जयनंदन की कहानी ‘और रास्ता क्या है’

गुणाकर अपनी गरीबी और जहालत से लड़कर भी टूट नहीं रहा था। सभी जानते थे कि इसके पीछे अस्मां की मोहब्बत एक ताकत बनकर छतरी की तरह उस पर तनी रहती है। उसके घर के दो लड़के सोबरन और रोहित भूख और बेरोजगारी से तंग आकर अंततः घर और गांव छोड़कर कहीं चले गये। जब चले गये तो घरवालों ने बहुत दिनों तक इंतजार किया मगर उनका कोई संदेश नहीं आया। जब इंतजार लंबा खिंच गया तो फिर अपने आप स्पष्ट हो गया कि वे कोई ऐसी जगह में हैं जहां का कोई पता नहीं होता और अगर होता भी है तो बताया नहीं जाता। लोग अनुमान लगाने लगे कि वे किसी ऐसे धंधे में लग गये हैं जो वैध नहीं है, जो बताने लायक नहीं है। गांववाले उन्हें लेकर आपस में चर्चा करते कि आखिर वे क्या करते होंगे…डकैती…अपहरण….दहशतगर्दी…नक्सलगिरी ?

स्नातक पास करने के बाद दोनों तीन-चार साल तक कोई सी भी एक नौकरी के लिए दिन रात एक किये रहे….भाग-दौड़…आवेदन…लिखित परीक्षा….साक्षात्कार। मगर कहीं कुछ नहीं हुआ। जमाने के रंग-ढंग को तजबीजते हुए दोनों भाइयों ने एक योजना के तहत इस जिले के सांसद बन्ना सिंह से नजदीकी बनायी। ढाई-तीन साल तक जी-जान से उनकी खिदमत में जुटे रहे। उसे चुनाव जिताने के लिए अनेक तरह के कुकर्म किये। चुनाव जीतकर बन्ना ने एक करोड़ रुपये में अपना समर्थन बेच दिया। एक अल्पमत का नेता, खरीदे गये सांसदों के बल पर, देश का प्रधानमंत्री बन गया। इस भ्रष्ट प्रधानमंत्री से नजदीकी खूब भुनायी गयी और बन्ना के घर में कई अन्य स्रोतों से भी धन बरसने लगे।

सोबरन ने अवसर को अनुकूल समझकर अपने पारिश्रमिक के लिए भी हाथ फैला दिया, ‘‘हमने जितना बन पड़ा तन-मन से आपकी सेवा की, अब हमें भी कोई किनारा पकड़ा दीजिये, सर। कोई सी भी चपरासी या क्लर्क की नौकरी दिला दीजिये। घर की हालत बहुत खस्ता है।’’

बहुत दिनों तक बन्ना उसे टालता रहा, फिर एक दिन उसने साफ-साफ कह दिया, ‘‘पचास-पचास हजार रुपये का जुगाड़ करो। जिस नौकरशाह को भी कहूंगा, कम से कम इतना तो लेगा ही।’’

उन दोनों की आंखों में पहले तो खून उतर आया, मगर वे कर भी क्या सकते थे। वह अब कोई छोटे रुतबे का आदमी नहीं रह गया था। देश को लूटते-लूटते अपने खास लोगों को लूटने में भी उसे कोई शर्म नहीं थी। घर में पांच रुपये भी नहीं थे, पचास हजार वे कहां से लाते।

सोबरन के पिता सनेही लाल और चाचा विदेही लाल बूढ़े हो चुके थे। किसी तरह अपनी मामूली खेती से दो-चार महीने की खर्च निकाल लेते थे, फिर उनके पास कोई उपाय नहीं रह जाता था और लगभग भुखमरी की स्थिति बरपा हो जाती थी। पुराने लोगों को कम खाने, नहीं खाने और रूखा-सूखा कुछ भी मिल जाये, उससे दिन खेप लेने की आदत बन गयी थी….मगर नये लड़के तिलमिला जाते थे। सोबरन और रोहित के लिए जब असह्य हो गया और उम्मीद की कहीं कोई किरण नहीं रही तो वे घर से चले गये। उनके पहले गांव से इसी तरह कुछ और लड़के भी चले गये थे।

अब सबको यह लगने लगा था कि गुणाकर भी उन्हीं के नक्शेकदम पर चल पड़ेगा। अस्मां उसकी आजिजी और खीज को महसूस कर रही थी। एक दिन उसने कहा, ‘‘गुणाकर, तुम सबसे अलग हो…तुममें ज्यादा काबिलयत है…अपने क्लास में हमेशा अव्वल आते रहे…तुम तबीयत से कोशिश करोगे तो तुम्हें कोई न कोई नौकरी जरूर मिल जायेगी।’’

‘‘तुम डरो मत अस्मां, मैं अपने भाइयों की तरह आसानी से गांव छोड़कर जानेवाला नहीं हूं। मैं अपने को पूरा आजमाऊंगा और यथासंभव अपनी क्षमता की बूंद-बूंद लगा दूंगा ताकि मुझे गलत रास्ते पर न जाना पड़े। सोबरन और रोहित या गांव के अन्य लड़कों ने जो रास्ता अपना लिया, मैं उनसे बहुत सहमत नहीं रहा। मैं चाहता था कि शैक्षणिक योग्यता के आधार पर उन्हें काम नहीं मिल रहा तो मेहनत-मजूरी के काम में वे लगें, लेकिन जुर्म की नाजायज दुनिया में जाने के विकल्प को खारिज करें। सोबरन ने मेरी यह बात नहीं मानी और कहा कि सिद्धान्तों को जीकर उसने बहुत देख लिया, अब और नहीं सहा जाता।’’

‘‘जो चले गये, वे तो अब वापस नहीं आयेंगे, लेकिन आगे कोई और उस खतरनाक धारा में न बहे, यह कोशिश जरूर होनी चाहिए।’’

‘‘कौन करेगा कोशिश? सरकारी कल-कारखाने और प्रतिष्ठान बेचे जा रहे हैं। रोजगारयाफ्ता लोग भी बेरोजगार हो रहे हैं। जो थोड़े से सरकारी पद हैं वे सालोंसाल सरकारी काहिली के कारण रिक्त पड़े रह जाते हैं। अपने सूबे में शिक्षकों के चालीस हजार पद पिछले आठ वर्षों से खाली हैं। जुर्म की दुनिया में कोई शौक से नहीं जाता, अस्मां।’’

‘‘जो भी हो, वह बहुत मुश्किल जिंदगी है। चौबीस घंटे जान खतरों पर टंगी रहती है। आदमी कभी इत्मीनान नहीं हो पाता। जिंदगी की स्वाभाविक लय के लिए वह तरस-तरस जाता है। वे इस दुनिया में रहकर भी इस दुनिया के आदमी नहीं रह जाते। उसके परिवारवालों पर जो गुजरता है सो तो गुजरता ही है।’’

परिवारवाले सचमुच त्रस्त थे। दस-पन्द्रह कोस की परिधि में डकैती, लूट या अपहरण की कोई वारदात होती तो पुलिस सबसे पहले सनेही लाल के घर पर छापा डालती, तलाशी लेती और कड़ी पूछताछ करती। वे कुछ भी बताने से असमर्थ होते। पुलिस उन्हें मारती, पीटती और सड़कों व गलियों में घसीट लेती। उनकी इज्जत मानो चौराहे पर आ जाती। वे औरतों को भी नहीं बख्शते और उनके साथ भी अभद्रता से बर्ताव करते। गुणाकर यह सब देखते हुए अंदर ही अंदर उबलने लगा था और यथासंभव विरोध के स्वर भी मुखरित करने लगा था। गांववाले यहीं से यह आभास ग्रहण करने लगे थे कि अब कभी भी गुणाकर घर से गायब हो सकता है।

अस्मां चाहती थी कि एक अनिश्चित भंवर में गुम हो जाने के लिए गांव छोड़ने की नौबत गुणाकर के साथ न आये। वह या तो गांव में ही रहे उसकी नजरों के सामने या फिर ऐसी मर्यादित, अनुशासित जगह रहे, जहां से उसे संपर्क किया जा सके, संवाद बनाया जा सके और वह भले लोगों की स्वस्थ दुनिया हो। गुणाकर के लिए उसके मन में रागात्मकता के बीज उसकी शालीनता, मेधा और सज्जनता के खाद-पानी से दिन ब दिन और पुष्ट होकर वृक्ष में बदलते जा रहे थे। उसके घर में रोज चूल्हे की मियाद कितनी होती थी, इसकी वह पूरी खबर रखती थी। मुख्य फसल धान और गेहूं कटने के बाद यह मियाद कृष्णपक्ष के चांद की तरह घटने लगती थी। अस्मां यह बहुत अच्छी तरह जानती थी कि गुणाकर में भूख बर्दाश्त करने का हाशिया ज्यादा नहीं है। एक शाम तो कम से कम तीन-चार रोटियां उसे मिलनी चाहिए। वह बहुत खाते-पीते परिवार से थी, इसलिए उसकी कोशिश होती कि किसी न किसी बहाने उसकी भूख को समाधान दिया जाये।

अस्मां अपने मामा के घर रहती थी। उसके मामा साबिर मियां को चार बेटे ही थे, कोई बेटी नहीं थी, तो वे बड़े लाड़-दुलार से अस्मां को अपने घर ले आये। अस्मां पांच बहने थीं इसलिए उसके मां-बाप को कोई दिक्कत नहीं थी। साबिर मियां की गया में अपनी कलाली थी, इसलिए उनके पास पानी का अकूत पैसा था। अस्मां ने अपनी ममानी को राजी कर लिया था कि ममेरे भाइयों को ट्यूशन पढ़ाने के लिए गुणाकर को बुला लिया जाये। वह चाहती थी कि उसे कोई अच्छा काम मिलने तक कहीं व्यस्त रखा जाये। ममानी ने गुणाकर से उसके मेहनताना के बारे में पूछा तो उसने एक शाम खाना खिला देने का प्रस्ताव रख दिया। ममानी ने हिसाब-किताब करके देखा तो उसे लगा कि इसमें ज्यादा खर्च हो जायेगा और झंझट भी मोल लेना होगा। उसने सौ रुपया महीना दे देने की बात कही। अस्मां एकदम द्रवित हो गयी थी इस मजबूरी पर कि एक आदमी को अपने पारिश्रमिक के तौर पर एक शाम का खाना मांगना पड़ रहा है।

गुणाकर ने उससे कहा था, ‘‘रोज तुम्हारी रसोई से नशा कर देनेवाली सुगंध बाहर तक फैलती रहती है। मैंने कई बार सोचा कि जिन्हें ऐसे लजीज खाने की खुशकिस्मती रोज मिलती होगी, वास्तव में वे ही जीने का सही लुत्फ उठाते होंगे।’’ अस्मां को पहली बार महसूस हुआ कि एक भूखे आदमी की आंखों में खाना को लेकर कैसी-कैसी ललक समायी होती है। ममानी अगर एक वक्त खाना देने के उसके प्रस्ताव को ठुकरा देगी तो गुणाकर के दिल को बहुत चोट पहुंचेगी।

अस्मां ने ठान लिया कि जैसे भी हो ममानी को राजी करना है। उसने ममानी की खुशामद करते हुए कहा, ‘‘ममानी, रोज तो कुछ न कुछ खाना बचता ही है और वह या तो फेंक दिया जाता है या जानवरों की नाद मे चला जाता है। इस तरह देखें तो खाना खिलाना महंगा नहीं सस्ता सौदा है, ममानी।’’

ममानी मान गयी और गुणाकर के लिए बच्चों को पढ़ाने के एवज में एक शाम का खाना तय हो गया। अस्मां की खुशी में जैसे पंख लग गये। गुणाकर को तृप्त देखने से बढ़कर उसके लिए दूसरी खुशी भला और क्या हो सकती थी! उसे खिलाने का वह इंतजार करती। जो कुछ भी स्वादिष्ट या स्पेशल बनता, गुणाकर के लिए जरूर बचाकर रखती। उसकी कोशिश होती कि खिलाने का काम ममानी से पहले उसी के द्वारा संपन्न हो जाये। अपनी मैट्रिक और आई ए की परीक्षा अस्मां ने प्राइवेट से पास की थी, जिसमें सारी मदद उसने गुणाकर से ही ली थी। अब वह बी ए की तैयारी कर रही थी, अतः उससे नजदीकी रखने का एक जेनुइन कारण था जिस पर ममानी की कोई आपत्ति नहीं हो सकती थी। मामू भी जानते थे कि गुणाकर से संपर्क रखकर अस्मां कुछ हासिल कर लेती है। उनकी नजर में गुणाकर एक शरीफ, अच्छा और जहीन लड़का था।

अस्मां और गुणाकर में लगाव बचपन से ही था, यह सभी जानते थे। दोनों की पढ़ाई गांव के ही मदरसे में साथ-साथ शुरू हुई थी। गांव मुसलमान बहुल था और यहां मदरसा के अलावा कोई हिन्दी स्कूल नहीं था। हिन्दी स्कूल पांच-छह मील दूर था जिसमें तनिक सयाना होकर ही आना जाना संभव हो सकता था। अतः स्कूल की आदत लगाने के लिए हिन्दू बच्चों को भी अपनी पढ़ाई मदरसे से ही शुरू करनी होती थी और तीन-चार जमात तक सबकुछ उर्दू में ही पढ़ना होता था। अस्मां और गुणाकर एक साथ बैठते रहे थे। उनकी करीबी बढ़ानेवाला एक वाकिया ऐसा हो गया था जिसे वे कभी नहीं भूल सके। तीसरी जमात में गुणाकर को रामायण का एक उर्दू गुटका पढ़ना था और इसकी जगह पर अस्मां को दीनी तालीम का रिसाला पढ़ना था। लेकिन हुआ ऐसा कि रामायण का गुटका अस्मां पढ़ने लगी और दीनी तालीम का रिसाला गुणाकर पढ़ने लगा। इसी बीच इम्तहान आ गया और दोनों को जो सवाल मिले उसके हिसाब से रामायण के सवाल गुणाकर को नहीं आते थे और दीनी तालीम के सवाल अस्मां को नहीं आते थे। दोनों के चेहरे पर असहायपन की नियति झांकने लगी थी। तभी अस्मां को एक युक्ति सूझी। उसने इशारे से गुणाकर को समझा दिया। अस्मां ने अपनी कॉपी में रामायण के बारे में लिखकर गुणाकर का नाम लिख दिया और गुणाकर ने दीनी तालीम के बारे में लिखकर अस्मां का नाम लिख दिया। उनके जो अंक आये उन्हें देखकर मौलवी साहब बहुत खुश हुए और दोनों की पीठ थपथपाकर शाबाशी दी।

अस्मां कभी-कभी उससे उन लड़कों के बारे में पूछताछ करने लगती थी जो गांव छोड़कर लापता हो गये थे। एक दिन उसने पूछा, ‘‘पुलिस बार-बार आकर पूछती है उनका पता….क्या वाकई गांव में किसी को मालूम है उनके बारे में ?’’

उसने कहा, ’’गांव में किसी को मालूम हो तो हो, लेकिन हमारे घर में किसी को कुछ भी भनक नहीं है, यह मैं पक्का जानता हूं।’’

’’लेकिन पुलिस तो यही समझती है कि तुम सबको उनकी सारी जानकारी है और वे लूट के धन भी गांव भेज रहे हैं।’’

‘‘हमें पुलिस से इसी बात का तो गुस्सा है कि यह फर्ज उनका है कि वे उनके बारे में हमें बतायें कि वे कहां हैं। हमने उनके गुम हो जाने की प्राथमिकी दर्ज करवा रखी है, लेकिन वे उलटे हमें ही खदेड़ रहे हैं।’’

‘‘फर्ज करो गुण, कि वे किसी दिन आ जायें बहुत सारा माल असवाब लेकर, तो क्या करोगे तुम?’’

‘‘मालूम नहीं अस्मां, क्या सलूक होगा मेरा….हो सकता है दरिद्रता में ईमान डोल जाये। लेकिन तुमसे ज्यादा मुझे कौन जान सकता है कि मैं हमेशा मूल्यों के साथ खड़ा रहा हूं। यह जानते हुए भी कि कदम-कदम पर अराजकता है, अन्याय है, धांधली है, कुछ बेहतर होने की उम्मीद नहीं छोड़ी है।’’

‘‘तुम्हारे भीतर का यही सकारात्मक पक्ष, देखना एक दिन तुम्हें सफलता जरूर दिलायेगा।’’

‘‘मेरी सकारात्मकता का अवलंब तुम हो अस्मां, वरना सच पूछो तो मुझे हिला देने के लिए कम आंधियां मुझसे नहीं टकरा रही हैं। जरा तुम्हीं बताओ, अब तक मेरे द्वारा किये गये पांच दर्जन आवेदनों का हश्र क्या रहा ? मुझे समझ में नहीं आता कि ये नौकरियां मिलती किसे हैं? अभी पिछले दिनों प्रश्नपत्रों के लीक करने के एक बड़े रैकेट का पर्दाफाश हुआ। कहीं ऐसा तो नहीं कि सारे इम्तहानों के प्रश्नपत्र इसी तरह पहले ही बिक जाते हैं ? पहले घूस, सिफारिश और भाई-भतीजावाद का जादू चलता था, अब उसमें एक नया पृष्ठ जुड़ गया प्रश्नपत्र के लीक हो जाने का। हमारे जैसे देहात में रहनेवाले माटी के माधो का आखिर क्या होगा अस्मां?’’

‘‘गुण’’, अस्मां ने उसकी कलाइयों पर अपना कोमल स्पर्श फिराया, ‘‘अगर तुम्हारे जैसे जीनियस का अंततः कुछ नहीं होगा, तो मैं मान लूंगी कि अब इस दुनिया में सत्यबल का प्रताप पूरी तरह खत्म हो गया।’’

गुणाकर का छोटा भाई सुधाकर मैट्रिक में पढ़ रहा था। गुणाकर चाहता था कि वह असाधारण अंक लाकर पास करे और पूरे जिले में एक आकर्षण केन्द्र बन जाये। एक दिन जब उसने लक्ष्य किया कि तैयारी को वह गंभीरता से नहीं ले रहा तो पूछ बैठा, ‘‘सुधा, परीक्षा एकदम पास है और मैं देख रहा हूं कि तुम इसकी खास परवाह नहीं कर रहे ?’’

‘‘भूखे-सूखे रहकर बहुत पढ़ लिया, भैया। अब नहीं होगा मुझसे।’’

‘‘क्या कह रहे हो सुधा ? तूने अभी पढ़ा ही क्या है? तकलीफ में रहकर ही घर के सभी लड़कों ने अपनी पढ़ाई की है। सबने स्नातक पास किया, तुम तो अभी मैट्रिक भी नहीं कर सके हो।’’

‘‘आपलोगों के स्नातक करने का फायदा क्या हुआ, भैया? आप तो हमेशा अव्वल आते रहे, क्या मिला आपको?’’

पल भर के लिए स्तब्ध रह गया गुणाकर। कोई जवाब नहीं था उसके पास। उसने अकचकाते हुए पूछा, ‘‘सुधा, अचानक तुम्हें आज क्या हो गया?’’

सुधाकर ने आसपास एक दृष्टि दौड़ायी फिर धीरे से कहा, ‘‘मैं जा रहा हूं, भैया। अब यहां नहीं रहूंगा।’’

गुणाकर पर जैसे बिजली टूट पड़ी। अपने को संभालते हुए उसने कहा, ‘‘क्या कहा- जा रहे हो तुम ? कहां जाओगे तुम इस उम्र में?’’

‘‘मुझे भूख बहुत सताती है भैया, सहा नहीं जाता। आप तो एक वक्त अस्मां के यहां खा लेते हैं।’’

जैसे शर्म से पानी-पानी हो गया गुणाकर। सचमुच कितना स्वार्थी है वह! अपना जुगाड़ तो उसने कर लिया लेकिन अपने इस छोटे भाई के लिए और अपने बूढ़े मां-बाप और चाचा-चाची के लिए उसने जरा सा भी नहीं सोचा। उसका गला भर आया, ‘‘मुझे माफ कर देना, छोटे। सचमुच अपराध कर रहा था मैं। तुमने मेरी आंखें खोल दीं।’’

‘‘मेरा यह मतलब नहीं था, भैया। मैं कहना चाहता हूं कि भूख मिटाने के लिए अब मैं भी जा रहा हूं।’’

‘‘सुधा, मुझे साफ-साफ बताओ तुम कहां जा रहे हो?’’

‘‘सोबरन भैया आये थे। उन्होंने कहा कि यहां कुछ होने-जाने का नहीं है…मैं भी उनके साथ चल चलूं।’’

गुणाकर जैसे उछल पड़ा, ‘‘सोबरन भैया आया था? वो कहां रहता है…क्या करता है…कुछ बताया?’’

‘‘नहीं, मैंने पूछा नहीं, लेकिन वे अच्छे दिख रहे थे। भूख और गर्दिश वाली उनकी इकहरी देह अब पुष्ट होकर खिल उठी है। बाउजी से भी उन्होंने मुलाकात की, शायद अपना अता-पता उन्हें बताया हो। कल वे एक आदमी भेजेंगे, जिसके साथ मैं चला जाऊंगा।’’

गुणाकर ने उसे बहुत मोह और वात्सल्य से निहारा। भरे गले से कहा, ‘‘तो तुम कल चले जाओगे हम सबको छोड़कर?’’

‘‘आप ऐसा क्यों कह रहे हैं, भैया ? मैं गांव छोड़ रहा हूं, दुनिया नहीं…।’’

एकटक देखता रहा गुणाकर। उसे वह कैसे समझाता ? एक तरह से दुनिया ही तो छोड़ रहा है वह और एक ऐसी भूमिगत दुनिया में जा रहा है, जिसमें कभी चैन, सुकून और रोशनी नहीं होती। उसे बहुत दया आयी कि पढ़ने और खेलने की उम्र में यह लड़का अब खतरों से खेलेगा…घातक हथियारों और अस्लों की भाषा में आतंक का पाठ पढ़ेगा।

गुणाकर ने जैसे कराहते हुए पूछा था, ‘‘सोबरन भैया मुझसे क्यों नहीं मिला, सुधाकर ? क्या मुझे वह अपना दुश्मन समझता है?’’

‘‘आपसे वे इसलिए नहीं मिले कि आप उन्हें रोकने और समझाने लग जाते। वे आपसे मुखातिब होकर किसी भी तरह कमजोर नहीं बनना चाहते हैं।’’

आंखें डबडबा आयीं गुणाकर की…कैसी मजबूरी है कि खूनी खेल में भी लिप्त है और  अपनों के प्रेम  के धागे से भी मुक्त नहीं है।

‘‘मैं अगर तुम्हें रोक लूं, सुधाकर?’’

‘‘कितनी बार रोकेंगे आप? वे मुझे अनेक बार लेने आते रहेंगे और मैं आपको यह नहीं बताऊंगा कि वे कब और कहां आयेंगे?’’

गुणाकर ने अपने पिता सनेही लाल से कोई बात नहीं की। सोचा – जरा इनकी परख कर ली जाये, सोबरन से मुलाकात की बात खुद बताते हैं या छुपा लेते हैं।

अगले दिन उसने देखा कि सुधाकर घर से गायब हो गया और बाउजी बिना इसका अफसोस या दुख जताये नजदीकी होम टाउन कादिरगंज चले गये। अंधेरा हो गया तो उधर से रिक्शा करके लौटे, जिस पर एक बोरा चावल, दाल और घरवालों के लिए कपड़े आदि लदे थे।

ताज्जुब से उसने उन्हें निहारा तो वे उससे नजरें चुराने लगे। गुणाकर समझ गया। वह खुद पर जब्त न कर सका और धिक्कारते हुए से स्वर में पूछ बैठा, ‘‘बाउजी ! तो सोबरन ने आपकी खाली जेब भर दी और आपने उसे स्वीकार कर लिया ? मतलब लूट, अपहरण और डकैती की कमाई आप खायेंगे ? यह भोजन क्या भूखे पेट की मरोड़ से भी ज्यादा त्रासद नहीं होगा बाउजी ? और फिर यह बताइये कि इस तरह एहसान ले लेने के बाद क्या पुलिस की पूछताछ का पहले की तरह आप डटकर सामना कर सकेंगे?’’

सनेही लाल की बूढ़ी आंखों में ढेर सारी करुणा छलछला आयी। उन्होंने कंपकंपाते हुए से कहा, ‘‘हम क्या करें बेटा….कब तक इस तरह फांकाकशी में जियें ? घर से तीन लड़के चले गये हमें छोड़कर और तुम हो तो तुम्हारे पास कोई काम नहीं है। हम बूढ़े हो गये हैं, खुद कुछ करने लायक नहीं हैं…कैसे होगा हमारा गुजारा?’’

कठघरे में जैसे मुजरिम सिद्ध हो गया हो गुणाकर। कोई जवाब नहीं था उसके पास। उसने कहा, ‘‘बाउजी, सचमुच इस तरह तो मैंने सोचा ही नहीं। ठीक है, आपको मैं वचन देता हूं कि कल से मैं बेरोजगार नहीं रहूंगा। डिग्री के अनुकूल कोई जॉब नहीं मिल रहा, तो उसकी परवाह न करके कोई शारीरिक श्रमवाला काम मैं पकड़ लूंगा। अब कम से कम एक मजदूर की न्यूनतम मजदूरी साठ रुपया घर में रोज आया करेगा, बाउजी।’’

गुणाकर अगले दिन से कादिरगंज जाकर एक बिल्डर के पास ईंट और गारा ढोनेवाले कुली के काम में शामिल हो गया। अस्मां के घर में भी उसने खाना छोड़ दिया और उसकी जगह पैसा देने के लिए कह दिया। जो भी पैसा मिलेगा उससे घर के सभी लोगों को रोटी मिल सकेगी, भले ही दो या तीन शाम के लिए ही मिले। अस्मां पूरा किस्सा जानकर हैरान रह गयी। गुणाकर के प्रति उसके मन में प्रेम का आयतन और विस्तृत हो गया। उसने कहा, ‘‘गुण, मैं कह सकती हूं कि तुमने जो कदम उठाया है, उससे तुम्हारा कद छोटा नहीं और बड़ा हुआ है। अपराध की दुनिया का बादशाह भी होने से भली दुनिया का छोटा कहा जानेवाला यह काम कहीं अच्छा है।’’

एक सप्ताह का पेमेंट लाकर गुणाकर ने अपने पिता के हाथ में रख दिया। कहा, ‘‘बाउजी, बहुत छोटी रकम है यह…सोबरन भैया ने जितना दिया होगा, उसकी तुलना में शायद कुछ भी नहीं…लेकिन यह मेरे खून-पसीने की कमाई है और इसमें किसी की आह या नाइंसाफी या जुर्म की बू मिश्रित नहीं है। सोबरन के दिये पैसे से खरीदा गया अन्न खत्म तो नहीं हुआ होगा, लेकिन मैं चाहूंगा कि मैं जो खाऊं वे सोबरन के पैसे का न हो।’’

सनेही लाल के नेत्रों में ढेर सारा प्यार छलछला आया। उन्होंने कहा, ‘‘तुमने ठीक कहा बेटे, सोबरन के पैसे से खरीदा गया अन्न जल्दी क्या शायद कभी खत्म नहीं होगा, चूंकि तुमने जिस तरह अपने आपको हम सबकी खातिर सबसे छोटे काम में जोत दिया, इतनी गैरत हममें भी जाग गयी कि हम उसके पैसे से खरीदे अन्न खाने से खुद को बचा लें। देखो, रखा है कोने में पूरे का पूरा बोरा। तुम्हारे टोक देने के बाद नजर उठाकर भी हमने उस तरफ नहीं देखा।’’

सनेही लाल की छाती से चिपक गया गुणाकर, ‘‘ऐसा करके आपने हमें पूरी तरह जीत लिया बाउजी…मुझे लग रहा है जैसे सचमुच मैं कोई छोटा नहीं बल्कि बहुत बड़ा काम करके आ रहा हूं।’’

गुणाकर ने सोचा कि सुधाकर को घर छोड़े कई दिन हो गये….इसके पहले कि पुलिस पूछताछ करे, उसके लापता होने की प्राथमिकी थाने में लिखवा देनी चाहिए। वह थाने पहुंचा तो वहां कई जीपें और भैन लगी हुई थीं और कई खूंखार किस्म के लोग चक्कर काट रहे थे। पता चला बन्ना सिंह अपनी पूरी पलटन के साथ आया हुआ है। एक सिपाही ने बताया कि किसी धनी घर के एक बच्चे का अपहरण हो गया है, जिसकी तहकीकात में उठाये गये कदमों की वह जानकारी लेने आया है। गलत समय समझकर गुणाकर लौटने लगा। मगर उसे थानेदार ने तुरंत अंदर अपने कक्ष में बुला लिया। जब तब उसके घर होनेवाली छापामारी के कारण थाने के लोग उसे अच्छी तरह पहचान गये थे।

थानेदार ने उसे कड़ी नजरों से देखा और सामने बैठे बन्ना सिंह से कहा, ‘‘इसे पहचान लीजिये सर, यह सोबरन और रोहित का भाई है। पता चला, पांच-छह दिन पहले इसका छोटा भाई भी अंडरवर्ल्ड के उड़नखटोले पर चढ़कर हवा में गायब हो गया। क्यों यही खबर देने आये हो न?’’

गुणाकर कुछ बोलता इसके पहले बन्ना ने अपना जबड़ा फैला दिया, ‘‘क्यों रे लड़के, तुम्हारे बारे में बहुत सुना है…तुम पुलिस की मदद क्यां नहीं करते ? तेरे भाई, बचेंगे नहीं….पाताल से भी उसे ढूंढवा लेंगे हम। बड़ा बाबू, मुझे तो लगता है इस लड़के को सब कुछ पता है…कायदे से कभी इसका मुंह खुलवाइये। क्यों रे, बच्चे के अपहरण के बारे में कुछ मालूम है तुम्हें?’’

एक सिहरन दौड़ गयी उसके शरीर में…आज कहीं उसका बुरा दिन तो नहीं है। उसने बहुत मिमियाते हुए कहा, ‘‘सर, आप यकीन नहीं करेंगे, लेकिन यह सच है कि भाइयों ने जो रास्ता चुना है हम उसके पक्ष में कभी नहीं रहे, मैंने उनका विरोध किया और अपनी आजीविका के लिए एक बिल्डर के यहां कुली का काम करता हूं।’’

‘‘बहुत ड्रामा करना जानते हो तुम….ठीक है, अभी तुम जाओ यहां से।’’ थानेदार ने कहा तो उसे लगा जैसे किसी खूंखार भेड़िए के जबड़े से छूटकर वह बाहर आ गया।

गुणाकर ने उपस्थित चुनौतियों से संघर्ष करने में खुद को पूरी तरह झोंक दिया। दिन भर ईंट-गारा ढोकर वह घर आता। शाम को अस्मां के ममेरे भाइयों को पढ़ाने चला जाता। अस्मां रोज उसके लिए अखबार और रोजगार समाचार के पन्ने खंगालकर उसकी योग्यता के अनुकूल रिक्तियां ढूंढती, उससे आवेदन करवाती और अपने सिजदे में उसके लिए दुआ करती। वह देर रात तक जागकर इम्तहानों की तैयारी करता। उसके धैर्य, लगन और मेहनत को देखकर अस्मां पूरी तरह आश्वस्त महसूस करती और अपने प्यार की उष्मा देकर उसकी लौ को हमेशा प्रज्ज्वलित रखती।

इसी दौरान एक चमत्कार हो गया। उसने रेलवे के क्लर्क ग्रेड की एक परीक्षा पास कर ली और उसका इंटरव्यू भी दे आया। अस्मां और उसके घरवालों को लगा कि सफलता ने उसकी देहरी पर दस्तक दे दी है।

बिगड़ी हुईं स्थितियां अब पटरी पर आती दिख रही थीं तभी एक दिन धड़धड़ाती हुई पुलिस की जीप आ गयी। गांववाले समझ गये कि रात में कहीं कोई वारदात हो गयी है। पता चला कि बन्ना सिंह के घर में भीषण डकैती हो गयी। औरतों के जेवर तक उतरवा लिये लूटेरों ने। गुणाकर को बहुत हैरानी हुई….बन्ना सिंह तो खुद भी अपराधियों का शरणदाता और संरक्षक है….रात के लूटेरों से कहीं ज्यादा खतरनाक है वह…देश को लूटने का कारोबार तो वह दिन में ही चलाता है। इसके घर में फिर किसकी हिम्मत हो गयी?

पुलिस कुछ ज्यादा ही सख्त तेवर लेकर आयी थी, चूंकि मामला बन्ना सिंह जैसे धाकड़, दबंग व बाहुबली सांसद का था। सनेही लाल के पूरे घर की तलाशी ली गयी….घर के लोगों के साथ धक्का-मुक्की करके गाली-गलौज की गयी और अंततः गुणाकर को पकड़कर थाने ले जाया गया। बन्ना सिंह वहां बैठा था। उसे देखते ही वह भड़क उठा, ‘‘आज अगर तुमने अपने भाइयों का पता-ठिकाना नहीं बताया तो जिन्दा नहीं बचोगे। मेरे घर में डकैती करने की जुर्रत तुम्हारे भाइयों के सिवा दूसरा कोई नहीं कर सकता। नौकरी चाहिए थी उन्हें….मैंने नहीं दिलायी उसी का बदला लिया है उन्होंने। इस लौंडे को सब पता है….साले को छोड़ना नहीं बड़ा बाबू। मैं जरा गृहमंत्री से बात करता हूं।’’

बन्ना चला गया। थानेदार ने गुणाकर से कहा, ‘‘अब तक हम तुम्हें छोड़ते रहे, लेकिन आज तुम किसी भी तरह नहीं बचोगे। जब तक उनका पता-ठिकाना नहीं बताओगे तब तक तुम पर ऐसे जुल्म ढाये जायेंगे जिसकी तुमने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।’’

…..और वे शुरू हो गये। जिस गुणाकर ने आज तक किसी से एक चांटा तक नहीं खाया था, उस पर यातना की तमाम थर्ड डिग्री शामतें बरपाई जाने लगीं। उसे सुलाकर, बांधकर, लटकाकर जितना पीटा जा सकता था, पीटा गया। वह चीखता, तड़फड़ाता, बिलखता और कराहता रहा। जब वह बेहोश हो गया तो उसे इलाज के लिए सरकारी अस्पताल भेज दिया गया।

उसकी हालत देखकर उसके घरवालों और अस्मां के रोंगटे खड़े हो गये…. कानून के रखवालों के हाथ क्या इतने कठोर और अमानुषिक हो सकते हैं ? आठ-दस रोज भर्ती रहने तक अस्मां ने उसकी जी भर कर सेवा की। गुणाकर बिना कुछ बोले अस्मां को देखने लगता और उसकी आंखें आंसुओं से डबडबा जातीं। वह उसे तसल्ली देती कि वह हिम्मत न हारे…यह इम्तहान की घड़ी है।

गुणाकर चलने-फिरने लायक हो गया तो पुलिस ने कोर्ट में उसकी पेशी करायी और आठ दिनों के लिए फिर से रिमांड पर ले लिया। पुलिसिया सितम उस पर फिर ढाये जाने लगे। पुराने घाव अभी भरे भी नहीं थे। वह अपने भाइयों के बारे में जब कुछ जानता ही नहीं तो आखिर बताये क्या! उसे लगने लगा कि पुलिस ने शायद बन्ना सिंह के कहने पर तय कर लिया है कि पीटते-पीटते उसे समाप्त कर देना है।

उसकी हालत बद से बदतर होती जा रही थी। लगातार यंत्रणा सहते-सहते वह खड़ा होने लायक भी नहीं रह गया था।

तीन-चार दिनों बाद जब वह हाजत में कराह रहा था, थाने में चाय पहुंचानेवाले एक लड़के ने आकर उसे एक पर्ची दी। लिखा था उसमें – ‘तुम्हें मारते-मारते मार डालेंगे ये लोग। अब भी ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है। इस नर्क से निकलने का मन हो तो आज रात हमारे आदमी जायेंगे, तुम हां में सिर हिला देना, वे हाजत का ताला तोड़कर तुम्हें अपने साथ कर लेंगे – सोबरन।’

गुणाकर फूट-फूटकर रो उठा…क्या करे वह ? मर जाये या फिर उसी दुनिया में दाखिल हो जाये जिससे वह घिन करता रहा? अस्मां के भरोसे का फिर क्या होगा?

अगली सुबह अस्मां बड़े उत्साहपूर्वक अपने साथ एक वकील और एक खुशखबरी लेकर थाने पहुंची। खुशखबरी के रूप में उसके पास रेलवे का बहाली पत्र था। देखा – थाने में अफरा-तफरी मची है। पता चला हाजत से गुणाकर भाग गया। अस्मां जैसे स्तम्भित रह गयी। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि वह रोये या हंसे।



जयनंदन हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार और उपन्यासकार हैं। जयनंदन की कहानियों  में मजदूर वर्ग  का संघर्ष बहुत प्रभावी ढंग से उभर कर आया है। 

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