महाप्राण की ‘निष्प्राण’ होतीं स्मृतियां

आशीष सिंह

सारी  तस्वीरें : आशीष सिंह

तस्वीरों में निराला का गांव

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मेरे भाई ! उनकी निगाह में “गढ़ाकोला ” इसलिये नहीं है
क्योंकि उनकी निगाह में आम -अवाम है ही नहीं – “”-

– महाकवि के गांव से वापस आकर एक कुछ देखी — कुछ सुनी रपट आपके लिए

करीब अस्सी किलोमीटर का सफर पूरा करने में आपको गर तीन घंटे से ज्यादा लग जाये, वह भी जब आप निजी वाहन से हों , तब कल्पना कर सकते हैं कि गढ़ाकोला नामक गांव में पहुंचना कितना सुगम है । राह में कई जगह गढ़ाकोला या निराला के गांव के बारे में ग्रामीणों से पूछा गया , हर बार प्रत्युत्तर में अनभिज्ञता मिली । रास्ते में कहीं एक छोटा सा पत्थर भी नहीं मिला, जहाँ से पता चलता यह राह गढ़ाकोला जा रही है ,यह राह हिंदी के एक ऐसे महाकवि के पैतृक घर की ओर जा रही है जिसने गांधी जैसे युगपुरूष और नेहरू जैसे राजनेता को भी हिंदी की ताकत का अहसास कराया था । यह तो भला हुआ गूगल मैप का, जिसके सहारे हमारे नौजवान दोस्त शुभम और रंजीत लगातार भटकते -भटकते वापस गढ़ाकोला की राह ढूंढ ही ले रहे थे । अन्ततः एकाध जगह थोड़ा अल्पविराम लेकर हम अपने प्रिय कवि के गांव में दाखिल हुए , गांव के ठीक पहले मोड़ पर ‘निराला की बड़ी तसवीर लगी एक पट्टी दिखी, जिस पर लिखा था “निराला शिक्षा निकेतन , गढ़ाकोला , उन्नाव , यह पट्टी ही बता रही थी कि आप निराला के गांव में प्रविष्ट हो रहे हैं ,और इस बात की ताकीद भी कि जनता का कवि जन स्मृतियों कैसे जीवित है , एक उम्मीद जगाती सी नाम पट्टिका ।
कुछ देर चलने पर हम पाते हैं कि एक तरफ पंडाल लगा है , सैकड़ों ग्रामीण कुर्सियों पर विराजमान हैं , आल्हा गायन चल रहा है । अवध के गांव में किसान जनसमुदाय के बीच प्रचलित जनगीत , अल्हैतों को गाते देखते हुए क्षण भर ही हम खड़े हुए थे कि एक सज्जन मंच से उतरकर हम लोगों की तरफ आते दिखे ,मिला-मिली हुई । उनसे हमारी कोई जान पहचान नहीं थी, लेकिन आये लोगों के प्रति उन सज्जन का आत्मीय व्यवहार अपनों के स्वागत सरीखा लगा । उनके मार्गदर्शन में ही हम सब बगल में रखी कुर्सियों पर जा विराजे । सूर्यकान्त त्रिपाठी ,निराला स्मृति कमेटी द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम देखकर मन खुशी से भरा गया । जनता अपने लिए जीने वाले महाकवि को कितना प्यार करती है ।अपने तरीके से उन्हें याद कर रही है । हर वर्ष वसंत पंचमी को कविता पाठ , लोक गायन और सांस्कृतिक उत्सव के रूप में अपनी धरती पर पले -बढ़े कवि के जन्मदिन पर याद करती है
लेकिन हमारे शहरी कानों को वो आल्हा कहाँ सुहा रहा था ,कर्ण भेदी लगने लगा , हमारे एकाध मित्र कुनमुनाने भी लगे । इसी बीच हमारा सबसे युवा साथी शुभम यह तलाशने में लग गया कि आखिर निराला के घर तक कैसे पहुंचा जाये । होते करते दो छात्र मिल गये, जो हमें निराला के पैतृक घर तक ले जाते हुए यह बताते रहे कि हम नहीं जानते कि उनका घर कौन सा है , लेकिन गांव में एक जगह निराला जी की मूर्ति लगी है, जहाँ हर साल वसंत पंचमी को हमारे गुरू जी सारे बच्चों को वहाँ ले जाते थे । बात करते -करते हमें आसपास छोटी -छोटी दुकानें ,कच्चे -पक्के घर मिलते गये । जैसा आप देश के किसी गांव में गुजरते हुए देख सकते हैं ,जहाँ विकास रूपी पूंजी की गंगा नहीं पहुंची है । जहाँ पूंजी पहुँची भी है, वहाँ समस्त आत्मीयता सिक्कों में तब्दील हो गयी है , संपन्न और विपन्न की खाई गहरी ही हुई है । लेकिन फिर भी तथाकथित जड़ प्राचीनता से भयावह आधुनिकता अच्छी है ,आगे जी लेने की कुछ राहें तो खुलती ही हैं । खैर ! ये अतिरिक्त बातें हैं , हम मूल बात पर आते हैं ।गांव में चलते -चलते लगभग हम सब रूक ही गये , बड़े जगत वाले इंदारा दर्शन जो हुआ ,
हमें बहुत सालों बाद जीवित कुएं दिखे थे । लोग पानी भर रहे थे ।एक तरफ कुछ सुखद आश्चर्य मिश्रित अनुभूति हुई कि अच्छा !यहाँ आज भी हमारे परम्परागत जल संरक्षण के रूप मौजूद हैं ,वहीं दूसरी तरफ ये इंदारे उस गांव की आर्थिक दशा की गवाही भी दे रही थे ।बड़ी -बूढ़ी महिलाएं गराड़ी से पानी खींच रही हैं। यह शौक नहीं ,बल्कि इस गांव के पिछड़े हालात की जीवित निशानियां हैं । इसका मतलब यह नहीं कि उस गांव में पानी निकासी के आधुनिक संसाधन नहीं ही होंगे , हो सकते हैं लेकिन छोटी सी दूरी में कइयों विशालकाय कुंओं का मिलना यह साबित करता है कि बहुसंख्यक आबादी किस तरह गुजर -बसर करती है ।
यहाँ इलाज के लिए बड़ा अस्पताल नहीं है । कहने को सरकारी स्कूल है, जहाँ पढ़ाई की व्यवस्था इतनी ही ” उन्नत ” व्यवस्था है, जितनी की प्रदेश के तमाम दूसरे सरकारी शिक्षा संस्थानों में है । महाविद्यालय और इंटर कालेज सरकारी ही हैं ! शायद ! इस गांव में न कोई कोई वाचनालय है और न ही कोई पुस्तकालय ।
उस कवि के गांव में जिसकी आकांक्षा थी कि गांव-गांव में पुस्तकालय होने चाहिए ,तभी हमारे देश की सामाजिक चेतना उन्नत हो पायेगी । हाँ ! मन्दिर कई दिख रहे थे । शायद इसका एक नाता यहाँ के जीवन से भी हो ! हमारी आर्थिक स्थितियों की इंदराजी कराती सामाजिक चेतना जो इन भयानक स्थितियों में भी जी लेने का सम्बल बन जाती है ।
बात करते -करते हम उस जगह पहुंचे जहाँ एक छोटी चहारदीवारी से घिरे प्रांगण में बने चबूतरे पर हमारे महाकवि की सुन्दर आवक्ष प्रतिमा स्थापित है । ऊपर छत है ,नीचे थोड़ा बड़ा चबूतरा । दो तरफ से कच्चे कमरों से घिरा ‘निराला प्रांगण “। कमरभर चहारदीवारी से घिरा । किनारे -किनारे बड़े करीने से फूलपौधे लगे थे , जहाँ गेंदा ,गुलाब नामधारी ,कुछ अनाम फूल मुस्करा रहे थे । वहाँ जाते ही एक बुज़ुर्ग सज्जन व ,कुछ बूढ़ी महिलायें भी बैठी मिली , पता चला वे निराला के परिवारीजन हैं । कल इसी चहारदीवारी से सटी कच्ची दीवार व चहारदीवारी का एक कोना ढह जाने से घर की बहू व दो बच्चे चोट खा गये हैं । बहू को ज्यादा चोट आ गयी है , कल शाम को बोल पायी थी । सरकारी अस्पताल लेकर गये हैं ,किसी तरह इलाज चल रहा है । यह सुनते ही मन दुखी हो गया । सारा उत्साह ठंडा पड़ गया । मन में अब तक उठते रहे सारे सवाल छूमंतर हो गये । । । खैर ! हम लोगों ने कुछ पंखुड़ियां लेकर निराला जी की प्रतिमा को सादर प्रणाम किया । और वहीं उनके सानिध्य में ही चबूतरे पर बैठकर बातचीत करने लगे । तब तक एक सज्जन एक थाली में बिस्कुट -नमकीन और दूसरी थाली में चाय लेकर आ गये । एक अनजान इलाके में भी अपनों के प्रीति कैसी होती है ,हम सब महसूस कर रहे थे। हम सब चाय -पानी पीकर आगे की योजना बनाने लगे । तब तक राय बनी कि यहीं हम सब निराला की कविताओं को पाठ करेंगे । शुभम ,धनंजय , रंजीत व विशाल सभी युवा साथियों ने अपनी अपनी रुचि की कविताओं को पढ़ा ।शुभम ने तो निराला की कई -एक कविताओं को गाकर भी सुनाया । अभिभूत करने लायक गायन । सच।
इस दौरान लोग आते जा रहे थे ,हम सब के अनियोजित परन्तु उत्साह भरे काव्य पाठ -बातचीत में शामिल होते जा रहे थे । अपने -अपने तरह से निराला के व्यक्तित्व और कविता के मर्म को समझाने -बताने में भी भागीदारी कर रहे थे ।
वे बुज़ुर्ग सज्जन जो निराला के सम्भवतः पोते लगते हैं , उनसे परिवार के बारे में , निराला के बारे में ढेरों बातें सुनने को मिल रही थी । यह भी जो हिस्सा यहाँ से निकलकर शहरातू बन गया वह लौटकर यहाँ की दशा देखने नहीं आया । और आये भी क्यों ? न यहाँ कोई जर -जमीन है न जीविका का कोई स्थाई साधन । सम्भवतः एक बीघा खेत है । शासन ने कभी ढाई बीघा देने का वायदा किया था , वो महज वायदा ही रह गया । कमोबेश इसीलिए परिवार का एक हिस्सा बंगाल में बस गया तो दूसरे हिस्से इलाहाबाद ,उन्नाव आदि के अलग-अलग जगहों पर । वे खुद यहाँ नहीं रहते हैं । उन्नाव में ही दूसरी जगह -वह नाम याद नहीं आरहा – घर पर ही अन्नपूर्णा मंदिर बनाकर जीविका निर्वहन करते हैं । यहाँ राशन कार्ड तक नहीं बना है ।

महज एक बीघा जमीन में लोग कितना खा लेंगे और कैसे ? वे हम सबको निराला प्रांगण से ही सटे पुश्तैनी
घर दिखाने लगे । साथ में बोलते जा रहे थे “कल बहू चोट खा गई है , कल शाम को बोली थी ,तब से बोली नहीं “। ( इस वाक्य को पढ़ते हुए जो तकलीफ आपको हो रही है , उससे कम तकलीफ़देह हमारे लिए भी नहीं था यह सब सुनना और यह उजाड़ मंजर देखते रहना ) वे बता रहे हैं ” यह जो दो कमरे पक्के वाले –बिना प्लास्टर के — कालोनी के पैसे से बनवाया गया है ।” हम देखते हैं घर का अन्दरूनी हिस्सा मलबे में बदल चुका है ,गिरा पड़ा मैदान सरीखे ,
घर का मुख्य हिस्सा कच्चा बना है । छप्पर रखा हुआ । घर के सामने और घर के पीछे एक कच्चे कमरे को ही मुख्य हिस्सा मान सकते हैं ।

बताने लगे ‘यह वही कमरा है जिसमें बाबा काव्य -साधना करते थे । इसी में एक हाथ की चकिया पर अपने भतीजों केशव और कालीचरन को अपने हाथ से आटा पीसकर खिलाते थे और कहते थे ” आटा पीसेंगे सूरज किरन ,रोटी खायेंगे केशव-कालीचरन “। मालूम हो कि निराला जी के दोनों बच्चे रामकृष्ण और सरोज का पालन- पोषण उनके नानी -नाना के घर पर ही हुआ था । घर के अन्दर पड़ा खाली हाता और गिरी-पड़ी दीवालें और कल की रोटी का जुगाड़ की पक्की व्यवस्था की कोई गारंटी नहीं । आजाद भारत में आम आदमी की यही तस्वीर है , इसमें निराला के परिवार की बात नहीं ,बल्कि देश के हर गांव के गरीब-गुरबे के परिवार की यही कहानी है । यह सब देखते ही हमें अपना गांव और अपने परिवार के लोग नजर आ रहे थे । मन में एक तरफ यह सवाल भी पनपा कि निराला जिनकी नुमायन्दगी कर रहे थे , उनके लोग आज भी उसी हालत में हैं या यूँ कहें कि उससे भी बुरी हालत में हैं । ऐसे में हम क्या सिर्फ निराला के घर, निराला के गांव की विकास की बात करें तो क्यों करें ? और करें भी तो किससे करें ? फिर मन में दूसरा सवाल कौंधा गर निराला उच्च वर्ग से या उच्च वर्ग को खुश रखने वाला साहित्य रचते ,समझौता परस्त साहित्यकार होते तो तो क्या उनकी स्मृतियों के साथ ऐसा व्यवहार होता ! शायद नहीं । लेकिन तब क्या उनकी लेखनी की लपट ऐसी होती कि आज उनकी मृत्यु के लगभग साठ साल बाद भी साहित्य से थोड़ा -बहुत सरोकार रखने वाले लोग , आम जन उनको इतनी आत्मीयता से याद करते और अभी तक । क्या हम सब यहाँ —–? ”
इसी के साथ एक सवाल यह भी पनपा कि आखिर हम अपने साहित्यकारों – संस्कृतिकर्मियों की स्मृतियों को संरक्षित करने के लिए इतना पीछे क्यों हैं !
सोचते -विचारते भरे कदमों से हम वापस हो रहे थे ।हम सब लगभग चुप थे । अपनी असहायता और अपने शासन की हृदयहीनता से दिल कचोट रहा था ।
लौटकर हम वापस उसी मेले में शामिल होते हैं ,, जहाँ पहले सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहा था , निराला के नाम से बने एक बरामदे में अब इलाके के विधायक माननीय हृदयनारायण दीक्षित जी अपने लाव लसकर के साथ पधार चुके थे । अब आल्हा और सामाजिक कविता की जगह पर उद्घोषक माननीय विधानसभा अध्यक्ष जी का कवित्व शैली में बखान कर रहा था । लाल चेहरे वाले पैरों पर पैर चढ़ाये नेताजी बैठे थे ,अब सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला स्मृति समिति “के बैनर माननीय विधायक जी का बैनर लगभग ढक लेने को उतारू था , आसपास पुलिस महकमे की गाड़ियों के साथ तमाम प्रशासनिक अमला अपने अपने वाहनों पर सवार होकर आया था । पता नही यह सब महाकवि को बधाई देने आये थे या अपने सरताज की सेवा में । लेकिन गाड़ियों का यह रेला और इधर-उधर लगी जलेबी , मूंगफली , बतासे , बेर बेचती -खरीदती आबादी बिलकुल अलग-अलग नजर आ रही थी ।
जहाँ से नेताजी की बलैया ली जा रही थी , उसके ठीक सामने “निराला उद्यान ” नाम का एक जंग खाया बोर्ड लगा है , जिस उद्यान का गेट टूटा पड़ा है , उसके रेलिंग जगह -जगह बिछी है , वहाँ जगह-जगह झूले लगे हैं लेकिन वह भी मृतप्राय से , पूरा उद्यान महज उजाड़ जगह बनकर रह गई है । उसमें कभी बेहद भली भावना से एक बोरिंग और इंजन रखा गया था ,बोरिंग का कुआँ पटा पड़ा है और इंजन की उम्र आदिकालीन होने की गवाही दे रही है । किनारे शिलापट्ट हैं जिन पर आज भी महाकवि के रचनाओं के उद्धरण हमसे सवाल पूछते हैं और कहते हैं
“जीर्ण बाहु , है शीर्ण शरीर
तुझे बुलाता कृषक अधीर ,
ऐ विप्लव के वीर!
चूस लिया है उसका सार,
हाड़ -मात्र ही है आधार
ऐ जीवन के पारावार ! ”

शाम हो रही थी , अब वापस भी होना है । लेकिन निगाह में अपने प्रिय कवि की तमाम स्मृतियों के रूप में न दर्ज की जा सकने वाली निगाहें दर्ज हैं । जो निगाहें आपके अपने शहर -गांव हरजगह आप से टकरा जाती हैं , और हम -आप बच निकलने की कोशिश करते मिलते हैं । अपने आपसे , उन निगाहों से ।
आलीशान इमारत ,खूबसूरत मेहराबें ,करीने के बेल-बूटे और गजब की नक्काशी के बरक्स टूटे -फूटे कच्चे घर ,बिखरी जिंदगियां और नामालूम कहाँ खो गई उम्मीदों , सामने आ सवाल करती निगाहें आपको परेशान कर देती हैं , बुरी तौर पर अपने आप सोचने के लिए विवश कर देती हैं । किन परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना करते हुए महाकवि ने एक उदात्त जीवन की ओर देखने के लिए हमारी निगाहों में झांका होगा । कितनी गहरी पीड़ा से जन्में होंगे ये शब्द कि ” गहन है यह अंधकारा
स्वार्थ के अवगुण्ठनों से हुआ है , लुण्ठन हमारा ” ।
प्रणाम मेरे महाकवि ! हम कृतघ्न कौमें हैं , हम आज भी अपने आसपास के भयावह जीवन को नही देख पा रहे हैं और न ही आपकी आवाज़ को सुनने लायक बन पा रहे हैं। हम जब भी परेशान होते हैं , आपकी ओर ही तो ताकते हैं । हम यह दिन याद रखेंगे और आपको भी और उनको भी जो महज नामलेवा होकर आपको मूर्तियों में तब्दील कर देना चाहते हैं और उन तमाम पढ़ी -ना पढ़ी अवाम को भी जो आपकी कविता भले न समझती हो , लेकिन अपने जन के प्रति आपके हृदय में कितना प्यार है उसे जानती है । इसीलिये अपने तरीके से आपको याद करती है । आखिर यह एक लेखक की रचनात्मक ताकत ही तो है कि चंद नौजवान अपने लेखक के पैतृक आवास तक उन्हें सलाम करने पहुंच जाते हैं । हम अपने भास ,भवभूति या वाल्मीकि को कहाँ पहचानते हैं , उनके नामों की माला जपना , उनकी प्रतिमा/प्रतिष्ठान बनाकर उनके नाम को सिक्कों में , पहचानों में भुनाना जरुर जानते हैं । अबकी वसंत पंचमी को जब हम कुछ नौजवानों ने महाप्राण निराला को प्रणाम करने महाकवि के पैतृक गांव जाने का निर्णय लिया था , तब हम में से कोई भी निराला के गांव कभी गया नहीं था । और हम किसी गांव जा भी नहीं रहे थे ,हम अपने साहित्यिक पुरखे की जगह -जमीन महसूसने जा रहे थे ,जिसका चैतन्य काल तो बंगाल की माटी में अंकुरित हुआ था ,वहाँ की शस्य श्यामला धरती में ही उसके व्यक्तित्व में साहित्यिक -सांस्कृतिक भाव अंकुरित हुए औरअवध के एक बेहद पिछड़े गांव गढ़ाकोला ने जीवन के ठोस यथार्थ से परिचित कराते हुए उनके व्यक्तित्व को चुनौतियों का सामना करने लायक बनाया था । निराला के व्यक्तित्व की आन्तरिक दृढ़ता और निश्छल भावुकता में इन अलग-अलग संस्कृतियों और भाषा -भाषी जमीन के अदभुत सहमेल का ही परिणाम है , इसी में उनकी पौरुष भरी गुर गम्भीर वाणी और आत्मीयता की गूंज मौजूद है । जो जीवित रहते हुए तमाम युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करता रहा और मृत्योपरांत भी युवाओं को अपनी लेखकीय आभा से लगातार अपनी ओर खींच रहा है । शायद ये निराला ही होंगे जिनको लगभग तमाम रचनाकारों ने अपनी कविता / जीवनी / संस्मरण के जरिये लगातार याद किया है, वे चाहे शमशेर , नागार्जुन , त्रिलोचन , शिवमंगल सिंह सुमन , रामविलास शर्मा , अज्ञेय व अमृतलाल नागर जैसे अनेकानेक बड़े रचनाकार ही क्यों न हों । शमशेर महाकवि को याद करते हुए कहते हैं कि जब जब मैं राह भटका ,सघन तम में,तुम ही दीख पड़े ‘, हे महाकवि । ” क्या शमशेर ने यह पंक्ति यूँ ही कही थी ! नहीं ।?या सही मायने में आम जन के साथ एकाकार होकर उनकी उम्मीदों के साथ खड़े होने की जरुरत है । इसी रूप में निराला हमारे मार्गदर्शक रचनाकार हैं ।
लेकिन फिर कहीं कोने से एक आवाज़ आती है कि हम अपने रचनाकार को कितना समझते हैं , और नहीं तो क्यों ? आखिर उन जैसे तमाम रचनाकारों की अन्तिम परिणति क्या उन जैसी नही होगी या नहीं हुई है । भुवनेश्वर ,सुरेन्द्रपाल जैसे तमाम रचनाकार उसी की अगली कड़ी ही तो हैं ! या नहीं ?

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