बी आर विप्लवी की रचना प्रक्रिया : आदमियत का आरजूनामा

राजकिशोर राजन

मानवता का दर्द लिखेंगे

माटी की बू-बास लिखेंगे

हम अपने इस कालखंड का

एक नया इतिहास लिखेंगे

जब मैं अपने समय के एक महत्वपूर्ण गजलकार बी.आर.विप्लवी के रचना कर्म से गुजर रहा था तो अदम गोंडवी की ये पंक्तियाँ रह-रह कौंध जा रही थी। कारण कि विप्लवी जी की काव्ययात्रा के पीछे जो प्रेरक शक्तियाँ हैं उनमें मनुष्यता का दर्द, अन्याय और शोषण से मुक्त एक नया इतिहास लिखने की तड़प और संकल्प है। इनकी प्रथम प्रकाशित कृतियों में एक  ‘प्रवंचना’ नामक खंडकाव्य है। इस काव्यसंग्रह की रचना सन् 1978 में हुई जब विप्लवी जी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में स्नातक (विज्ञान) के छात्र थे। इसकी भूमिका जिसे कवि ने ‘सुलह-सफाई’ नाम दिया है पढ़ कर अचंभित रह जाना पड़ता है। भारत की वर्णवादी-जातिवादी व्यवस्था, इतिहास का एक नया सच हमारे सामने पहाड़ की तरह खड़ा होता है। क्या भारत का इतिहास, षड़यंत्र, हनन-दलन, शोषण का इतिहास है ? क्या ! भारत में धर्म, वर्चस्व की राजनीति है ? ऐसे बहुत सारे प्रश्नों की ऊपज है ‘प्रवंचना’। कुल आठ सर्गों में बँटी यह कृति ‘सम्भावना’ तक पहुँच अपने गंतव्य तक पहुँचती है। समाज-व्यवस्था के मूल में कौन-कौन सी प्रेरक शक्तियाँ हैं ? क्या हमारी व्यवस्था का निष्कर्ष इसी तथ्य में निहित है कि सबल, निर्बल जन पर शासन करे और उसके लिए न्याय-अन्याय, नीति-अनीति, पाप-पुण्य सब स्वीकृत हो ? सत्ता-सुख-साधन ही हमारी सभ्यता का प्रेय-श्रेय हो ? कितना दु:खद वह क्षण होगा जब कवि को कहना पड़ा –

आदर्श यहाँ का सत्ता-सुख-साधन है

आदर्श यहाँ निर्बल जन पर शासन है

जाने ऐसा अधिकार दिया है किसने ?

परवशता को स्वीकार कराया किसने ? (पृ0 26)

कवि की दृष्टि साफ है, उसे कोई गफलत नहीं है। वह और उसकी कविता ऐसी शक्तियों के विरूध्द खड़ी होती हैं जो शोषक हैं, जो निर्बल की छाती पर खड़ा हो अपनी महानता का उद्धोष करते हैं। दरअसल हर कवि की अपनी जमीन होती है और होनी चाहिए। वह उसी जमीन पर खड़ा होता है, तब बड़ा होता है। बी. आर. विप्लवी की कविता इसी जमीन से उपजती है। इसीलिए उनकी कविता में चाक-चिक्य नहीं है, बनावटीपन नहीं है, तितली के पंख में पटाखा बाँध कर, भाषा के हलके में विस्फोट करने की कोई लालसा नहीं है।

इस खंड काव्य के अंतर्गत (प्रथम सर्ग) कवि की स्थापना है कि सिन्धुघाटी की सभ्यता आर्यों की सभ्यता से उन्नत, समानतावादी श्रमण-सभ्यता थी जिसे आर्यों ने नष्ट कर दिया और वहीं से कोलों-भीलों, मुण्डा, उराँव, शम्बर, नल-नीलों, द्रविणों यानी इस देश के मूलवासियों का शोषण प्रारंभ हो गया। कवि की स्थापना कल्पनाश्रीत नहीं है। बहुत सारे इतिहासकार सिन्धुघाटी की सभ्यता के पतन के मूल में इसे एक कारण मानते हैं। आप कवि से कई मामलों में असहमत भी हो सकते हैं। उदाहरणस्वरूप  सिन्धुघाटी सभ्यता निस्संदेह उन्नत नगरीय सभ्यता थी परन्तु उसमें भी पर्याप्त मात्रा में असमानताएं मौजूद थीं। सामाजिक गतिशीलता में निरंतर ठहराव आ रहा था। भोग-विलास की प्रवृत्तियाँ बढ़ रही थी जबकि आर्यों का समाज मुक्त समाज था उनमें विजय प्राप्त करने की जीजिविषा थी। वे कुशल अश्वारोही, बलिष्ठ और स्वर्ण-लिप्सा से दूर थे। परन्तु इतना तो सत्य है कि उस सभ्यता के विनाश ने भारत की प्राचीन संस्कृति के स्थान पर आर्य संस्कृति को जन्म दिया जिसने ऐतिहासिक रूप से सामाजिक असमानता, श्रम का अवमूल्यन और बर्चस्ववादी नीति को जन्म दिया –

सोने की चिड़िया सब कहते थे जिसको

किसने पर कतरा, भस्म कर दिया उसको

द्रविड़ों के सुदृढ़ पाँव सत्ता से उखड़े

वे विन्ध्य पार जाकर फिर से निखरे (पृ0 32)

कवि शोषण के ऐतिहासिक, सामाजिक कारणों का गहराई से विश्लेषण करता है। इनका अध्ययन चकित करता है और यह अकारण नहीं कि इस खंड काव्य के अंत में कुल 38 संदर्भ ग्रंथों की सूची दर्ज है। हिन्दी भाषा में लिखी खंड काव्य में इस प्रकार की तैयारी प्राय: दृष्टिगोचर नहीं होती। इय तथ्य से प्रकारांतर से यह भी साबित होता है कि कवि की काव्ययात्रा ‘स्वांत:सुखाय’ नहीं अपितु ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ है। हमें ये जान लेना चाहिए कि जिसे हम काव्य-सत्य कहते हैं वह सामाजिक सत्य से अलग नहीं हो सकता। अगर दोनों में अंतर है तो वैसी रचना भाषा में विलास के अलावा कुछ भी नहीं है। बी.आर. विप्लवी की यह काव्य-कृति उसी सामाजिक सत्य को उद्धाटित करती है। गोस्वामी तुलसीदास अद्भुत प्रतिभाशाली कवि हैं परन्तु उनका सामाजिक सत्य तब पता चलता है जब वे गुरू-गंभीर स्वर में आह्वान करते हैं :-

बरनाश्रम निज-निज धरम, निरत बेद पथ लोग।

चलहिं सदा पावहिं सुखहिं नहिं भय सोक न रोग॥

(रामचरित मानस/उत्तर कांड)

यह तुलसी के लिए आदर्श समाज व्यवस्था है। समाज व्यस्था का यही स्वप्न हिंदू धर्म (ब्राह्मण धर्म) और मुख्यधारा के भारतीय साहित्य का रहा है। इस व्यवस्था, परंपरा, दुनिया को बदलने का स्वप्न कवि का है। यह संग्रह ऑंख खोलने वाली कथा कहती है कि किस प्रकार छल-कपट से इस देश के निवासियों  को गुलाम बनाया गया और उन्हें चिरकाल तक उसका दंश झेलने के लिए दस्यु, शूद्र, नाग आदि-आदि नाम दे दिया गया। सदियों से हो रहे विश्वासघात की कथा लंबी है:-

किसकी-किसकी कथा कहें, कितने ऐसे नर-वर हैं

जिनका कहीं न लेखा, साक्षी मात्र धरा-अंबर है (पृ0 -39)

परंन्तु बात यही खत्म नहीं होती, शुरू होती है। कवि भारतीय कुटिल परंपरा की नृशंसता को उकेरता है कि छलने वाला-दलने वाला ही शोषित-वंचित समाज के लोगों से अपनी पूजा-अभ्यर्थना करवाता है। और इस प्रकार स्वत्व चुरा लेता है।

तृतीय सर्ग से आरंभ कर सप्तम सर्ग तक बाली वध का वर्णन है। और अष्टम सर्ग है संभावना जिसे उपसंहार भी कहा जा सकता है। इसमें कवि प्रवंचना का शिकार होते रहे समुदाय का आह्वान करता है :-

यह मनुज जब तक सरल है, सौम्य है

जाल के धागे नहीं पहचानता

वह प्रवंचित ही बनाया जायेगा

छद्म-छल को है न जब तक जानता। (पृ0 90)

संक्षेप में कहा जाए तो ‘प्रवंचना’ वंचित समाज का ऐतिहासिक दस्तावेज है। कवि ने दलित, वंचित समाज के इतिहास की पृष्ठभूमि में बाली वध प्रकरण चित्रित किया है। परन्तु कई प्रश्न विचारणीय हैं। अगरचे बाली वध आर्य राम ने षड़यंत्र के अंतर्गत किया ताकि रावण वध का पथ प्रशस्त हो सके और इसके लिए बाली भ्राता सुग्रीव को माध्यम बनाया गया परन्तु, अंगद बाली पुत्र था वह पितृहंता राम का भक्त और लंका की सभा में राम का राजदूत कैसे बन गया ? किष्किंधा निवासियों ने बाली वध को स्वीकार कैसे कर लिया ? क्या यह मात्र कूटनीति और राजनय की विजय है ?

भाषा और शिल्प का सम्यक् योग इस काव्यकृति को पठनीय और महत्वपूर्ण बनाता है। इसके साथ ही अपने युगीन -संदर्भों के साथ मनुष्य की यात्रा-वृतांत सुनाती यह कृति अपनी सहजता और काव्य-सौष्ठव से भी चमत्कृत करती है :-

आकर्षण से ही यह समष्टि पलती है

लय-ताल-युक्त सांस हवा चलती है

प्रतिकूल प्रकृति के-दोहन है, शोषण है

यह जीवन-उन्मूलन है, प्रतिकर्षण है         (पृ0 27)

मनुष्य को केन्द्र में रखती यह कृति सबका आह्वान करती, कहती है :-

सब मिल कर जन-गण-मन को अब सन्मति दें

आओ सरभाव-शील को नयी प्रगति दें

कुल-वंश, जन्म का भेद, घृणा का घर है

मानवता इन सिध्दांतों से ऊपर है           (पृ0 100)

हम कवि के ऐतिहासिक-सामाजिक निष्कर्षों से सहमत-असहमत हो सकते हैं परन्तु इतना तो प्रकट हो जाता है कि वह इतिहास और साहित्य का गंभीर अध्येता है और यह कृति विमर्श की माँग और शुरूआत भी करती है।

खंड काव्य की रचना के बाद गजलों से गुजरते हुए विप्लवी जी ‘तश्नगी का रास्ता’ नामक गजल संग्रह ले कर आते हैं। ‘तश्नगी’ जिसे हम ‘तृष्णा’ कहते हैं और बौध्द साहित्य में तृष्णा का खेल ही संसार है। सारे दु:खों की जड़, मोह-माया, ईर्ष्या-द्वेष, युध्द, सभी कुछ इसी की कोख में पलते हैं। भूमिका में उन्होंने कबूल भी किया है : ”तश्नगी का रास्ता’ केवल दैहिक प्यास का ही हालिया-बयान नहीं है। वरन् हमारे समय की हर तृप्त-अतृप्त अंतहीन तृष्णा की ओर देखने और आत्म-निरीक्षण के प्रस्ताव का सिलसिला है।” कहने की आवश्यकता नहीं कि विप्लवी जी भले गजल की तलाश में हों या फिर गजल उनकी तलाश में हो, ऊपरी तौर पर यह परिवर्तन परिलक्षित होता है। आंतरिक रूप से उनकी वैचारिक जमीन वही है जहाँ से उनकी काव्ययात्रा ‘प्रवंचना’ शुरू होती है। बुध्द की समानता, करूणा से गहरे प्रभावित इस कवि की यात्रा जब गजल गाँव में पहुँचती है तो वहाँ भी केन्द्र में आज का संसार है, जहाँ तृष्णा का व्यापार है। जहाँ सभी ठगे जा रहे है, छले जा रहे हैं परन्तु तुर्रा यह कि हम कामयाब हो रहे हैं। भाषा की जीवंतता उनके पहले संग्रह में भी चकित करती है जब वह गजल गाँव में प्रवेश करती है तो और परवान चढ़ती है। दुर्बोधता और अमूर्त्तन का सहारा इन्हें लेने की जरूरत कहीं नहीं पड़ती, चूँकि इनके पास कहने को बहुत कुछ है। अनुभव समृध्द है, दृष्टि यायावर की है, अध्ययन विपुल है, सहृदयता कमाल की है। सबसे बड़ी बात कि, कवि हृदय इन्हें स्वाभाविक रूप से प्राप्त हुआ है, इसके लिए इन्हें जप, तप, माला नहीं फेरना पड़ा है।

कवि के पास सूक्ष्म अंतर्दृष्टि होनी चाहिए और विप्लवी जी इस गजल संग्रह में हमारे समय के यथार्थ को उकेरने में उसी सूक्ष्म अंतर्दृष्टि का परिचय देते हैं। रदीफ-काफिया, बहर के साथ उन्होंने मज़मून और कहन को महत्व दिया है यानी केशव दास उनके आदर्श नहीं हैं। उनकी दृष्टि जनवादी है और विषय स्पष्ट:-

अधिक कुछ और मिल जाये अधिक कुछ और जुड़ जाये

कहाँ तक तश्नगी का रास्ता ले जाएगा हमको

दिनों दिन ‘विप्लवी’ रंजो-अलम हलचल बढ़ी जाए

कहाँ अगली सदी का रास्ता ले जाएगा हमको

विप्लवी जी की गजलों की पृष्ठभूमि में जनवादी चेतना है जो कहन के स्तर पर भी साफ परिलक्षित होती है परन्तु जैसे कि गजल की फितरत होती है, वह दिल की आवाज है और उसे किसी खास विचारधारा से जोड़ कर नहीं देखा जा सकता। परन्तु इनकी गजलें जरूर एक संतुलन साधती हैं। और कहा जाता है कि जो कविता संतुलन साधती है उसकी उम्र बहुत लंबी होती है। कविता या गजल में शिल्पगत चमत्कार अगर आवश्यकता से बेसी हो तो मर्म को उद्धाटित करना कठिन हो जाता है। संग्रह की गजलों की खासियत है कि इस मोर्चे पर भी वह संतुलन साधती है, मध्यम मार्ग का अनुसरण करती है। कला खूबसूरत हो तो अच्छी बात है परन्तु अगर खूबसूरत और सच दोनों हो तो बहुत अच्छी बात है। शब्द का अर्थ शब्द के बाहर होता है और इसके लिए हमें शब्द के बाहर यानी जीवन में जाना होगा। कहने का गरज यह कि विप्लवी जी की गजलों से निकट होने के लिए जीवन में जाना होगा :-

जागें तो बदल देंगे यह हालात यकीनन

हम सोई हुई कौम जगाने में लगे हैं   (पृ0 112)

विप्लवी जी की शाइरी महफिल में गुलबदन की कसीदाकारी नहीं है। और न ही आह:-आह: और वाह:-वाह: की मुरीद। उसका रास्ता अलग है, मरहला अलग है, उसकी मंजिल अलग है। वैसे वह इश्क और हुश्न की तमाम बातें करती है परन्तु उसका मकसद मदहोश करना नहीं, अज्ञानता, गरीबी, अभाव में सदियों से डूबे लोगों को जगाना है, खड़ा होना सिखाना है। हिंदी में कविता की तरह गजलों की आमद बहुत है। टनों-मनों लिखे जा रहे हैं परन्तु अच्छी कविता या अच्छी गजल पहचान ली जाती है। विप्लवी जी की गजलें पहचान में आ जाती हैं और यही किसी रचनाकार की सार्थकता है। फिराक साहब जिन्दगी से इतने अजहद प्यार करते थे कि उसे दूर से ही पहचान लेने की बात करते हैं :-

 

बहुत पहले से उन कदमों की आहट

जान लेते हैं

तुझे ऐ जिन्दगी

हम दूर से पहचान लेते हैं

विप्लवी जी की शाइरी कुछ इसी तरह जिन्दगी को दूर से पहचान लेती है। कहीं अटकती-भटकती नहीं। सीधी और सधी भाषा और कहीं भी बेमतलब की कलाबाजी नहीं होने के कारण पाठकों पर इनकी शाइरी का गहरा असर होता है। शायर को पुख्ता यकीन है कि सोई हुई कौम अगर जाग गई तो यकीनन हालात बदल देगी। शर्त यही है कि वह जागे। जब तक वह सोई है तमाम बातें, योजनाएं सरकारी-गैरसरकारी कवायद बेमतलब, बेमानी हैं। दरअसल सत्ता नहीं चाहती कि वे जागें। परंपरावादी और विरोधी ताकतें नहीं चाहती कि वे जागें। सभी के सभी उन्हें जगाने के नाम पर सुलाने में लगे हैं। सभी उनकी लड़ाई लड़ रहे रहें। आजादी के बाद से तो यही मंजर आम है। इस देश में वंचितों-शोषितों की लड़ाई वे लड़ रहे हैं जो वास्तव में शोषक हैं। इसीलिए यह लड़ाई अंतहीन सुरंग में प्रवेश कर गई है, यथास्थिति बरकरार है। और जब तक सोई हुई कौम खुद नहीं जागेगी हालात् में तब्दीली होने की कोई गुंजाइश नहीं है। विप्लवी जी की गजलों की पुकार यही है, ख्वाहिश यही है। और इन्ही कारणों से अपने समकालीन गजलकारों में वे दूर से पहचाने जाते हैं। आज की दास्तां कहती इन गजलों में आप सच को सच की तरह, प्यार को प्यार की तरह, घृणा को घृणा की तरह ही देखेंगे। सब कुछ का समायोजन जिन्दगी की तरह। देश-दुनिया की गमजदा सच्चाईयों से रू-ब-रू कराती इन गजलों की ख्वाईश बस इतनी है कि आदमी को आदमी होना मयस्सर हो, अमन का दिन और रात हो, खूबसूरत हमारा संसार हो। परंतु उसके सपने से हकीकत की दुश्मनी जो है :

रो रही है चमन की हालात पर

गमजदा अन्दलीब की चिट्ठी

‘विप्लवी’ आँसुओं की तहरीरें

ये है गम के अदीब की चिट्ठी (पृ0 101)

विप्लवी जी की गजलें कलावाद की उदाहरण बनने से इनकार करती हैं, दीवान-ए-खास में उनका मन नहीं लगता। वे लोक में जीना चाहती हैं, इसीलिए भाषा के स्तर पर या शिल्प के स्तर पर कहीं दुरूहपन, उलझाव, अतिरिक्त बुनावट नहीं है। राजनैतिक चेतना भी गजलों में दिखती है, उनमें व्यंग्य के स्वर भी हैं पर सतही तौर पर नहीं, वैचारिक स्तर पर। गंभीर राजनैतिक समझ इनकी गजलों की वह खासियत है जो इन्हें अपने समकालिनों में एक विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। इसके कुछेक उदाहरण द्रष्टव्य हैं :-

‘विप्लवी’ उस हुकूमत की जड़ हिल गयी

कैसी चुप्पी थी इतना असर हो गया   (पृ0 68)

आस्तीं अश्क में डूबी हैं रहनुमाओं की

या खुदा कितनी जलालत है इस जमाने में    (पृ0 30)

बाड़े से निकलना नहीं चाहे यहाँ की कौम

महदूद तरक्की है यहाँ जात-पात में   (पृ0 27)

अलबत्ता ऐसे कई-कई शेर हैं जिनको देखने के बाद यह पुख्ता हो जाता है कि इस गजलकार की गजलों में तश्नगी के सैकड़ों पहलू हैं जिनके कारण जिन्दगी से नमी, धरती से खूबसूरती और दुनिया से सुख-चैन छीन रहा है। भूमिका में  उन्होंने लिखा भी है :- ”तश्नगी का रास्ता’, केवल दैहिक प्यास का ही हालिया बयान नहीं है वरन् हमारे समय की हर तृप्त-अतृप्त अंतहीन तृष्णा की ओर देखने और आत्म-निरीक्षण के प्रस्ताव का सिलसिला है।” बुध्द ने तृष्णा को दु:खों का मूल कहा है। इस संग्रह की गजलें भी दुनिया में तृष्णा से उपजे, फले-फूले व्यापार की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कराती हैं। और उस तृष्णा रूपी अग्नि के आग में झुलस रही मनुष्यता को बचाने का आह्वान करती हैं।

विप्लवी जी की गजलों का स्वर यूँ तो जनवादी है परन्तु गजल विधा की जब बात होगी तो वहाँ भी इनकी पकड़ मजबूत है। हिंदी-उर्दू दोनों को भले अलग खानों में नहीं बाँटा जा सकता है (जैसा कि गजलकार का मत है) परन्तु हकीकत में अदब की दुनिया में ये अलग-अलग भाषाएं हैं। इनकी गजलों में आवश्यकतानुसार शब्द-चयन किये गये हैं। जहाँ जिस भाषा के शब्द उपयुक्त प्रतीत होते हैं उन्हें जगह दी गई है। सायास न उर्दू के शब्द लादे गये हैं न हिन्दी के। इससे इनकी गजलों में एक अलग आस्वाद पैदा होता है। इन दिनों गजलों के साथ जिस प्रकार अतिरेक और ज्यादती हो रही है, विप्लवी जी ने उससे बचने का प्रयत्न किया है। अगला दुष्यंत बनने की होड़ा-होड़ी में हिन्दी के कई गजलकारों ने जैसे गजल का हिंदीकरण  करने की प्रतिज्ञा ले ली है, तत्सम शब्दों की पैरोडी लिखी जा रही है, उससे गजल विधा को नुकसान भले न हो, पाठकों पर आफत तारी है।

उर्दू गजल की परंपरा व उसके विस्तार को बिना आत्मसात् किए गजल जैसे कठिन विधा से अलग रहना बुध्दिमत्ता ही कही जाएगी।

विप्लवी जी किसी खास विचारधारा या वाद से बँधे नहीं हैं। दबे-कुचले, वंचित-शोषित जनों की पीड़ा उनकी रचनाओं का मूल स्वर है परन्तु जब कला की बात होगी, वहाँ भी उनके पास बेहद सौन्दर्यवान और लाजवाब कर देने वाली शाइरी है, जिनकी वक्रोक्ति दर्शनीय है:-

वो जो कलियों की हँसी से हैं जख्म खाए हुए

पूछिए ऑंख की शमसीर तबस्सुम क्यों है

‘विप्लवी’ पूछे है दुश्मन भी बड़ी हैरत से

मेरे लब पे बचा आखीर तबस्सुम क्यों है     (पृ0 98)

 

देश-दुनिया, घर-परिवार, सियासत, धर्म, पाखंड, समाज आदि मुद्दों से संबंधित इन गजलों में विप्लवी जी की दृष्टि यथार्थ से मुँह मोड़ने वाला या आत्ममुग्धता वाला नहीं है। ये ‘कला, कला के लिए’ के पैरोकार नहीं है और न इनका दृष्टिकोण व्यावसायिक है। ये साहित्य को एक सामाजिक दायित्व की तरह ग्रहण करते हैं :-

गजलगोई भी तिजारत हो गई है

रहजनी रहबर की आदत हो गई है          (पृ0 57)

ये तश्नगी का रास्ता, इंसानियत, रोशनी, खूबसूरती, अमन के खिलाफ रास्ता है जो एक दलदल से निकलती है और एक दूसरे दलदल में डूब कर खुदकशी कर लेती है। यही कारण है कि :-

राह से भटकी सदा-ए-इंकिलाब

हादसों को एक शह देकर गई (पृ0 84)

विप्लवी जी की ‘तश्नगी का रास्ता’ के बाद ‘सुबह की उम्मीद’ नामक गजल संग्रह ‘वाणी प्रकाशन’ से एक नई सृजनात्मक ऊर्जा के साथ गजलों की दुनिया में आई। वसीम बरेलवी, पद्मश्री डॉ0 गोपालदास ‘नीरज’, पद्मश्री बेकल उत्साही, यश मालवीय और अशोक ‘अंजुम’ जैसे शायरों ने इस संग्रह की उम्दा गजलों को बेहद सराहा है। इसमें कोई शक नहीं कि इस संग्रह ने गजल विधा में एक रचनात्मक हस्तक्षेप किया और अपनी गहन दृष्टिबोध के कारण अपनी खास मुकाम बनाने में कामयाब हुई। गजल की रूह तक उतरती इस संग्रह की गजलों ने पद्मश्री डॉ0 गोपालदास ‘नीरज’ को यह लिखने को बाध्य कर दिया कि ‘अनेक गजलकारों को गजल कहने का शऊर भी सिखाएगी’।

इस संग्रह में भी विप्लवी जी की शाइरी ने अपनी जमीन यानी प्रवंचित जन के दुख-दर्द और उनकी दशा-दिशा को मुखर हो कर उठाया है परन्तु पूर्व की अपेक्षा उनमें कलात्मकता या यूँ कहा जाए कि कहन शैली में भिन्नता आई है। एक उदाहरण देखें :-

झूठ, सच, जीत, हार की बातें

छोड़िए, दास्तान लम्बी है     (पृ0 23)

ये दास्तान स्वयं शायर की भी है और भारतीय समाज में वंचित जन का भी है। ये दास्तान उम्र से लंबी है, और इसके खत्म होने की फिलहाल कोई सूरत भी नजर नहीं आती। एक तथ्य को जान लेना जरूरी है कि विप्लवी जी का चिंतन सदियों से पददलित उस समुदाय को केन्द्र में रखता है जिसे अब दलित नाम से अभिहित किया जाता है। और इन दलित समुदाय के साथ आदिवासी आदि भी जुड़ते हैं, जिनकी व्यथा-कथा का अंत नहीं। जिन्हें कर्म से नहीं, जन्म से उपेक्षा, अपमान, गैर-बराबरी का दंश झेलना पड़ता है। इसके अलावा मानव समाज की ‘तिश्नगी’ ये दो बुनियादी चिंतन और उसके कारण संसार में व्याप्त पीड़ा, दर्द को जुबान देने का नाम है, विप्लवी जी शायरी :-

खामुशी से बयान देते हैं

दर्द को इक जुबान देते हैं     (पृ0 32)

अपने देश को आजाद हुए कई दशक बीत गए। दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र। पर जाति यहाँ धर्म और ईश्वर से भी बड़ी है। जात-पात के नाम पर बँटा  यह लोकतंत्र दुर्दशा के ऑंसू बहा रहा है। दुनिया का कौन-सा देश होगा, जहाँ जन्म से ही छुआछूत शुरू हो जाती है? और देश, समाज और आदमी को जाति के समक्ष कमजोर और लाचार हो जाना पड़ता है :

यहाँ खूबी-खराबी की कसौटी कुछ अलग ही है

यहाँ तो आदमी से पहले उसकी ‘जात’ जाती है (पृ0 39)

दुनिया जैसे-जैसे आधुनिकता-उत्तार आधुनिकता की ओर बढ़ रही है, छल-छद्म और अमानवीयता बढ़ती जा रही है। भरोसा किसी चिड़या की मानिंद दुनिया से उड़ गई है। लगातार कुरूप हो रहा है मनुष्य। तृष्णा के पिंजरे में कैद मनुष्य उससे निकलने की जद्दोजहद क्या करे, उसी में सुकून की तलाश कर रहा है। शाइर इस व्यापक और मूल प्रश्न पर इस संग्रह में भी आमने-सामने होता है :

 

अधिक कुछ और मिल जाए, अधिक कुछ और जुड़ जाए

कहाँ यह तिश्नगी का रास्ता ले जाएगा हमको       (पृ0 47)

भारतीय इतिहास के गंभीर अध्येता विप्लवी जी भविष्य को भूत और वर्तमान संदर्भों से अलग नहीं करते। वे इतिहास के घटनाक्रमों का सूत्रबद्ध मूल्यांकन करते हैं और इस प्रकार नीर-क्षीर विवेक के प्रयोग पर बल देते हैं। इतिहास को समग्रता से समझे बिना जो दृष्टि निर्मित होती है वह एकांगी और खंड-खंड होता है। विप्लवी जी से हम पूर्णतया सहमत नहीं भी हों तथापि उनकी इतिहास दृष्टि हमें चकित करती है। कबीलाई सभ्यता, सिन्धुघाटी, आर्य और आधुनिक भारत के इतिहास का ये कोना-कोना झाँक आए हैं। तिश्नगी के रास्ते का जिक्र करते और अंधेरे भविष्य के बारे में सोचते ये पीछे लौटते हैं, भारतीय परंपरा का एक सिरा पकड़ते हैं :-

यहाँ शोलों से सीता को परखने की रवायत है

कहाँ पाकीजगी का रास्ता ले जाएगा हमको   (पृ0 47)

क्या गजब कि अपने देश में तिश्नगी का रास्ता और पाकीजगी का रास्ता दोनों  ही भूल भूलैया और जड़ता की ओर ले जाता है जो प्रगतिशील परंपरा की विरोधी और अमानवीय है। इस संग्रह की गजलों में कहन की अद्भुत ताजगी है। जैसे आग पर चढ़कर गर्म पानी में चावल पक जाता है, न गीला होता है न कच्चा। कविता या शाइरी के साथ भी ऐसा ही होता है जहाँ शब्द को चावल और पानी को भाव मान सकते हैं। अगर चावल कच्चा रह जाता है तो सब बेमजा। इस संग्रह की खास विशेषता यह भी है कि शिल्प और भाव का मणिकांचन संयोग हुआ है। भाव के साथ शब्द पक गये हैं। साहित्य में यह पकना आसान प्रक्रिया नहीं है चूँकि इसे जबरदस्ती नहीं पकाया जाया सकता। चावल से इस मायने में यह भिन्न है। विप्लवी जी की शाइरी बहुत बडे फ़लक की बात भी आसानी से कहने में समर्थ है। कुछ उदाहरण देखी जाए:-

तू हजारों ख्वाहिशों में बँट गयी

जिन्दगी! कीमत ही तेरी घट गयी

(पृ0 27)

भोले बचपन की, लड़कपन की निशानी ले गया

वक्त मुझसे चन्दामामा की कहानी ले गया

(पृ0 35)

मैं जिसको देखूँ उसे एतबार मिल जाए

मिरी निगाह को इतना तो मोतबर कर दे

(पृ0 42)

क्हने की जरूरत नहीं विप्लवी जी की शाइरी को वो निगाह उनकी शायरी ने ही बख्श दी है।

विप्लवी जी की शाइरी संसार की बुनियादी समस्याओं, अन्याय और शोषण के साथ जिन्दगी में फैली तमाम दुश्वारियों से भी मुठभेड़ करती है। जो सबसे घुट गया उस पर उनकी निगाह जाती है। जिस दफ्तरी जीवन में वे दिन बिताते हैं वहाँ की हकीकत भी उनकी शाइरी में यत्र-तत्र देखी जा सकती है :

खुशी है सच की कहीं गुम कि जैसे दफ्तर में

कोई गरीब की फाइल इधर-उधर कर दे      (पृ0 42)

किसी साधारण कर्मचारी की फाइल इधर-उधर होने के बाद उस आदमी को कितना पापड़ बेलना पड़ता है यह व्यवस्था के बाहर रहने वाले नहीं समझ सकते।

वह शायर ही क्या जो अपने समय और समाज की धड़कन को सात तह के भीतर से सुन न ले। विप्लवी जी का एक शेर द्रष्टव्य है :

रहजनों से मिरी दोस्ती क्या बढ़ी

कैसा महफूज मुश्किल सफर हो गया (पृ0 44)

कितने अफसोस और दुख की बात है, यह सोच कर ही तन-मन सिहर जाता है। क्या हमारी सभ्यता और संस्कृति का निष्कर्ष यही है कि आज रहजनों की दुनिया में हम शुतुरमुर्ग की तरह रह रहें हैं और हमारी खैरियत उनकी अनुकंपा पर आश्रित है। रहजनों की दोस्ती से मुश्किल सफर का महफूज बन जाना एक त्रासदी है जिससे हमारा दौर गुजर रहा है। यह सच हमारे चेहरे पर कालिख है जिसे हम लाख धोने की कोशिश करें और साफ-शफ्फाक दिखने का जुगत भिड़ायें, हमारा चेहरा और गंदा दिखता है। शाइर इस बहुरूपिये समय को गइराई से विश्लेषित करता है और कहता है कि :

क्या शराबों पे राय लें उनकी

जो पियें और हराम लिखते हैं (पृ0 50)

इंतिहा है इस विदूषक व्यवहार का और शाइर की कलम का कमाल जिससे कुछ छुट जाए! यह हमारा दौर है जहाँ आदमी पाप भी करता है तो भगवान को चढ़ावा चढ़ा कर। सत्य-असत्य, पाप-पुण्य, न्याय-अन्याय जैसे शब्द व्यंग्य बन गए हैं। परन्तु शिकायत कोई, किसके करे ? यही तो इस देश की व्यथा कथा है कि मनुष्य की कौन कहे देवता, भगवान कहाने वाले भी छल-छद्म में आकंठ निमग्न हैं :

सल्तनत लूट ली ‘बली’ की सब

और जमीं तीन गाम लिखते हैं।      (पृ0 50)

विप्लवी जी की शाइरी परंपरा से हो रहें तमाम कुटिलताओं, अन्याय, शोषण को जहाँ बेनकाब करती है वहीं वर्तमान के रेशे-रेशे को उघाड़कर देखती हे और एक ऐसे भविष्य का सपना ऑंखों में रोकती है जहाँ मनुष्य, अपनी जड़ों की ओर लौटेगा और स्वयं से साक्षात्कार करेगा, अपनी सकल अपकर्म को पहचानने के लिए दृष्टि प्राप्त करेगा। संक्षेप में कहा जाए तो विप्लवी जी की काव्ययात्रा आदमीयत का आरजूनामा है।

इनकी साहित्य यात्रा निरंतर प्रवहमान है और यह आलेख उनकी काव्ययात्रा की एक झलक मात्र है। उनसे हम सबकी बड़ी उम्मीदें हैं। बहरहाल,

संदर्भ  (1)    प्रवंचना (खंड काव्य)                           (3)    सुबह की उम्मीद

विप्लवी प्रकाशन                                           (गजल संग्रह)

लखनऊ                                           वाणी प्रकाशन

प्र. संस्करण-2011                                  नई दिल्ली

प्र. संस्करण-2004

(2)    तश्नगी का रास्ता

विप्लवी प्रकाशन

लखनऊ

प्र. संस्करण-1994

 

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1 Response

  1. कुमार विजय गुप्त , munger says:

    सब मिल कर जन-गण-मन को अब सन्मति दें

    आओ सरभाव-शील को नयी प्रगति दें

    कुल-वंश, जन्म का भेद, घृणा का घर है

    मानवता इन सिध्दांतों से ऊपर है….सरल ह्रदय का उद्बोधन है दुनिया को बेहतर बनाने का ! विप्लवी जी को हार्दिक बधाई साथ ही अच्छी विवेचना के लिए आपको साधुवाद !

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