डॉ भावना कुमारी की पांच ग़ज़लें

1
कैसा अपना है ये सफ़र मालिक
कुछ न आता है अब नज़र मालिक

लूट लाते हैं, कूट खाते हैं
कर रहे हैं गुजर -बसर मालिक

चोट जब भी लगी है सीने पर
टूटने लगती है कमर मालिक

आ ही जाता है सबके चेहरे पर
बीतती उम्र का असर मालिक

धूप से बच भी कैसे सकते हो?
जिन्दगी में है दोपहर मालिक

वक़्त ने साथ दे दिया मेरा
उसने छोड़ी कहाँ कसर मालिक

रात -दिन इक लगन -सी रहती है
जब भी देता है कुछ हुनर मालिक

2

इक खुमारी रात की ऑखों में भरता देखकर
हंस पड़ा है चांद भी तारों को हंसता देखकर

रेत -सा बिखरा पड़ा जो जिंदगी की धार में
मौन है वो दूध औ पानी को मिलता देखकर

वह उड़ेगा और ऊंचा देखना ऐ आसमां
एक बच्चा सोचता चिड़ियों को उड़ता देखकर

रूक गया पानी तो सड़ ही जाएगा वह एक दिन
फिक्र में रहते किनारे बांध बनता देखकर

इश्क को भी नाज हो आया है इस परवाने पर
आग में हंसके पतंगे को यूँ जलता देखकर

3

किसलिए चाॅद पर ,चाॅदनी पर लिखें
क्यों लिखें फूल पर ,क्यों कली पर लिखें

पेड़,पर्वत,नदी पर लिखा है बहुत
आदमी हैं तो हम आदमी पर लिखें

सींचता है पसीने से जो खेत को
उसकी मिहनत भरी जिंदगी पर लिखें

लोग डूबा किये हौसला छोड़कर
हौसले की हर -इक बानगी पर लिखें

है अंधेरा बहुत रात लंबी हुई
एक दीपक जला रोशनी पर लिखें

4

तिर जाती मेरी आंखों में बचपन की शैतानी जी
गुड्डे-गुड़ियों के संग थी परियों की मनमानी जी

रूठ के रिनिया भाग गई है रंग-सभी बेरंग हुए
फेर गई है अब तो सारे खेलों पर वह पानी जी

सच में होते भूत यहां या सच में होती हैं परियां
बात चली तो कौतूहल औ होती थी हैरानी जी

चांद पे जाने की जिद करती मैं बैठी हूँ ऑगन में
मुझको बहला कर थक बैठी मेरी प्यारी नानी जी

आओ फिर से लौट चलें उस बचपन के तहखाने में
उस बचपन के आगे होती सब खुशियाँ बेमानी जी

5

बिना बोले भी कह जाते बहुत हैं
ये आंसू लफ्ज़ से अच्छे बहुत हैं

नदी में डूबते हर आदमी को
बचाने के लिए तिनके बहुत हैं

गरीबों के लिए महंगे जो होंगे
तुम्हारे वास्ते सस्ते बहुत हैं

मिलेंगे नाम ,पैसे और शोहरत
लुभाने के लिए तमगे बहुत हैं

ज़माने की चलन को क्या कहूँ मैं
जो खोटे हैं वही चलते बहुत हैं

चमक कर कह रहीं हैं बिजलियां ये
उजाले हैं मगर खतरे बहुत हैं

बहकने से बचाना कान अपने
सियासी गाँव में चमचे बहुत हैं

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डॉ भावना

माता- डाॅ शांति कुमारी
पिता -राम राज राय
जन्म-स्थान -मुजफ्फरपुर,बिहार
जन्म-तिथि- 20-2-76
प्रकाशित पुस्तकें-अक्स कोई तुम-सा (गज़ल-संग्रह),शब्दों की कीमत  (गज़ल-संग्रह)पर अखिल भारतीय  अंबिका प्रसाद दिव्य पुरस्कार ।
सपनों को मरने मत देना,हम्मर लेहू तोहर देह (काव्य-संग्रह)

संप्रति-राम श्रेष्ठ सिंह महाविद्यालय चोचहाॅ ,मुजफ्फरपुर के रसायन शास्त्र विभाग में प्राध्यापिका पद पर कार्यरत ।

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1 Response

  1. RUPESH KUMAR says:

    Very good

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