पीड़ा और प्रेम की अजस्र धारा वाली ‘एक नदी जामुनी सी’

पुस्तक समीक्षा

सुशील कुमार

मालिनी गौतम अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका होते हुए हिंदी में लिखती हैं जो हिंदी के लिए एक बड़ी अच्छी बात है। गजल-संग्रह के बाद बोधि प्रकाशन से 2016 में उनकी एक कविता की किताब *एक नदी जामुनी सी* आई है। पूरे संग्रह से गुजरने पर मुझे अनुभव हुआ कि यह कवयित्री स्वयं एक नदी सी है जिसके भीतर पीड़ा और प्रेम की अजस्र धारा बहती है – ‘अधपके जामुन के रंग वाली उस नदी सी’ जिसमें खोए हुए प्रेम को पाने की अदमित इच्छा की उब-डूब है। एक अनवरत खोज है। वेदना की कचोट प्रेम-सम्वेदना को उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि में रूपायित कर उसे महत्वपूर्ण बनाती है। यहाँ प्रेम का सन्दर्भ फूहड़ नहीं ; सामाजिक अंतर्विरोधों का एक निरभ्र काव्याकाश रचती है-
रात की बासी रोटी और साग
बच्चों के हाथों में देते हुए
उसके चेहरे पर
अपना घर बना चुकी
चिंता की रेखाओं में से
कम हो गयीं थी दो-चार रेखाएँ
सवेरे के खाने का जुगाड़ जो हो गया था
पर नहीं जानती थी कमली
कि जिस पल में खुश हो रही थी
आसमान के काले बादल
उसी पल सेंध लगा रहे थे
उसकी खुशियों में
और रात चोरों की तरह टपकने लगे
टूटे हुए खपरैल से /( कविता ‘बदकिस्मती की लकीरें’)
संकलन की कविताएँ पढ़ते हुए महसूस होता है कि गुजरात के सुदूरवर्ती इलाके में , आदिवासी परिवेश में लंबे समय से रहते हुए कवयित्री ने जिस विकट परिस्थितियों का साक्षात्कार किया और भोगा है , वह उनकी सामाजिक चेतना को उसी दिशा में पल्लवित करती है , जो उनकी कविता में आकर जीवंत हो उठती है। यही उनकी कविता की प्राण है। स्त्री:दुःख का आर्तनाद इनकी अभिव्यक्ति का मुख्य स्वर होते हुए भी उसके कई स्तर हैं इन कविताओं में। देखिए एक कविता *सजा एक अपराध की * : ‘ लड़कियां कटती हैं/खेत में खड़ी फसलों की तरह/ खटती हैं मशीनों के कलपुर्जों की तरह/ कच्चे सूत सी/काती जाती है चरखों पर / कच्ची हांडी सी/ चढ़ाई जाती है आँच पर /
मालिनी गौतम का स्त्री-कवि जीवन के जिन अंतर्विरोधों को झेलती है , उसका विस्तार केवल कवयित्री के अंतःकरण तक ही नहीं हुआ है बल्कि उसका व्यापक सामाजिक- राजनीतिक संदर्भ भी है जिसका रेखांकन उनकी एक कविता *एक और 15 अगस्त * में भी शिद्दत से हुआ है। इस कविता में गांव की एक वृद्धा पूछ रही है कि ‘भैया जे आजादी का होवे है” । और आगे , “दु:शासन का अट्टहास / अब किसी को सुनाई नहीं देता/ हर रोज होता है/ एक द्रोपदी का वस्त्रहरण /इस बार तो दुर्योधन की / जंघा भी हो जाएगी वज्र की”
इसी प्रकार संग्रह की एक महत्वपूर्ण कविता है- “चांद के साथ ” / इस कविता में कवयित्री ने चंद्रमा को देखने के बहाने जीवन के अंतर्द्वंद्व और उसकी विषमताओं से उद्भूत जिन विभिन्न सामाजिक अंतर्दशाओं का चित्रण किया है , वह हमारे मन को भीतर तक आलोड़ता है। कविता में बचपन का चांद वह चांद नहीं है जो किसी के यौवन का चांद होता है । फुटपाथ पर हथेलियाँ फैलाए, भीख मांगते बच्चों के लिए उनकी गोल-गोल रोटियां ही उनका चाँद हैं। शराबी पति की मजदूरिन ‘कम्मो’ (नाम) के माथे पर चमकती बड़ी लाल- सी बिंदी ही उसका चांद है। यही चांद चौकीदार की जवान बेटी लाजो के लिए उसका समय बर्बाद करता है और वह अपने चांद से निराश हो चुकी है , जबकि खेत में काम करती किसान की एक सांवली लड़की को चांद देखने का फुर्सत ही नहीं क्योंकि उसके धान के हर क्यारे में एक चांद चमक रहा है। कविता में कवयित्री के वस्तुगत दृष्टिकोण की वर्गीय अभिव्यक्ति पूरी सफलता से हुई है और अलग से विश्लेषण की माँग करती है । यह चाँद प्रेम की विलास- कुंठा से अलग , सामाजिक वैषम्यता का जो बहुविध स्वरूप रचता है , उसमें कवियित्री की काव्य-प्रतिभा से आप बिना प्रभावित हुए नहीं रह सकते । लगभग 60 कविताओं के इन संग्रह में बहुत सारी कविताएँ महत्वपूर्ण हैं जिनमें कुछ का मैं अवश्य उल्लेख करना चाहूंगा – विशेष रूप से – *प्रेम में होना*, * पत्थर से भगवान तक * , *एक औरत की बेईमानी * , *बोनजाई* और *हार द्रोणाचार्य की* का। कुल मिलाजुला कर यह कहा जा सकता है कि कवयित्री मालिनी गौतम ने अपने इस पहले काव्य संग्रह से ही हिंदी जगत में स्त्री विषयक अंतर्वस्तु से सिक्त सामाजिक चेतना की सहज-संश्लिष्ट कविताओं का जो दस्तक दिया है, वह उनके कविता-फलक को भविष्य में और भी गहनता और सफलता से सामने लाएगा, इस संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, मै बहुत-बहुत शुभकामनाएं प्रेषित करता हूँ इस अत्यंत संभावनशील कवयित्री को।
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{एक नदी जामुनी-सी : बोधि प्रकाशन, जयपुर से प्रकाशित : पेपरबैक संस्करण-मूल्य रु. 100.00 : 112 पृष्ठ}

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