मुझमें कुछ है जो आईना-सा है : परदे में छिपी आवाज़ को बाहर लातीं ग़ज़लें

You may also like...

1 Response

  1. satyadeo jangid says:

    बहुत ही शानदार समीक्षा…जनाब शहन्शाह आलम साहब।उनकी कविताओं,ग़ज़ल और समसामयिक घटना आदि पर फेसबुक पर की गई बेबाक, तथ्यात्मक टिप्पणियों का कायल हूँ। मुझमें कुछ है जो आईना सा है में ग़ज़लें वाकई शीर्षक को सार्थक करती सी हैं।बहुत ही शुक्रिया…
    ख़्वाब जे दरवाजे खटका कर देखेंगे
    मन का कोना-कोना जाकर देखेंगे…

Leave a Reply