Author: literaturepoint

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रचना त्यागी की कहानी ‘काला दरिया’

 शुरुआती औपचारिकताओं के बाद पत्र का मजमून कुछ यूँ था –  माननीय मंत्री जी,  वन्दे मातरम !          बहुत सोच-विचार के बाद आपको यह पत्र लिखने बैठा हूँ। विगत कई वर्षों की पीड़ा  जब वक़्त की चट्टान तले दबकर धूमिल होने की बजाय किसी बरगद की जड़ों की मानिंद फैलती चली गई, और मैं...

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सिमन्तिनी रमेश वेलुस्कर की कविताएं

1. कठिनतम परिस्थितियों में जब मुट्ठी भर संवेदनशील लोग शर्म से गड़े जा रहे हैं पांच हज़ार बरसों में लगभग चौदह हज़ार युद्धों का इतिहास चीख़ चीख़ कर कह रहा है कोई राजा आज तक शर्म से नहीं मरा 2. चैत और फागुन के बीच के मौसम में जब चलती...

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डॉ शंभुनाथ की कविताएं

भूख पर 2 कविताएं भूख में सपने बहुत आते हैं भूख का नामोनिशान नहीं होताविज्ञापनों के संसार मेंमॉल में भी वह चर्चा के बाहर हैकंपनियों के व्यापार कोश में नहीं है यह शब्दबाहर है कैफे से संसद सेशिखर वार्ताओं से भी पूरी तरह बाहरभूख फैल रही है शहर-शहरभूख में फैल...

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सपना सिंह की कहानी ‘उसका चेहरा’

         मैं उससे पहली दफा एक दोस्त के घर मिला था और एक लम्बे अर्से बाद मेरा मन कविता लिखने को होने लगा था।           दोस्त ने ही उसका परिचय कराया था, इनसे मिलो, अनुसूया अपने शशांक की पत्नी। उसने अन्यमनस्कता से मुझे देखकर हाथ जोड़ दिये थे तभी उधर...

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केशव शरण की कविताएं

उत्तरोत्तर विकास सैकड़ों को डुबोया गया हज़ारों के विकास के लिए एक दिन हज़ारों भी डूब गये लाखों के विकास के लिए अब करोड़ों के विकास के लिए सोचा जा रहा है 2. कल कौन-से देवता का दिन? भरी कटोरियां और कलश लेकर मंदिर जाते हुए उसे देख रहे थे...

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नज़्म सुभाष की 3 लघुकथाएं

सौदा दिन पर दिन रोजी रोटी का जुगाड़ मुश्किल होता जा रहा है। मार्केट जैसे कोई आता ही नहीं ….ऐसे कैसे चलेगा गुजारा ?….कमाई कुछ भी नहीं और खर्चा … सुरसा की तरह हमेशा मुंह बाये रहता…करीब हफ्ते भर से बिटिया रोज कहती है -“पापा मेरा बस्ता फट गया है”...

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प्रदीप कुमार शर्मा की लघुकथा ‘कर्ज़’

वह बहुत चिंतित था. ‘लाकडाउन की वजह से काम से बैठे हुए चार महीने से ऊपर हो गए. फैक्ट्री चालू हो तब तो कोई काम हो और पैसा आए. हमारी हालत तो ऐसी है. न सड़क पर बंट रहे खाने पीने की सामग्री ले सकते हैं और न ही फ्री...

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डॉ कुन्दन सिंह की 5 कविताएं

शिकारी शहर शहर शिकारी हो गया हैमारता है झपट्टाऔर लील जाता हैगांव-गिरांव के लड़केकि गांव के गांववीरान पड़ते जा रहेबचे हैं बसबूढ़े निस्साहाय असमर्थखेत खलिहान से दुआर दलान तकपसरी पड़ी है चुप्पी ! शिकारी शहर ने कर लिया है रुखअब खुद ही गांव की ओरनये शिकार की तलाश मेंभूख बड़ी...

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अंजू शर्मा की कहानी ‘नेमप्लेट’

ये उन दिनों की बात है जब दिन कुछ अधिक लम्बे हो चले थे और रातें मानो सिकुड़-सी गईं थीं! उनके बड़े हिस्से पर अब दिन का अख्तियार था! ये उन्हीं गुनगुने दिनों में एक बड़े महानगर की एक अलसाई-सी शाम थी जो धीमे-धीमे चलकर अपने होने का अहसास कराने...

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अनामिका अनु की 10 कविताएं

1. तथाकथित प्रेम अलाप्पुझा रेलवे स्टेशन पर, ईएसआई अस्पताल के पीछे जो मंदिर है वहाँ मिलते हैं, फिर रेल पर चढ़कर दरवाजे पर खड़े होकर, हाथों में हाथ डालकर बस एक बार जोर से हँसेंगे, बस इतने से ही बहती हरियाली में बने ईंट और फूस के घरों से झाँकती...

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रमेश शर्मा की कहानी ‘एक मरती हुई आवाज़’

जाते दिसंबर का महीना था. हफ्ते भर पहले पछुआ हवाओं से हुई बारिश के चलते कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. जगमगाते शहर को देखकर लगता था कि क्रिसमस की तैयारियां अब जोरों पर हैं. शहर के अधिकांश घर रंगीन झालरों की रोशनी में अभी से डूबे हुए थे. उसने...

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अच्छे और बुरे आदमी के बीच की ‘बारीक रेखा’ की कहानी

प्रज्ञा की कहानी ‘बुरा आदमी’ पर सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की टिप्पणी कबीर कह गए हैं, बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय हर भले आदमी के भीतर एक बुरा आदमी छिपा होता है। वह कब फन उठाएगा कोई नहीं जानता।...

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अवधेश प्रीत की कहानी ‘कजरी’

कजरी की हालत अब देखी नहीं जा रही।रात जैसे-जैसे गहराती जा रही है फजलू मियां की तबीयत डूबती जा रही है। वह इस बीच कभी घर के भीतर तो कभी बथान तक कई चक्कर लगा चुके थे। जब भी वह बथान तक जाते थम कर खड़े हो जाते। कजरी उन्हें...

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बलजीत सिंह ‘बेनाम’ की तीन ग़ज़लें

1 प्यार का मतलब बताती इक कहानी दे गया इक पतंगा हँसते हँसते ज़िंदगानी दे गया शख्स जाने कौन था पर दर्द में मसरूर था अपने हिस्से की मुझे बाकी जवानी दे गया ज़िन्दगी के जब सभी अल्फ़ाज़ थे बिखरे पड़े तब ख़ुदा सपने में लफ़्ज़ों को मुआनी दे गया...

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आलोक कौशिक की लघुकथा ‘नालायक बेटा’

रामानंद बाबू को अस्पताल में भर्ती हुए आज दो महीने हो गये। वे कर्क रोग से ग्रसित हैं। उनकी सेवा-सुश्रुषा करने के लिए उनका सबसे छोटा बेटा बंसी भी उनके साथ अस्पताल में ही रहता है। बंसी की मां को गुजरे हुए क़रीब पांच वर्ष हो चुके हैं। अपनी मां...

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डॉ सुनील कुमार की 2 कविताएं

आग की खोज उन बस्तियों के लिए आग की खोज एक जुगुनू के द्वारा हुई इतना घुप्प अंधेरा था सदियों से एक जुगनू भी उन्हें विशालकाय सूरज सा लगने लगा उसे देख कर सदियों की अंधेरी बस्तियों को आग का एहसास हुआ उन्हें भी गर्माहट सी होने लगी विचारों की...

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जयनंदन की कहानी ‘और रास्ता क्या है’

गुणाकर अपनी गरीबी और जहालत से लड़कर भी टूट नहीं रहा था। सभी जानते थे कि इसके पीछे अस्मां की मोहब्बत एक ताकत बनकर छतरी की तरह उस पर तनी रहती है। उसके घर के दो लड़के सोबरन और रोहित भूख और बेरोजगारी से तंग आकर अंततः घर और गांव...

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विजय शंकर विकुज की कहानी ‘ऑपरेशन प्रलय’

            हड़हड़-खड़खड़, हड़हड़-खड़खड़!             सुबह घर से निकलते हुए भी हड़हड़-खड़खड़ की आवाज़ उसके कानों में रेंगकर दिमाग को थपेड़े मार रही थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अभी तक उसके मन-मस्तिष्क पर परसों की भारी बरसात...

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इश्क : छोटे कलेवर में बड़ा संदेश देता उपन्यास

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव पितृसत्तात्मक समाज की सबसे बड़ी ध्वजवाहिका स्त्री ही होती है। परंपरा, रिवाज, संस्कार के नाम पर जाने-अनजाने बेटियों से लेकर बहुओं तक पर पुरुषशासित समाज के उन नियमों को कड़ाई से पालन करने की जिम्मेदारी स्त्रियों के कंधों पर ही होती है, जो अन्तत: उन्हें बेड़ियों में...

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रामनगीना मौर्य की कहानी ‘बेचारा कीड़ा’

रेखा चित्र : रोहित प्रसाद पथिक ‘तू शायर है, मैं तेरी शायरी’…समर अपने मोबाइल के ‘सिंग-टोन’ पर जगा। लेकिन,फोन तुरन्त बन्द भी हो गया। शायद, किसी का मिस्सड-कॉल था। असमय नींद टूटने से समर को झल्लाहट हुई। फोन बन्द हो चुका था, सो इतनी सुबह किसका फोन हो सकता है?...