जीवन से छूट रहे जीवन को बचाने का उपक्रम

शहंशाह आलम
कुँवर रवीन्द्र जिस दुस्साहस से सजग, विनम्र, पानीदार होकर कवितारत रहते आए हैं, मुझे इनका इस तरह कवितारत रहना अचंभित करता है, जैसे इनकी रंगों से दोस्ती मुझे विस्मित करती रही है। अब इनकी अस्सी से अधिक कविताओं का संग्रह ‘रंग जो छूट गया था’ जिस उम्दा तरीक़े से मंज़रे-आम पर आया है, आप भी इन कविताओं को पढ़कर अभिभूत हुए बिना नहीं रह सकते। इसलिए कि ‘रंग जो छूट गया था’ की कविताएँ उन बारिशों की कविताएँ हैं, जिन बारिशों से जीवन के रंग बरसते हैं। जिन बारिशों से जीवनानुभूतियाँ बरसती हैं। जिन बारिशों से एक रंगमय कवि का कवित्व बरसता है :

आज-कल मैं
     एक ही बिंब में
     सबकुछ देखता हूँ
     एक ही बिंब में
     ऊँट पहाड़
     समुद्र और तालाब को
     मगर आदमी मेरे बिंब से
     बाहर छिटक जाता है(‘आदमी का कोई बिंब नहीं बनता’/17)।
अब कविता से आदमी के छिटक जाने की बात इतनी साफ़गोई से कोई ‘ओरिजिनल पोएट’ ही कह सकता है। आज के आदमी की सच्चाई यही है कि वह रंगों से, दृश्यों से, बिंबों से छिटककर भागना चाहता है। आज के आदमी को मालूम है कि एक पोएट, एक आर्टिस्ट, एक पेंटर इनसे जो सच्चा और अच्छा जीवन चाहता है, वैसा जीवन जीना इस इक्कीसवीं सदी में तो असंभव जैसा है। इन आदमियों की किसी सरकार द्वारा आमदनी तो नहीं बढ़ाई गई, महंगाई ज़रूर बढ़ा दी गई। आज का आदमी रोज़ गड्ढ़ा खोदता है, रोज़ पानी पीता है। यहाँ कवि का अभिप्राय ऐसे आदमियों को लेकर है, जो आज भी आम आदमी की कैटेगरी में फँसा-उलझा हुआ है। या इसी कैटेगरी में आम आदमी को रखते हुए सारी मलाई अपने मनपसंद तबक़ों को सरकारें देते रहना चाहती हैं। ऐसे में किसी आम आदमी के पास छिटकने, भटकने, लटकने के अलावा कौन-सा रास्ता है, जो बचा हुआ है। तभी तो हमारे कवि कुँवर रवीन्द्र यह भी कहने की गुंजाइश निकाल लेते हैं :

मैंने कभी भी तुम्हें
     कैनवास पर चित्रित नहीं किया
     न रंग भरा उन दृश्यों में
     जहाँ तुम थे
     फिर भी
     हर फ़्रेम में तुम हो
     जहाँ होना चाहिए
     और जहाँ नहीं भी होना चाहिए(‘तुम हो’/21)।

कुँवर रवीन्द्र उन ख़बती कवियों में से नहीं हैं, जो कुछेक कविताएँ लिखकर ‘कविता का घर’ खण्डहर करने में रोज़ भिड़े दिखाई देते हैं। कुँवर रवीन्द्र बेहद महीन कवि हैं और उतनी ही महीनी से कवितारत रहते हुए कविता के माध्यम से जीवन की संवेदनाएँ करवट बदल-बदलकर प्रकट करने में लगे दिखाई देते हैं। इनकी ‘स्मृतियाँ’, ‘औरत’, ‘पिघला हुआ सिलसिला’, ‘खो गई है कहीं अंतराल में’, ‘जागती आँखों से’, ‘केवल चेहरा है’, ‘दिल्ली पुस्तक मेला’, ‘एक बुद्धिमान लड़की’, ‘केवल चेहरा है’, ‘और क्रांति हुई’, ‘मेरा गाँव’, ‘मुँह ढाँपे पड़े रहेंगे लोग’, ‘ख़ामोशियों की ज़बाँ होती है’, ‘बीती रात का शोकगीत’ आदि कविताएँ संग्रह की कुछ ऐसी ही कविताएँ हैं, जो समय के आदिम भय को जहाँ नया अभिप्राय देती हैं, वहीं सतर्कता से समय के प्रेम के वचनों को नया प्रतीक देती हैं :

     मेरे घर में सबकुछ सहेजा हुआ है अब तक
     खिड़कियों में तुम्हारी शक्ल
     दरवाज़े पर पाँव
    आँगन में खिलखिलाहट
     कमरों में तुम्हारी गंध
     बिस्तरों पर तुम्हारी छुवन(‘कहीं तस्वीर नहीं है’/41)
या,
     मैंने खिड़कियाँ खोल दी हैं
     खोल दिए हैं रौशनदानों के पट
     सारा घर रौशनी से भर गया
     सुवासित हो गया तुम्हारी सुगंध से
     दरवाज़े भी खोल देता हूँ
     खिड़कियों से जो दिख रहा है
     जंगल पहाड़ नदियों का दृश्य
     शायद आ जाए भीतर
     सजा लेना चाहता हूँ
     अपना पूरा घर
     मैं दरवाज़े खिड़कियों पर परदे नहीं लगाता(‘मैंने खिड़कियाँ खोल दी हैं’/42)।
कुँवर रवीन्द्र जिन बिंबों को अपनी कविताओं का हिस्सा बनाते हैं, ये सारे बिंब मरुस्थल में हरी दूब की तरह हैं। ये सारे बिंब सभी सामाजिक के जीवन-कैनवास से जीवन के रंगों, रेखाओं को लेकर ही बनाए गए हैं। इन बिंबों में बेतरतीबी कहीं दिखाई नहीं देती बल्कि ये सारे बिंब एकदम कुँवर रवीन्द्र की कविताओं में तरतीब के साथ आकर बैठ गए लगते हैं। इन कविताओं के पाठकों को भी पता है कि कुँवर रवीन्द्र की कविताएँ ऐसी हैं कि कोई बीमार आदमी इन कविताओं को पढ़कर बिस्तर से उट्ठे और किसी अपने दोस्त-अहबाब से मिलने के लिए भाषा की ताज़गी के साथ चल पड़े। यह सच है कि कुँवर रवीन्द्र की कविताएँ आपको वहीं पर छोड़ती हैं, जहाँ आप किसी को मुहब्बत से गले लगा लेते हैं, तो किसी तानाशाह को देवता मानने से इनकार भी कर देते हैं :

     देखा है तुमने
     हरित लबादा ओढ़े
     जलती हुई धरती पर
     गर्मियों में लू के थपेड़े खाते
     पलाश का जंगल
     जैसे दुर्दिनों में भी
     रच रहा हो सपने(‘भूपेन हज़ारिका’/52)।
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‘रंग जो छूट गया था'(कविता-संग्रह)
कवि : कुँवर रवीन्द्र
प्रकाशक : अनंग प्रकाशन, बी-107/1, गली मंदिर वाली,
समीप रबड़ फैक्ट्री, उत्तरी घोंडा, दिल्ली-110053
मूल्य : 120₹।

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