सादगी और आत्मीयता का पारस्परिक रचाव

उमाशंकर सिंह परमार

भास्कर चौधुरी छत्तीसगढ़ के हैँ, युवा कवि हैं, गद्य और पद्य दोनों में समान हस्तक्षेप रखते हैँ। मैंने उनका लिखा जो भी पढ़ा है, उस आधार पर मेरी मान्यता है कि भास्कर कवियों की भारी भरकम भीड़ में बड़ी दूर से पहचाने जा सकते हैं । वह इसलिए कि आज के तमाम विमर्शों व कविता के टेक्निकल , संवेगात्मक अनुकरणों से हटकर नया लिखते हैं। आज वस्तु और रूप व भाषा को देखा जाए तो थोड़ा बहुत हेर फेर के साथ कविताएँ परस्पर अनुकरण सी प्रतीत होती हैं। भाषा और वस्तु की आवृत्ति तो आम बात है ।  एक ही विषय और भाषा को रूप बदलकर नया कर दिया जाता है । यदि रूप नहीं बदला तो शब्द-संयोजन इस प्रकार करते हैं कि वस्तु या तो चमत्कार हो जाता है या फिर अमूर्त और वायावी हो जाता है । कविता लिखना है तो लिखना है। मुद्दे बहुत हैं। भाषा आभास से प्राप्त हो जाती है और प्रस्तुति का ढंग व  संवेदना इन्टरनेट और टीवी से मिल जाती है ।कविता रेडीमेड आवृत्ति बनती जा रही है ।भास्कर चौधुरी की कविताएँ इस आवृत्ति को तोडती हैं । न केवल वस्तु के रूप में बल्कि भाषा और शिल्प के लिहाज से भी आवृत्तिमूलक प्रवृत्ति को खण्डित करती हैं ।भास्कर इसीलिए कवियों की भीड़ में दूर से पहचाने जा सकते हैं ।

उनका कविता संग्रह “कुछ हिस्सा उनका भी है”    2011  में प्रकाशित हुआ था। भूमिका हमारे समय के वरिष्ठ लोकधर्मी कवि सुरेश सेन निशान्त ने लिखी है । कविता संग्रह मेरे पास है। इसे मैंने पढ़ा तो मुझे आश्चर्य हुआ। यह तो एक नये विमर्श की प्रस्तावना है । एक ऐसा विमर्श जो समकालीन अस्मितामूलक विमर्शों के दायरे में नही अँट सकता है या जिसे लकीर की फकीर अकादमिक बहसें और शोध पत्र आलोचनाएँ  नहीं अटा सकती हैं। दलित विमर्श , स्त्रीविमर्श , आदिवासी विमर्श पर खूब लिखा जा रहा है। छोटे बच्चे भी अपनी उम्र, चेतना, समझ, और शारीरिक लघुता के लिहाज से एक अस्मिता हैं । जातीय और लैंगिक विभेदों से अलग अपनी अवस्थिति में बच्चे एक वर्ग हैं ।यह संसार उनका भी है लेकिन जिस तरह का हमारा  पारिवारिक ढाँचा और सामाजिक संरचना है, बच्चों के लिए उस ढाँचे में कोई स्वतंत्र स्पेस नहीं है । वह आश्रित वर्ग है । भास्कर चौधुरी का यह कविता संग्रह बच्चों के लिए इसी स्पेस की बात करता है। उनके लिए भी हिस्सेदारी और भागीदारी का सवाल उठाता है। संग्रह की कविताओं का विषय केवल  बच्चे हैं, ऐसा नहीं है। और भी विषय हैं जैसे माँ पर कविता , पिता पर , पत्नी पर , कवियों लेखक पर ,बीड़ी,  छोटा घर , मध्यमवर्ग ,अखबार , पत्र,  युद्ध ,  सैनिक ,  मुसलमान , गाय आदि लगभग दो दर्जन विषयों पर कविताएँ हैं और अलग-अलग सवाल हैं लेकिन इन सवालों की जद में कहीं न कहीं बच्चे  सम्मिलित हैं । कहने का आशय है कि बच्चों को जीवन के वैविध्यपूर्ण सन्दर्भों में देखने की सफल कोशिश की गयी है । भास्कर के कविता संग्रह की शीर्षक  कविता शोषित और कामगार बच्चों के लिए हिस्सेदारी का सवाल है
बच्चा
जो आपके बच्चे का
ध्यान रख रहा है
घर पर आपके
गणतन्त्र दिवस तो उसका भी है
बच्ची
जो लीप रही है
आपका आँगन
गणतन्त्र दिवस उसका भी है
भास्कर की कविताएँ बच्चों पर हैं लेकिन बच्चों की कविताएँ नही हैं। ये कविताएं  प्रतिबद्ध जनवादी लोकधर्मी परम्परा की कविताएँ हैं, जो सामयिकता और वैचारिकता की मजबूत रीति की ऐतिहासिक स्वीकृति का प्रमाणन करती हैं । भास्कर चौधुरी भूमंडलीकरण के दौर के कवि हैं। वह सवालों की शिनाख्त एक नियति से बँधकर नहीं करते, न नारेबाजी की आड़ में सवालों का भारीभरकम शब्दों से शिकार करते हैं। वह आवेग और संवेदना की बौद्धिक ऊँचाइयों तक जाकर यथार्थ का काला सच उघाड़ देते हैँ ।उदाहरण के रूप में यह सदी युद्धों और संघर्षों की सदी है । धार्मिक और फासीवादी विचारों के सत्तसीन होने की सदी है । इन सभी प्रतिक्रियाओं का खामियाजा मानवता ने भुगता है और भुगत रही है लेकिन बच्चे तो बच्चे हैं, वह बेखौफ हैं कि यह सदी कितनी खौफनाक है। बच्चों की यह अनभिज्ञता उनकी अवस्थिति के साथ साथ आतंक और हिंसा पर कटाक्ष भी है
बेनजीर की हत्या के खौफ़ से बेखौफ़
सरहदों पर सैनिकों के जमवाड़े से अनजान
कराची की सड़कों पर
गलियों में, चौराहों और नुक्कड़ों में
बच्चे भाँज रहे हैं बल्ला
यह बिम्ब पाकिस्तान के कराची शहर का है लेकिन यह कहीं भी हो सकता है। हर मुल्क के बच्चे एक जैसे होते हैं ।बेखौफ इसलिए हैं कि मनुष्य की हिंसक वृत्ति से वह अनजान है । मुल्कों की आपसी राजनीति व दलों की आपसी हिंसा से वह अनजान हैं । वह अनजान हैं इसलिए कट्टरतावादी शक्तियों और शोषकों का सबसे आसान शिकार हैं बच्चे । बच्चों की यही मासूमियत उनका सबसे बडा शत्रु भी है । भास्कर कट्टरतावाद , राष्ट्रवाद व निरन्तर युद्धों के बीच फँसे बच्चों पर बड़ी शिद्दत से विचार करते हैँ । मासूमियत और अबोधपन की सूक्ष्मताओं को रेखांकित करते समय उनकी कविता में  आत्मीयता व आक्रोश का बेहतरीन आवेग प्राप्त होता है।

ये वही बच्चे हैं
जो अपनी माँओं के लिए
विमानों की जासूसी करते हैं
इन बच्चों मे होड़ लगी होती है
बमवर्षक विमानों की सूचना देने की

सैनिक और जासूस राज्य के अंग होते हैं परन्तु बच्चों की यह जासूसी उस जासूसी की अपेक्षा अलग है। यह बेखौफ जासूसी है। अपने प्रेम और जीवन को बचाने की जासूसी है कि विमान आकर कहीं हमारी माँ को मार न दे, कैद न कर ले जाए । बच्चों की यह स्थिति देखकर युद्ध के विरुद्ध घृणा का विस्तार होता है। युद्ध एक अमानवीय कृत्य है ।युद्ध बच्चों का बचपना छीनते है ।

करूणा  भारतीय रस शास्त्र का सबसे श्रेष्ठ रस है । जिस काव्य में जीवन के प्रति करुणा होती है, वही काव्य प्रगतिशील होता है । तमाम अस्मिताओँ के प्रति सकारात्मक चिन्तन इसी करुणा का निष्कर्ष है। भास्कर चौधुरी की कविताएं  करूणा का विस्तार करती हैं। करूणा को कविता का स्थाई विधान बनाते हैं। करूणा वह तत्व है जो भास्कर को वाल्मीकि से लेकर तुलसी तक की परम्परा से जोड़ देता है।

जरा देखो
उस अफगानी बच्चे की आँखें
एल्यूमिनियम की तुड़ी मुड़ी प्लेट हाथ में लिए
खड़ा हैँ पंक्ति में सबसे आखिरी
इंतजार मे सूखी रोटियों के लिए

भास्कर चौधुरी की कविताओं का लोक उनका अपना घर परिवार , माँ बाप  , पत्नी बेटी , और बच्चे हैं। जिस घर की चौहद्दी में वह रहते हैं, वहीं से कविता निचोड़ते हैं । नितान्त निजी और वैयक्तिक रिश्तों की कविताएँ हैँ । रिश्तों नातों पर कविता लिखना जोखिम का काम है । इसमें सबसे बड़ा जोखिम यह होता है कि रिश्तों की निजता अक्सर प्रतिपाद्य का विस्तार करने मेँ अक्षम होती है और दूसरा जोखिम यह की कवि रिश्तों का सार्वजनिकीकरण नही कर पाता है, जो कविता या रचना की बडी शर्त है । निजता तभी तक निजी है जब तक वह रचना नहीं होती है ।निजता जब रचना हो जाए तो उसे सार्वजनिक अभिव्यक्ति में तब्दील होना पड़ेगा ।भास्कर चौधुरी के “कुछ हिस्सा उनका भी है” में बहुत सी कविताएं निजी रिश्तों को लेकर लिखी गयी हैं यहाँ भास्कर अपने रचनात्मक जोखिम का उपचार  वैचारिकता और चरित्र की वर्गीय अवस्थिति से करते हैं । वह रिश्तों की अनुभूति तो निजी रखते हैँ लेकिन रिश्तों के व्यक्तित्व को करेक्टर मेँ तब्दील कर देते हैं । जाहिर है जब चरित्र सृजित होता है तो वह हवा में नहीं होता उसकी पहचान होती है, उसकी अस्मिता होती है, उसका स्वरूप होता है, उसकी वर्गीय स्थिति भी होती है। चरित्र आंशिक उल्लेख का नाम नहीं होता। समूची संस्कृति का वह टाइप या सामान्य प्रतीक होता है ।भास्कर चौधुरी के रिश्तामूलक चरित्र इसी कोटि के हैं। पिता पर कई कविताएं हैं और सभी कविताएं वर्गीय पहचान के साथ आती हैं, साथ वर्गीय सोच व समाजिक आयामों से जुड़े मूल्यों का क्षरण व आत्मबोध गहराई से व्यक्त होता है।

मुझे भेजते रहे
और
स्वयं खाली होते रहे
पिता आज खाली हैं
आज जब मैं
भरा हुआ हूँ

हिन्दुस्तान का हर पिता इस खालीपन से मुठभेड़ करता है। वह स्नेह और वात्सल्य से अपने आपको भरता है, मगर बच्चे का भरा होना उसे सबसे बडा सकून देता है ।यहाँ पिता का चरित्र अपने कर्म के कारण सार्वजनिक हो रहा है। वह अकेले कवि का पिता नहीं है, वह पिता की सांस्कृतिक पहचान है। यही पहचान वह पत्नी , दादी , और भाई ,और बेटी ,सबके साथ दिखाते हैं ।इन रिश्तों का सबसे खूबसूरत पक्ष प्रेम होता है। आज का समय प्रेम के विस्थापन का समय है । प्रेम की जगह अहंमन्यता और बाजार ने ले ली है लेकिन कोई भी लोकधर्मी कवि हो वह आत्मीयता का सौन्दर्य रचता है ।आत्मीयता रचनात्मकता का अहम बिन्दु होती है । भास्कर जब प्रेम कविता लिखते हैं, तो भावों आवेगों अनुभूतियों और सुकोमल संवेदनाओं की मनोहारी छटा मनमोहक होती है । यहाँ प्रेम क्रियात्मक चरम परिणिति के रूप में नहीं, जीवन के आवेगों से संचालित होता है । ऐसा प्रेम पत्नी , रजत कृष्ण , जाडा , गौरैया , माँ सिरीज की कविताओं में गहराई के साथ विन्यस्त है

वह दिखा देती है मुझे
एक पति का चेहरा
जिसके पास
कागजों में रसोईघर है
पत्नी का दर्द है कविता म़ें
पर
रसोईघर मेँ
हिस्सेदारी नहीं है
दर्द का बंटवारा नहीं है
जीवन मेँ
यहाँ पत्नी भी एक वर्ग के स्वरूप में ह़ै। वह इसलिए है कि कवि उससे प्रेम करता है। यहाँ प्रेम और वैचारिकता दोनों का समन्यजस्य पूर्ण शिल्प कविता को एक उम्दा रचना बना रहा है

भास्कर चौधुरी इक्सवीं सदी के कवि हैं इसलिए वह सपाट और सीधी अभिव्यक्ति पर विश्वास करते ह़ैं । घुमा फिरा कर कहना उनकी आदत में शुमार नहीं है। इस इक्कीसवीं सदी की शुरूआत विचारधारा और इतिहासबोध की मृत्यु उद्घोषणाओं से हुई। मनुष्य नागरिक न होकर एक उपभोक्ता है। इस संकट के दौर ने लेखन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। प्रतिक्रियावाद पहले की अपेक्षा अधिक चौकन्ना और जागरुक हो चुका है। वह उस रूप में नहीं आता, जिससे सहज पहचाना जा सके। अब वह विचारधारा और तर्क की स्वीकृतियों के दम पर आता है। इसलिए अब किसी भी लोकधर्मी कवि के लिए घुमा फिरा कर गोल मटोल कहने का समय नहीं है, सीधा और सपाट कहने का समय है । भास्कर चौधुरी की सभी कविताएँ सपाट भंगिमा में हैं। वह अपने अर्थ पर और मन्तव्य पर किसी तरह का कोई संकट खड़ा नहीं करती हैं । कवि समय के सवालों से भाषा की आड़ लेकर मुठभेड़ नहीं करता। वह सीधे टकराने की मुद्रा में व्यूह रचता है । मैं मुसलमान हूँ , और रिश्ते ये दो कविताएँ की सामाजिक समरसता और गंगा-जमुनी तहजीब के लिहाज से बेहतर कविताएँ हैं। इन दोनों कविताओं में उस वैचारिक निर्मिति का विरोध है, जिसके द्वारा अल्पसंख्यक समुदाय को धर्म के कारण खलनायक बना देने की प्रतिक्रियावादी रीति है । प्रतिक्रियावाद विचारधारा और लोकतंत्र दोनों को अपदस्थ करता है। यह कवि की चिन्ता है, साथ ही कवि इन सामयिक मुद्दों पर बेबाक राय रखते हुए आभासी और जादुई यथार्थ से निकल कर वास्तविक यथार्थ पर अपना अभिमत रखता है ।
भास्कर चौधुरी का कविता संग्रह ‘कुछ हिस्सा उनका भी है’  एक नजरिए और एक मुद्दे पर केन्द्रित नहीं है, वह बहुआयामी अवधारणाओं का संग्रह है। आजकल की कविताओं में इफरात फैले हुए आभासी चित्रों का बड़ी साफगोई और प्रमाणिकता के साथ खण्डन है । इस आभास से टकराना आज का बेहद ज्वलन्त मुद्दा है । वित्तीय पूँजी और उसके द्वारा अधिकृत लोकतान्त्रिक संस्थाओं ने जनता को  हमेशा आभास में रखने की कोशिश की है। कवि का यह सामाजिक दायित्व है। इस आभास की विसंगतियों को उजागर करे और जनविरोधी मूल्यों का प्रतिरोध करे। यही कारण है आज की कविता प्रतिरोध की कविता कही जाती है । भास्कर की उन कविताओं में, जो स्वतन्त्र विषय को लेकर लिखी गयी हैं, प्रतिरोध को देखा जा सकता है । जैसे अखबार कविता ,  जरूरतें , बाढ़, छोटा घर , कवि ,लेखक , सैनिक आदि में वह अपने समय की असंगतियों को बड़ी बेरहमी से चिन्हित करते हैं । यहाँ प्रतिरोध एक चेतना है, एक मकसद है वह फैशनेबुल और रेडीमेड नहीं है। वह आत्मीयता और लगाव की अनिवार्य परिणिति है । इसलिए भास्कर चौधुरी सवालों पर केन्द्रित रहकर समालोचन की अपेक्षा असंगति पर चोट करते है। असंगति पर प्रहार से ही प्रतिरोध। प्रतिपक्ष का मुखौटा उघाड़ने लगता है । ऐसी कविताओं में मध्यमवर्ग कविता बेहतरीन है। यह कविता तथकथित भारतीय समाज का सच बयाँ करती है। मध्यमवर्ग को मार्क्स ने दोगला कहा था । मध्यमवर्ग सर्वहारा होकर भी क्रान्तिविरोधी होता है । लेकिन हिन्दुस्तान का मध्यमवर्ग सर्वहारा नहीं है, वह शक्तिशाली है इसीलिए वह पूँजीवाद का सबसे बडा सहयोगी बनकर उभरा है
मध्यमवर्ग आटा गूँथने रोटी बेलने और सेंकने
वेट लिफ्टिंग , वजन कम करने
और जागिंग मशीनें खरीद रहा है
गाँवों  को कस्बा
कस्बे को नगर
नगरों को महानगर बना रहा है
बोतलों में पानी पी रहा है
और पानी बहा रहा है

भास्कर चौधुरी की कविताओं का कहन समय और इतिहासबोध के साथ ही परखा जा सकता है। यहाँ कविता ने अपने साज सज्जा वाले आवरण को लगभग उतार दिया है और समाज व राजनीति की विसंगतियों की विकृतियों की ओर अपना ध्यान बड़ी शिद्दत से खींचा है। इस ध्यान में कहीं भी किसी अखबारी भाषा का छलपूर्ण अनुकरण नहीं है। काव्य का तेवर बदला है। कविता का मिजाज बदला और विमर्श का का नया विषय प्रस्तावित हुआ है । इन सब बदलावों को रूढ़ काव्यभाषा में नहीं व्यक्त किया जा सकता। अस्तु भास्कर चौधुरी ने बोलचाल की भाषा को काव्यभाषा बनाया है। अपनी इस भाषा के कारण वह जनजीवन की अवस्थितियों का  प्रमाणिक वर्णन कर पाते हैं  इन कविताओं मे प्रतिरोध की वैविध्यपूर्ण अवस्थितियों के साथ साथ सादगी का भी सौन्दर्य विन्यस्त है । जो आज की युवा पीढी की मुख्य पहचान है और समकालीन लोकधर्मी कविता का प्रस्थान बिन्दु है ।

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