भास्कर चौधुरी की 10 कविताएं

1

माँ का आना

माँ के आते ही

मैं असहज हो जाता हूँ

हो जाती है पत्नी असहज

हम दोनों के कान खड़े

छोटी-छोटी बातों को पकड़ लेने की क्षमता

एक-ब-एक दुगुनी-तिगुनी हो जाती है

 

माँ के आते ही

खुश हो जाती है

हमारी चार साल की बिटिया

वह चाहती है कि उसकी दादी खेले उसके संग

पूरे घर के लगाए सौ चक्कर

सोने के कमरे से रसोर्इ

रसोर्इ से बरामदा

बीच घर, स्नानघर

ढूंढे दादी उसे

पलंग के नीचे, सोफा के पीछे

कोना-कोन

इधर-उधर

 

वह चाहती है

दादी उसके संग देखे कार्टून

वह दादी के संग कृष्णा-गणेश

दोनों मिलकर बैठे

खाएं गाएं बजाएं

माँ भी पूरा-पूरा साथ देती

या कोशिश करती कम से कम

उठते-बैठते कर्इ-कर्इ बार

कमर में होने लगता दर्द

पसीने-पसीने हो जाती

लगाते-लगाते चक्कर

लेकिन बेटी मानती नहीं

 

दोनों एक-दूसरे को सुनाते ​किस्से-कहानियाँ

माँ, पिता के बारे में बताती तो

बेटी अपने स्कूल के कारनामे कहती

बात-बात पर मेरी और पत्नी की शिकायत करती

माँ सुनती-बोलती अपने कानों को सजग रखती

हमारी तरफ

 

जाने कैसे होने लगता उन्हें अदांज़

हमारी असहजता का

कारण बताकर पिता के अकेले खाना बनाने का

उनकी बिगड़ती तबियत का

माँ लौट जाती दिनों पहले

तय कार्यक्रम के

हमारी मौन स्वीकृति के साथ ….

2

पिता – एक

यह बैल बूढ़ा

उसने खुला छोड़ दिया

चरे या मरे

उसे क्या….

 

पिता भी बैल की तरह….

 

पिता – दो

पिता

मुझसे बाइक

नहीं मांगते

पैदल ही निकल जाते हैं

मीलों

मर्इ-जून की दुपहरी में।

 

पिता – तीन

पिता जीवित हैं

मृत्यु के बाद भी

बच्चों में अपने

 

जीवित पिता

नदारद हैं

बच्चों के जीवन से !

4

पिता का सफर

सूरज की तपिश के बावजूद

निकल पड़ते भरी दुपहरी

भीड़ भरी बस में खड़े-खड़े सफर

पसीने से लथपथ पिता

पहुँचते छोटे बेटे के दरवाजे

आधी रात

हाल जानने

उस पर आर्इ मुसीबतों की

छानबीन करते

तकलीफें दूर करने का

भरसक यत्न करते

उसे मंजिल का एहसास दिलाते

एक बार फिर

और लौट पड़ते

 

लौटती राह

उनका अगला पड़ाव होता

बड़े बेटे का घर

प्यास से सूखे होंठ लिए पहुँचते

दिलासा देते उसे

नौकरी की ऊँच-नीच समझाते

ज़माने से समझौता करने कहते

सबसे ताल मिला कर चलने को कहते

रसोर्इ-घर में खाली पड़े डिब्बे में

गुड़-चना और थोड़ा काजू

खरीदकर भरते

सेहत का ख्याल रखने को कहते

और लौट पड़ते….

 

अभी पूरा नहीं हुआ उनका सफर

चल पड़ते वे एक बार फिर

कंघे पर बैग लटकाए

बिटिया, जमार्इ और उनके बच्चों के

दुखों को समेटने

खुले हाथों से बाँटने को उतावले उन्हें

​ज़िंदगी की सारी खुशियाँ

 

यूँ उनका ये सफर

खत्म होता माँ के पास पहुँचकर

जिन्हें वे एक पिटारा थमा देते

छोटे-बड़े बेटों

बिटिया-जमार्इ और उनके बच्चों के

सुख-दु:ख के क़िस्सों का पिटारा।

 

5

माँ के बगैर घर

पिछले कुछ दिनों से

घर पर नहीं माँ

 

माँ नहीं

घर, घर नहीं

घर चला गया

पीछे-पीछे

माँ के साथ

छोटे भार्इ को है

माँ की ज़रूरत

रसोर्इ में उसके

दाल चावल को है

माँ के हाथों की ज़रूरत …

 

इधर पिता अकेले

र्इंट पत्थर के मकान में

उदास नीम की टहनियों के

उदास सींकों से

कुरेदते हैं अपने दाँतों को

इस तरह असहनीय पीड़ा

चेहरे का स्थायी भाव बन गया है

पिछले कुछ दिनों से…

6

पत्नी भी माँ की तरह…

 

मैं होठों पर जीभ

फेरता हूँ बार-बार

जाने कहाँ से

उग आती हैं पपड़ियाँ

माथे पर चुहचुहाने लगता है पसीना

सिर्फ कुछ पल गर्म चूल्हे के पास

अपने को पाता हूँ अकेला –

निपट अकेला

चारों तरफ डिब्बों और बर्तनों की भीड़

जैसे कर्इ बरसों से पका रहा हूँ रोटियाँ

जैसे यह गुंथा आटा

कभी होने को नहीं खत्म

जैसे मांजने हों

बेसिन में पड़े अनगिनत

जूठे बर्तन…

 

माँ बरसों से यही कर रही है…

पत्नी भी माँ की तरह….।

7

दादी

पंद्रह दिनों से बिस्तर पर थी दादी

दादा की मृत्यु के बाद से

मझले बेटे के साथ थी

बीस-पच्चीस वर्षों से

 

दादी कहती

अब कोर्इ इच्छा नहीं बाकी

अब बस

हो गये दिन पूरे

माँ को पास बुलाती

पूछती कान में मुंह लगाकर

बमुश्किल निकलती आवाज़ में –

आज तिथि कौन सी है

कौन सा पक्ष चल रहा है…

 

आखिर

हुआ भी वही जो दादी चाहती थी

जब मरी दादी तो शुक्ल पक्ष चल रहा था

आसमान में चाँद दिन के उजाले में भी

अपनी उपस्थिति जता रहा था

मौसम न अधिक ठंडा था न गर्म

खत्म हो चुकी थी

बच्चों की अर्धवार्षिक परिक्षाएँ

 

दादी मरी तो बड़े बेटे और छोटे बेटे

दोनों आए दो दिनों के लिए

 

दादी मरी तो

सब ओर सुकून था…

 

8

परदादी

दीदी नहीं रही

लेकिन ​ज़िंदा है दादी

 

पड़पोती की आँखों में झांकते-झांकते

लौटने लगी है परदादी की आँखों में रौशनी

 

पड़पोते से बतियाते

गूंजने लगी है परदादी की आवाज़

घर का कोना-कोना

 

पड़पोते का पोतड़ा साफ करते-करते

लौट आया है परदादी के हाथों में दम

एक बार फिर

समकोण से न्यूनकोण की तरफ झुकती-मुड़ती

जवाब देती उनकी कमर

सीधी हो गर्इ लगभग

परदादी बुहारने लगी है आँगन

फिर एक बार परदादी के बेसुरे गीतों से

निकलने लगे हैं सुर

 

सिमटती सिकुड़ती सिहरती परदादी

एक बार फिर

फैल रही है पूरे घर-आँगन में…

9

बिटिया

सुबह से सुलझाती रही

हमारा झगड़ा

हमारी बिटिया

अन्य दिनों के विपरीत

शांत और चुपचाप

अपने में मशग़ूल होने का स्वांग करते हुए

बैठक के कमरे से

सोने के कमरे तक

उसने कर्इ चक्कर लगाए होंगे दिन भर

मीलों का फ़ासला किया होगा तय

मानों सुलह कराना चाह रही हो

 

वह हमारी बिटिया तीन साल की

बैठक कमरे में रखे दीवान और सेंट्रल टेबल के बीच

दोनों हाथों के बल

झूला झूलती रही देर तक

ऐसा करते हुए उसने मुझे

कर्इ बार देखा कनखियों से

और मैं कुर्सी पर बैठा हुआ

किताब में खो जाने का नाटक करते हुए

चुपके-से देखता रहा उसे…

 

वह हमारी बिटिया

जब भी होता है हमारा झगड़ा

अपनी माँ का साथ देती है

पत्नी रोती तो उसके साथ वह भी रोने लगती

और सारा दिन कोशिश जारी रखती सुलह की

ऐसा करते हुए वह मुझे एक पुल की तरह दिखार्इ देती

बरसों पुराना अपने पायों पर मज़बूती से खड़ा पुल…

 

सोचता हूँ

जाने कैसी होती होगी सुलह

जहाँ बच्चे नहीं होते।

10

समय – एक

मेरी बच्ची

घर के अन्दर एक

घर बनाती है

और घर-घर खेलती है

 

उस घर में वह

मम्मी होती है

पापा होती है

बावजूद इसके

कि अंदर वाले इस घर में

वह बिल्कुल अकेली होती है

उसका यह घर-घर का खेल

हमारे घर लौटने के बाद भी

देर तक चलता रहता है

 

वह अपने खेल के अंत में

अपने घर से हमारा परिचय कराना चाहती है

और हम समय और सोने का बहाना कर

परिचय अगले दिन के लिए टाल देते हैं

 

हमारी बेटी

घर-घर खेलती हुर्इ

अपने घर में

गहरी नींद सो जाती है।

 

समय – दो

मैं देख रहा हूँ

दिवाकर, समीर और संचिता को

बड़े होते

टीवी पर

इस चैनल से उस चैनल

दुगुनी-तिगुनी-चौगुनी

रफ़्तार से उम्र बढ़ते

लगातार –

घाघ से घाघ होते

पैंतरे सीखते एक से बढ़कर एक

 

मैं देख रहा हूँ

बच्चों से बचपन को ग़ायब होते

छीज़ते….

  • भास्कर चौधुरी

मोबाईल नं. 9098400682

 

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1 Response

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