अख़बारी नरक की आधी हक़ीक़त

लघु उपन्यास : आधी हक़ीक़त
लेखक : शैलेंद्र शान्त
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन
मूल्य : 80 रुपए

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

दूर से जो चीज़ बहुत खूबसूरत और आकर्षक लगती है, जरूरी नहीं कि नजदीक जाने पर भी वो वैसा ही लगे। पत्रकारिता के साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। वरिष्ठ पत्रकार-कवि शैलेंद्र शांत ने अपने लघु उपन्यास ‘आधी हक़ीक़त’ में दूर के इसी ढोल की सच्चाई का पर्दाफाश किया है। अख़बारी ज़िन्दग़ी के उस नरक को दिखाया है, जिसे सिर्फ़ अख़बार में काम करने वाला ही जानता और भोगता है।

शैलेंद्र जी को मैं व्यक्तिगत रूप से जानता हूं। उनकी पत्रकारिता से भी अवगत हूं और उस संस्थान और वहां के लोगों से भी, जहां से अब वो रिटायर हो चुके हैं। इसलिए ‘आधी हक़ीक़त’ में जितनी भी हक़ीक़त है, उसे मैं जानता हूं। इसलिए जब मैं यह उपन्यास पढ़ने बैठा, तो उसके एक-एक शब्द के साथ मैं कोलकाता के सफ़र पर निकल पड़ा। लगा कि मैं उपन्यास पढ़ नहीं रहा बल्कि उनके दफ्तर या अख़बार के अपने उस दफ़्तर में बैठकर (जहां मैं काम करता था) वो सब कुछ सजीव देख रहा हूं, जो शैलेंद्र जी बता रहे हैं। पत्रकारिता के नाम पर एक ऐसी नारकीय ज़िन्दग़ी, जिससे निकल भागने का मन हर वक्त करेगा।

बुद्धिजीवी का चोला ओढ़कर बैठने वाले लोगों का वह ठिकाना, जहां केवल सियासत होती है, जहां केवल गुटबाजी होती है। ख़बरनवीसों की दिलसच्पी ख़बरों में कम तिकड़म में ज्यादा रहती है। किसे उठाएं, किसे गिराएं–इसी में सारी बौद्धिकता जाया हो जाती है। ये उन्हें भी ठीक-ठीक नहीं पता होगा कि दुनिया उन्हें बुद्धिजीवी क्यों मानती है।

ऐसा नहीं है कि यह नरक केवल कोलकाता में ही है बल्कि लोगों को नरक से निकालने, उनके साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ लड़ने का दावा करने वाला हर अख़बार अपने अन्दर इस नरक को पालता है। इसका शिकार जो होते हैं, वो शातिर नहीं होते। इस उपन्यास का हीरो भी ऐसा ही भोला इंसान है, जो सचमुच पत्रकारिता करने का सपना लेकर ही अख़बार की नौकरी करने आया था। इस नौकरी को पाने के लिए उसने कितने संघर्ष किए, अभावों के कितने दंश झेले लेकिन अन्तत: वह सिर्फ़ नौकरी ही करता रह गया। इसलिए एक दिन उसने वीआरएस लेने का एलान कर अपने तमाम ‘बुद्धिजीवी’ साथियों को चौंका दिया था। ऐसे अख़बार, ऐसे शहर और उपन्यास के हीरो जैसे किरदार हर शहर में मिल जाएंगे।

उपन्यास दिल को छूता है लेकिन इसे लघु उपन्यास नहीं होना चाहिए था। उपन्यास का कथानक और विस्तार मांग रहा था लेकिन पता नहीं शैलेंद्र जी कथानक में की इस पुकार को अनसुना कैसे कर पाए। इस कथानक अभी भी एक उपन्यास की पूरी संभावना छिपी हुई है। शैलेंद्र जी से उम्मीद की जानी चाहिए कि वो कलम चलाएंगे और पूरी हक़ीक़त सामने लाएंगे।

और अन्त में प्रकाशक को बधाई और धन्यवाद कि इतनी कम कीमत पर वो इस उपन्यास को उपलब्ध करा रहे हैं।

 

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