वर्तमान को राह दिखाती कविताएं

पुस्तक समीक्षा

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

 ‘कट रहे वन-उपवन

बना जीवन विजन।

सुख-शांति के आगार

बने कारागार

साकार बने निर्जन’’

शहर की लपलपाती जीभ अपनी सीमा का अतिक्रमण कर खेत-खलिहान-जंगलों को लगातार निगल रही है। वो हर कुछ खा जाना चाहती है। वो खेत-खलिहानों को मॉल में बदल देना चाहती है। जंगल में पेड़ों की जगह कंक्रीट की बिल्डिंग उगाना चाहती है। उसकी महत्वाकांक्षा इतनी बड़ी है कि इंसान और इंसानियत उसके आगे बौने नज़र आने लगे हैं। इस सच्चाई पर तमाम कविताएं लिखी गई हैं लेकिन उन कविताओं को पढ़ते हुए प्रो वरयाम सिंह की ये पंक्तियां याद आती हैं,

कविता में नागरिक सरोकार व्यक्त हों, इससे शायद ही कोई असहमत हो, लेकिन इतने जोर-शोर के साथ कि कविता पत्रकारिता के स्तर पर उतर आये, ये स्वीकार्य नहीं।

प्रोफेसर रामस्वार्थ ठाकुर की कविताएं ठीक इसी जगह खुद को अलग ऊंचाई पर स्थापित करती हैं।नागरिक सरोकारों की चिंता करते वक्त उनकी कविता कविताई से नहीं बिछड़ती। और इसलिए कविता कविता बनी रहती है, ख़बर बनने से बच जाती है। इस आलेख की शुरुआत मैंने कविता की जिन पंक्तियों से की, वो प्रोफेसर ठाकुर की लिखी हुई हैं और उनके सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह अतीत के मुखर वर्तमान में संकलित हैं।

अतीत के मुखर वर्तमान में रामस्वार्थ ठाकुर की कविताओं का अंदाज़ और शिल्प प्रभावित करती है। साफ बातों को साफ-साफ ही कहा गया है, वो सीधे मर्म पर चोट करती हैं। मसलन ये जगह, ये शहर कविता की इन पंक्तियों को देखिए

क्या कहूं—

ये शहर क्या नाम है

यही जानो-दोस्त                               

यहां हर दिल शीशा

हर रूह कशिश

यहां हर भेड़िये की खाल पर लिखा

एक मेमने का नाम है।

अतीत के मुखर वर्तमान में कविताओं को 6 खंडों में विभाजित किया गया है। सम-सामयिक कविता, प्रकृति, गांव की कविताएं, विविध कविताएं, बीमार की कविताएं और बच्चों के लिए। हर खंड की कविताओं का अपना अलग संदेश है, अपना अलग अंदाज़ है और अपनी अलग लय है लेकिन हर जगह वो बात आम आदमी की ही करती है। उसके सुख की, उसके दर्द की, उसकी विडंबनाओं की।

आप खुद देखिए कवि जनतंत्र को किस तरह परिभाषित करता है। असली जनतंत्र कविता में वो लिखते हैं

असली जनतंत्र

जहां कानून

किताब की इबारतें

न्याय—विवादों का शेष

नेता—भीड़ को हांकने वाला

मताधिकार—मतदाता सूची में दर्ज एक नाम

और

नागरिक—एक अदद आदमी होता है

इसमें एक ही सहायक क्रिया होता है है।

क्या आप असली जनतंत्र के इस रूप से इनकार कर सकते हैं? आज के मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य को देखिए। इस कविता की एक एक पंक्ति फिट बैठती हैं।

बोलो मत कविता को पढ़ते हुए मुझे असहिष्णुता को लेकर बना डरावना माहौल याद आ जाता है।

बोलो मत

शब्द को शीत लग जाएगा

अथवा

चीनी या जापानी इन्सेफ्लाइटिस का संक्रमण

अथवा

सांप्रदायिक उन्माद में

कोई उसे छूरा भोंक देगा।

अटपटे बोल के बहाने रामस्वार्थ ठाकुर शब्दों की ऐसी चाबुक चलाते हैं कि कविता के कठघरे में खड़ा अपराधी तिलमिला उठता है। मसलन

खामोश है सड़क

राजा की सवारी निकलने वाली है

           *******

नगर के चौराहे पर

भ्रष्टाचार का वेपर लैंप

अंधकार में ऊंघ रहा है।

*******

राजनीति

शेर है, सिंह, भालू, गीदड़ है

यह आम आदमी के खून से मस्ती करती है।

रामस्वार्थ जी की कविताओं में गांव की ज़िन्दगी अपने यथार्थ रूप में उभर कर सामने आती है। गांव की गाय में वो लिखते हैं

गांव की गाय

न बाप, न माय

क्या खाये, कहां जाये

खूंटे से बंधी गाय।

गाय को प्रतीक बनाकर बड़े ही प्रभावी ढंग से गांव की उन मेहनतकश महिलाओं की ज़िन्दगी को भी उकेरने की कोशिश की गई हैं, जो परिवार-गांव-समाज के लिए हाड़तोड़ मेहनत करते हुए पूरी जिंदगी मानो एक खूंटे में बंधी हुई ही गुजार देती हैं। गांव कविता में वो गांव के दर्द को भी बखूबी चित्रित करते हैं

एक गांव-

भोर की उतारी हुई चादर

खेत की जमी हुई खादर

बंजर पड़ी धरती

दीख रह परती।

प्रकृति खंड की कविताओं में भी वो बार-बार गांव की ओर लौटते हैं। शहर में प्रकृति की कद्र कहां?

बीमार की कविताएं बताती हैं कि हम शाब्दिक हमदर्दी के दौर में जी रहे हैं।

वे मित्र

शब्दों में ही

रुपए, दवाएं, सेवाएं

और भी ढेर सारी आवश्यक वस्तुएं देकर

चले जाते हैं

संकलन की आखिरी दो कविताएं देखकर आप चौंक सकते हैं। इतनी धीर-गंभीर बातें करने वाले कवि की कलम बच्चों के लिए चली तो कमाल की चली।

अतीत के मुखर वर्तमान कविता संकलन का प्रकाशन इन्फ़ोलिम्नर मीडिया ने किया है और ये किताब amazon.com पर उपलब्ध है। नीचे के लिंक  पर क्लिक कर इस किताब  को खरीद सकते हैं।

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