Author: literaturepoint

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राजा सिंह की कहानी ‘असफल’

राजा सिंह द्वारा राजाराम सिंह पताः- एम0 1285, सेक्टर-आई एल.डी.ए. कालोनी    कानपुर रोड, लखनऊ-226012                    मोबाइल 9415200724 वह लम्बे-लम्बे डग भरता है।उसे मालूम है कि मॉर्निंग वॉक के समय जोर-जोर से चलना चाहिए। धीमे टहलने से कोई फायदा नहीं। परन्तु तेज कदमों से चलने से वह थक जाता है,  हांफने...

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आज का सच दर्शाती कहानियां

पुस्तक समीक्षा पुस्तक: किस मुकाम तक  लेखक: हरियश राय  प्रकाशक:प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली  मूल्य: ₹250  पृष्ठ: 128   डॉ. नितिन सेठी         आज की कहानी बदलते जीवन और समाज पर पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों की पड़ताल करती है। विज्ञान के युग में जहां हजारों ऐप्स और गैजेट्स ने हमारी मुश्किलें आसान...

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राहुल कुमार बोयल की 4 कविताएं

राहुल कुमार बोयल जन्म दिनांक- 23.06.1985 जन्म स्थान- जयपहाड़ी, जिला-झुन्झुनूं( राजस्थान) सम्प्रति- राजस्व विभाग में कार्मिक पुस्तकें- समय की नदी पर पुल नहीं होता (कविता संग्रह) नष्ट नहीं होगा प्रेम ( कविता संग्रह)मैं चाबियों से नहीं खुलता( काव्य-संग्रह)विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं यथा वागर्थ, सृजन सरोकार, किस्सा कोताह, कथा, दोआबा, हिन्दी जनचेतना, हस्ताक्षर...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘फुंसियाँ’

सुशांत सुप्रिय A-5001,गौड़ ग्रीन सिटी ,वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,ग़ाज़ियाबाद – 201014( उ. प्र . )मो: 8512070086ई-मेल: sushant1968@gmail.com  सुधीन्द्र, जब यह पत्र तुम्हें मिलेगा, मैं तुम्हारे जीवन से बहुत दूर जा चुकी हूँगी । मेरे पैरों में इतने वर्षोंसे बँधी जंजीर खुल चुकी होगी । मेरे पैर परों-से  हल्के लग रहे होंगे और किसी भी रास्ते पर चलने के लिए स्वतंत्र होंगे । चलने से पहले तुम से चंद बातें कर लेना ज़रूरी है । कल रात फिर मुझे वही सपना आया। तुममुझे अपने दफ़्तर की किसी पार्टी में ले गए हो । सपने में जाने-पहचाने लोग हैं।  परस्पर अभिवादन और बातचीत हो रही है कि अचानक सबके चेहरों पर देखते-ही-देखते फुंसियाँ उग आती हैं । फुंसियों का आकार बढ़ता चला जाता है । फुंसियों की पारदर्शी झिल्ली के भीतर भरा मवाद साफ़ दिखने लगता है । और तब एक भयानक बात होती है । उन फुंसियों के भीतर मवाद में लिपटा तुम्हारा डरावना चेहरा नज़र आने लगता है । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते हैं । जैसे तुम तुम न हो कर कोई भयावह यमदूत हो । असंख्य फुंसियों के भीतर असंख्य तुम । मानो बड़े-बड़े दाँतों वाले असंख्य यमदूत… डर के मारे मेरी आँख खुल गई । दिसंबर की सर्द रात में भी मैं पसीने से तरबतर थी । “तुमने ऐसा सपना क्यों देखा ? “जब भी मैं इस सपने का ज़िक्र तुमसे करती तो तुम मुझे ही कटघरे में खड़ा कर देते । “क्यों क्या ? क्या सपनों पर मेरा वश है ? “मैं कहती । तुम्हारा बस चलता तो तुम मेरे सपने भी नियंत्रित कर लेते ! तुम कहते हो कि यह सपना मेरे अवचेतन मन में दबी हुई कोई कुंठा है, अतीत की कोई स्मृति है । दुर्भाग्य यह है कि मेरी तमाम कुंठाओं के जनक तुम ही हो । मेरे भूत और वर्तमान में तुम्हारे ही भारी क़दमों की चहलक़दमी की आवाज़ गूँज रही है । मुड़कर देखने पर लगता है कि मामूली-सी  बात  थी।  मेरे  गाल  पर अक्सर उग आने वाली चंद फुंसियाँ ही तो इसकी जड़ में थीं । लेकिन क्या यह बात वाक़ई इतनी मामूली-सी थी ? तुमने ‘ आइसबर्ग ‘ देखा है ? उसका केवल थोड़ा-सा हिस्सा पानी की सतह के ऊपर दिखता है । यदि कोई अनाड़ी देखे तो लगेगा जैसे छोटा-सा बर्फ का टुकड़ा पानी की सतह पर तैर रहा है । पर ‘ आइसबर्ग ‘ का असली आकार तो पानी की सतह के नीचे तैर रहा होता है जिससे टकरा कर बड़े-बड़े जहाज़ डूब जाते हैं । जो बात ऊपर से मामूली दिखती है उसकी जड़ में कुछ और ही छिपा होता है। बड़ा और भयावह  । मेरे चेहरे पर अक्सर उग आने वाली फुंसियों से तुम्हें चिढ़ थी । मेरा उन्हें सहलाना भी तुम्हें पसंद नहीं था । बचपन से ही मेरी त्वचा तैलीय थी । मेरे चेहरे पर फुंसियाँ होती रहती थीं । मुझे उन्हें सहलाना अच्छा लगता था । ” फुंसियों से मत खेलो । मुझे अच्छा नहीं लगता । ” तुम ग़ुस्से से कह उठते । ” क्यों ? ” आख़िर यह छोटी-सी आदत ही तो थी । ” क्यों क्या ? मैंने कहा, इसलिए ! ” ” पर तुम्हें अच्छा क्यों नहीं लगता ? ” तुम कोई जवाब नहीं देते पर तुम्हारा ग़ुस्सा बढ़ता जाता । फिर तुम मुझ पर चिल्लाने लगते । तुम्हारा चेहरा मेरे सपने में आई फुंसियों में बैठे यमदूतों-सा  हो  जाता ।  तुम चिल्ला कर कुछ बोल रहे होते पर मुझे कुछ भी सुनाई नहीं देता । मैं केवल तुम्हें देख रही होती । तुम्हारे हाथ-पैरों में किसी जंगली जानवर के पंजों जैसे बड़े-बड़े नाख़ून उग जाते । तुम्हारे विकृत चेहरे पर भयावह दाँत उग जाते । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते । तुम मेरे चेहरे की ओर इशारा कर के कुछ बोल रहे होते और तब अचानक मुझे फिर से सब सुनाई देने लगता । ” भद्दी, बदसूरत कहीं की ।” तुम ग़ुस्से से पागल हो कर चीख़ रहे होते । शायद मैं तुम्हें शुरू से ही भद्दी लगती थी , बदसूरत लगती थी । फुंसियाँ तो एक बहाना थीं । शायद यही वजह रही होगी कि तुम्हें मेरी फुंसियाँ और उन्हें छूने की मेरी मामूली-सी आदत भी असहनीय लगती थी । जब हम किसी से चिढ़ने लगते हैं, नफ़रत करने लगते हैं तब उसकी हर आदत हमें बुरी लगती है । यदि तुम्हें मुझ से प्यार होता तो शायद तुम मेरी फुंसियों को नज़रंदाज़ कर देते । पता नहीं तुमने मुझसे शादी क्यों की ? शायद इसलिए कि मैं अपने अमीर पिता की इकलौती बेटी थी । मेरे पापा को तुमने चालाकी से पहले ही प्रभावित कर लिया था । उनकी मौत के बाद उनकी सारी जायदाद तुम्हारे पास आ गई और तुम अपना असली रूप दिखाने लगे । ” तुम भी पक्की ढीठ हो । तुम नहीं बदलोगी । ” तुम अक्सर किसी-न-किसी  बात  पर  अपने  विष-बुझे बाणों से मुझे बींधते रहते । सच्चाई तो यह है कि शादी के बाद से अब तक तुमने अपनी एक भी आदत नहीं बदली — सिगरेट पीना , शराब पीना , इंटरनेट पर पार्न-साइट्स देखना...

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ईश मिश्र की कहानी ‘गुलेरी जी की आत्मा’

ईश मिश्र दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से राजनीति शास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर पद से फरवरी 2019 में रिटायर। 1985 से पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं शोधपत्र लिख रहे हैं। सांप्रदायिकता पर लेखों का संकलन प्रकाशनार्थ समयांतर (मार्च 2017-नवंबर 2017) में समाजवाद पर प्रकाशित 9 लेखों को संकलित संपादित करने की तैयारी। 17 बी, विश्वविद्यालय मार्ग दिल्ली...

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शिव कुमार यादव की कहानी ‘किन बैरन लगाई ई आग रे…’

शिव कुमार यादव जन्म – 28जुलाई 1960 गांव – कतिकनार,बक्सर, बिहार। रचनाएं – हवा,काले फूल का प्रेम और रामऔतार की भैंस कहानी संग्रह। ईश्वर का हिन्दू और आस्था की परती पर, कविता संग्रह। अंधेर अर्थात बेजान बेजुबान समय की कहानियों का बंग्ला,मरठी, पंजाबी और तेलगु में अनुवाद। संप्रति :- सेल,आई एस...

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देवेश पथ सरिया की 3 कविताएं

देवेश पथ सरिया साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन: वागर्थ, पाखी,  कथादेश, कथाक्रम, कादंबिनी, आजकल,  परिकथा, प्रगतिशील वसुधा, दोआबा, जनपथ, समावर्तन, आधारशिला, अक्षर पर्व, बया, बनास जन,  मंतव्य, कृति ओर,  शुक्रवार साहित्यिक वार्षिकी, ककसाड़, उम्मीद, परिंदे, कला समय, रेतपथ, पुष्पगंधा आदि पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित समाचार पत्रों में प्रकाशन: राजस्थान पत्रिका, दैनिक...

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शंकर की कहानी ‘बत्तियां’

शंकर हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार। मशहूर साहित्यिक पत्रिका ‘परिकथा’ के संपादक थानेदार ने ऊंची आवाज में जो कुछ कहा था, दरअसल वह उसकी अपनी ही बेचैनी और घबड़ाहट का बयान था। सिपाही बिहारी राय और भरत पांडे ने जैसे कल सुना था, वैसे ही आज भी सुना: ‘‘कमबख्तो, मैं हथियार-बम...

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कैलाश मनहर के दोहे

कैलाश मनहर आधी रोटी नभ में चमके, आधी मेरे पास | आधी रात राजधानी में, भूत कर रहे रास ||१|| आधी साँस अधूरे सपने,अधसुलगी-सी आग | आधी नींद अँधेरा गहरा, आधी मेरी जाग ||२|| आधी हिम्मत आधी दहशत,बातें आधमआध | आधे मन में आधी खुशियाँ, आधे हैं अपराध ||३|| आधी...

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अनिरुद्ध सिन्हा की 5 ग़ज़लें

अनिरुद्ध सिन्हा जन्म-2 मई 1957 शिक्षा-स्नातकोत्तर (अर्थशास्त्र) प्रकाशित कृतियाँ (1)नया साल (2)दहेज (कविता संग्रह )(3))और वे चुप हो गए (कहानी-संग्रह)(4)तिनके भी डराते हैं (5)तपिश (6)तमाशा (7)तड़प (8)तो ग़लत क्या है (9)ताकि हम बचे रहें (10)तो मैं ग़ज़ल कहूँ (ग़ज़ल-संग्रह)(11)हिन्दी ग़ज़ल सौंदर्य और यथार्थ (12)हिन्दी ग़ज़ल का यथार्थवादी दर्शन (13)उद्भ्रांत की...

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दुनिया की भयावहता से लड़ने की ऊर्जा देने वाली किताब

पुस्तक समीक्षा सीमा संगसार तोत्तो चान एक अकेली ऐसी पुस्तक थी , जिसे मेरे कई शुभचिंतकों ने पढ़ने की सलाह दी। अमेजन पर उपलब्ध नहीं होने की वजह से मैं इसे पढ़ नहीं पा रही थी। एक आदर्श शिक्षक और एक माँ के लिए यह किताब पढ़ना उतना ही जरूरी...

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सुधांशु गुप्त की कहानी ‘संत, सत्यवान और सुधीर’

सुधांशु गुप्त कई कहानियां देश की प्रतिष्ठत पत्रिकाओं और पत्रों में प्रकाशित। अनेक कहानियां रेडियो से प्रसारित हो चुकी हैं। एक कहानी का मंचन श्रीराम सेंटर में हो चुका है। हिन्दी अकादमी और साहित्य कला परिषद द्वारा कहानी लेखन के लिए सम्मानित। ढाई दशक पत्रकारिता में गुजारने के बाद अब...

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रविशंकर सिंह की कहानी ‘पान-प्रसाद और पेंशन’

रविशंकर सिंह जन्म : 8 अक्टूबर 1958, ग्राम : धनौरा, भागलपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिन्दी), पीएचडी प्रकाशन : हंस, कथादेश, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, जनसत्ता, अक्षरपर्व, परिंदे, संवेद, जनमत, अलाव, प्रगतिशील वसुधा, कथाबिंब, कल के लिए, किस्सा, अंगचम्पा, समकालीन भारतीय साहित्य आदि पत्रिकाओं में कहानियां, कविताएं, आलेख प्रकाशित कहानी संग्रह...

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डी एम मिश्र की 7 ग़ज़लें

डी एम मिश्र 1. यूं अचानक हुक्म आया लाकडाउन हो गया यार से  मिल भी न पाया लाकडाउन हो गया बंद पिंजरे में किसी मजबूर पंछी की तरह दिल हमारा फड़फड़ाया लाकडाउन हो गया घर के बाहर है कोरोना, घर के भीतर भूख है मौत का कैसा ये साया लाकडाउन...

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हरियश राय की कहानी ‘ऐसा हो तो…’

हरियश राय उत्‍तर प्रदेश के फतेहगढ़ में प्रारम्भिक शिक्षा, 1971 के बाद की शिक्षा दिल्ली से। दो उपन्यासों‘नागफनी के जंगल में’और‘मुट्ठी में बादल’के अलावा  छ:  कहानी संकलन‘बर्फ होती नदी’, ‘उधर भी सहरा’,‘अंतिम पड़ाव’, ‘वजूद के लिए’,‘सुबह- सवेरे’व‘ किस मुकाम तक ‘’प्रकाशित. इसके साथ ही सामयिक विषयों से संबंधित पांच अन्‍य...

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केशव शरण की 2 कविताएं

केशव शरण प्रकाशित कृतियां-तालाब के पानी में लड़की  (कविता संग्रह)जिधर खुला व्योम होता है  (कविता संग्रह)दर्द के खेत में  (ग़ज़ल संग्रह)कड़ी धूप में (हाइकु संग्रह)एक उत्तर-आधुनिक ऋचा (कवितासंग्रह)दूरी मिट गयी  (कविता संग्रह)क़दम-क़दम ( चुनी हुई कविताएं ) न संगीत न फूल ( कविता संग्रह)गगन नीला धरा धानी नहीं है ( ग़ज़ल...

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श्रुति कुशवाहा की 5 कविताएं

श्रुति कुशवाहा जन्म :       13/02/1978  भोपाल, मध्यप्रदेश शिक्षा :       पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि. भोपाल) प्रकाशन:           कविता संग्रह “कशमकश” वर्ष 2016, साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग, भोपाल के सहयोग से प्रकाशित वागर्थ, कथादेश, कादंबिनी, उद्भावना, परिकथा, समरलोक एवं जनसत्ता, दैनिक भास्कर, पत्रिका, नई...

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विवेक मिश्र की कहानी ‘कारा’

विवेक मिश्र 15 अगस्त 1970 को उत्तर प्रदेश के झांसी शहर में जन्म विज्ञान में स्नातक, दन्त स्वास्थ विज्ञान में विशेष शिक्षा, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्कोत्तर. तीन कहानी संग्रह- ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’-शिल्पायन, ‘पार उतरना धीरे से’-सामायिक प्रकाशन एवं ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ?’- किताबघर प्रकाशन तथा उपन्यास...

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प्रज्ञा की कहानी ‘एक झरना ज़मींदोज़’

प्रज्ञा प्रकाशित कृतियां कहानी संग्रह-तकसीम, मन्न्त टेलर्स उपन्यास—गूदड़ बस्ती, धर्मपुर लॉज नाट्यालोचना और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर भी पुस्तकें प्रकाशित संप्रति एसोसिएट प्रोफेसर किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ई-मेल-pragya3k@gmail.com एक प्रेम कहानी ऐसी भी! जैसा उन्हें उस वक्त देखा, मैं वैसा ही पेश करने की कोशिश करूंगा जनाब! न...

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बढ़ती अमानुषिकता के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करती पत्रिका

कथन अंक 83-84 बढ़ती अमानुषिकता से जूझती दुनिया पर केंद्रित संपादक :  संज्ञा उपाध्याय पता :107, साक्षरा अपार्टमेंट्स ए -3, पश्चिम विहार, नयी दिल्ली-110063 फोन–9818184806 मूल्य 100 रुपए पत्रिका सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव कोरोना वायरस से बचने के लिए पुरी दुनिया ने खुद को ताले में बन्द कर लिया है। पूरी...