आज का सच दर्शाती कहानियां

पुस्तक समीक्षा

पुस्तक: किस मुकाम तक

 लेखक: हरियश राय

 प्रकाशक:प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली

 मूल्य: ₹250

 पृष्ठ: 128

  डॉ. नितिन सेठी

        आज की कहानी बदलते जीवन और समाज पर पड़ने वाले विभिन्न प्रभावों की पड़ताल करती है। विज्ञान के युग में जहां हजारों ऐप्स और गैजेट्स ने हमारी मुश्किलें आसान की हैं, वहीं कुछ अनजानी-सी समस्याएं भी उत्पन्न की हैं। हमारा आपसी सौहार्द, मेलजोल, संग-साथ सब कुछ छूटता जा रहा है। समय के बहाव और बदलाव के साथ-साथ हमारी जीवनशैली भी बदल रही है। भागदौड़ के इस दौर में हम स्वयं नहीं जानते कि यह ‘वाइल्ड गूज चेज़’ हमें किस मुकाम तक पहुंचाएगी। समाज के ऐसे रूपों के चित्रण समसामयिक अनेक कहानियों में किए गए हैं।

हरियश राय अपने नवीनतम कहानी संग्रह ‘किस मुकाम तक’ में कुछ ऐसी ही भावभूमि की कहानियां लेकर हमारे समक्ष आते हैं। रिश्तों का बिखराव, कामकाज का बोझ, दो वक्त की रोटी कमाने की जद्दोजहद –ये सब मिलकर ‘इस मुकाम तक’ संग्रह की कहानियों का ताना-बाना बुनते हैं। हरियश राय इन कहानियों में केवल कहानी ही नहीं कहते अपितु इसके छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, हैरान-परेशान पात्रों के चरित्र से इनका मनोविज्ञान भी पाठक के समक्ष लाते हैं। संवेदना और विचारधारा से समन्वित ये कहानियां आज की कहानियां कही जा सकती हैं।

‘चीलें’ में प्राची,अमृता ,अनमोल जैसे पात्रों के माध्यम से समाज की अलग-अलग परिस्थितियां दिखलाई गई हैं। चालीस वर्षीय प्राची सोनवरकर एक एमएनसी में तैनात हैं और अब तक अविवाहित हैं। अनमोल अपनी पत्नी से परेशान है। उसकी पत्नी ने उससे तलाक़ चाहा है, वहीं अमृता का पति उसको घर से निकालने पर तुला हुआ है। तीन अलग-अलग चरित्रों के माध्यम से हम वैवाहिक जीवन और उससे उत्पन्न चाही-अनचाही परिस्थितियों को देखते हैं प्रस्तुत कहानी में। ‘चीलें’ कहानी में प्रतीक रूप में आई हैं। कहानी के सभी पात्र जैसे अपनी-अपनी नियति का शिकार हैं और उनकी नियति चील की तरह उन पर झपट पड़ी हैं। धार्मिकता का ताना-बाना इतनी मजबूती से समाज को जकड़े हुआ है कि इससे बाहर निकल पाना संभव नहीं। धर्म तो वह है जो अपने व्यवहार में लाया जाए न कि जिसका प्रदर्शन किया जाए, लेकिन दुर्भाग्य से आज मानव-सभ्यता धर्म का अर्थ केवल बाहरी आडम्बरों और उसके दिखावों तक ही सीमित रखे हुए है। ‘इससे बेहतर ही’ कहानी के अंबिकाप्रसाद इसी बात को लेकर व्यथित हैं और सोचते हैं कि अब जो भी धर्म होगा, उसके मानने वाले होंगे; वे इससे बेहतर ही होंगे।सोसाइटी में एक मंदिर का निर्माण होना है जिसके लिए कुछ लोग अंबिकाप्रसाद से चंदा मांगने आए हैं। अंबिका प्रसाद अपनी कल्पना से चंदा मांगे जाने से लेकर उस मंदिर के निर्माण तक और उसके बाद होने वाली तरह-तरह की गतिविधियों और  धार्मिक क्रियाकलापों का खाका भी खींचते दिखते हैं और उनका वास्तविक रूप दर्शाते हैं। अंबिकाप्रसाद का सोचना सही है,  “अब जो लोग भविष्य में आएंगे उनके लिए मंदिर बनाना जरूरी नहीं होगा। जागरण -सत्संग जरूरी नहीं होंगे। वे कुछ हटकर सोचते होंगे। कुछ अलग तरीके से सोचेंगे।”

‘इस मुकाम तक’  कहानी शीर्षक कहानी है जिसमें अस्पतालों और चिकित्सा जगत का नंगा सच दिखाया गया है।अस्पताल किस तरह लूट का जरिया बने हुए हैं, यह ‘ किस मुकाम तक’ कहानी का केंद्रीय भाव है। अस्पतालों का जालतंत्र इतना फैला हुआ है कि उस अस्पताल में अफगानिस्तान से भी मरीज अपना इलाज कराने आते हैं। अस्पताल की संवेदनहीनता और धन-लोलुपता की अच्छी पोल खोलती यह कहानी इस संग्रह की एक महत्वपूर्ण कहानी है। लोभ-लालच हमें किस मुकाम तक लेकर आए हैं, यहां दर्शनीय है।

कॉरपोरेट जगत के कारनामे किसी से छिपे नहीं हैं। अपना माल बेचने और दूसरे को बेवकूफ बनाने की कला–ये दोनों ही कॉरपोरेट सेक्टर की वास्तविक पहचान कहे जा सकते हैं। ‘ कोई इस तरह भी’ कहानी में किरीट दलाल, लोचन पसरीचा नाम के व्यक्ति को सेवानिवृत्ति के बाद बीमा एजेंट के रूप में नौकरी देना चाहता है। उन्हें अपनी मीठी-मीठी बातों में फंसा कर किरीट दलाल उनके घर तक भी पहुंच जाता है लेकिन लोचन पसरीचा यहां व्यावहारिकता से काम लेते हैं।सेवानिवृत्ति के बाद अब वे किसी भी प्रकार की कंपनी में काम करना नहीं चाहते। उनका पूरा जीवन ही कंपनियों के टारगेट पूरे करते-करते बीता है। अंत में किरीट दलाल को अपने अकाट्य तर्कों से वे निरुत्तर कर देते हैं। जीवन की अंधी दौड़ और अथाह पैसा कमाने की होड़ को लोचन पसरीचा किरीट दलाल को अपने दृष्टिकोण से समझाते हैं।

          गरीबी इंसान को मजबूर कर देती है बहुत दूर तक भागदौड़ करने के लिए। एक समय ऐसा आता है कि दौड़ते-दौड़ते, चलते-चलते भी हमें आगे कोई मंजिल नहीं मिलती और हमें लगता है कि हम चल रहे हैं बंद रास्तों पर। ‘बंद रास्तों पर’ कहानी इसी पृष्ठभूमि की कहानी है, जिसमें मालकिन रचना सेठी और उनकी नौकरानी सुमंगला का चित्रण किया गया है ।रचना सेठी सुमंगला को दिनभर डांटती- टोकती- मारती रहती हैं। सुमंगला को अपनी गलती का भी पता नहीं होता। आखिरकार सुमंगला काम छोड़कर दूसरे काम तक पहुंच जाती है लेकिन फिर वही स्थितियां उसके सामने हैं। नए काम पर और भी नए रूपों में समस्याएं और दुश्वारियां हैं।सुमंगला को लगता है कि गरीब की ज़िंदगी इन्हीं बंद रास्तों पर ही चलने के लिए बनी है।

             ‘उन्हें बाघ खा जाए’ कहानी एक रोचक कहानी है जिसमें देवयानी और उसके स्वार्थी पिता की पारिवारिक स्थितियों का चित्रण किया गया है। देवयानी के पिता अपने स्वास्थ्य के कारण देवयानी का विवाह नहीं होने देते। पुरुषप्रधान समाज का कड़वा सत्य इस कहानी में द्रष्टव्य है ।अकेली लड़की अनेक परिस्थितियों से जूझते हुए किस तरह अपनी राह बनाती है, देवयानी के चरित्र से सीखा जा सकता है। ‘साइलेंट किलिंग’ पुनः रिश्तों के स्वार्थ को बयां करती है ।’उन्हें बाघ खा जाए’ में जहां स्वार्थी पिता और पुत्री को केंद्र में रखा गया है ;वहीं साइलेंट किलिंग में पति-पत्नी के माध्यम से रिश्तों का खोखलापन दर्शाया गया है। इरा मेहरा ब्रेन ट्यूमर की मरीज हैं। उनके पति राजीव लोचन अपने पारिवारिक मोह में उनका यथोचित ध्यान नहीं रख पाते। आज जीवन के अंतिम क्षणों में स्वयं अस्पताल के डॉक्टर ही राजीव लोचन को उनकी पत्नी की इस दयनीय स्थिति का जिम्मेदार बताते हैं। डॉक्टर इसे एक साइलेंट किलिंग का नाम देते हैं। कहानी अपने शीर्षक से ही बहुत कुछ कह जाती है यहां। केवल इरा मेहरा की ही साइलेंट किलिंग नहीं है यहां बल्कि उनके सपनों, उनके विश्वास और उनकी मानवीयता की भी साइलेंट किलिंग है।

              आज का परिवेश शिक्षा को केवल हाई लिविंग स्टैंडर्ड और ढेर सारा धन दौलत कमाने का माध्यम मानता है। आपसी प्यार और व्यवहार, प्रोफेशनल होते समाज में जैसे पूरी तरह खत्म हो गये  हैं। प्रेमप्रकाश जी का बेटा सौरभ पिछले अनेक वर्षों से अमेरिका में डॉक्टर बनकर रह रहा है और अपने बूढ़े माता-पिता को भूल गया है। प्रेमप्रकाश और उनकी पत्नी जीवन के अंतिम क्षणों में भी सौरभ की यादों और बातों से ही सुवासित हैं। अपनी बेटी द्वारा किए गए सेवा-सुश्रुषा के कार्य उन्हें याद नहीं रहते। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के शेर  ‘इक तेरी दीद छिन गई मुझसे’ को हरियश राय ने कहानी का शीर्षक बनाया है।जीवन की अंतिम अवस्था में भी माता-पिता किस तरीके से अपने बच्चों को याद करते हैं लेकिन प्रवासी पुत्र-पुत्रियां मानो उन्हें भूल ही जाते हैं।

         लेखक अपने साहित्य में समाज के कड़वे सच को भी दिखाता है ।उसके आसपास होती अनेक घटनाएं उसे एक ऐसा क्लू दे जाती हैं जिसकी नींव पर वह अपनी कहानी का भवन तैयार करता है ।’आसिया नूरी गुमसुम हैं’ जैसी कहानी कुछ ऐसी ही परिस्थितियों को लेकर लिखी गई है। आसिया नूरी को मुस्लिम होने के कारण समाज में अनेक प्रकार के धार्मिक और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अपने ऑफिस में उनके सहकर्मी उन्हें अपने ही ग्रुप में सीमित होने का अजीबोगरीब फ़रमान सुना देते हैं। यह कहानी वास्तव में आज के प्रत्येक कार्यस्थल की कड़वी सच्चाई है जिससे मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। लेखक कहानी का अंत बहुत ही अप्रत्याशित स्थिति में करता है जब आसिया नूरी की छः  साल की मासूम बच्ची को स्कूल में फैंसी ड्रेस में बुर्का पहनाने के लिए कहा जाता है। ‘न रंग न राग’ का पात्र दिल्ली में ऑटो चलाता है। बिहार छोड़कर दिल्ली में दो पैसे कमाने में उसे अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। मेहनत करके अपनी जीविका चलाने वाले न जाने कितने महेंद्र सिंह हमारे आसपास मिल जाएंगे। दूसरों की मुश्किलें आसान करते-करते, दूसरों के जीवन में रंग घोलते-घोलते उनकी अपनी खुद की ज़िंदगी न रंग न राग वाले न जाने किस मुकाम पर पहुंच जाती है।

           हरियश राय लंबे समय से कहानी लेखन में रत हैं। हरियश राय का अनुभव संसार बहुत व्यापक है। समाज के अनेक रंग उन्होंने देखे हैं और इन्हें अपनी कहानियों में अभिव्यक्ति भी दी है। अधिकांश कहानियां मध्यमवर्गीय चरित्रों को लेकर रची गई हैं। जिनके यथार्थ को लाने का प्रयास लेखक ने किया है। हरियश राय के पात्र अपनी वैचारिक दुनिया में खोए रहते हैं ,अपने परिवेशगत परिवर्तनों के बारे में खूब सोचते हैं। यही कारण है कि संग्रह की अधिकांश कहानियों में पात्रों के कथोपकथन कम रखे गए हैं। कहानियों के पात्र स्वागत कथनों से ही कहानी का विकास करते चलते हैं। लेखक ने तीन-चार कहानियों में विवाह की समस्याओं को बखूबी उठाया है। कहीं विवाह के बाद विच्छेदन की परिस्थितियां हैं तो कहीं विवाह न होने की ही समस्याएं केंद्र में रखी गई हैं। अधिकांश पात्र जीवन के ठहराव को सामने लाते हैं और कहानी को गति देते चलते हैं। संग्रह की अधिकांश कहानियों के शीर्षक प्रतीकात्मक रखे गए हैं। कहानी पढ़कर स्पष्ट होता है कि कहानी के प्रत्येक पात्र पर वे शीर्षक सटीक बैठते हैं। एक बात और महत्वपूर्ण है। अपनी अधिकांश कहानियों के अंत में लेखक कोई निर्धारित निष्कर्ष नहीं निकालता। उसने अनावश्यक रूप से आदर्शवादी अंत को किसी भी कहानी पर नहीं थोपा है। प्रत्येक कहानी समाप्त होते-होते पाठक के समक्ष कुछ ऐसे प्रश्न छोड़ जाती है, जिनको लेकर कहानी पढ़ने के बाद भी पाठक का मन विचारों के जाल में बंधा रहता है। नारी विमर्श हरियश राय की कहानियों में प्रमुखता से उभरा है। ‘चीलें’,’उन्हें बाघ खा जाए’, ‘साइलेंट किलिंग’,’आसिया नूरी गुमसुम हैं’  जैसी कहानियों में स्त्री चरित्र प्रधान है। लेखक यहां मुद्दों को उठाकर कहानियों के नारी पात्रों की सामने लाता है। पाठक स्वयं महसूस करता है कि उपरोक्त में नारी का संघर्ष और कुछ कर गुजरने का जज़्बा भरा है लेखक ने। कुल मिलाकर ‘इस मुकाम तक’ संग्रह की सभी कहानियां विचारोत्तेजक हैं, दिल को छूती हैं और अपने शिल्प से प्रभावित करती हैं। समाज के आज के घटित सच का सार्थक- सहज शब्दांकन है ‘किस मुकाम तक’।


 डॉ. नितिन सेठी

 सी– 231 शाहदाना कॉलोनी

 बरेली (243005)

 मो. 9027422306

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