Author: literaturepoint

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अर्कित पांडेय की कविता ‘उपहार’

अर्कित पाण्डेयछात्रपता- इकौना बाईपास,जिला- श्रावस्ती मैं रहा रात भर सोचता बस प्रिये,दूँ क्या उपहार में जन्मदिन पर तुम्हें। प्रातः आकाश की लालिमा दूँ तुम्हे,या दूँ पंछियों का चहचहाता वो स्वर,नीले आकाश की नीलिमा दूँ तुम्हे,या दूँ भेंट पुष्पों का गुच्छा मधुर, पर प्रकृति सी सजल तुम स्वयं हो प्रिये,क्या ये उपहार देना उचित...

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संजीव ठाकुर की बाल कथा ‘जालिम सिंह’

स्कूल का चपरासी बच्चों को बहुत बदमाश लगता था। बच्चे उसे जालिम सिंह नाम से पुकारते थे। जालिम सिंह स्कूल के बच्चों पर हमेशा लगा ही रहता था। किसी को मैदान में दौड़ते देखता तो गुस्साता, झूले पर अधिक देर झूलते देखता तो गुस्साता। कोई बच्चा फूल तोड़ लेता तब...

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नीरू मोहन की कविता ‘मील का पत्थर’

*पहुँचाकर मंजिल पर राही को अभी भी वहीं खड़ा हूँ | धूल से ढककर, सूरज से तपकर अभी भी अडिग खड़ा हूँ | रुका न कोई पलभर भी न पूछा मेरा अता-पता | देखकर मुझको दूर से यूँ ही अपनी मंजिल की ओर ही बढ़ा | न ली कोई मेरी...

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आराधना सुमन की कविता ‘नाजायज’

नाजायज शब्द बड़ा “नाजायज “लगता है मुझे क्योकि अक्सर ये वहाँ प्रयोग होते है जो जीवन का पवित्र मन्त्र है उच्चारण है आवाहन की जीवित जीवन की सुंदरता की …. नाजायज रिश्ते की परिभाषा नहीं मिलती एक दाग धब्बा को कहकर लोग निकल लेते है…..! हर रिश्ते मे मौजूद लोग...

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मुकेश कुमार सिन्हा की कविता ‘मत बनो बाज’

कभी बाँध कर देखो दो-ढाई किलो का पत्थर पेट से पांच-छः महीने तक। ऐ पुरुष! पता चल जायेगा कितना दर्द सहती हूँ कितना त्याग करती हूँ और कितने अरमान के साथ खिलाती हूँ ‘कली’! मेरे त्याग और मेरे सब्र की परीक्षा कैसे ले पाओगे? ढोकर देखो न पत्थर पेट से!...

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राजेश”ललित”शर्मा की कविता ‘दम लगा के हई शा’

दम लगा के हईशा हिम्मत न हार थक मत अब चल उठ जा चल उठ मत घुट घुट घुट कर मर जाएगा हाथ कुछ नहीं आएगा दो नहीं कई पाटों में पिस जायेगा घुड़सवार ही गिरते हैं गिर गिर कर फिर उठते हैं फिर जा घोड़े पर चढ़ते हैं छूट...

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शहादत ख़ान की कहानी वेलेंटाइन डे

शहादत शिक्षा-           दिल्ली विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडर कॉलेज से बी.ए. (विशेष) हिंदी पत्रकारिता। संप्रीति-         रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में कार्यरत। मोबाईल-        7065710789 दिल्ली में निवास। कथादेश, नया ज्ञानोदय, समालोचना, कथाक्रम, स्वर्ग विभा, परिवर्तन, ई-माटी और जनकृति सहित आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। वेलेंटाइन-डे...

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भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी पता : 1 / बी / 83,        बालको        जिला : कोरबा (छ.ग.)        495684        मोबाइल न. : 9098400682 Bhaskar.pakhi009 @gmail.com परिचय जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी...

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नकुल गौतम की लघुकथा ‘तिरपाल’

मुम्बई में बारिशें इस बार जल्द शुरू हो गयी थीं। पूरी बस्ती रंग बिरंगी तिरपालों से ढंकी जा चुकी थी। बुधिया की छत पहली बारिश में ही साथ छोड़ गयी और घर में यहाँ वहाँ पानी टपकने लगा। बीवी साल भर कहती रही कि छत पर डाम्बर लगवा लो, पर...

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राजेश”ललित”शर्मा की दो कविताएं

समय समय ज़रा सरक बैठने दे मुझे अपने साथ गुज़ारने दे चंद पल कुछ करें बात चलें कुछ क़दम समझें हम तुम्हें तुम हमें समझो सच में बहुत तेज़ चलते हो रुको तो सुनो तो फिर निकल गये आगे चलो मैं ही दम भरता हूँ ज़िंदगी ही से सवाल करता...

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प्रेम नन्दन की पांच कविताएं

 प्रेम नंदन जन्म – 25 दिसम्बर 1980,को फतेहपुर (उ0प्र0) के फरीदपुर गांव में| शिक्षा – एम.ए.(हिन्दी), बी.एड.। पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा। लेखन – कविता, लघुकथा, कहानी, आलोचना । परिचय – लेखन और आजीविका की शुरुआत पत्रकारिता से। दो-तीन वर्षों तक पत्रकारिता करने तथा तीन-चार वर्षों तक भारतीय रेलवे में स्टेशन मास्टरी  के पश्चात...

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प्रशान्त पांडेय की लघुकथा ‘पगलिया’

एगो कुसुमिया है. हड़हड़ाते चलती है. मुंह खोली नहीं की राजधानी एक्सप्रेस फेल. हमरे यहां काम करने आती है. टेंथ का एक्जाम था तो काम छोड़ दी थी. दू-तीन महीना बाद अब जा के फिर पकड़ी है. “तब सब ठीक है?” हम अइसही पूछ लिए. गलती किये। माने कुसुमिया का...

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विशाल मिश्र का एक गीत

जब कोई हक़ीक़त चंद पलों में अफ़साना बन जाए भरने वाले ज़ख्म कोई जब फिर ताज़ा कर जाए मैं क्यूँ न रो दूं। मुद्दत से थी राह तकी के बादल एक दिन बरसेंगे धूल उड़ रही, न मालूम था के ऐसे तरसेंगे मैं क्यों न रो दूं। हम कितना चाहें...

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प्रेरणा शर्मा ‘प्रेेरणा’ की सात प्रेम कविताएं

प्रेरणा शर्मा ‘प्रेरणा’ पेशे से अध्यापिका विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं , समाचार पत्रों  में लेख, कविताएं प्रकाशित बोधि प्रकाशन द्वारा  प्रकाशित पुस्तक ‘ स्त्री होकर सवाल करती है ‘  में कविताएं प्रकाशित  हो चुकी हैं । एक प्रभात  के आगमन  से .. निशा  के अवसान  तक .. घूमती  रहती  हूँ...

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सुरेंद्र भसीन की चार कविताएं

सुरेन्द्र भसीन पेशे से एकाउंटेंट, कई निजी  कंपनियों में काम किया। पता के 1/19A, न्यू पालम  विहार, गुड़गांंव, हरियाणा मो-9899034323 मेरी बेटी /सबकी बेटी मैं जब भी अपनी बीवी की आँखों में देखता हूँ उसमें मेरी बेटी का चेहरा नजर आता है। जो बड़ी होकर अपने पति को जैसे बड़ी उम्मीद से याचक होकर निहार रही है तो मैं बिगड़ नहीं पाता हूँ वहीं ढीला पड़ जाता हूँ। क्रोध नहीं कर पाता उबलता दूध जैसे छाछ हो जाता है. हाथ-पांव शरीर और दिल अवश होकर जकड़ में आ जाता है और आये दिन अख़बारों में पढ़े अच्छे-बुरे समाचारों की सुर्खियाँ याद आ-आकर मुझे दहलाने लगती हैँ। और मेरी पाशविक जिदें, नीच चाहतें बहुत घिनौनी और बौनी होकर मेरा मुँह  चिढ़ाने लगती है। कोई भला ऐसे में कैसे अपने परिवार को भूल अपनी बेटी के भावी सुखों को नजरअंदाज कर अपना सुख चाहता है ? वह ऐसा बबूल कैसे बो सकता है जिसे काटने की सोचते ही उसका कलेजा मुँह  को आता है? तभी जब मैं कुछ कहने को होता हूँ...

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नीरू मोहन की लघुकथा ‘एहसास’

यह कथा एक सत्य घटना पर आधारित है गोपनीयता बनाए रखने के लिए पात्रों के नाम और जगह बदल दिए गए हैं|*मीना बनारस के एक मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखती है| परिवार में पति मनीष के अलावा सास-ससुर और मीना की दो वर्ष की एक सुंदर-सी बिटिया है| मीना...

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नकुल गौतम की ग़ज़ल

अब मेरे दिल में नहीं है घर तेरा ज़िक्र होता है मगर अक्सर तेरा हाँ! ये माना है मुनासिब डर तेरा आदतन नाम आ गया लब पर तेरा भूल तो जाऊँ तुझे पर क्या करूँ उँगलियों को याद है नम्बर तेरा कर गया ज़ाहिर तेरी मजबूरियां टाल देना बात यूँ...

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राजेश”ललित”शर्मा की कविता ‘अहं ब्रह्म न अस्मि’

शब्द ब्रह्म हैं न,बिल्कुल न; ये सिर्फ हैं अभिव्यक्ति का माध्यम जो आप दे सकते हैं बिना बोले भी गूँगे गुज़ार देते हैं उम्र सारी इशारों ही इशारों में चिड़िया भी चहकते चहकते ममता देती चुगा देती चोंच से बच्चे भी ख़ुश होते,वैसे जलस्तर स जैसे मेरी पत्नी देती कौए...

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डॉ. ललित सिंह राजपुरोहित की लघुकथा ‘बहुरिया’

रामानुज के घर में मातम का माहौल था, घर में छाती पीटने और रोने की जोर-जोर से आवाजें आ रही थी। रिश्‍तेदार और पड़ोसी ढांढस बंधा रहे थे, तो कुछ ऐसे भी थे जो मजमा देख रहे थे। रामानुज अपने बच्‍चों को सीने से लगाए दीवार के कोने में बैठा...

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माया मृग की पांच कविताएं

मुझे तुम्‍हारे हाथ देखने हैं तुमने लौ को छुआ वह माणिक बन गई बेशुमार मनके तुम्‍हारी मुट्ठी में सिमटते चले गए मुझे बहुत देर बाद पता चला कि दरअसल लौ से तुम्‍हारे हाथ जल गए थे तुमने जले पोर मुझसे छिपाने को मुट्ठियां बन्‍द कर ली थीं …. ! उस...