मुझमें कुछ है जो आईना-सा है : परदे में छिपी आवाज़ को बाहर लातीं ग़ज़लें

पुस्तक-समीक्षा

शहंशाह आलम

भारतीय हिंदी ग़ज़लकारों में ध्रुव गुप्त बहुत ही इज़्ज़त और मुहब्बत से लिया जानेवाला नाम है। इसका मुख्य कारण ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हैं, जो पाठ के समय कुछ ऐसा अद्भुत समा बाँधती हैं, जैसे किसी बहती हुई नदी को आप बारिश के वक़्त देखते हैं। बारिश के वक़्त नदी की जो असली ख़ूबसूरती उभरकर सामने आती है, उसके तसव्वुर मात्र से मन में जो रागात्मकता जन्म लेती है, ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें कुछ वैसा ही आभास दिलाती हैं। मेरी मान्यता है कि ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें ग़ज़ल के बारे में एक नई समझ विकसित करती हैं। नई गहराई और नई समझदारी भी। हिंदी के बहुत सारे शायरों की तरह ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें अधोलोक से आई हुई ग़ज़लें नहीं होतीं बल्कि इनकी ग़ज़लें बिना किसी लाग-लपेट के सीधे इनके दिल से निकली हुई होती हैं :

सबने दो-चार हर्फ़ लिख डाले,

     मेरे चेहरे में अब मेरा क्या है।

या,

घर मेरे दिल में भी रहा न कभी,

     घर में मैं भी ज़रा- सा रहता हूँ।

या,

     सारी नज़रों से दरकिनार हुआ,

     मैं गए वक़्त का अख़बार हुआ।

ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हमें एक नए घर में प्रवेश कराती हैं, एक ऐसे नए घर में, जहाँ से आपको वापस लौटने की इच्छा नहीं होती। इसलिए कि ध्रुव गुप्त का जो ग़ज़ल-संसार है, उसकी आभा जीवन के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। जबकि जीवन को हमारे वक़्त के माननीय जटिलताओं से भर दे रहे हैं। आदमी को मांसहीन बना रहे हैं। इस पर बार-बार विचार किया जाना चाहिए कि मनुष्य को जो कुछ अच्छा और बढ़िया चाहिए, वह किस समय-काल में मिलेगा :

  पाँव में अपने छाले हैं, या,

     टुकड़ा-टुकड़ा आसमान है।

ध्रुव गुप्त की ग़ज़लें हों अथवा कविताएँ, दोनों ही में हम पाते हैं कि वे परदे में छिपी हुई आवाज़ को मुखर करते हैं, अपनी आवाज़ की ताक़त भर देते हैं, जिससे मांसहीन आदमी भी अपनी आवाज़ में एक नई तरह की ऊर्जा महसूस करता है माननीयों के विरुद्ध खड़ा होते हुए, अपने कठिन दिनों के विरुद्ध खड़ा होते हुए। इस तरह ध्रुव गुप्त ग़ज़ल सिंफ़ (विधा) को एक अलग तरह की ऊँचाई प्रदान करते हैं। इनकी ग़ज़ल-प्रतिभा की संपन्नता हमें चकित करती है। इनकी ग़ज़लों में अभिव्यक्त यथार्थ भी थोड़ा अलग है। थोड़ा भिन्न है :

  अख़बार देखकर अभी अफ़सोस है जिन्हें,

     वो अपने घर में बंद थे जब हादसा हुआ।

ध्रुव गुप्त मानवीय मूल्यों के प्रति सिर्फ़ अपनी रचनाओं में ही नहीं, अपने निजी जीवन में भी सचेत रहे हैं। यहाँ मैं ज़्यादा इस बात पर ज़ोर देकर कहना चाहूँगा कि ध्रुव गुप्त अपने रचना-कर्म से अधिक जीवन-कर्म में मानवीय मूल्यों को स्थापित करते रहे हैं। यही कारण है कि जिस तरह इनके निजी जीवन में किसी तरह का झोल-झाल नहीं रहा, उसी तरह इनकी रचनाओं में किसी तरह का झोल-झाल दिखाई नहीं देता। और न किसी तरह का जाल दिखाई देता है। मेरा यह कथन इनकी सद्य: प्रकाशित ग़ज़लों और नज़्मों की किताब ‘मुझमें कुछ है जो आईना-सा है’ में छापी गईं सारी ही ग़ज़लों और नज़्मों में हम किसी आईने की तरह साफ़-साफ़ देख सकते हैं। जबकि आज दिलों के आईने गर्द-गुबार से भरे पड़े हैं :

काश, ऐसा हो कि हम

     लौट चलें दश्त में फिर

     न कोई फ़िक्र हो कल की

     न उलझनें, न सितम

     भूख भर रोटी हो

     और आँख भरके हरियाली।

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मुझमें कुछ है जो आईना-सा है(ग़ज़लें और नज़्में)

शायर : ध्रुव गुप्त/

प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन,7/31, अंसारी मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110 002/

मूल्य : 250₹/

आवरण : के रवीन्द्र।

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1 Response

  1. satyadeo jangid says:

    बहुत ही शानदार समीक्षा…जनाब शहन्शाह आलम साहब।उनकी कविताओं,ग़ज़ल और समसामयिक घटना आदि पर फेसबुक पर की गई बेबाक, तथ्यात्मक टिप्पणियों का कायल हूँ। मुझमें कुछ है जो आईना सा है में ग़ज़लें वाकई शीर्षक को सार्थक करती सी हैं।बहुत ही शुक्रिया…
    ख़्वाब जे दरवाजे खटका कर देखेंगे
    मन का कोना-कोना जाकर देखेंगे…

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