बांदा की आबोहवा में कविता का अक्स

पिछले रविवार, सात अप्रैल को राजकीय महिला डिग्री कालेज बाँदा में जनवादी लेखक मंच, बाँदा और लोकोदय प्रकाशन की ओर से समकालीन कविता पाठ और परिचर्चा का आयोजन किया गया । इस कार्यक्रम की अध्यक्षता जिला अधिवक्ता संघ, बाँदा के अध्यक्ष श्री सुबीर सिंह  ने की और संचालन जनवादी लेखक मंच के जिला प्रवक्ता उमाशंकर परमार ने किया ।मुख्य अतिथि ‘दुनिया इन दिनों’ के प्रधान सम्पादक-वरिष्ठ कवि सुधीर सक्सेना , व विशिष्ट अतिथि वरिष्ठ पत्रकार राजेश बादल रहे। कार्यक्रम की शुरुआत में डीसीडीएफ अध्यक्ष सुधीर ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए जनपद बाँदा की साहित्यिक गतिविधियों का तथा परम्परा का उल्लेख किया । जनवादी लेखक मंच, बाँदा  के अध्यक्ष  वरिष्ठ कवि जवाहर लाल जलज ने सभी अतिथियों का परिचय देते हुए लेखक मंच की तरफ़ से जनपद में ऐसे आयोजन कराते रहने का वादा किया और कहा कि जनवादी लेखक मंच निरन्तर बाँदा की प्रतिभाओं और उनके लेखन को सामने लाता रहेगा। यह एक मंच ही नहीं है बल्कि सांस्कृतिक अपक्षरण व भीषण गुटबाजी के दौर में एक मुकम्मल हस्तक्षेप भी है।

इस अवसर पर जनवादी लेखक मंच के उपाध्यक्ष गोपाल गोयल की पत्रिका ‘मुक्तिचक्र’ का विमोचन भी हुआ। गोपाल गोयल ने अपने वक्तव्य में कहा कि ‘मुक्तिचक्र’ प्रति वर्ष 22 जून को बाबू केदार के नाम पर “जनकवि केदार सम्मान” किसी एक महत्वपूर्ण कवि को प्रदत्त करेगी । इसका आयोजन जनवादी लेखक मंच के साथियों की सहमति सहयोग से  किया जाएगा। चयन कमेटी बना दी गयी है । इस अवसर पर जनपद बाँदा के तीन जरूरी कवियों की किताबों का विमोचन आगन्तुकों ने किया । डा. बालकृष्ण पाण्डेय के ग़ज़ल संग्रह “साधो उनकी जात निराली” तथा राजेन्द्र सरस के ग़ज़ल संग्रह ‘सूखे न ये शजर’ तथा युवा कवि प्रद्युम्न कुमार सिंह के कविता संग्रह “कुछ भी नही होता अनन्त” का विमोचन किया गया । ये तीनों जरूरी किताबें लोकदोय प्रकाशन से प्रकाशित हुई हैं।

राजेन्द्र सरस  और पीके सिंह ने अपनी रचनाओं का पाठ किया तथा बालकृष्ण पांडेय की गज़लों का पाठ जवाहर लाल जलज ने किया । इन किताबों पर परिचर्चा की शुरुआत करते हुए युवा आलोचक अजीत प्रियदर्शी ( लखनऊ) ने कहा कि आज की ग़ज़ल इश्क मिजाजी छोड़कर प्रतिरोध की राह बढ़ चली है। ये दोनों गज़ल संग्रह प्रतिरोध की शानदार परम्परा  का निर्वहन करते हैँ तथा पीके सिंह की कविताएँ हमारे दौर के भयावह सच की कविताएँ हैं । युवा लेखिका अंकिता तिवारी ने बालकृष्ण पांडेय को जीजिविषा और जीवन का कवि कहा तथा युवा आलोचक शशिभूषण मिश्र ने तीनों किताबों को महत्वपूर्ण कहते हुए बाँदा की रचनाधर्मिता का विकास कहा। उन्होंने “साधो उनकी जात निराली” , “सूखे न ये शजर” का गहराई से विश्लेषण किया । शाकिर अली ( छत्तीसगढ़) ने कहा कि आज जिस तरह के हस्तक्षेप की जरूरत है वह भाषा और औजार इन कवियों के पास है ।नासिर अहमद सिकन्दर ( छत्तीसगढ़) ने कहा कि हम जब भी हिन्दी कविता की चर्चा करते हैं तो उसके समानान्तर ग़ज़ल की भी चर्चा होनी चाहिए। ग़जल ग़ज़ल होती है उसे हिन्दी और उर्दू में बाँटना उचित नही है ।  विशिष्ट अतिथि राजेश बादल ने आज के मूल्यहीन दौर की चर्चा करते हुए   भोपाल गैस त्रासदी पर अपनी लम्बी कविता का पाठ किया। उनका कहना था कि कविता वही है, जो पीड़ा के साथ साथ अपने सामाजिक दायित्व का भी निर्वहन करे । युवा गज़लकार कालीचरण सिंह ने इस अवसर पर अपनी ग़जलों का पाठ किया। उनकी ग़ज़ल “हो गये अन्तर्ध्यान हमारे नेता जी” पर श्रोताओं ने खूब तालियाँ बजाईं । वरिष्ठ कवि सुधीर सक्सेना ने तीनो विमोचित कविताओं पर बात करते हुए कहा कि बाँदा की आबोहवा और परिवेश, धूल, पानी में कविता का अक्स है। बाँदा को केन बाँधती है या फिर कविता बाँधती है । बाँदा लेखकों और कविता प्रेमियों को खींचता है अपने से जोडता है । बाँदा रचता है और रचना को जीता है । अध्यक्षता कर रहे सुबीर सिंह ने भविष्य में  ऐसे आयोजनों हर तरह के सहयोग का वादा किया। युवा गीतकार  कवि दीनदयाल सोनी ने गीत का पाठ किया ।दीनदयाल के गीतों पर श्रोताओं ने खूब तलियाँ बजाईं ।और अन्त में जनवादी लेखक मंच के सदस्य वरिष्ठ कवि रामौतार साहू ने सभी आगन्तुकों का आभार व्यक्त करते हुए चित्रकूट के पुरा काव्य अन्वेषक , संपादक बाबू लाल गर्ग के निधन पर पाँच मिनट का मौन रखने की अपील। सभी लेखकों ने पाँच मिनट का मौन रखकर बाबूलाल गर्ग जी को श्रद्धांजलि अर्पित की । इस अवसर पर युवा और लोकोदय प्रकाशन के प्रतिनिधि बृजेश नीरज, इतिहासकार मदन सिंह ,   समाजसेवी उमाशंकर पाण्डेय,  युवा ग़जलकार अली असर बाँदवी , श्यामू भदौरिया , आनन्द सिन्हा , शबाना रफीक , अरुण खरे , नारायण दास गुप्त , चन्द्रपाल कश्यप , चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ललित , डिग्री कालेज के सभी शिक्षक विद्यार्थी व नगर के सभी गणमान्य व्यक्ति पत्रकार समाजसेवी , उपस्थित थे । 

 

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