अवधेश कुमार ‘अवध’ के 2 गीत

1. दीपों का बलिदान याद हो

जब  मन में अज्ञान भरा हो,
अंधकार अभिमान भरा हो,
मानव  से  मानव  डरता हो,
दिवा  स्वप्न  देखा करता हो,
गलत राह मन को भाती हो,
मानवता   खुद   शर्माती हो,
         धर्म कर्म अभियान याद हो ।
         दीपों  का बलिदान याद हो ।।
सबके घर में उजियारा हो,
सर्वे  सुखिन: का नारा हो,
जीने का अधिकार मिला हो,
सदाबहारी फूल खिला हो,
हर मुख के पास निवाला हो,
पढ़ने को बेहतर शाला हो,
          भारत का गुणगान याद हो ।
          दीपों  का बलिदान याद हो ।।
पूर्वज की दिल में गाथा हो,
शर्म – शील उन्नत माथा हो,
उड़ने की चाहत मन में  हो,
सारा  भूमंडल परिजन हो,
नशा मुक्त मानव समाज हो,
नवल नवोदित सा सुराज हो,
         न्यायोचित बुनियाद याद हो ।
         दीपों  का बलिदान याद हो ।।

2. जनपथ बनाम राजपथ

मैं जनपथ का पथिक राजपथ से सवाल दुहराऊँगा।
क्या  है  दोनों  में   अन्तर तस्वीर आज दिखलाऊँगा?
झुग्गी से चल करके जनपथ खेतों में खो जाता है।
भूखे बच्चों की आँतों ज्यों अकड़- अकड़ सो जाता है।।
अलकतरा या सी सी से इसके नसीब का मेल नहीं।
ऊबड़ – खाबड़ गड्ढों से छुटकारा पाना खेल नहीं।।
फटी दरारों का कारण यह जनपथ है अथवा जूते।
बरसातों में दरिया से जनपथ निकले किसके बूते!!
ट्रैक्टर ट्राली बैलागाड़ी इधर- उधर इठलाती है।
कभी धूल में कभी कीच में गिरकर धक्के खाती है।।
बाँस बबूल झाड़ियों में फँसकर दिखती है बदहाली।
जैसे मुश्किल में आई हो गंगू की छुटकी साली।।
फटे -पुराने चिथडों से इज्जत कैसे ढँक पाऊँगा।
मैं जनपथ का पथिक राजपथ से सवाल दुहराऊँगा।
क्या है दोनों में अन्तर तस्वीर आज दिखलाऊँगा?
अहा! राजपथ जनमत लेकर सीधे संसद जाता है।
कांक्रीट का कटुक कलेजा सरेआम दिखलाता है।।
झाड़ू पानी स्वीपर पॉलिश से होता इसका मेकप।
मन्त्री के आने -जाने से हो जाता मोहक गेटप।।
दोनों ओर फूल की क्यारी अक्सर दिल को भाती हैं।
कृत्रिम झालर बत्ती लाइट रजनी दिवस बनाती हैं।।
शूट -बूट में सजे सिपाही से सेल्यूट भी मिल जाते।
जनमत के लाचारीपन को देख होंठ भी सिल जाते।।
किन्तु गगनचुम्बी जयकारी लगती मानो बेमानी।
जनपथ के हिस्से से कायम सदा राजपथ का पानी।।
यह काँटों से घिरा फूल- सा देख अवध इतराऊँगा।
मैं जनपथ का पथिक राजपथ से सवाल दुहराऊँगा।
क्या है दोनों में अन्तर तस्वीर आज दिखलाऊँगा?
अवधेश कुमार अवध
गुवाहाटी,
Mob.  8787573644

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