भैरव प्रसाद गुप्त : व्यक्तित्व के कुछ पहलू

कर्ण सिंह चौहान

साहित्य से समाज के मन को बदलने की बात भले ही कुछ लोगों को नागवार गुजरे लेकिन ऐसा तो शायद ही कोई लेखक हो जो अपने लिखे को इतना अर्थहीन मानता हो कि अपने पाठक पर किसी प्रतिक्रिया की आशा ही न करे । सामाजिक परिवर्तन में साहित्य की भूमिका से बिदकने वाले लेखक भी यह दावा करते हैं कि उनका लिखा या कहा पढ़ने या सुनने पर पाठक या श्रोता वही नहीं रहता जो वह उसके पहले था । अब यह प्रभाव और परिवर्तन किस तरह का हुआ है यह स्वयं उस लिखने या कहने वाले की आस्था, उद्देश्य और क्षमता पर निर्भर करता है । यह हो सकता है कि साहित्य से महान अनुष्ठान संपन्न कराने की ख्वाहिश लेकर लिखने चले लेखक का प्रभाव कुछ और ही हो या वैसी किसी बड़ी उदघोषणा के न होने के बावजूद उसका असर गहरा और दूरगामी हो ।

समाज की आत्मा के शिल्पी के गौरवमय आसन पर प्रतिष्ठित यह साहित्य स्वयं रचनाकार के व्यक्तित्व को भी अवश्य ही माँजता होगा जो उसके जीवन-व्यवहार में अवश्य दिखाई पड़ना चाहिए ।

लोक में आम लोगों का सामना सबसे पहले रचनाकार के इसी व्यक्तित्व से होता है और स्वयं लेखन से इस व्यक्तित्व की एक भरी-पूरी तस्वीर पाठक के सामने निर्मित होती है । यह और बात है कि उसकी यह तस्वीर पाठक की निज की आस्थाओं-विश्वासों से निर्मित मूर्ति से टकराती हो ।

युवावस्था में हर साहित्य प्रेमी प्रतिष्ठित लेखकों की एक तस्वीर मन में गढ़ता है । अक्सर यह होता है कि उसने लेखकों के बारे में फैली किंवदंतियों से यह तस्वीर कुछ इस प्रकार की बनाई होती है जिसमें अनोखेपन, चमत्कार और भव्यता का प्रमुख स्थान होता है । इस तस्वीर को बनवाने और बनाए रखने के लिए अनेक लेखक बड़ी अजीबोगरीब हरकतें भी करते हैं और तमाम जिंदगी एक आवरण और झूठ को ढोए चलते हैं ।

भैरव जी से पहली बार मिलने पर सर्वप्रथम यह मूर्तिभंजन ही होता है । सामान्य कद-काठी, साँवले रंग, साधारण घर के धुले बिना क्रीज वाले कुर्ते पाजामे की पोशाक पहनने वाले भैरव जी में सिवाय बढ़े हुए केशों के ऐसा कुछ नहीं है कि कोई उन्हें देखते ही जान ले कि जरूर यह व्यक्ति लेखक ही होगा । बढ़े हुए बाल भी किसी छायावादी शैली के नहीं यूँ ही अनचाहे सैवालों जैसे । पहली मुलाकात में ही लगता है कि अरे ! यह आदमी तो एक आम भारतीय घर गिरस्ती के अनुशासन में बँधा, जीविका की सामान्य चिंताओं से ग्रस्त एक मामूली आदमी है । और किसी भी परिचित-अपरिचित से मिलने पर उनका व्यवहार बेहद ठंडा, उत्साहहीन और बेरुखा सा होता है कि इतना भर परिचय पाकर चला आने वाला व्यक्ति शायद ही फिर उन्हें अच्छे रूप में याद करे । इस आधार पर कई संस्मरण उनके बारे में प्रचलित हैं ।

लेकिन प्रथम परिचय में पूर्व निर्मित मिथ के टूटने के बाद फिर एक नई तस्वीरआकार ग्रहण करती है जो उनकी बेहद निजी, आत्मीय और जनवादी तस्वीर है । अपरिचय का आवरण धीरे-धीरे हटता है, उनकी इधर-उधर बचती आंखें आगंतुक पर केन्द्रित हो उसके परिचय और सामान्य सुविधाओं के प्रबंध की ओर मुड़ती हैं । प्रारंभिक असहज वातावरण को धौर्य से जिसने भेदा है वही उनके वास्तविक व्यक्तित्व से साक्षात्कार कर सका है अन्यथा लोग उनकी अहम्मन्यता को ही मन पर अंकित किए उठ आए हैं ।

आजादी के बाद की साहित्यिक हलचलों से सरोकार रखने वाला कोई भी व्यक्ति भैरव प्रसाद गुप्त के नाम से अपरिचित नहीं रह सकता । केवल इतना ही नहीं, वह यह भी जानता होगा कि नई कहानी आंदोलन के प्रवर्तक, `नई कहानी’ पत्रिका के बेजोड़ संपादक, कितने ही लेखकों को साहित्य में लाने वाले और कहानियों को आ. महावीर प्रसाद द्विवेदी सी लगन से सँवारने वाले भैरवप्रसाद गुप्त एक प्रतिष्ठित कथा-लेखक भर नहीं हैं बल्कि आजादी के बाद साहित्य में हो रही तमाम सार्थक आंदोलनकारी हलचलों में सर्वाधिक सक्रिय रचनाकार रहे हैं । इस संदर्भ में उनका यह दावा निराधार नहीं है कि हमने अपनी रचनात्मक और संगठनात्मक क्षमताओं से कथा-साहित्य को उन व्यक्तिवादी-प्रतिक्रियावादी परिणतियों से बचा लिया जिसमें हिंदी कविता आजादी के बाद निमग्न हो गई थी ।

साहित्यिक आंदोलन की महत्वपूर्ण हलचलों से जुड़े ऐसे व्यक्ति के बारे में अनेकानेक रोमांचकारी किस्सों का साहित्य-जगत में प्रसार कोई अस्वाभाविक बात नहीं है । उस काल के संघर्ष के इस इतिहास का ब्यौरेवार परिचय तत्कालीन साहित्यिक माहौल संबंधी अनेकानेक गुत्थियों को सुलझा सकता है । यह आश्चर्य की बात ही है कि इस दौर के इस संघर्षकारी इतिहास का अभी तक कोई प्रामाणिक लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं किया जा सका है और इसके अभाव में आम हिंदी पाठक आजादी के बाद के साहित्य को कविता-कहानी की रुग्णप्रवृत्तियों तक ही सीमित कर देखने का आदी हो गया है ।
फिलहाल मेरा उद्दे श्य उस इतिहास में जाना नहीं है बल्कि अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर भैरव जी के व्यक्तित्व के कुछेक पहलुओं को सामने लाना भर है ।

मुझे ठीक से महीना या तारीख तो अब याद नहीं लेकिन भैरव जी से मेरी पहली ठिकाने की मुलाकात १९७३ की गर्मियों में लूकरगंज के उनके घर पर हुई । उससे पहले भी एक बार दिल्ली में मॉडल टाउन में उर्दू के प्रोफैसर और आलोचक मुहम्मद हसन साहब के घर पर हो चुकी थी जब सी.पी. एम. से जुड़े कई लेखक दिल्ली में हो रहे अफ्रो-एशियाई लेखक सम्मेलन का बहिष्कार कर रात को आगे का कार्यक्रम तय करने के लिए मिले थे । लेकिन वह मुलाकात बहुत ही औपचारिक सी थी ।

प्रगतिशील लेखक संघ को टूटे काफी वक्त हो गया था । सातवें दशक में हिंदी में फिर से एक नया ज्वार आया था जो अपने को जनवादी आंदोलन और साहित्य की प्रगतिशील विरासत से जोड़ रहा था । फिर से लेखक इस बात की जरूरत महसूस कर रहे थे कि लेखकों का कोई ऐसा जीवंत और सशक्त संगठन बने जो इस जनवादी उभार को संगठित कर सके, दिशा दे सके । इसी माहौल में केदारनाथ अग्रवाल और रणजीत ने मिलकर बाँदा में हिंदी लेखकों का एक अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक सम्मेलन फरवरी, १९७३ में बुलाया जिसमें सभी रंगत के प्रगतिशीलों से एक जगह एकत्र होने का आह्वान किया गया था । ऐसे किसी भी प्रयास के प्रति नए लेखकों का उत्साह स्वाभाविक था और वे उसमें बड़ी संख्या में सम्मिलित भी हुए । हमने उसी समय लिखना शुरू किया था इसलिए हम भी गए । प्रगतिशील आंदोलन के कई वरिष्ठ लेखक आए – सज्जाद जहीर, नागार्जुन, त्रिलोचन, शिवदान सिंह चौहान, अमृतराय, मन्मथनाथ गुप्त, रमेश सिन्हा आदि, लेकिन बहुत सारे लोग नहीं आए, यहाँ तक कि नजदीक ही इलाहाबाद से भैरव, मार्कण्डेय नहीं आए । इसलिए जिज्ञासा और शंका स्वाभाविक थी कि वे आए नहीं या बुलाए ही नहीं गए । डॉ. चंद्रभूषण तिवारी (जो इलाहाबाद में इनसे मिलकर आए थे) ने बताया कि भैरव जी इस आयोजन को सी.पी.आई. की शासक दल से समझौतावादी नीति से जुड़े लेखकों की लेखकों को भरमाने की नई चाल मान रहे हैं इसलिए नहीं आए । हम इस विचार से सहमत नहीं थे । लेकिन उस सम्मेलन के दौरान जो घटा और बाद में उसके आधार पर बने संगठन का जो हस्र हुआ उसने उनकी बात को ही सही प्रमाणित किया । फिर भी उस समय लेखकों में संगठन के प्रति उत्साह को देखते हुए इस तरह के प्रयासों के प्रति बायकाट का रवैया शायद उचित नहीं था ।

इन्हीं तमाम मुद्दों पर विचार करने के लिए अनेक जगहों के मार्क्सवादी पार्टी से जुड़े कुछ लेखक इलाहाबाद में एकत्र हुए । उनकी दो दिन तक चलीं बैठकें भैरव जी के लूकरगांज वाले घर पर ही हुईं और ठहरने का इंतजाम भी वहीं किया गया ।

यहीं भैरव जी से मेरी पहली वास्तविक मुलाकात भी हुई ।

इन दो दिनों में उन्हें करीब से देखने, जानने का मौका मिला । और जैसा मैंने शुरू में ही कहा उनका प्रथम दर्शन एकदम अप्रभावशाली, प्रथम परिचय एकदम उत्साहहीन और ठंडा । इसलिए सुनी-सुनाई बातों के आधार पर बनी उनकी एक मूर्ति टूटी । लेकिन साथ ही उनका एक नया और वास्तविक व्यक्तित्व धीरे-धीरे उद्घाटित हुआ । वय और प्रतिष्ठा में हम लोगों से काफी बड़े होने पर भी उनके व्यवहार में स्नेह, आत्मीयता और बराबरी के स्तर पर मिलने जैसी चीजें अधिकाधिक स्पष्ट होती गईं । तब जाकर मुझे लगा कि उनकी प्रारंभिक प्रतिक्रिया का राज क्या है ।

भैरव जी परिचित होने में थोड़ा समय लेते हैं, अंदर ही अंदर सामने वाले आदमी का जायजा लेते हुए उसके प्रति अपना बर्ताव निश्चित करते हैं – मानो उसकी पात्रता को अपनी अवधारणाओं में मन-ही-मन तोलते हैं । इन दो दिनों में मैंने देखा कि हम लोग जब बहसों में लगे होते या बीच के वक्त में शहर में घूमते रहते, वे छोटी-से-छोटी चीज का इंतजाम कर रहे होते । गर्मी का मौसम था तो उन्होंने बाजार से चूसने वाले बढ़िया आम लाकर बाल्टी में डुबोकर रखे, रात के समय अपने हाथ से मांस बनाया । वे बेहद आग्रह से आम खिलाते, भोजन परोसते । बगल का कमरा उनका अध्ययन कक्ष था जिसमें एक पुरानी मेज कागजों से पटी रखी थी, कुछ फटे-पुराने कागजों पर लिखे पत्र थे । यह कमरा एक श्रमजीवी लेखक और पत्रकार का कमरा लगता था ।

लेकिन वह सब करते हुए बहस में वे कोई रू-रियायत नहीं बरतते थे और अनेक अवसरों पर एकदम रौद्र रूप में आ जाते । मजाल है आप प्रगतिशील विरासत के बारे में कोई हल्की बात कह जाएँ, नई कहानी आंदोलन की एक सिरे से भर्त्सना करने लगें, आजादी के तुरंत बाद के साहित्य को झाडू लेकर एक सिरे से बुहार व्यक्तिवादी-कलावादी टोकरी में डाल दें । भैरव जी भभके हुए हैं, आँखें क्रोध से जल रही हैं, होंठ थोड़े काँप रहे हैं – `आप कुछ नहीं जानते हैं । समझे? कुछ नहीं पढ़ा है आप लोगों ने । सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कोरी बकवास करते हैं । गाल बजाने से ही कोई चीज मिट जायगी ? नई कहानी मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर ने नहीं हमने शुरू की थी और वह प्रेमचन्द की परंपरा को आगे बढ़ाने के उद्देश्यों से प्रेरित सही शुरूआत थी ।
.. और सुनिए आप जनाब ! मैं कहे देता हूँ कि अगर यही रवैया रहा आपका तो आप और कुछ भी कर लें, साहित्य आपकी समझ में नहीं आएगा । आप कविता के आंदोलनों से सारे साहित्य के बारे में धारणा बनाते हैं ? कविता हमारे यहाँ ज्यादातर सुविधाग्रस्त आलोचकों के चोंचलों की वस्तु रही है । कविता लिखना और उसके आधारपर बहस करना बहुत आसान होता है । आजादी के बाद के साहित्य को समझने के लिए कविता को नहीं कथा-साहित्य और उसमें भी कहानी को आधार बनाइए । तब इस तरह की अनर्गल बातें नहीं कर पाएंगे आप ।…”

……भैरव जी बोले जा रहे हैं एक एक की ओर इशारा करके, नाम लेकर, बेहद गुस्से भरी आवाज में । वे सिंहावलोकन की मुद्रा में, विहंगम दृष्टि डालने वाली नजर से या तटस्थ मूल्यांकन के मसीही अंदाज में इस साहित्य पर बात नहीं करते बल्कि एक ऐसे आदमी के रूप में बोलते हैं जो उस जमाने के साहित्यिक मोर्चे के युद्ध में शरीक सैनानी ही नहीं रहा, जिसने अपने खून-पसीने से साहित्य की स्वस्थ धारा को सींचा है । इसके सामने कोई भी तर्क हल्का और बेमानी हो जा सकता है । ऐसे मौकों पर भैरव जी सर्वोत्तम फार्म में होते हैं और उनकी छवि देखते ही बनती है ।

लेकिन हम लोग ही कहाँ हार मानने वाले थे । इस प्रसंग को छोड़ हमने उन्हें व्यावसायिक पत्रिकाओं के सवाल पर जा पकड़ा । यह वह दौर था जब हिंदी में लघु पत्रिकाओं का आंदोलन जोरों पर था, बड़ी या व्यावसायिक पत्रिकाओं के खिलाफ मुहिम तेज थी और सीधा सवाल लेखकों से किया जा रहा था – `तय करो किस ओर हो तुम ?’ इस स्पष्ट विभाजन के परिणामस्वरूप नए लेखकों ने तो दो- टूक पोजीशन ले ही ली थी, अनेक लेखक बड़ी पत्रिकाओं के मायाजाल को तोड़कर लघु-पत्रिकाओं के इस आंदोलन में आ मिले थे । ऐसे में भैरव जी का कभी-कभार बड़ी पत्रिकाओं में कहानी देना हम लोगों की नजर में किसी बड़े अपराध से कम न था ।

बस इसी पर सबने उनको धर दबोचा । एक-एक कर सबने फटकार का बदला लेने के भाव से मानो भैरव जी को ललकारा । भैरव जी एक-एक को सीधे आँखों में देखते चुपचाप सुनते और परखते रहे । जब सब कह चुके तो काफी देर तक मौन छाया रहा । भैरवजी शायद बेहद विचलित थे, पीड़ित हुए थे अंदर तक । शायद द्वंद्व भी था अन्दर कि जो कहना चाहते हैं उसे कहें या न कहें, या कुछ असर भी होगा कि नहीं । फिर बहुत धीरे-धीरे, जैसे अपने से ही बात करते हुए उन्होंने कहना शुरू किया –

“आप लोग हमें कटघरे में खड़ा कर जूते लगाना चाहते हैं । आपको छूट है, खूब सुविधा है कि किसी को कुछ भी कहें जो मन में आए…आप लोग बहुत भाग्यशाली हैं…बँधी नौकरी करते हैं स्थायी, वक्त पर पैसा पाते हैं, सुरक्षित हैं .. बढ़-चढ़कर क्रांतिकारी बातें कर सकते हैं । हम लोगों की स्थिति की आप कभी कल्पना नहीं कर सकते । आप नहीं जान सकते कि आज के जमाने में लेखक बनकर जीना और स्वाभिमान तथा अपने विश्वासों के साथ जीना कितना कठिन और भीषण संघर्ष है । मैं मसिजीवी लेखक हूँ, पत्रिकाओं में लिखकर, अपनी किताबें छाप या छपवाकर, उन्हें बेचकर जीविका चलाता हूँ । एक-एक पैसा कैसे आता है यह मैं जानता हूँ । आप कहेंगे यह समझौता परस्ती है, सिद्धांतहीनता है । लेकिन आप लोग शायद नहीं जानते कि अपने विश्वासों और स्वाभिमान के लिए हमने बड़े-से-बड़े `आफर’ ठुकराए हैं । और यदि समझौता किया होता तो ऐसी कोई चीज नहीं थी जो हम पा नहीं सकते थे । जिन लोगों को पत्रिका निकालने तक का कोई अनुभव नहीं वे व्यावसायिक पत्रिकाओं, सरकारी संस्थानों में ऊँचे पदों पर मोटी तनख्वाह पाते हैं और ऐश करते हैं । हमने अपने को नहीं बेचा, लेखन में कोई समझौता नहीं किया, कभी किसी के सामने नहीं झुके । हमारी कहानी माँगना और छापना उनकी मजबूरी है । वे हमारे लेखन के प्रशंसक नहीं हैं लेकिन उनके पास कोई चारा नहीं है । हम अपनी शर्तों पर अपनी रचना देते हैं । आप इस संघर्ष और स्वाभिमान को नहीं देखते ?और आप कहते हैं कि हम सिद्धांतहीन समझौता करते हैं ?…”

मैंने देखा भैरव जी की आँखें भर आईं, होंठ जोर-जोर से फड़फड़ाने लगे, शब्द की श्रृंखला टूट गई । लगा उनके आत्म-सम्मान को गहरी चोट लगी है । फिर कोई कुछ बोल नहीं सका । चुपचाप सभी ने अपनी इस हरकत पर मानो अफसोस किया ।

यह भैरव जी का एक और रूप था – बेहद संवेदनशील, कोमल, द्रवणशील और उस किंवदंती वाले रूपसे एकदम भिन्न जिसमें वे कड़क आवाज में ललकारते हुए साक्षात कालरूप भैरव थे ।

भैरव जी की गिनती अपनी बात पर अड़ने वालों में होती है । वैसे आज की दुनिया में बहुरूपियापन, लिजलिजे चरित्रों का जो जोर है, वैसे में सही बात के लिए अड़ने वाले लोगों की उपस्थिति सुखद आश्चर्य की तरह ही लगती है ।भैरव जी भी आसानी से अपनी अड़ नहीं छोड़ते । लेकिन यह कोई जिद नहीं होती । वे अंत तक इस बात अड़े रहे कि बाँदा में बना संगठन शासक दल के प्रति समझौता परस्ती का रुख रखने वाले छद्म प्रगतिशीलों की चाल है, किसी जीवंत संगठन बनाने की ईमानदार कोशिश नहीं – उससे कुछ निकलने वाला नहीं है । हिंदी के जनवादी लेखकों को एक ऐसा सशक्त और जीवंत संगठन बनाना होगा जो शासकवर्गों के चरित्र की सही समझदारी पर टिका हो ।

लेकिन इसके बावजूद उन्होंने माना कि फिलहाल संगठन के किसी भी ऐसे प्रयास के प्रति एकदम नकारात्मक रवैया अपनाना शायद हमें ही मुख्य धारा से काटेगा । इसलिए इन प्रयासों की असलियत को समझते हुए भी उन्होंने इसे जिद का सवाल नहीं बनाया और भरतपुर सम्मेलन में शरीक हुए । बाद में अपने निहित उद्देश्यों को पूरा न होते देख जब संयोजकों ने संगठन को अधबीच में छोड़ दिया तो उन्होंने अपनी धारणा को फिर से सबके विचारार्थ रखा । जिस तरह के संगठन की कल्पना उन्होंने की थी और जिसके लिए वे सतत् प्रयत्नशील थे, वह १९८२ में जाकर जब जनवादी लेखक संघके नाम से निर्मित्त हुआ तो यह स्वाभाविक ही था कि वे उसके प्रथम अध्यक्ष बने । वैसे १९७४ से लेकर १९८२ तक के काल में इस दिशा में किए प्रयासों और उसमें भैरव जी के योगदान की एक अलग ही कहानी है ।

भैरव जी संगठन के अध्यक्ष के आसन को सुशोभित करने वाले व्यक्ति ही नहीं रहे, उन्होंने एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में अपना पूरा समय उसे दिया है । पिछले दो-ढाई वर्षों में संगठन के निर्माण में उन्होंने जो कार्य किया उसका मैं प्रत्यक्षदर्शी गवाह रहा हूँ । मुझे आश्चर्य होता है कि इस उम्र में, लेखन कार्य की प्राथमिकताओं को निभाते हुए उन्होंने कैसे इतना कुछ किया । संगठन निर्माण का यह दौर बेहद भागदौड़ का रहा है । राज्य सम्मेलनों से लेकर जिला इकाइयों तक के कितने ही सम्मेलन इस बीच हुए हैं । इन दो-ढाई वर्षों में मैंने देखा है कि जहाँ से जब बुलावा आया है, भैरव जी सब काम छोड़ बोरिया-बिस्तर बाँध सफर में निकल पड़े हैं । इन दो वर्षों में जितनी यात्राएँ उन्होंने की हैं उनका विवरण दे पाना यहाँ संभव नहीं । और ये यात्राएँ किस तरह की रही हैं इसका अंदाजा दो उदाहरणों से ही लगाया जा सकता है ।

मध्य प्रदेश के कटनी नगर में जलेस का जिला सम्मेलन हुआ । भैरव जी, शील जी, मैं और रमेश रंजक बाहर से वहाँ पहुँचे । लौटने के लिए किसी आरक्षण का इंतजाम नहीं हो सका । भैरव व शील जी सामान लिए रेलवे स्टेशन पर खड़े हैं । कई घंटे हो गए लेकिन किसी गाड़ी में पैर रखने की जगह नहीं है । हारकर बस अड्डे से बस लेते हैं । बस भी खचाखच भरी है । ५-६ घन्टे का रास्ता भैरव और शील जी खड़े-खड़े तय करते हैं ।

इसी तरह दिसम्बर, १९८२ में महाराष्ट्र का सम्मेलन बंबई में सम्पन्न हुआ । भैरव, मार्कण्डेय और चन्द्रबली सिंह आरक्षण न होने पर गाड़ी में सवार हो गए हैं । रास्ते में रात हुई तो अब कहाँ जाएँ ? डिब्बे की दीवार के साथ खड़े-खड़े या नीचे फर्श पर बैठकर यह सफर तय होता है ।

एकाध नहीं अधिकांश यात्राओं की कहानी लगभग इसी तरह की है । लेकिन अपने काम के लिए नाराजी क्या और गिला क्या । इस संगठन के निर्माण की बुनियाद में ऐसे कितने प्रयासों का हाथ रहा है और इसमें भैरव जी ने एक प्रमुख भूमिका निभाई है ।

भैरव जी के लेखन के संबंध में विचार करना इस टिप्पणी का उद्देश्य नहीं है और न ही यहाँ वह संभव ही है । उसके संबंध में अनेक लोगों के अनेक मत हैं, जिनमें कुछ तो एक-दूसरे के नितांत विरोध में भी पड़ते हैं । मसलन ऐसे लेखकों-पाठकों की काफी बड़ी संख्या है जो भैरव जी के कथा साहित्य को प्रेमचंद की विरासत का वास्तविक हकदार मानते हैं – वही व्यापक फलक, सामाजिक यथार्थ के अंतर्विरोधों की वैसी ही गहरी पकड़, उसी तरह की सादगी पूर्ण जनप्रिय शैली और वैसी ही सोद्देश्यता । उनका मानना है कि भैरव जी ने अपने कथा-साहित्य में प्रेमचंद के बाद के परिवर्तित सामाजिक यथार्थ को संपूर्ण आयामों में उकेरने की कोशिश की है । ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जिनके लिए भैरव जी का कथा-साहित्य सपाटता, यथार्थ की सतही उथल-पुथल और उनकी प्रतिबद्ध वर्ग-दृष्टि की सिद्धि का ही दूसरा नाम है । यह कहने की अलग से जरूरत नहीं है कि इन दो परस्पर विरोधी मूल्यांकनों के पीछे स्वयं मूल्यांकन कर्ताओं का अपना सौंदर्य बोध, जीवन-जगत के प्रति दृष्टिकोण सक्रिय रहता है । स्वयं प्रेमचंद के जमाने में उनके लेखन को फूहड़ कहने वालों की कमी नहीं थी और आज भी ऐसे लोगों का नितांत अभाव नहीं है जो उसे दोयम दर्जे की प्रतिभा की रचना मानते हुए विश्व के श्रेष्ठकथा-साहित्य के समतुल्य रखने के विरोधी हैं । लेकिन भैरव जी ने अपने लेखन पर एक विशेष सौंदर्य बोध से प्रेरित लेखकों द्वारा लगाए गए आरोपों की बहुत अधिक परवाह न करते हुए लगातार लिखा है और काफी परिमाण में लिखा है । वे लिखने को एक `मिशन’ के रूप में लेते हैं और सामाजिक क्रांति में उसे एक हथियार मानते हैं । इस बात ने उनकी रचना को एक निश्चित स्वरूप प्रदान किया है ।

लेकिन इस प्रसंग के बहाने मैं उनके रचनाकार व्यक्तित्व के जिस पहलू की ओर संकेत करना चाहता हूँ वह है उनकी सहजता, साफगोई, सोद्देश्यता और दो-टूक निर्णयात्मकता । उनमें कहीं कोई बनावट, बुनावट, सायास जटिलता और कीमियागिरी नहीं है । और ये सब चीजें उनके व्यक्तित्व मे ही नहीं लेखन में भी लगातार दिखाई पड़ती हैं ! वे जिस चीज को जिस रूप में समझते हैं उसे उसी रूप में रखने और कहने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता । उन्हें अपनी विचारधारा और उससे बनने वाले भावी समाज के बिंब तथा उसके प्रकाश में भारतीय जनजीवन में हो रहे परिवर्तनों, संघर्षों के चित्रण में भी अनुचित कुछ नहीं लगता । विचारधारा, जन-संघर्षों, शिव पक्ष की जीत में अगाध विश्वास ही है जिसने इस बीच कहानी में आए संरचनात्मक बदलावों, मानव मन की गहराई और संबंधों की जटिलता के तमाम शोर तथा कलावादी तर्कों की आक्रामकता के दौर में भी उनकी कथा-यात्रा को अप्रभावित व अडिग बनाए रखा है । यह स्वाभाविक ही है कि जो कथा-साहित्य के विकास को संरचनात्मक जटिलता, मानव मन की गहराई, मध्यवर्गीय जीवन संबंधों के त्रिकोणों या भाषा-शैली की नवीनताओं से जोड़कर देखने के कायल हैं, उन्हें भैरव के कथा-साहित्य में अवरोध और घिसा-पिटापन ही नजर आए ।

यहीं इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि भैरव किसी भी प्रकार के वैचारिक स्खलन या समझौते को कभी बर्दाश्त नहीं करते । वे उसमें कोई रू-रियायत नहीं करते । तमाम मार्क्सवादी आलोचकों के लिए संदर्भग्रंथ बने जार्ज लूकाच जैसी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के लेखक के विरोध में कलम उठाने का साहस भैरव ही कर सकते थे । उन्होंने लूकाच के स्खलन को नजरअंदाज कर उनकी गरिमा के प्रतिस्थापन के प्रयासों पर तीखा प्रहार किया । यही बात हरिशंकर परसाई और रमेशचन्द्र शाह पर लिखे उनके लेखों के बारे में भी कही जा सकती है । जार्ज लूकाच वाली टिप्पणी से लेकर रमेश चंद्रशाह पर उन्होंने जो पालेमिकल लेख लिखे हैं उन्हें गौर से देखने पर यह सहज ही स्पष्ट होता है कि उनकी इस आलोचनात्मक प्रतिभा का किस तेजी से विकास हुआ है ।
जिन लोगों ने जार्ज लूकाच पर लिखी इस टिप्पणी को इकतरफा और अन्यायपूर्ण कहा था वे भी रमेशचन्द्र शाह पर लिखे उनके लेख से एकदम सहमत हैं । इसका कारण शायद इन आलोचनात्मक लेखों में पालेमिक्स के बीच विकसित हुई गहरी विश्लेषणात्मक पद्धति ही है । उन्होंने राजनीति, साहित्य और संस्कृति पर होने वाली विभिन्न बहसों में समयानुकूल हस्तक्षेप किया है और उससे असहमति के बावजूद लेखकों पाठकों पर गहरा प्रभाव छोड़ा है ।

आज जब लेखक का रचनात्मक जीवन छोटा होता जा रहा है, संस्कृति के क्षेत्र में सत्ता और निहित स्वार्थों के भयंकर आक्रमण चल रहे हैं, लोभ-लालच के इतने सुअवसर लेखकों को पथभ्रष्ट करने के लिए मौजूद हैं, दल-बदल और समझौतों का जोर है या लेखक प्राय: गंभीर मसलों पर मौन साधे हैं – ऐसे में भैरव जी की निष्ठा, बेबाकी, संघर्षधर्मिता का एक अतिरिक्त महत्व है । वे साहित्यकारों की उस परंपरा को आगे बढ़ाने वाले लेखक हैं जिन्होंने किसी से समझौता नहीं किया, जिन्होंने बड़ी से बड़ी शक्ति और सत्ता के सामने कभी सिर नहीं झुकाया, जो झूठ के विरोध में कभी पीछे नहीं रहे और सत्य के लिए लड़े । आज जब माहौल में भ्रष्टाचार, आतंक, फरेब, निराशा, प्रलोभन व्याप्त है, वहाँ भैरव जैसे लेखकों की आन और शान साहित्य कर्मियों में एक नया आत्मविश्वास जगाती है, उनमें अपने कर्म के प्रति गरिमा जगाती है और लेखक होने के बड़े दायित्वों का बोध जगाती है । आचार्य द्विवेदी के उपन्यास `बाणभट्ट की आत्म कथा’ में अघोर भैरव का एक वाक्य है – “डरना किसी से भी नहीं, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं ।” कहना न होगा कि भैरव आज उन्हीं कुछेक रचनाकारों में से हैं जो एक लेखक की आन के लिए किसी भी शक्ति को चुनौती दे सकते हैं ।

भैरव जी को सभा-गोष्ठियों में बोलते जिसने भी सुना है वे जानते होंगे कि भैरव बहुत अच्छे वक्ता नहीं हैं । वैसे भी यह संयोग कम ही देखने को मिलता है कि एक अच्छा रचनाकार वक्ता भी हो । मुझे याद पड़ता है जुलाई-अगस्त, १९८२ में बिहार राज्य जनवादी लेखक संघ के सम्मेलन के अवसर पर जमशेदपुर के एक कालेज के छात्रों-प्राध्यापकों ने बाहर से आए कुछ लेखकों को बोलने के लिए बुलाया । भैरव, डॉ. चन्द्रभूषण तिवारी और मुझे बोलना था । सबसे पहले भैरव जी की ही बारी थी । उन्होंने इतना धीरे-धीरे बोलना शुरू किया मानो अपने से ही बात कर रहे हों । यहाँ तक कि उनकी बगल की कुर्सी पर बैठे हम लोगों को भी मुश्किल से ही सुनाई पड़ रहा था । हाल पीछे तक पूरा भरा था और माइक भी नहीं था । हम लोगों ने भी और श्रोताओं में से भी कुछ ने उनसे जरा जोर से बोलने के लिए कहा । लेकिन भैरव जी थे कि उसी लहजे में अपने बचपन के संस्मरण सुनाए चले जा रहे थे । सभी लोग बड़े दुखी हुए । बाद में मैंने उनसे इसका सबब पूछा तो बोले-“अरे भाई, मैं अध्यापक तो हूँ नहीं कि इतनी लंबी-चौड़ी कक्षा को सँभाल सकूँ । मुझे इस तरह बोलने का बिल्कुल अभ्यास नहीं है ।”

लेकिन इसके ठीक विपरीत मैंने उन्हें जयपुर विश्वविद्यालय के आलोचना परिसंवाद में हस्तक्षेप करते देखा । तीन दिन के इस परिसंवाद में विभिन्न जगहों से आए बहुत से विद्वानों ने आलोचना की विभिन्न पद्धतियों पर बहस की । आखिरी दिन भैरव जी अध्यक्ष की हैसियत से बोले । उन्होंने तमाम उपस्थित विद्वानों को लगभग फटकार के अंदाज में बोलते हुए कहा कि यहाँ सारी बहस अमूर्त हो रही है और कोरा पांडित्य बघारा जा रहा है, इससे साहित्य की समझ में कोई इजाफा नहीं होता । भैरव जी लगभग डेढ़ घंटे तक बोले और मुझे अच्छी तरह याद है कि उनका स्वर इतना ऊँचा और एक रचनाकार के आत्मविश्वास से इस तरह भरा था कि सभी उनके वक्तव्य पर आश्चर्यचकित थे । उस दिन मुझे लगा कि लेखक के लिए केवल वक्तृत्व-कला में पारंगत होना ही पर्याप्त नहीं, उसके लिए रचनाकार का आत्मविश्वास कितना जरूरी है ।

अंत में, एक और बात का उल्लेख अवश्य करना चाहूँगा । मैंने पिछले दो-ढाई वर्षों में लेखकों और पाठकों के बीच उनके जो भाषण सुने हैं सभी में आज के शासक वर्गों द्वारा संस्कृति के भ्रष्टीकरण की बात और इस चुनौती का सामना करने की बात एक प्रमुख मुद्दे के रूप में उन्होंने उठाई । लेकिन अंदर-अंदर कहीं इस बात का भी बराबर अहसास होता रहा जैसे आज का यह भयंकर वातावरण हमारे समस्त प्रयत्नों को बेहद नगण्य साबित कर रहा है ।

लेकिन जमशेदपुर में मजदूर संगठन के नेताओं ने भैरव जी से अनुरोध किया कि वे यूनियन के दफ्तर में चलकर बैठें क्योंकि मजदूर अपने लेखकों को देखना चाहते हैं । भैरव जी वहाँ गए । मजदूर बारी-बारी से आते, माला डालते, कुछ पैसा चंदे के रूप में भेंट करते और आगे बढ़ जाते । यह दो-तीन घंटे चलता रहा । भैरव जी एकदम भाव-विह्वल थे । शाम को मजदूरों की सभा में बोलते हुए उन्होंने विस्तार से इसका उल्लेख किया और मजदूरों द्वारा प्रदर्शित इस स्नेह और प्यार के लिए उन्हें धन्यवाद दिया । बाद में रास्ते में चलते हुए उन्होंने लू शुन के उस कथन का हवाला दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि कुछ लेखक गलतफहमी का शिकार हैं कि क्रांति के बाद जनता उन्हें अपने लेखक मानकर कंधे पर बिठा लेगी और हलवा-पूरी परोसेगी । लूशुन ने कहा था कि ऐसा कुछ भी नहीं होगा बल्कि हो सकता है कि स्थितियाँ और भी खराब हो जाएँ । लेकिन भैरव जी उस दिन की घटना का जिक्र करते सिद्ध कर रहे थे कि हमारे देश के मजदूर-किसान अपने लेखकों को बेहद प्यार करते हैं, क्रांति के बाद की बात जाने दीजिए, क्रांति से पहले भी करते हैं । सवाल यह है कि हम उनके लेखक बनें तो ! उन्हें हमारे साहित्य से यह मालूम तो हो कि उनके लेखक कौन हैं ?

प्रेमचंद के बाद जनता के अपने लेखक होने के जो अधिकारी कहे जा सकते हैं भैरव जी का स्थान उनमें महत्त्वपूर्ण है ।

 कर्ण सिंह चौहान जी के फेसबुक वॉल से साभार

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