नूर मुहम्मद ‘नूर’ की दो भोजपुरी ग़ज़लें

एक
आदमिन के ढ़हान, चारू ओर
उठि रहल बा मकान चारू ओर
एगो बस जी रहल बा नेतवे भर
मू  रहल  बा  किसान चारू ओर
अब के पोछी हो लोर, ए, दादा
रो रहल, समबिधान चारु ओर
ई अन्हरिया, बड़ा पुरनिया  हो
कब ले  होई  बिहान चारू ओर
जे बा जंहवां, ध्वस्त बा ओहिजा
एक्के जइसन थकान चारू ओर
लामरन, भेड़ियन  के बस्ती  में
कब बनी  हो, मचान चारू ओर
उठि रहल बा,, गिरल – सड़ल कचरा
गिर रहल   बा  उठान  चारू   ओर
अब त कुछु ताल ठोक के  बो   ल
कब  खुली  हो   जुबान चारू ओर
दो
भोर गायब, बिहान गायब बा
रोसनी के निसान,, गायब  बा
का कहीं देस के खबर तो से
देंह भर बा, परान गायब बा
नवका साहेब के एजेंडा से
खेत गायब, किसान गायब बा
जिल्द भर रह गइल बा हाथे में
बीच से संविधान गायब बा
ई जे लउकत बा, इंडिया ह इ
अउर हिंदोस्तान  गायब बा
खांसि के टिमटिमा रहल बा दीया
नीन गायब निदान गायब बा।

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