भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी

जन्म: 27 अगस्त 1969

रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.)

शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड

प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ एवं गद्य संकलन (यात्रा वृतांत) ‘बस्तर में तीन दिन’ प्रकाशित। लघु पत्रिका ‘संकेत’ का छ्टा अंक कविताओं पर केंद्रित. कविता, संस्मरण, समीक्षा आदि प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

यात्रा:    सुनामी के बाद दो दोस्तों के साथ नागापट्टिनम की यात्रा. वहाँ ‘बच्चों के लिए बच्चों के द्वारा’ कार्यक्रम के तहत बच्चों को मदद पहुँचाने की कोशिश, आनंदवन, बस्तर, उत्तराखंड,  शांतिनिकेतन की यात्रायें।

पता : 1 / बी / 83,

       बालको

       जिला : कोरबा (छ.ग.)

       495684

       मोबाइल न. : 9098400682

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  1. जड़ें

सोचता हूँ 
कहाँ होती है 
उनकी जड़ें 
जो गाँव छोड़ 
दिल्ली चले जाते हैं 
जिनके पीछे
रह जाते हैं 
माँ बाबूजी दद्दा दादी या परदादी
या इनमें से कोई एक या दो 
खपरैल की छत बदले जाने के इंतज़ार में मकान
एक बदहाल खेत
पानी को तरसता कुआं 
चंद पेड़ बबूल और इमली के 
रिश्तों को निबाहते बर्तन, खाट और 
धूल अटीं कक्षा ग्यारवीं या बारह्वीं की किताबें ...

सोचता हूँ 
कहाँ होती हैं उनकी जड़ें
जिनकी जड़ें जमी ही नहीं होती हैं कहीं 
जो घूमते रहते हैं गाँव से कस्बा कोई 
या कस्बे से शहर 
सिमटता परिवार लेकर 
जिसमें सदस्य केवल तीन या चार ही होते हैं 
जो विवश होते हैं फोन पर किसी मित्र को झूट बोलने को 
कि वे घर पर होते हुए भी नहीं होते हैं घर पर 
जो कभी किसी गाँव कस्बे या शहर को 
अपना नहीं कह सके
कहाँ होती हैं उनकी जड़ें ...

कहाँ होती हैं उनकी जड़ें
जो जड़ों से उखाड़ दिये गये हैं 

सोचता हूँ .... 

2. आजमगढ़ के भीतर कोई गाँव

(रबीश के लिए)

इस गाँव में 

नेता कोई नहीं आता

दरअसल यहाँ झगड़ा नहीं होता कोई

 

यहाँ घर हैं कई ऐसे

जहाँ एक ही है

बीच वाली दीवार

हिंदू की दीवार पर

खुदी है कोई तहरीर

और मुस्लिम वाली दीवार

जो सड़क की ओर है

पर बना है शिव का त्रिशूल

मस्ज़िद का दरवाज़ा

खुलता है हिंदू की ओर

और दोनों घरों की नालियाँ

खुलती है सड़क पर

बढ़ रहा है दोनों घरों की

लड़कियों का कद

और कम पड़ने लगी है

गोबर थापने की जगह...

 

3. अम्मा के हिस्से का दूध

(प्रिए मित्र पीयूष दूबे के लिए)

मेरे गाँव में

भैंस ने बच्चा जना है

सुना है

भैंस के बच्चे से

बेहद प्यार करती है अम्मा

अक्सर झगड़  लेती है पिता से

कि भैंस के बच्चे को

मिलना ही चाहिए

उसके हिस्से का दूध

 

याद है मुझे

जब तक रहा मैं गाँव में

मेरे ही हिस्से आता रहा

अम्मा के हिस्से का दूध !!

 

4. चुप

पिता के पिता ने कहा

पिता से

चोप्प

दुबक गए पिता

किताबों की अलमारी के पीछे

 

पिता ने मुझसे कहा

चुप

मैंने दरवाजा खोला

बाहर निकल गया घर से

और  बाहर ही रहा

खाने के वक्त तक

घूमता रहा इधर-उधर

बेमतलब

 

मैंने बेटी से कहा

चुप्प

उसने पलट कर जवाब दिया !!

 

5. हँसी

वह बच्चा

जो मेरे पड़ोस में रहता है

हँसता रहता है सारा दिन

कभी नहीं रोता 

और कभी रोता भी है तो

हँसने जैसा लगता है

कहती है बच्चे की माँ...

 

सोचता हूँ

बच्चे उधर

गाज़ा पट्टी में

या फिलीस्तीन में

या यज़िदी–

इराक की पहाड़ियों में

छुपे हुए माँओं की गोद में

हँसते हैं कब ?

 

6. अल्ला

एक

अल्ला पेड़ की तनों में

पत्तियों पंखुड़ियों

मकबरों में अल्ला

जगह जगह अल्ला

हर जगह अल्ला 

अल्ला की ज़रूरत हर किसी को

                           

बच्चों के उड़ रहे चिथड़ों में अल्ला

अल्ला को प्यारे बच्चे

बच्चों को प्यारे अल्ला !

 

दो

यज़ीदी यहूदी

ईसाई इस्लाम

तमाम धर्म

मान्यताएँ तमाम

कोई दिन में पाँच बार नमाज़ अता फरमाए

कोई रटे सर हिला-हिलाकर

धर्म की बातें

दिन में कम से कम पाँच बार

कोई छाती से चिपकाए रहे धर्म

कोई माइक पकड़कर चीखे धरम –धरम

कोई उठा ले बंदूक

ढांप कर आधा चेहरा

दोहराए धर्म की बात कोई

और कर दे खल्लास 

मर्दों को दूसरे धर्म के और

औरतों लड़कियों और बच्चियों को

जो बलात्कार के काम आए

बची रहने दे जीवित 

भूखी नंगी

मौत से बदतर... 

7. बसंत

मेरे परिचितों

और मित्रों में

कई हैं बसंत

बसंत दुबे, बसंत त्रिपाठी, बसंत गोरख

और भी न जाने कितने बसंत

 

एक लड़की थी

बासंती नाम था उसका

गहरा काला रंग था

माथे पर बैगनी रंग की बिंदी लगाती थी

उजले कपड़े पहनती थी

मेरे साथ पढ़ती थी

बेहद खूबसूरत थी वह

 

मेरी कक्षा में एक बच्चे का नाम

उसके पिता ने बसंत रखा है

वह गोल-मटोल है

मुस्कुराता रहता है हमेशा

 

कई है बसंत मेरे आस-पास

और बसंत कहीं नहीं !!

8. कैक्टस

एक टुकड़ा भी

नहीं बादल का

तुम्हारे आसमान में

 

कड़ी धूप

दिन भर की

काली रातों की

कड़कड़ाती ठंड

 

शुष्क ज़मीन

सूखी रेत

गहरे-गहरे तक

पानी नहीं जिसके

 

वहीं बसते हो तुम

हरे-हरे ह्रष्ट-पुष्ट

सोखते हो

तुम कितना कम

जीवन रस

ज़रूरतें तुम्हारी कितनी कम....

9. पत्नी भी माँ की तरह ...

मैं होठों पर जीभ

फेरता हूँ बार-बार

जाने कहाँ से उग आती है पपड़ियाँ

माथे पर चुह्चुहाने लगता है पसीना

सिर्फ कुछ पल गर्म चूल्हे के पास

अपने को पाता हूँ अकेला –

निपट अकेला

चारों तरफ डिब्बों और बर्तनों की भीड़

जैसे कई बरसों से पका रहा हूँ रोटियाँ

जैसे यह गुँथा आटा

कभी होने को नहीं खत्म

जैसे मांजने हों

बेसिन में पड़े अनगिनत

जूठे बर्तन....

 

माँ बरसों से यही कर रही है...

पत्नी भी माँ की तरह ...

10. ल्युकेमिया

वह बच्चा मौत से लड़ रहा है

उसे ल्युकेमिया है

अस्पताल की सफेद चादर वाली बिस्तर पर

अपनी माँ से गले लिपट कर लेटा हुआ है

‘हमें कभी हार नहीं मानना चाहिए’ –

कहती है बच्चे की माँ

अपने आँसुओं को छुपाती ...

 

अस्पताल के बाहर लम्बी कतार हे

ख़ून जाँच करवाने वालों की

मानों उमड़ पड़ा है आधा शहर

इस वक्त सबसे ज़रूरी है

बच्चे का जीवन ...

 

उधर एक देश मर रहा है

उड़ी हुई है अस्पताल की छत

टूटी खिड़कियाँ टूटे दरवाजे

वहाँ मौत का सा सन्नाटा

पसरा पड़ा है !

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