ज़िन्दगी का जश्न मनातीं कविताएं

सुषमा सिन्हा के कविता संग्रह ‘बहुत दिनों के बाद’ की समीक्षा
सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव

ताउम्र सिलती रहीं मां
अपनी कटी-फटी
उघड़ी ज़िन्दगी को
और फैलती रही
खुशबू की तरह
घर के हर एक कोने में
(कविता : ‘मां- दो’)
कविता की इन पांच पंक्तियां में पूरी ज़िन्दगी सिमटी है। ज़िन्दगी, जिसमें दर्द है, संघर्ष है, प्रेम है। ऐसी पंक्तियां उसी रचनाकार की कलम से निकल सकती है, जिसके पास संवेदनाओं की इतनी उर्वर ज़मीन है कि उसकी नज़र से कुछ भी नहीं चूकता। इतनी गहन संवेदनाओं की धनी कवियत्री हैं सुषमा सिन्हा और ऊपर की पंक्तियां उनके हाल ही में प्रकाशित कविता संग्रह ‘बहुत दिनों के बाद’ में शामिल कविता ‘मां’ का एक हिस्सा है।
संवेदनाओं की ताक़त ही है, जो कवियत्री को अंधेरे में भी उजाला ढूंढ लेने का हौसला देता है।
कहते हैं लोग
अंधेरे का कोई वजूद नहीं होता
आंखें बंद कर लो तो अंधेरा
आंखें खुली हों तो उजाला
पर ऐसा कहां होता है
आंखें खुली हों
तब भी तो अंधेरा होता है
और बंद आंखों में भी तो
जगमगाती रहती है रौशनी
(कविता : ‘अंधेरा’)
सुषमा की कविताओं में विषयों की विविधता है। कहीं रिश्ते इन कविताओं के मुख्य किरदार हैं तो कहीं प्रकृति। कहीं शहर का चौराहा, तो कहीं कोलतार की बेजान सड़कें। कहीं खुशी तो कहीं ग़म है, कहीं जोश तो कहीं हताशा है। दरअसल सुषमा की कविताएं ज़िन्दगी की कविताएं हैं। ज़िन्दगी के अनुभव कविता बनकर पन्नों पर उतरते चले गए।
दु:ख मिला तो रो लिये
सुख मिला तो हंस लिये
रात मिली तो लौट गए घर
दिन मिला तो चल दिए कहीं
भूत मिला तो समझा लिया खुद को
भविष्य मिला तो सजा लिए अपने
(कविता : ‘दु:ख-सुख’)
ज़िन्दगी के ये सारे पल कविताओं के उनके संसार में बड़े ही करीने से सजे हुए मिलते हैं। सुषमा की नज़रों ने घर को जिस ढंग से देखा है, उसे महसूस किया है, वह किसी सामान्य रचनाकार की दृष्टि नहीं हो सकती।
ईंट-गारे से घेरी हुई जगह को
घर कहना मुनासिब नहीं
कई बेघर भी रहते हैं, इन मकानों में
घर का ख्याल
हमें सुकून दे जरूरी नहीं
उम्र गुजर जाती है इन क़ैदखानों में
(कविता : ‘सच’)
ईंट-गारे से घेरी हुई जगह को घर बनाने का हुनर औरत में ही होता है। औरत होने के नाते सुषमा भी नहीं चाहती कि दुनिया का कोई भी घर क़ैदखाना बनकर रह जाये। ‘घर लौटने का सुख’ कविता में उनकी यही इच्छा प्रतिफलित होती दिखती है।
मेरे छूते ही सिसकियों की आवाज़
तेज़ हो आई है
देखा कि ज़ख़्म अब भी हरे हैं
और दर्द आज भी
हर जगह बिखरा पड़ा है
हिम्मत कर के फिर से
समेटने लगी हूं उन्हें
कि हरकत हुई है घर में
घर जो खत्म हो रहा था
मैंने उसे बचाना चाहा
बहुत दिनों के बाद।
(कविता: ‘घर लौटने का सुख’)
जो औरत घर बचाती है, उस औरत का सबसे बड़ा दर्द यही है कि वह औरत है। उसके लिए उसी घर में दर्द के बड़े बड़े अजगर मुंह बाए बैठे रहते हैं। सुषमा की कविताओं में यह दर्द इतने स्वाभाविक ढंग से उभरा है कि मन को उद्वेलित कर देता है।
परेशान होती हूं अपनी पहचान से
पहचानते हैं लोग हमें इस तरह
कि हम उस घर में रहते हैं
उनकी बेटी हैं, उनकी बहू हैं
उनकी मां हैं, उनकी पत्नी हैं
उनकी बहन हैं, उनकी दोस्त हैं
उनकी प्रेमिका हैं…
थक गई हैं हम अपनी
इस पहचान के साथ जीते-जीते
निकल कर इससे बाहर
बताना चाहती हैं हम
कि हमारा भी एक नाम है
और हम अपने ‘मैं’ का
अपने पूरे स्वाभिमान के साथ
परिचय देते हुए जीना चाहती हैं
(कविता : ‘हमारी पहचान’)
पहचान के इस संकट के बीच लोलुप निगाहों में केवल देह भर रह जाने से बचने की जंग
उपमा देते हैं लोग
तो तुम भी दे लो
पर चंदन की नहीं बनी है
हमारी यह देह
और न ही हमारे अंदर से आती है
ऐसी कोई खुशबू ही।
(कविता : ‘प्रेम का अर्थ’)
फिर उन बेटियों का दर्द, जिन्हें समाज के शैतानों की बुरी नज़र लग गई और फिर उन मांओं का भी दर्द, जिनके अपने बेटे शैतान बन गए।
माफ़ी मांगना चाहती हूं
उन तमाम बेटियों से
जिन्हें जन्म देने के बाद
हम उनकी हिफ़ाजत नहीं कर पाए
अफसोस करना चाहती हूं
दुनिया की उन तमाम औरतों के लिए
जिनकी कोख से
इंसान की शक्ल में हैवान पैदा हुए
(कविता : ‘पूछना चाहती हूं’)
और फिर हर रोज घर को घर बनाए रखने की लड़ाई
गोल-गोल रोटी बेलती औरत
कभी घर की धुरी बन
कभी परिवार की परिधि बन
घूमती रही ताउम्र बस गोल-गोल
(कविता : ‘चूल्हा-रोटी-औरत’)
इस संग्रह में कई कविताएं स्त्रियों पर केंद्रित हैं और इन कविताओं में वो अपने पूरे स्वाभिमान के साथ डट कर खड़ी नज़र आती हैं। वो जब प्रेम में होती है तब उसका रूप कुछ और होता है।
कल रात
फिर तुम्हें सपने में देखा
और दिन भर मैं ख़्वाब बुनती रही
(कविता : ‘तुम्हारा सपना’)
जब वह दुविधा में होती है, तब कुछ और
बड़े दु:ख की बात है
कि मैं तुम्हें प्यार करती हूं
जबकि मैं नहीं चाहती कि तुम्हें प्यार करूं
मैं हमेशा तुम्हारा इंतज़ार करती हूं
और मनाती हूं कि तुम न आओ
जगह-जगह तुम्हें ढूंढती हूं
और डरती हूं
कहीं दिख न जाओ
(कविता : ‘चाहत’)
लेकिन इस दुविधा में भी प्रेम ही उसे ताक़त देता है। ऐसी ताक़त कि उसमें हर संकट से बाहर निकल आने का हौसला मिलता है।
रेगिस्तान में ओस की बूंद
आंधियों में थरथराता दीया
काली-अंधेरी रात का ध्रुवतारा
हिम्मत देता हुआ
(कविता : ‘प्रेम’)
ये प्रेम ही है, जो सुषमा को बेजान चीज़ों के मानवीकरण की ताक़त भी देता है। ‘रास्ता और जीवन’ उनकी ऐसी ही एक मजबूत कविता है।
कभी नहीं सोचा था
रास्तों के बारे में इस तरह
कि ये मात्र माध्यम नहीं, मंज़िल हैं…
कभी नहीं देखा था ध्यान से
कि रास्ते इतने खूबसूरत होते हैं
दोनों और के किनारे लगे पेड़
हमारी सुरक्षा, स्वागत के लिए
हाथ बांधे खड़े होते हैं…
(कविता : ‘रास्ता और जीवन’)
‘जीवन गाड़ी’ कविता में तो मानवीकरण की यह कल्पना अपने चरम पर है। जहां ट्रक उन्हें बुजुर्ग, कार वयस्क, स्कूटर-साइकिल बच्चे नज़र आते हैं। दरअसल ये केवल ट्रक, कार, स्कूटर का मानवीकरण नहीं है बल्कि कहीं ना कहीं कवियत्री ने इनके जरिये ये बताने की कोशिश की है कि यह इंसान का मशीनीकरण भी है। इंसान के पास अपनी ज़िन्दगी जीने का वक्त नहीं है। वह एक ऐसी रेस में भागे जा रहा है, जिसके अन्त में किसी की विजय नहीं होने वाली। फिर भी वो भाग रहा है, भाग रहा है।
हमें भागते रहना है
हर स्थिति में, हर परिस्थिति में
उम्र की अंतिम सांस तक
जबकि यह तय है
कि अन्तत: इस रेस को हार जाना है।
(कविता : ‘रेस’)
और यह भागदौड़ क्यों? उस भयावह चीज़ के लिए जिसकी काट आज तक इंसान नहीं निकाल पाया। जिसकी वजह से दुनिया कभी भी खूबसूरत नहीं बन पाई।
डरते नहीं अब किसी भी बात से
दर्द की हद भी जानते हैं
कि मृत्यु से भी ज्यादा
भयावह होती है भूख।
(कविता : ‘भूख’)
संग्रह में शामिल 58 कविताएं इसलिए भी अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब हैं क्योंकि इन कविताओं में कोई शाब्दिक कसरत नहीं है बल्कि जीवन से घुली-मिली और उसीसे निकली स्वाभाविक कविताएं हैं। सुषमा कविता में ही जीती हैं, हर शय में कविता को महसूस करती हैं।
वह कविता ही थी
जो सुबह से शाम तक
संभालती रही मुझे
बताती रही इस दुनिया के बारे में
अच्छे और बुरे के बीच
फ़र्क का एहसास करता रही
पाने और खोने का अर्थ समझाती रही
वह कविता ही थी
जो बताती रही मुझे रास्तों के बारे में
चलते रहने और ठहर जाने के
द्वन्द्व को सुलझाती रही
आंसुओं के बीच मुस्कुराने की
कला सिखलाती रही
(कविता : ‘कविता’)
सुषमा की कविताओं में एक अजीब सी छटपटाहट है। हर बिगड़ी को बनाने की छटपटाहट। बिखरते घर को संवार लेने की छटपटाहट, टूटते रिश्तों को सहेज लेने की छटपटाहट, बेटियों को हर तरह के डर से हमेशा के लिए मुक्त करने की छटपटाहट। ये छटपटाहट ही उनकी कविताओं को सीधे जन से जोड़ देती है। संग्रह की कविताएं समाज की तमाम विडंबनाओं को ही रेखांकित नहीं करती बल्कि इनके बीच भी ज़िन्दगी का जश्न मनाती है। एक ऐसी ज़िन्दगी का जश्न जिसमें सुख-दुख का स्वागत समान रूप से होता है। इसलिए अगर ये कहा जाय कि सुषमा की कविताएं ज़िन्दगी का जश्न मनातीं कविताएं हैं तो अतिश्योक्ति नहीं होगी।
इस बेहतरीन संग्रह के लिए सुषमा सिन्हा बधाई की पात्र हैं। इस काव्य संग्रह की कविताएं आपको प्रभावित करेंगी। पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक।
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कविता संग्रह : बहुत दिनों के बाद
कवियत्री : सुषमा सिन्हा
प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली
मूल्य : 250 रुपए

2 comments

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