अरविंद श्रीवास्तव की सात कविताएं

अरविन्द श्रीवास्तव की कविताएँ अपने समय के खतरों का ताजा बयान है।  आधुनिक होते मनुष्य का समय प्रेम के अनुकूल होने की लंबी प्रतीक्षा में बीतता जा रहा है, जो बड़ी त्रासद और वेदनायुक्त है। इसे मनुष्यता पर खतरे की संकेत के रूप में कवि देखता है –
“लिहाजा यह समय
प्रेम विस्तार या कि
इन्तजार के लिए
खतरे से खाली नहीं है !’ 【खतरों भरा समय】
प्रेम पर यह डर की ही पहरेदारी है ,जो आदमी को चुप करा देती है और जो चुप नहीं रहते, उन्हें कौवे की जात में शुमार कर दिया जाता है। देखें कविता ‘राइफल’ । दुनिया भर की बुराई को बांचते हुए भी हम उसके फेरे में रहते हैं। असहमति की जमीन इस खराब वक्त के नीचे से लगातार खिसकती जा रही है जो उनकी कविता ‘असहमति’ की मूल वस्तु है। आप महसूस करेंगे कि अरविन्द श्रीवास्तव की काव्यभाषा अपने समकालीनों से अलग और बेधक होती है।  वे कविता में लगातार हमारी संवेदना और अनुभव को नवीकृत करते चलते हैं और भरसक उन तारों को छूकर झनझनाने का उपक्रम भी करते दिखते हैं  –
“प्रेम में / कईयों ने खून से खत लिखे / कइयों ने लिखी कविताएँ / मैंने मैदान में दौड़ाई साईकिल / लगाया चक्कर / कई-कई बार / हैंडिल छोड़ के ! (‘प्रेम में’ / पृ. सं.- 38)।
देखा जाए तो एक अलक्षित भाव-बोध से विस्मित करना अरविन्द की कविताओं की खास पहचान है। महसूस किया जा सकता है कि कवि का यह कर्म उनके प्रेम के आख्यान में और मस्ताना, और दीवाना, और कबीराना हो जाता है जो मानवीय मूल्यों के बरअक्स एक अचूक, बेध्य और संवेदी भाषा के साथ अपने कथ्य को बिलकुल नई भंगिमा में उद्भासित करता है –
“दुनिया की सबसे निश्छल लड़की / यदि करती है मुझसे प्रेम / और कहती है ‘आई लव यू’ / तो इसे मैं मानूँगा नहीं / और इसे मानता भी हूँ तो / उसे देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है / और यदि एक झूठा / फरेब और मक्कार राजनेता / कहता है यही / तो कम से कम उसे देने के लिए / मेरे पास / एक ‘मत’ है !” (लोकतन्त्र / पृ. सं. 72)।
सदृश इनकी अनेक कविताओं का अंदाज-ए-बयां और काव्य-फल चौंकाने वाला होता है – जैसे कि ‘घटनाएँ बगैर कौतूहल’ कविता का यह अंश देखा जा सकता है  –
“जब अचंभित होंगे हम / और समाप्त हो जाएंगे / दुनिया के तमाम कौतूहल / तब मेरे हथेली पर काँच गड़ाकर तुम पूछोगे / बताओ यंत्रणा कितनी है पीड़ादायक / और कहूँगा मैं-मौसम आज सुहावना है बहुत” ।
इस तरह की अलक्षित और नव्य-संवेदनाओं से उनकी बहुत सारी कविताएँ अटी पड़ी हैं, मानों उनके काव्याकाश से गुजरते हुए हम एक नई कौंध, एक नए चमक के पास से होकर गुजरते हैं, जो  कुछ और संदर्भों व उदाहरणों को देखने से अधिक स्पष्ट होगा। एक कविता है ‘रोटी’- केवल दो पंक्तियों की कविता है यह –
‘रोटी जली तो क्या हुआ
खुशबू तो बिखर गई !’
यहाँ कवि की चिंता रोटी के जलने में नहीं, उसकी खुशबू से ही कवि तृप्त और आह्लादित दिखता है। या फिर कविता ‘मुखौटा’ ही –
‘मैंने मारा अपने हृदय पर / पश्चात्ताप का कोड़ा / और लगाई दौड़ सरपट / उस जगह की / जहाँ मैं / छोड़ आया था / अपना मुखौटा’।
हालाकि उन्हें अहसास है कि मनुष्य का ’हृदय’ बर्फ हो रहा है और उसकी संवेदना-शक्ति क्षीण। इसमें बाजार का खतरा भी शामिल है जो हमें बाहर ही नहीं, अंदर से भी बेपर्द करता है बेरुखी से। पर  गंभीर कहन में भी वे हमारी संवेदना को झकझोरने में कोई-कसर नहीं रखते, इनकी कविता ‘बाजार’ देखिए –
“(1) पहले दबोचा / फिर नोचा कुछ इस तरह / कि / मजा आ गया / (2) उड़ा ले गई / छप्पर का पुआल / देह की मिरजई / बाजार बेपर्द करती है / बेरुखी से / (3) पहले खरीदता हूँ / चमकीले / काँच के टुकड़े / बिखेरता हूँ जिन्हें / फर्श पर / बीनता हूँ फिर / बारीकी से / किसी खतरे के अंदेशे में।“ (‘बाज़ार’ / पृ . सं. 29)
पहले काव्य-संग्रह ‘एक और दुनिया के बारे में’ (2005) से हिन्दी कविता में अपनी उपस्थिति दर्ज करने वाले कवि अरविंद श्रीवास्तव की दो और कविता की किताबें आ चुकी हैं – ‘अफ़सोस के लिए कुछ शब्द’ (2009) और ‘राजधानी में एक उज़बेक लड़की’ (2012)। इन वर्षों में कवि की भाषा-शैली का जो विकास हुआ है उसका संकेत हमें उनके आरंभिक काल की कविताओं में ही मिल जाती है –
“एक बुढ़िया सड़क किनारे / बुदबुदा रही है / ‘यह दुनिया नहीं रह गई हैं / रहने के काबिल’ / ठीक ऐसे ही समय में / एक बच्चा अस्पताल में / गर्भाशय के तमाम बंधनों को तोड़ते हुए / पुरज़ोर ताक़त से / आना चाहता है / पृथ्वी पर !” (‘एक ही वक़्त में’ / संग्रह ‘एक और दुनिया के बारे में’ से)।
दूसरे संग्रह तक आते-आते कवि की भाषा और तीक्ष्ण, और मार्मिक हो जाती है –
“ये औरतें बित्ते-बित्ते में / साग-पात रोप / अपनी तैयारी रखती थी / मुश्किल वक़्त के लिए / … / ये महिलाएँ बीज बनकर आई थीं / यहाँ की मिट्टी से सनकर / की थीं गर्भधारण / मुहल्ले के रूप में इन्होंने एक दुनिया विकसित की थीं” /(‘इस तरह बनी थी एक दुनिया’ कविता का अंश)।
अद्यतन संग्रह ‘राजधानी में एक उज़बेक लड़की’(2012) में यह काव्य-भाषा और धारदार मिलती है :
“पत्ते कभी पीले नहीं होते / नहीं छिपाना पड़ता / नारियल को अपनी सफ़ेदी / नाटक के सारे पात्र / पत्थरों में आत्मा का संचार करते / नदियाँ रोतीं नहीं / और समुद्र हुँकार नहीं भरते / शब्द बासी नहीं पड़ते / और संदेह के दायरे से प्रेम / हमेशा मुक्त होता” (‘एक डरी और सहमी दुनिया में’ / पृ. सं. – 9)।
कहना न होगा कि भाषा के जादुई सम्मोहन से अरविन्द श्रीवास्तव का कवि दिन-दिन अमानवीय होते समय के साथ जीवन की पड़ताल पूरी बेबाकी और उस अभीष्ट खुलापन के साथ करता है जो उनके कविता की एक ऐसी स्वायत्त दुनिया रचती  है जो हमें विस्मित कर क्षण भर ठहर कर सोचने को मजबूर करती है। यही इनकी भाषा का गुण और समझदारी है।
आइए, मन को कौंधने और आलोड़ने वाली उनकी कुछ लघु कविताएँ पढ़ते हैं , जिसे उन्होंने बड़े अपनपों और प्यार से लिखकर मुझे भेजा है।
हम उनके जन्मदिन पर इन्हें सुधी पाठकों को नज़र करते हुए हर्षातिरेक हो उन्हें अपनी अप्रतिम  शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं –

–सुशील कुमार (09006740311)

खतरों भरा समय
कैसे करूँ इंतज़ार..
जब जेब में फूटी कौड़ी नदारत हो
पुस्तैनी विरासत के नाम पर
टूटे-फूटे छप्पर और नज़्म की
दो-चार फटी-चीटी-सी
अब के समय की
सबसे फालतू पुस्तकें

गले में घोंटने भर थूक
और जड़ता कुछ इस तरह
कि गोलियों से छलनी कर दे कोई
तो उफ़ न निकले

आबरू का एक खोखला मुखौटा
रख छोड़ा है बाप-दादों ने
कि हरामखोरी से बची रहे पीढ़ी
नसीहत की चिथड़ी किन्तु लम्बी चादर में
अपने ढकने का स्वांग रचकर
किसी राजर्षि स्वप्न की कामनाओं सहित
करूँ इंतज़ार, कैसे

जब पूरी की पूरी सदी लेपटॉप में बंद पड़ी हो
और जीवन व्यवस्था
सौदागरों के हाथ गिरवी
दुनिया भर के हुक्मरान हाथ धोकर पीछे पड़े हों
प्रेम के खिलाफ..

लिहाजा यह समय
प्रेम विस्तार या कि
इन्तजार के लिए
खतरे से खाली नहीं है !

राइफल

जानकार सूत्रों ने बताया कि
बेहद सम्मान है चीन की संस्कृति में
राइफलों का

हमने खुली आँखों से देखा कि
चीन ही नहीं
अन्दर ही अन्दर पूरी दुनिया
प्यार करती है राइफल और
राइफल वाली संस्कृति से

राइफल की आवाज सुनकर
आम आदमी चुप्पी साध लेता है
कौवे बचे हैं..
जो चुप नहीं बैठते !

असहमति

वह धीरे से सरका
करीब आया
दबी किन्तु सख्त जुबान में बोला
‘स्मैक’ लोगे ?

मैं कहता नहीं..
फिर भी मुझे
लेना पड़ता !

मेरा पार्टनर

अभी थोड़ी देर में
हम पार्टनर को करेंगे फोन
पाउंड-डालर का पूछेंगे भाव
बातें करेंगे शेयर-डिबेंचर और नोटबंदी की
नई सेल्स स्कीम के लिए
करेंगे शिनाख्त
ख़ूबसूरत हसीना की

अभी थोड़ी देर में
हम निकालेंगे समय
चाहेंगे बहाना आंसू
संत्रास झेलते समय पर

और हम ऐसा नहीं कर पायेंगे
मेरे मुड़ते ही मेरे पीछे
मेरा पार्टनर
खडा कर चुका होगा..
मेरे खिलाफ
हथियारबंद दस्ता !

तुम्हारे हाथों 

ब्रह्माण्ड का गिरमिटिया हूँ
अनुबंध पर आया हूँ
चंद दिनों के लिए
धरती पर

साठ-सत्तर की अपनी थकान
उतारनी है इसी जगह
अनुबंध के अंतिम पल को
तुम्हारे नाम कर जाउंगा
समय के सबसे तेज़ घोड़े पर चढ़कर
लौट जाउँगा
तुम्हारे हाथों
सौंप कर
कोई गुमनाम ख़त !

माचिस

यह माचिस की तीली थी

जिसने मुझे साथ-साथ रहना सिखाया था

हम पेड़ से गिरे शाख थे

हम प्रेम में असफल प्रेमी

चूतिया किस्म के लोग

धरती को संदेह भरी आँखों से देखते हुए

घात में बैठे पेशेवर पंडित

उबाऊ समय में दक्ष कलाकार

अधिक सतर्क और ज्यादा चौकस

अनार के दाने और मेहदी के रंग

सभी कुछ डब्बे में बंद

सह अस्तित्व व प्रेम हूक

यह धरती एक डब्बा

जहाँ चूल्हे पर खदकता भात

कोंपले फूटने को तैयार

और राजमार्ग व्यस्त

श्मशान की तरह

हमारे योद्धा

मुस्कुरा रहे थे सितारे

मेरी वसीयतों को देखकर..

नदियाँ गा रही थी मंद-मंद

पर्वतों से बादलों का संवाद ज़ारी था

खेल रही थी हवाएं मेरे बदन से

सभ्यताओं पर सभ्यताएं उग रही थी

शताब्दियाँ छोड़ रही थी पीछे सदी

घास ने चादर बिछा दी धरती पर

और स्त्रियाँ घोल रही थी वातावरण में प्रेम राग

 

विचारकों से भरी पड़ी थी दुनिया

नकारात्मकता निगरानी के दायरे में थी

और हमारे योद्धा

जुटे थे

सितारों पर हमले की तैयारी में !

**
अरविन्द श्रीवास्तव
= कला कुटीर, अशेष मार्ग,

मधेपुरा-852113. (बिहार)

मोबाइल- 9431080862

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