Author: literaturepoint

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अरविन्द यादव की कविताएं

उम्मीदें अनायास दिख ही जातीं हैं आलीशान महलों को ठेंगा दिखाती नीले आकाश को लादे सड़क के किनारे खड़ी बैलगाड़ियां और उनके पास घूमता नंग-धड़ंग  बचपन शहर दर शहर इतना ही नहीं खींच लेता है अपनी ओर चिन्ताकुल तवा और मुँह बाये पड़ी पतीली की ओर  हाथ फैलाए चमचे को...

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दुष्प्रचारों से नहीं दब सकता गांधी का सत्य

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव गांधी के देश में गोडसे की पूजा होने लगे, तो खुद से यह सवाल पूछना ही चाहिए कि गांधी की विरासत को संभालने में हमसे कहां चूक हो गई? गांधी को जितना समझा है, उससे मैं यह अनुमान लगा सकता हूं कि अगर आज वो...

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सारुल बागला की कविताएं

रेखाचित्र : रोहित प्रसाद पथिक ईश्वर ये दुनिया उनके लिए नहीं बनाई गयीजिनके लिए सिर्फ आसमानीपाप और पुण्य से बड़ी कोई चीज़ नहींफर्ज़ कीजिए कि ईश्वर कोईनयी दुनिया बनाने में व्यस्त हो जाता हैया फिर चला जाता है दावत पर कहींकिसी स्वाद में डूबकरअनुपस्थित हो जाता हैतो आप कितने इंसान...

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अनु चक्रवर्ती की ग़ज़ल

मुसल्सल  एक ही बात पर जान निकलती रहीभीड़ में भी वो निग़ाह देर तलक मुझे तकती रही तूने क्या मंतर पढ़ा ,जाने कौन सी बांधी तावीज रफ़्ता -रफ़्ता मैं तेरे निगाहे -तिलिस्म में बंधती रही शोर बरपा -सा क्यों है , तेरे बज़्म में यूँ सरासर  उफ़्फ़! हाथ जो पकड़ा तूने ,बर्फ़...

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राजा सिंह की कहानी ‘पलायन’

रेखाचित्र : संदीप राशिनकर वे जा रहे हैं। वह परिसर से बाहर खड़ा, उन्हें दूर जाते देख रहा है। जब वे नज़रों से ओझल हो गए तो वह लौट आया। उनके कमरे में अपने को ढीला छोड़ते हुए वह राहत की साँस लेता है परन्तु उनकी आवाजें कर्कश, मृदु, तीखी,...

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आग का पता बताने वाली कहानियां

पुस्तक समीक्षा सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव उसे वो पसंद हैंजो मुंह नहीं खोलतेउसे वो पसंद हैंजो आंखें बंद रखते हैंउसे वो पसंद हैंजो सवाल नहीं करतेउसे वो पसंद हैंजिनका खून नहीं खौलताउसे वो पसंद हैंजो अन्याय का प्रतिकार नहीं करतेउसे मुर्दे पसंद हैंवो राजा है(लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित कविता संग्रह ‘अंधेरे अपने...

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शिवानी शर्मा की 5 लघुकथाएं

अपनी अपनी बारी सरकारी अस्पताल में एक डॉक्टर के कमरे के बाहर पंक्तिबद्ध लोग अपनी-अपनी बारी की प्रतीक्षा में थे। वहीं कतार में एक बुजुर्ग महिला भी थीं जो प्रतीक्षा के पलों में अपने झोले में से कभी बिस्किट तो कभी चूरन की गोली और कभी सौंफ जैसी कोई चीज़...

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आलोक कुमार मिश्रा की कविताएं

बिछोह नदी और बुआ दोनों थीं एक जैसी सावन में ही हमारे गाँव आतीं थीं मंडराती थीं बलखाती थीं बह-बह जाती थीं गाँव घर खेत खलिहान सिवान दलान में  बुआ झूलती थी झूलाऔर गाती थी आशीषों भरे गीतनदी भरती थी मिट्टी में प्राणजैसे निभा रही हो रस्म मना रही हो रीतदोनों लौट जाती थीं जब जाते थे...

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प्रणव प्रियदर्शी की कविताएं

अकेले आदमी की मर्जीवह वक्त की आग पर से विद्रूपता का राख हटा बढ़ता है आगे जूझने को सारी विषमताओं से। जब वह अपने भीतर उतरता है तो समाज उसे अनुपयोगी सिद्ध कर देता है देखता है वह सामने सूखे कचनार का पेड़ और ठिठक कर खड़ा हो जाता है...

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गजेन्द्र रावत की कविताएं

1. सहज कौवामेरी तरह नहीं लेतासहजमौत कोमैंने उसेएकजुट होआकाश सर पर उठाते देखा है… 2. बेरहमी अंधेराउन्हें पसंद हैवे नहीं देखना चाहतेअपना भी चेहरारोशनी जो दिखा देती हैउनके भीतर जमे हुए डर कोइसीलिएवो हर शैजो देती है रोशनीमिटा दी जाती हैबेरहमी से…. 3. खोज रहे हैं आजवे चल पड़े हैंनंगे...

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पीयूष कुमार द्विवेदी के 10 दोहे

भीषण सूखा है कहीं, और कहीं सैलाब । हमने जो दोहन किया, देती प्रकृति जवाब ।।१।। नीम कटी जो द्वार की, तरसे मेरे कान । सुनने को मिलता नहीं, मधुर कोकिला गान ।।२।। धरती छाती चीरकर, लेते जल हम खींच । लेकिन लौटते नहीं, कितनी हरकत नीच ।।३।। गंगा बस...

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राजेश’ललित’ की कविताएं

बुद्ध मैं आत्मा घर रख आया बस यूँ ही शरीर  लेकर निकल पड़ा कभी इस डगर कभी उस नगर आत्मा साफ़ हो तो ठीक बाहर रोगी हैं वृद्ध हैं बाहर निष्प्राण हैं मैं कोई बुद्ध नहीं कोई वट वृक्ष नहीं हाँ,पत्नी को बता आया वो साफ़ रखेगी आत्मा संदूक में...

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डॉ नितेश व्यास की कविताएं

शब्द का सपना कविता में जीवन के ढंग को तलाशता हूं मैं खोजता हूं शब्दों में इन्द्र धनुष के बाहर‌ का कोई रंग कोई ऐसी वर्णमाला जिसे पहनकर मैं अदृश्य हो सकूं मैं एक आरामदायक कमरा खोजता हुआ कविता की पुस्तक तक पहुंच जाता हूं मैं ढूंढता हूं एक गोद...

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शिवदयाल की कहानी ‘खटराग’

ईश्वरी बाबू मेरे पड़ोसी हैं। अक्सर शाम को हम साथ ही बैठते हैं और चाय पीते हुए देर तक बातें करते रहते हैं। इसमें रस बहुत मिलता है। और ईश्वरी बाब तो जरा-सी बात को ऐसा मोड़ और ऐसी गहराई दे देते हैं कि मन नहीं चाहता कि उनकी बात...

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बच्चों के लिए राम करन की कविताएं

बादल! आना मेरे गाँव बरगद बाबा खड़े मिलेंगे, जटा-जूट से बढ़े मिलेंगे। झुककर छूना उनके पांव, बादल! आना मेरे गाँव। पके रसीले आम मिलेंगे, लँगड़ा, बुढ़वा नाम मिलेंगे। और मिलेगी पीपल छाँव, बादल! आना मेरे गाँव। घर-घर ठाड़े नीम मिलेंगे, दातुन लिए हक़ीम मिलेंगे। चिड़ियां करती ‘ची-ची-चांव’, बादल! आना मेरे...

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अमरीक सिंह दीप की कहानी ‘प्रकृति’

वह इतनी सुन्दर है जितनी सुन्दर यह धरती। धरती पर खड़े पहाड़ । पहाड़ पर खड़े देवदार, चीड़ , चिनार , सागवान , बुरुंश के वृक्ष। पहाड़ों से गिरने वाले झरने। झरनों के समूह गान से बनी नदियां। नदियां , जो मैदानों में आकर बाग-बगीचों और खेतों को सींचतीं हैं...

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केशव शरण की ग़ज़लें

1. पता है फिर ख़राबी से जलन क्यों हो रही मुझको कपट की कामयाबी से जलन क्यों हो रही मुझको नवाबी शान इसके मालिकों की कोफ़्त देती क्या मुलाज़िम की नवाबी से जलन क्यों हो रही मुझको बचा हूं मैं अगर तो श्रेय है बेरंग पानी का  गरल गाढ़े गुलाबी...

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मधु कांकरिया की कहानी ‘जलकुम्भी’

प्रणीता की कहानी मैं लिखना नहीं चाहती थी क्योंकि उसे सम्पूर्णता में पकड़ पाना, अनंत उदासी के उसके घेरे को बेध पाना मेरे बस की बात नहीं थी. फिर भी उसकी कहानी मैं लिख रही हूँ तो महज इस कारण कि कौन जाने किन सहृदय पाठकों के हाथों में पड़कर यह...

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शंकर की कहानी ‘नायक’

ये प्रेम किशोर के लिए उद्भुत और अभूतपूर्व क्षण थे और स्टेट सर्विसेज प्रतियोगिता संयोजित करने वाले इस कार्यालय की इमारत से सफल परीक्षार्थियों की सूची देखकर निकलते हुए उनके पाँव जिस तरह उड़ रहे थे,  यह उनके लिए बिल्कुल नया अनुभव था। उन्होंने पथरीली जमीन पर पाँव दबा-दबा कर...