Author: literaturepoint

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जीवन से छूट रहे जीवन को बचाने का उपक्रम

शहंशाह आलम कुँवर रवीन्द्र जिस दुस्साहस से सजग, विनम्र, पानीदार होकर कवितारत रहते आए हैं, मुझे इनका इस तरह कवितारत रहना अचंभित करता है, जैसे इनकी रंगों से दोस्ती मुझे विस्मित करती रही है। अब इनकी अस्सी से अधिक कविताओं का संग्रह ‘रंग जो छूट गया था’ जिस उम्दा तरीक़े...

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अनवर सुहैल की तीन कविताएं

एक नफरतों से पैदा नहीं होगा इंक़लाब लेना-देना नहीं कुछ नफ़रत का किसी इंक़लाब से नफ़रत की कोख से कोई इंक़लाब होगा नहीं पैदा मेरे दोस्त ताने, व्यंग्य, लानतें और गालियाँ पत्थर, खंज़र, गोला-बारूद या कत्लो-गारत यही तो हैं फसलें नफ़रत की खेती की… तुम सोचते हो कि नफ़रत के...

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निर्मल गुप्त की तीन कविताएं

निर्मल  गुप्त लोग घर वापस जा रहे हैं लोग घर वापस जा रहे हैं कंधे पर लटकाये बेलनाकार टिफिन जिसमें अब भी पड़े हैं रोटी के कुछ सख्त कुतरे हुए कोने भूख चाहे जैसी भी हो बचा रहता है फिर भी कुछ न कुछ। लोग घर वापस जा रहे हैं...

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घर : एक आत्मकथा

सिनीवाली मैं बोल नहीं सकता। पर मैं संवेदनहीन नहीं हूं। जिसमें तुम सब और तुम्हारी विगत पीढि़यों ने जिंदगी गुजारी है, हां मैं ही तो हूं….. तुम्हारा घर । तुम्हारे बाप दादा ने मुझे खून पसीने की कमाई से एक एक रूपया जोड़कर बनाया। जिस दिन मेरी नींव पड़ी थी,...

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मैं पतझड़ में बसंत लिख रहा हूं

नित्यानंद गायेन   आधुनिक हो गया है हत्यारा बहुत आधुनिक हो गया है हत्यारा | उसने सीख ली है नई तकनीक अब वह हथियार से नहीं करता वार नहीं मिलते उसके हाथों में खून के धब्बे अब उसके इशारों पर हो जाते हैं हजारों क़त्ल एक साथ |  मैं पतझड़ में...

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स्मिता मृणाल की तीन कविताएं

स्मिता मृणाल रिफ्यूजी बचपन एक कोलाहल सा गुजरता है हर पल उन बदबूदार सीलन से भरे टेंटों में विस्मृत सी धुंध से उठता एक शोर तोड़ता चुप से सन्नाटे को बेतहाशा बदहवास भागती हुई सी एक भीड़ और पीछे आग की कुछ तेज़ लपटें जलते हुए कुछ घर छूटती हुई...

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सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं

सुशांत सुप्रिय इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं देह में फाँस-सा यह समय है जब अपनी परछाईं भी संदिग्ध है ‘ हमें बचाओ , हम त्रस्त हैं ‘ — घबराए हुए लोग चिल्ला रहे हैं किंतु दूसरी ओर केवल एक रेकॉर्डेड आवाज़ उपलब्ध है — ‘ इस रूट की...

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मामाजी

रागिनी पुरी करीब छह बज रहे हैं। पूरा घर सुबह की पहली अंगड़ाई ले रहा है। सुमेधा के कानों में हल्की हल्की आवाज़ें छन कर आ रही हैं। कभी बाथरूम की हल्की फुल्की उथल पुथल, तो कभी रसोई में बर्तनों के खड़कने की आवाज़ें…इसका मतलब मामीजी जाग गई हैं। लॉबी...

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मनुष्य और लोकजीवन के कभी न अंत होने की कविताएँ

शहंशाह आलम   मेरा मानना है कि कविता की आँखें होती हैं, तभी तो जिस तरह कवि की पुतली अपने समय को देखने के लिए हर तरफ़ घूमती-घामती है, वैसे ही कविता की भी पुतली चहुँओर घूमती रहती है। कवि और कविता के लिए यह ज़रूरी भी है कि दोनों...

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शैलेंद्र शांत की चार कविताएं

शैलेंद्र शांत   उसके सीने पर सवार थी इमारत मछलियां बार-बार ऊपर आ जाती थीं और पलट कर गोताखोर बन जाती थीं इस छोर, उस छोर कुछ लोग उन्हें फंसाने की फिराक में बैठे थे बंसी डाले और उधर उस छोर पर बैठे थे कुछ जोड़े अपनी सुध खोए और...

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तीन लघु प्रेम कथाएं

सत्येंद्र  प्रसाद  श्रीवास्तव महबूबा तुम भूख की तरह आती हो, प्यास की तरह तड़पाती हो, खुशबू की तरह लुभा कर उड़ जाती हो, अभाव की तरह रोम-रोम में बस जाती हो, सपनों में खुशी बनकर आती हो, नींद खुलती है तो महंगाई की तरह इठलाती हो,पूस की ठंड की तरह...

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हमारे समय की पटकथा

राजकिशोर राजन   हम ऐसे समय में जी रहे हैं जब साहित्य भी बाजारवाद के ढाँचे में समाहित हो रहा है। प्रतिरोध के स्वर नेपथ्य में जा रहे हैं। वैसे में एक कविता ही है जो सबसे ज्यादा बेचैन है, चूँकि उसका सपना संसार को सुन्दर, कलात्मक, भय-भूख और शोषण...

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दशरथ की कहानी

सुनील मिश्रा कमाकर अपना व परिवार का पेट भर लेना, ये सपना भले ही देखने-सुनने में बड़ा छोटा लगता हो, मगर बहुत सारे लोगों की आँखों में तैरता ये सपना उन्हें अपने घरों से दूर बहुत दूर ले जाता है, पिछले दिनों नोएडा में ऐसे ही एक मुस्कराते हुए शख्स...

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शहंशाह आलम की चार कविताएं

शहंशाह आलम जिस तरह झरना गूँजता है जिस तरह झरना गूँजता है आत्मीय-आत्मविभोर बार-बार वैसे ही आकाश को गूँजते देखता हूँ हुगली नदी के गान में आनंदित झरने में आकाश में जो कुछ गूँजता है उस गूँज में तुम्हारी भी भाषा की गूँज सुनता हूँ घनीभूत अपनी इस यात्रा की...

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नित्यानंद गायेन की दो कविताएं

नित्यानंद गायेन   अगले वर्ष अगले वर्ष फिर निकलेगी झांकी राजपथ पर  भारत भाग्य विधाता  लेंगे सलामी  डिब्बों में सजाकर परोसे जाएंगे  विकास के आंकड़े शहीदों की विधवाओं को पदक थमाएं जाएंगे राष्ट्र अध्यक्षों के शूट की चमक और बढ़ जाएगी  जलती रहेगी अमर ज्योति इंडिया गेट पर  मूक खड़ी...

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मेरे काम के लोग

हेमन्त वशिष्ठ   यहां आबादी बहुत है… लेकिन किसी काम की नहीं… क्षत-विक्षत शरीर, छिन्न-भिन्न अंग वैसे भी किस काम आते हैं… उनका मकसद उनकी आत्माओं को छल चुका है वो पाक-पवित्र रूहें, जो मैने भेजी थी ज़्यादातर दूषित वापिस आ रही हैं खंडित यानी डैमेज़्ड उनकी रहने की वजह...

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कभी आओगे ख़्वाबों में

गीत मुहम्मद अब्यज ख़ान कभी आओगे ख्वाबों में कभी नींदें चुराओगे मुझे छुप छुप निहारोगे कभी बातें बनाओगे मेरे घर की गलियों में तुम चक्कर लगाओगे मेरी ख़ातिर तुम कितने बहाने बनाओगे कभी पूछोगे मुझको तुम कभी नज़रें बचाओगे पतंगों के बहाने से कभी कपड़े सुखाने के मुझे तुम देखने...

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जंगल ज़िन्दगी

कहानी नूर मुहम्मद नूर पिछले पांच दिनों के भयावह अंतर्द्वन्द्व से आज कहीं जाकर नसीम को मुक्ति मिली। सोमवार की दोपहर अपने दो साल के मटमैले चिथड़े पहने, बेटे को अपनी गोद में सुला रही, उस पागल जैसी औरत को देखने के बाद से, निरंतर पांच दिनों की लंबी मानसिक...

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नंदना पंकज की दो कविताएं

नंदना पंकज   ज्वार-भाटा चढ़ती हुई चाँदनी के साथ चिर-विरह को अभिशप्त समुद्र के हृदय की तरल वेदनाएं उबलने लगती हैं चाँद का गुरुत्व बढ़ा देता है मिलन की आतुरता और किसी विक्षिप्त प्रेमी की भाँति व्यग्र हो छटपटातीं हैं लहरें दहकते लपटों सी उछलतीं हैं टीस भरी लालसाएं प्रेयसी...

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स्मिता मृणाल की दो कविताएं

स्मिता मृणाल रेस्ट इन पीस प्रत्यूषा कितना आसान होता है झूठ के आवरण में सच को छुपा देना जाने कितने ही रहस्य कैद होते हैं इस सच और झूठ के बीच और इन रहस्यों की खोज में हम पाते हैं खुद को तर्क और वितर्क के दो अंतिम छोरों पर...