इस संसार को देखने की समझ देती कविताएँ

पुस्तक-समीक्षा

शहंशाह आलम

हर कवि अपने समय को गहराई में जाकर सुनता है, तब अपने सुने हुए समय को एकदम विलक्षण प्रकट करता है। सच्चाई यही है, कवि के समय में जो कुछ घटित हुआ होता है, हर कवि उसी घटे हुए के प्रभाव में होता हुआ ख़ुद को रचनारत रखता है। शिवनारायण जी ऐसे ही कवियों में हैं। उनका सद्य: प्रकाशित कविता-संग्रह ‘दिल्ली में गाँव’ की सारी ही कविताएँ अपने पाठ के समय यही एहसास कराती हैं। शिवनारायण उस जमात के कवियों में हैं, जो आम जन के निकट जाकर उन्हीं की बातें करने में विश्वास रखते हैं, घनीभूत रूप में। हम कह सकते हैं कि शिवनारायण मानुष से प्यार करनेवाले कवि हैं। यही कारण है कि कवि दिल्ली जाता है तो उन मानुषों की तलाश में लग जाता है, जो उसी के गाँव के होते हैं और दिल्ली में रोज़ी-रोटी के लिए जी रहे होते हैं :

     जब कभी दिल्ली जाता हूँ

     अनगिन व्यस्तताओं के बीच भी

     निकाल ही लेता हूँ समय

     सुंदर से मिलने का (दिल्ली में गाँव/पृ.11)।

मेरे विचार से किसी भी कवि के भीतर जो दुर्लभ छुपा होता है, वह यही है कि शब्द की क़ीमत वह पहचान रहा होता है। समय जितना यातनापूर्ण होता जाता है, हर कवि उतना ही उस यातनापूर्ण समय के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है। इसलिए हम जिस समय को जी रहे होते हैं, उस समय में घृणा को जनतंत्र का हिस्सा बनाकर पेश किया जा रहा है और यह दुखद है जबकि किसी भी जनतंत्र में प्रेम की, सौहार्द की जलधारा बहनी चाहिए :

     उसने निर्मम गाली-गलौज के साथ

     किया था मेरा अपमान

     भीड़ देखती रही सब

     किसी ने कुछ नहीं कहा उससे

     मैं अपने अपमान का प्रतिकार करता रहा

     और वह धमकी देता फ़ुर्र हो गया(भीड़ की चुप्पी/पृ.26)।

तोदयुश रौज़ेविच ने कभी लिखा था : ‘खेद की बात है कि तथाकथित मानवता कितनी तत्परता से उस विवेक को तज दे रही है जिसे इतनी कठिनाई के साथ हासिल किया गया था।’ ऐसी ही चिंता शिवनारायण अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त करते रहे हैं। आज समाज में जो कुछ दिखाई देता है, भ्रामक ही दिखाई देता है। वह चाहे मानवता-मनुष्यता हो या फिर प्रेम-प्यार हो या फिर स्वभाव-स्वभाषा हो, सबकुछ ही उलट-पुलट दिखाई देता है :

     हर आमो-ख़ास सन्नारियों को

     इत्तिला दी जाती है कि

     दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों

     एक भूतपूर्व पुलिस अधिकारी

     जो अपने को हिंदी का समालोचक बताता है

     सुंदरियों के प्रेमपत्र लिए घूम रहा है(दिल्ली की सड़कों पर/पृ.17)।

इन दिनों दिन की गाथा हो अथवा रात की, इन गाथाओं में मनुष्य की हँसी, मनुष्य का चैन-सुकून सब ग़ायब दिखाई देता है। हमारी आँखों में जो-कुछ रच-बस रहा है। हमारी ध्वनियों से जो भी स्वर बाहर आ रहा है, वह डरा, हारा, सहमा ही दिखाई देता है। लेकिन रचनाकार  कोई भी हो, ज़िन्दगी से अच्छा चुनना जानता है :

     बेमतलब जीने में

     कई बार सृजित हो जाती है

     मतलब की दुनिया

     जैसे ममल ख़ाँ के

     स्याह अँधरे जीवन में

     फैल गया था उजास

     लैलख के प्रेम का(लैलख ममल ख़ाँ/पृ.32)।

‘दिल्ली में गाँव’ में शिवनारायण की लगभग चालीस कविताएँ शामिल की गई हैं। इससे पूर्व शिवनारायण के दो अन्य कविता-संग्रह, ‘काला गुलाब’ और ‘सफ़ेद जनतंत्र’ प्रकाशित हुए हैं। ‘दिल्ली में गाँव’ की कविताएँ पहले के दोनों कविता-संग्रह से थोड़ी ज़्यादा इस मायने में अलग हैं, क्योंकि ‘दिल्ली में गाँव’ की कविताएँ जीवन के क़रीब अधिक दिखाई देती हैं। इसमें जहाँ ‘मलाल की आवाज़’ और ‘निर्भया’ जैसी कविताएँ हमें एक नए उद्देश्य से जोड़ती हैं, वहीं ‘मीना माँझी’, ‘बाला मुस्करा रही है’ आदि कविताएँ हमें इस संसार को कुछ अलग तरह से देखने की दृष्टि देती हैं। मेरा मानना है कि जैसे किसी अपने से लपककर मिलते रहे हैं, वैसे ही शिवनारायण की कविताएँ आपकी तरफ़ लपकती हुई दिखाई देती हैं, अपनों की तरह।

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दिल्ली में गाँव/कवि : शिवनारायण/प्रकाशक : संजना प्रकाशन, डी-70/4,

अंकुर एन्कलेव, करावल नगर, दिल्ली-110 094/मूल्य : 250₹

 

 

 

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1 Response

  1. c s menon says:

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