Author: literaturepoint

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सबका शायर : शीघ्र प्रकाश्य ग़ज़ल संग्रह

हैं निगह में, पहाड़ के मंज़र और उस पर, उजाड़ के मंज़र ज़िंदगी सिल रही है, फट -फट के कैसे – कैसे, जुगाड़ के मंज़र नूर मुहम्मद नूर के ग़ज़ल संग्रह सबका शायर की प्री-बुकिंग जारी है। यह संग्रह अगस्त के आखिरी हफ्ते में प्रकाशित होगा। अगर आपने अभी तक...

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कसक : लघु उपन्यास

पहले प्यार में आदमी आमतौर पर नाकाम हो जाता है। और फिर यह पहला प्यार बहुत तकलीफ देता है। अनमित्र भी भूलने की कोशिश कर रहा था लेकिन अचानक पहला प्यार जिस रूप में उसके सामने आकर खड़ा हो गया, उसकी कल्पना भी उसने नहीं की थी। पढ़िए मुहब्बत में...

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वह जो कल्पना है : कविता संग्रह

#LiteraturepointEbooks प्रेम क्या है इस प्रेम की जगह कहाँ है जितना पूछता हूँ मैं ख़ुद से उतना डूबता हूँ मैं ख़ुद में जो भी यह सवाल करेगा, ऐसे ही डूबता जाएगा। प्रेम होता ही इतना अनन्त है। प्रेम के कई रंगों को अपने शब्दों में साकार किया है अर्पण कुमार...

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रोटियों के हादसे : कविता संग्रह

भूखा बच्चा रोटी समझ चांद को लपकना चाहता है लेकिन काट दिये जाते हैं उसके पंख वो फड़फड़ाता है छटपटाता है उसका पंख लेकर कोई और उड़ जाता है उसके हिस्से में ना तो रोटी है ना ही उड़ान उसके हिस्से में सिर्फ भूख है सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव के कविता...

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संजीव ठाकुर की बाल-कथा ‘डरपोक’

संजीव ठाकुर सीतेश पूरे हॉस्टल में बदनाम था। उसकी बदनामी इस बात में थी कि वह न तो कभी ठीक से नहाता था, न ही ढंग से कपड़े पहनता था और न ही बिस्तर ठीक करता था। उसकी किताबें-कापियाँ वगैरह भी जैसे-तैसे ही रहती थीं। वह कभी भी समय पर...

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चांदनी सेठी कोचर की लघुकथा ‘कामवाली’

चादनी सेठी कोचर रेणु की काम वाली सुनीता उसके घर में पिछले 4 साल से काम कर रही थी। दोनों एक दूसरे को बखूबी समझते थे लेकिन आज सुनीता को काम पर आने में थोड़ी देर क्या हुई, रेणु उस पर चिल्लाने लगी। “क्या बाता है सुनीता, आज तुमने आने...

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अर्पण कुमार की 5 कविताएं

अर्पण कुमार दो काव्य संग्रह ‘नदी के पार नदी’ (2002), ‘मैं सड़क हूँ’ (2011) एवं एक उपन्यास ‘पच्चीस वर्ग गज़’ (2017) प्रकाशित एवं चर्चित। कविताएँ एवं कहानियाँ, आकाशावाणी के दिल्ली, जयपुर एवं बिलासपुर केंद्र से प्रसारित। दूरदर्शन के ‘जयपुर’ एवं ‘जगदलपुर’ केंद्रों से कविताओं का प्रसारण एवं कुछ परिचर्चाओं में...

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मुकुल आनन्द की कविता ‘तुम्हारी याद’

मुकुल आनन्द ग्राम+पो- पटसाजिला-     समस्तीपुर राज्य-     बिहारपिन-     848206″बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययनरत” वर्तमान निवास स्थान-  दुर्गाकुंड, वाराणसी तुम्हारी याद  तुम याद आती हो जैसे आती है रात आता है दिन लगती है भूख लगती है प्यास.. जैसे बच्चों के चोटिल होने पर माँ को आता है...

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नूर मुहम्मद ‘नूर’ की 2 ग़ज़लें

नूर मुहम्मद ‘नूर’ जन्म : 17 :08 :1952 गांव :महासन, डाक : महुअवां कारख़ाना, जनपद : कुशीनगर। पिछले 5 दशक से निरंतर लेखन। हिंदी की तमाम पत्र- पत्रिकाओं  में अनगिनत रचनाओं का प्रकाशन। अबतक चार किताबें प्रकाशित। एक लंबी कविताओं, एक कहानियो और दो ग़ज़लों की। भारतीय रेलवे में 36...

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प्रशान्त तिवारी की 7 कविताएं

प्रशान्त तिवारी जौनपुर निवासी (उत्तर प्रदेश)वर्तमान में नोएडा में निवास एक न्यूज़ ऐप में कार्यरत माएं भी जादूगर जैसी होती हैं 10 रुपए की कमाई में 12 रुपए का खर्च चला लेती हैं और उसी 10 रुपए में से 3 रुपए बचा भी लेती हैं उस वक्त के लिए जब हम...

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राजेश ‘ललित’ शर्मा की 4 कविताएं

राजेश’ललित’शर्मा बी-९/ए:डी डी ए फ्लैटस होली चाईल्ड के पीछे टैगोर गार्डन विस्तार नई दिल्ली -११००२७ ज़ख्म ज़ख़्मों पर मरहम नहीं नमक लगा बना रहे घाव उठती रहे टीस दर्द की आह निकले। याद रहे हमेशा किसने दिया था ? ये जख्म !! तन्हा कुछ देर इंतज़ार करो,ए दोस्त ज़िंदगी ज़रा...

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हम सब जिसे शबाना के नाम से जानते हैं

पुस्तक समीक्षा मैं शबाना ( उपन्यास ) लेखक : यूसुफ़ रईस  प्रकाशक : नोशन प्रेस ( इंडिया, सिंगापुर, मलेशिया ), ओल्ड नं. 38, न्यू नं. 6, मैक निकोल्स रोड, चैटपट, चेन्नई – 600 013 मूल्य : ₹ 199 मोबाइल संपर्क : 09829595160 शहंशाह आलम शहंशाह आलम हम सब जिसे शबाना...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘गलती’

सुशांत सुप्रिय A-5001 , गौड़ ग्रीन सिटी , वैभव खंड , इंदिरापुरम् , ग़ाज़ियाबाद – 201014 ( उ. प्र. ) मो : 8512070086 ई-मेल : sushant1968@gmail शुक्लाजी ने चश्मा लगाया , थैला उठाया , छड़ी ली और बाज़ार से दूध , सब्ज़ी और अन्य सामान लाने के लिए धीमी चाल...

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राजेंद्र राजन की 3 कविताएं

राजेंद्र राजन बुखार पर्व जो फेंक दिए गए थे इतिहास के कूड़ेदान में आज वे घूम रहे हैं दल के दल बजा रहे हैं धर्म का बाजा हर सड़क हर गली में इतने जोर से कि बहरे हो जाएं कान सुनाई न दे पड़ोस का चीखना अपनी ही आवाज़। उनकी...

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विजेंद्र की 6 कविताएं

विजेंद्र एक तुम्हें बाहर आना ही होगा कहां मिलेगा उस आदमी का उजला ब्यौरा जिसे काले पत्थरों में चुन दिया गया है उन्हें करीब से देखो समुद्र की तूफानी लहरों का गरजन तुम्हें सुनाई देगा श्रमिकों और किसानों का एकजुट संघर्ष लोकतंत्र की पहली जरूरत है दबे कुचले लोगों की...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की 5 कविताएं

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव राजा एक उसे वो पसंद हैं जो मुंह नहीं खोलते उसे वो पसंद हैं जो आंखें बंद रखते हैं उसे वो पसंद हैं जो सवाल नहीं करते उसे वो पसंद हैं जिनका खून नहीं खौलता उसे वो पसंद हैं जो अन्याय का प्रतिकार नहीं करते उसे मुर्दे...

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आरती आलोक वर्मा की 3 ग़ज़लें

आरती आलोक वर्मा एक लगाई  उन्होंने  ही  आग  घर में बसाये हुये थे जिन्हें हम नजर में   घरौंदे बिखरते नजर आ रहे हैं  नये दौर के इस अनूठे शहर मेंचमन में पसरने लगी आग हरसू शरारे दिये छोड़ किसने शज़र में ।जहाँ मुफलिसी बसर कर रही होवहाँ कौन जीता नहीं डर फिक्र में किसी...

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शुक्ला चौधुरी की 3 कविताएं

शुक्ला चौधुरी मां एक जब घर से अचानक गायब हो जाती थी मां पहले हम चावल के कनस्तर में झांकते फिर दाल मसाले के डिब्बे से पूछते तब भी अगर मां आवाज़ नहीं देती तब हम चूल्हे के पास खड़े हो जाते और जोर-जोर से रोते मां मां मां चूल्हे...

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आशीष श्रीवास्तव की लघु कथा ‘तबीयत’

आशीष श्रीवास्तव पिछले एक सप्ताह से राकेश कार्यालय आता और अपने कार्यालयीन सहयोगी नरेश को काम में सहयोग करने के लिए कहता, फिर बहुत-सा काम बताकर चला जाता। कहता : पिताजी की तबियत ठीक नहीं है उन्हें दिखाने जाना है, भाई संभाल ले। नरेश  ने संवेदनशीलता और गंभीरता दिखाई और...

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सुशान्त सुप्रिय की कहानी ‘मिसफिट’

सुशान्त सुप्रिय मार्फ़त श्री एच. बी. सिन्हा , 5174, श्यामलाल बिल्डिंग , बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) , नई दिल्ली – 110055 मो:  8512070086 ई-मेल: sushant1968@ gmail.com उसका सिर तेज़ दर्द से फटा जा रहा था । उसने पटरी से कान लगा कर रेलगाड़ी की आवाज़ सुननी चाही । कहीं कुछ नहीं था । उसने जब-जब जो जो चाहा, उसे नहीं  मिला । फिर आज  उसकी  इच्छा   कैसे  पूरी हो सकती थी । पटरी  पर लेटे-लेटे उसने कलाई-घड़ी देखी ।  आधा घंटा ऊपर हो चुका था पर इंटरसिटी एक्सप्रेसका कोई अता-पता  नहीं  था । इंटरसिटी एक्सप्रेस न सही , कोई पैसेंजर गाड़ी ही सही । कोई मालगाड़ी ही सही । मरने वाले को इससे क्या लेना-देना  कि  वह  किस गाड़ी  के  नीचे  कट  कर  मरेगा ।  उसके सिर के भीतर कोई हथौड़े चला रहा था । ट्रेन उसे क्या मारेगी, यह सिर-दर्द ही उसकी जान ले लेगा — उसने सोचा । शोर भरी गली में एक लंबे सिर-दर्द  का नाम ज़िंदगी है । इस ख़्याल से ही उसके मुँह में एक कसैला स्वाद भर गया । मरने के समय मैं भी स्साला फ़िलास्फ़र हो गया हूँ — सोचकर वह पटरी पर लेटे-लेटे ही मुस्कराया । उसका हाथ उसके पतलून की बाईं जेब में गया । एक अंतिम सिगरेट सुलगा लूँ । हाथ विल्स का पैकेट लिए बाहर  आया  पर  पैकेट  ख़ाली  था ।  दफ़्तर से चलने से पहले ही उसने पैकेट की अंतिम सिगरेट पी ली थी — उसे याद आया । उसके होठों पर गाली आते-आते रह गई । आज सुबह से ही दिन जैसे उसका बैरी हो गया था ।सुबह पहले पत्नी से खट-पट हुई । फिर किसी बात पर उसने बेटे को पीट दिया । दफ़्तर के लिए निकला  तो  बस...