भास्कर चौधुरी की पांच कविताएं

भास्कर चौधुरी

1

मनुष्य

तुम्हारे चेहरे में जो

उदासी का रंग है

ऐसा बहुत कम होता है

उन्हें

जब मैं

पढ़ पाता हूँ

हाँ जो रंग

खुशियों के संग हैं

जो रंग ताज़ा हैं

जो अभी फीके नहीं पड़े हैं

अक़्सर मैं उन्हें

ताड़ लेता हूँ ..

ऐसा कब होगा

मैं जब

इन रंगों के भेद को पढ़ पाउंगा

एक साधारण सा कवि से

अच्छा मनुष्य बन पाउंगा …

2

तानाशाह

एक

तानाशाह समझता है

दुनिया एक गुब्बारा है

तानाशाह के दायें हाथ में पिन है

और बायें में जलती हुई फुलझड़ी

गुब्बारे के ऊपर खड़ा

तानाशाह

बच्चों की तरह मचल  रहा है

तानाशाह को हँसी के दौरे पड़ रहे हैं

वह हँस रहा है

पेट पकड़ पकड़ कर

दुनिया को पिन और

जलती हुई फुलझड़ी दिखा-दिखा कर !!

दो

डरा हुआ है

तानाशाह

पर

पता है उसे

हम डरे हुए हैं

उससे ज़्यादा !!

तीन

क्या

खाली रही

कभी

दुनिया

तानाशाहों से ?

क्या

दुनिया रही

कभी

तानाशाहों की ??

3

दिल्ली

जंगल झरने
पहाड़ पर्वत
खेत खलिहान
गाँव गोडसी
सबकी जगह दिल में है

असल में दिल्ली ही भली!

4

केथेटर

इस समय

जब तानाशाह

व्यस्त हैं

जुमले उछालने में

और हम

उनके जुमलों पर

खीसे निपोरने में

अस्पताल के बिस्तर पर पड़ा

केथेटर लगा बूढ़ा कवि

नौजवान कवि को देखते ही

खुश हो जाता है और

उसके हाथों को पकड़े रहता है देर तक

मानों हाथों की गर्मी

कोई दवा हो केथेटर से मुक्त होने की !!

 

 

5

पुंछ में स्कूल

पुंछ में स्कूल की दीवारें ढह चुकी हैं

बची है सिर्फ एक दीवार

हालांकि गोलियों से वह भी हुई है छलनी

और ऊपर छत की तरफ से उड़ चुकी है आधी

बचा जो है उसे हम दीवार कह सकते हैं फिर भी

दीवार पर लिखा ‘चलो स्कूल चलें’

मिटा नहीं है अब तलक

और इस लिखे के ठीक पास

मिटा अब भी नहीं है

स्कूल जाते बच्चे की तस्वीर

हालांकि उसके गालों हाथों और माथे पर

गोलियों के गहरे निशान हैं

स्कूल के दरवाजे और खिड़कियाँ बंद नहीं है

दरअसल वहाँ खिड़कियाँ और दरवाजे है ही नहीं

वहाँ अब बच्चे नहीं बकरियाँ आती हैं

गोलियों की गूंज सुन टूटी हुई दीवारों को फांदकर

मे मे करती हुई भाग जाती हैं  |

3 comments

  1. पुँछ में स्कूल में लगी गोलियों से छलनी दीवार यथार्थपूर्ण बिंब है।सुंदर रचना।
    राजेश”ललित”शर्मा

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