Author: literaturepoint

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आदित्य अभिनव की कहानी ‘सुंदरी’

अबुल हसन यों तो था पाँचवक्ती नमाजी लेकिन उसका उठना-बैठना हिंदुओं के साथ था। उसके रग-रग में भारतीय सभ्यता और संस्कृति रची-बसी थी। उसे अपनी सभ्यता-संकृति से बड़ा प्यार था। उसकी दृष्टि में भारतीय संस्कृति के चार आधार ‘गंगा,गीता, गायत्री और गौ’ किसी धर्म विशेष यानी केवल हिंदू धर्म, जिसे...

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साधारण लोगों की असाधारण कहानी

नीरज नीर के कहानी संग्रह ‘ढुकनी एवं अन्य कहानियां’ पर कमलेश की टिप्पणी मैंने नीरज नीर की पहली कहानी हंस में पढ़ी थी- कोयला चोर। उससे पहले मैं उन्हें एक बेहतरीन कवि के रूप में जानता था। उनका कविता संग्रह ‘जंगल में पागल हाथी’ और ‘ढोल’ चर्चित हो चुका था...

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हरियश राय की कहानी ‘भंवर में…’

रेखांकन : संदीप राशिनकर चाहता तो वह गूगल के जनक सरगै ब्रिन की तरह बनना जिसकी वजह से गूगल दुनिया भर में मशहूर हो गया और जिसकी वजह से क्लास का हर बच्चा ‘’गूगल करो’’ या  ‘’गूगल कर लेना’’ या ‘’गूगल में देख कर बताता हूं ‘’ कहता  रहता था...

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संजय शांडिल्य की प्रेम कविताएं

लौटना जरूरी नहींकि लौटो यथार्थ की तरहस्वप्न की भी तरहतुम लौट सकती हो जीवन में जरूरी नहींकि पानी की तरह लौटोप्यास की भी तरहलौट सकती हो आत्मा में रोटी की तरह नहींतो भूख की तरहफूल की तरह नहींतो सुगंध की तरहलौट सकती हो और हाँ,जरूरी नहीं कि लौटनाकहीं से यहीं...

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बोर्ड पर काली चॉक से मैं नहीं लिख सकता-मंटो

रंजन ज़ैदी मंटो-शताब्दी वर्ष बीत गया लेकिन उसके चर्चे अब भी महफ़िलों में जारी हैं क्योंकि वह एक जीवंत और संघर्षशील कहानीकार था। वह एशिया उप-महाद्वीप में उस समय जन्मा था जब हिन्दुस्तान अपनी आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था और देश पर अंग्रेज़ी साम्राज्य की हुकूमत थी। इसके बावजूद...

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मीरा मेघमाला की कविताएँ

कैसे मर जायें झट से! ऐसे में गर मरने को कहा जाएतो कैसे मर जायें झट से! अंतिम दर्शन के लिएआये लोग हंसेंगे,झाड़ू-पोछा नहीं लगाया हैबर्तन, कपड़े नहीं धोये हैंसाफ़ नहीं कर पाई घर का शौचालयपेड़ पौधों को भी पानी नहीं दिया हैकुत्ता और बिल्ली भूखे बैठे हैंकल के नाश्ते...

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नामवर की दृष्टि में प्रेमचंद

अनिता यादव प्रेमचंद और नामवर सिंह का नाम साथ में आते ही पहला विचार आता है हिंदी साहित्य के दो युग पुरुष एक साथ एक स्थान पर। एक अनेक विरोध के  बावजूद शीर्ष पर बैठा हुआ है  और दूसरा उसको शीर्ष पर स्थापित करने में पूर्ण समर्पित है।  प्रेमचंद का...

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आलोक कुमार मिश्रा की कविताएं

  हंसो औरतों                          (1) चलो एक ऐसी दुनिया बनाएँ जहाँ औरतें हंसें तो हंसने लगें सारी दिशाएं वो बाहर निकलें तो स्वागत में खड़ी मिलें राहें जब उनके सिर में उभरें दर्द की रेखाएँ स्नेह से पगी उँगलियाँ उनके बालों में भागती दिख जाएँ जब वो साधें...

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क से कहानी : हाल फिलहाल की अच्छी कहानियां

क से कहानीसत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव 2021 में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली कहानियों में जो कहानियां अच्छी लगेंगी, उन पर संक्षिप्त टिप्पणी ‘क से कहानी ‘स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित की जाएंगी। इस अंक में सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव लिख रहे हैं लेकिन अगर आपको भी कोई कहानी पसंद आती है तो...

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प्रशान्त गौतम की कविताएं

1. उसने कहा, मुझे यथार्थ पर भरोसा है जो दिखाई देता है धरातल पर और तुम कवि हो! तुम्हें होगा कल्पनाओं पर। मैंने कहा मुझे कल्पना और\ यथार्थ दोनों पर भरोसा है, क्योंकि कल्पना की अंशतः परिणति ही यथार्थ है। अगर मेरी सभी कल्पनाएं यथार्थ में बदल गयी, तो एक...

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रामकुमारी चौहान : साहित्य के इतिहास में उपेक्षित एक सशक्त कवियत्री

शुभा श्रीवास्तव रचना कोई भी हो उसमें युगबोध और प्रासंगिकता को ढूँढना मुख्य आलोचकीय बिंदु बन जाता है। परंतु हमें यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि रचनाकार की अनुभूति समकालीन प्रासंगिकता पर सदैव फिट नहीं बैठती है। कुछ रचनाएं परंपरा और इतिहास की दृष्टि से देखने पर संस्कारित जड़ों का...

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विवेक चतुर्वेदी की कविताएं

पिता बार-बार दिख रहे हैं पिता आजकल रेलवे स्टेशन पर दिखे आज एस्केलरेटर की ओर पैर बढ़ाते और वापस खींचते प्लेटफार्म पर पानी की जरूरत और रेल चल पड़ने के डर के बीच खड़े… फिर डर जीत गया कल चौराहे पर धुंधलाती आंखों से चीन्हते रास्ता डिस्पेंसरी के बाहर धूप...

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मोहम्मद मुमताज़ हसन की ग़ज़लें

(1) मुंह मोड़कर हम जाते नहीं, इश्क गर तुम ठुकराते नहीं! यूं किसी से दिल लगाते नहीं, मग़रूर  से रिश्ते बनाते नहीं! आंखों पे कब अख्तियार रहा, ख़्वाब लेकिन तेरे आते नहीं! वो ख़फ़ा होती है तो होने दो, हम नहीं वो  के मनाते नहीं! दिल उजड़ी हुई बस्ती लगे...

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केशव शरण की ग़ज़लें

एक क्या बतायें जिस्म, दिल को और जां को क्या हुआ बिंध गये सब इक तरफ़ से, पर कमां को क्या हुआ उम्र तन की हो गयी है, इसलिए बस इसलिए! किसलिए हो जाय बूढ़ा, मन जवां को क्या हुआ देखकर दो प्रेमियों को क्यों परेशां हाल है क्यों नहीं...

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निर्मल गुप्त की कविताएं

मेज पर रखा सफेद हाथी लिखने की मेज़ पर सिरेमिक का सफ़ेद हाथी हैउसके हौदे पर उगा हैहरेभरे पत्तों वाला मनी प्लांटवह तिरछी आँखों से देख रहामेरी उँगलियों से उगते कविता के कुकरमत्तेजल्द ही यहाँ उदासी की फ़सल पनपेगी. गुलाबी फ्रॉक पहने एक लड़की टहलती चली आती हैरोज़ाना मेरी  बोसीदा स्मृति  के...

समय के टेढ़े सवालों से टकराती ग़ज़लें

पुस्तक समीक्षाडी एम मिश्र के ग़ज़ल संग्रह लेकिन सवाल टेढ़ा है पर लिखा है श्रीधर मिश्र ने साहित्यिक गतिविधियों की बात करें तो यह सक्रिय व सचेत साहित्यिक कर्म का प्राथमिक व सबसे जरूरी दायित्व होता है कि वह अपने समय को रचे भी व उसकी समीक्षा भी करे।  इस...

अनुराग अनंत की कविताएं

तुम्हारे कंधे से उगेगा सूरज तुम्हारी आँखें मखमल में लपेट कर रखे गए शालिग्राम की मूरत है और मेरी दृष्टि शोरूम के बाहर खड़े खिलौना निहारते किसी गरीब बच्चे की मज़बूरी  मैंने जब जब तुम्हें देखा ईश्वर अपने अन्याय पे शर्मिदा हुआ और मज़दूर बाप अपनी फटी जेब मेंहाथ डालते हुए आसमान की तरफ देख कर...

साधारण में असाधारण का आलोक

पुस्तक समीक्षा राम नगीना मौर्य के कहानी संग्रह यात्रीगण कृपया ध्यान दें पर लिखा है डॉ. अनिल अविश्रान्त ने             कहानियाँ ‘कहन’ हैं, मनुष्य की अभिव्यक्ति की सबसे पुरातन विधा। कहने के अलग-अलग अंदाज ने किस्सा, आख्यायिका, कथा और कहानियों को जन्म दिया है। यह एक समानान्तर...

निदा रहमान की कविताएं

एक ना चाहते हुए रोज़ उग आती हैं तुम्हारे इश्क़ की ख़्वाहिशें रोज़ाना सुबह दफना देती हूँ हर वो हसरत जो मुझे तुम्हारे लिए बेचैन करती है.. रात नागिन सी हो जाती है जो डसती, तड़पाती है तुम्हारे लिए बगावती बनाती है… शामों में छाई उदासी बंजर ज़मीन सी नज़र...

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की कहानी ‘जहरा’

              मैं ठीक से नहीं बता पाऊंगा कि उसका नाम जहरा था या जहरी । इतना याद है कि गाहे  बगाहे लोग दोनों ही नाम इस्तेमाल करते थे । इस बात से कभी जहरा को भी कोई फ़र्क पड़ा हो, ऐसा मुझे याद नहीं । उस गांव-जवार में जहरा की...