हम सब जिसे शबाना के नाम से जानते हैं

पुस्तक समीक्षा

मैं शबाना ( उपन्यास )

लेखक : यूसुफ़ रईस 

प्रकाशक : नोशन प्रेस ( इंडिया, सिंगापुर, मलेशिया ), ओल्ड नं. 38, न्यू नं. 6, मैक निकोल्स रोड, चैटपट, चेन्नई – 600 013 मूल्य : ₹ 199

मोबाइल संपर्क : 09829595160

शहंशाह आलम

शहंशाह आलम

हम सब जिसे शबाना के नाम से जानते हैं, यह शबाना हर घर में पाई जाती है – मेरे यहाँ भी, मेरे पड़ोसी के यहाँ भी, मेरे दोस्त-अहबाब के यहाँ भी। इस शबाना का नाम हर माँ-बाप बड़े प्यार, बड़े लाड़ और बड़ी मुहब्बत से रखते हैं। एक शबाना, जब मैं पंद्रह-सोलह साल का रहा होऊँगा, मेरे घर में भी पैदा हुई थी। इस शबाना को मैंने जितना खिलाया, प्यार दिया, मान दिया, इतना मैंने और किसी भाई-बहन को नहीं दिया। घर में सबसे बड़ा अपने माँ-बाप के बाद मैं ही जो हूँ। मेरी बहन शबाना को, जिसे मैंने इतना टूटकर माना-चाहा, उसको लेकर मैं अकसर सोचता हूँ कि क्या उसके चेहरे पर जो हमेशा वाली मुस्कराहट है, वह सच्ची मुस्कराहट है। यहाँ यह सब लिखने कि वजह यही है कि यूसुफ़ रईस के बहुचर्चित उपन्यास ‘मैं शबाना’ की जो शबाना नाम की किरदार है, उसके चेहरे पर भी हँसी ही रहती है हमेशा मगर आँखों से अदृश्य आँसू हरदम बहते रहते हैं, किसी दरिया की तरह और यह दरिया जो है, किसी को दिखाई नहीं देता, सिर्फ़ लेखक को दिखाई देता है। मेरी बहन शबाना को लेकर मैं यही सब महसूस करता हूँ। आँसुओं वाला यह दरिया अपनी बहन शबाना की आँखों में नहीं, अपनी इस बेटी को लेकर मेरी माँ की आँखों में देखता रहा हूँ, एकदम रवाँ-दवाँ। मेरी माँ अपनी शबाना के लिए कैसे-कैसे ख़्वाब नहीं बुना करती थीं। उनके सारे ख़्वाब मकड़ियों के जाले साबित हुए। उनकी बस एक ख़्वाहिश अपनी इस शबाना नाम की बेटी को लेकर थी कि उनकी इस बेटी को उसका शौहर जो हो वो किसी अच्छी-सी सरकारी नौकरी वाला हो। मगर सरकारी नौकरी वाले लड़के की अनाप-शनाप माँग और जन्नत की हूर जैसी लड़की की चाह के आगे माँ हार गईं। यही हारने वाली कैफ़ियत मेरी माँ की आँखों में अपनी शबाना को लेकर है और ‘मैं शबाना’ की शबाना की कैफ़ियत अपनी हार को लेकर उपन्यास के लेखक यूसुफ़ रईस साहब देखते हैं :

जैसे-जैसे मेरे बदन की कसावट और चेहरे की सुर्ख़ी बढ़ी तो अम्मी और अब्बू जान को मेरे निकाह की फ़िक्र सताने लगी थी। वो कहते हैं न कि जब पेड़ पर फल आते हैं तो ख़ुद-ब-ख़ुद आँगन में पत्थर गिरने लगते हैं। कुछ ऐसा ही हाल मेरे मामले में भी हुआ और धीरे-धीरे मेरे लिए भी रिश्ते आने लगे। कई रिश्ते अब्बू को पसंद नहीं आए तो कई लोगों ने पलट कर जवाब नहीं दिया ( पृ. 3 )।

मुझको मालूम नहीं, आपकी शबानाओं को लेकर आप सबका तजुर्बा कैसा रहा? मेरा अपनी शबाना को लेकर ज़िंदगी का तजुर्बा बेहद कड़वा-कसैला है और यूसुफ़ रईस साहब को यह तजुर्बा लेकिन मेरे जैसा ज़रूर रहा, यह मैं इस उपन्यास के हवाले से ज़रूर कह सकता हूँ। हमारी ज़िंदगी से ज़्यादा हमारी मजबूरियाँ हमको कई-कई अजब-ग़ज़ब खेल-तमाशे ज़रूर दिखाती हैं। अपनी अम्मी-अब्बू और फ़ूफ़ी की बेहद-बेहद प्यारी शबाना की ज़िंदगी भी कई पसंद न आने वाले अजब-ग़ज़ब खेल-तमाशे दिखाती है। शबाना को न चाहते हुए भी नापसंदीदा तमाशे देखने ही होते हैं। यह दर्द लेखक का और ‘मैं शबाना’ की शबाना का साझा दर्द के जैसा है। तभी यूसुफ़ रईस साहब ने शबाना की ज़िंदगी का सारा कच्चा-चिट्ठा हमारे सामने खोल-खालकर रख दिया है। यह कच्चा-चिट्ठा आपकी शबानाओं का न सही – मेरी, मेरे पड़ोस की, मेरे दोस्त-अहबाब की शबानाओं का ज़रूर है। ये शबानाएँ खुली आँखों से जो कुछ देखा करती रही हैं, यही सब इनका आज और कल होता रहा है। यही सब इनका मुक़द्दर होता रहा। इस उपन्यास की ख़ासियत यही है, इसमें जो कुछ लेखक द्वारा लिखा गया, सच की तरह का सच लिखा गया है। यही वजह है कि यह उपन्यास अपने लोगों के बारे में लिखा गया उपन्यास मुझे बार-बार लगा। इस किताब के सारे किरदार मुझे अपने किरदार लगे। इस किताब की अम्मी जान मुझे अपनी अम्मी जान लगीं। इस किताब के अब्बू जान मेरे अपने अब्बू जान लगे :

ईशा की नमाज़ के बाद मैं फिर से उसी घुटन भरे हवेलीनुमा तहख़ाने में आ गई थी। लौटने से पहले मैंने अम्मी जान से अपना ख़्याल रखने और वक़्त पर दवाइयाँ लेने का वादा ले लिया था। साथ ही अम्मी जान को कमर से पट्टा न खोलने की ताक़ीद कर दी थी। अब्बू जान ने एक नौकरानी का बंदोबस्त कर लिया था। इसलिए घर के काम की कोई फ़िक्र नहीं थी। बस अम्मी जान को ही चैन नहीं पड़ता था। मुझे मालूम था कि घर-परिवार के आगे ख़ुद की कभी परवाह नहीं करेगी ( पृ. 51 )।

‘मैं शबाना’ को पढ़ते हुए मुझे यही लगा कि यूसुफ़ रईस साहब ने उपन्यास लिखने की परंपरा, अस्मिता और स्वतंत्रता को बचाए रखा है, बेहद बारीकी से। यह उपन्यास बस लिखने की ख़ातिर भर नहीं लिखा गया है। इस उपन्यास के कथा-समय में एक लड़की के बहाने पूरे मुस्लिम समाज की लड़कियों की कठिनाइयाँ, परेशानियाँ, लाचारियाँ, बेबसियाँ, मजबूरियाँ साफ़-साफ़ दर्शाई गई हैं। मुस्लिम परिवार की धूल-मिट्टी, कंकड़-पत्थर, वायु-प्रदूषण सबकुछ को बेहद महीनी से लेखक ने रख दिया है। इस फ़िक्र को छोड़कर कि इन सबका असर इनके पाठकों पर कैसा और कितना पड़ेगा। यूसुफ़ रईस साहब की जान इसी बात में है कि वे जो भी कहना चाहते हैं, बिना लाग-लपेट के बिंदास कह डालते हैं। इनके जो भी पात्र आते-जाते हैं, वे सभी केंद्र में रहते दिखाई देते हैं, हाशिए पर नहीं। इन पात्रों का जीवन ज़रूर रेगिस्तान के बालू की तरह तपता हुआ है। शबाना के शौहर का जीवन कम आग की लपट से घिरा हुआ नहीं है। तभी असलम का इस उपन्यास में आना-जाना ज़्यादातर ख़ामोशी से भरा हुआ है। मगर हाँ, असलम मियाँ ज़िंदगी की आग की इस लपट से निकलना जानते हों, न जानते हों, शबाना इस आग की लपट से बेलाग-बेधड़क निकलना बख़ूबी जानती है। शबाना की ज़िंदगी, ज़िंदगी की लिपाई-पुताई के बाद जीने जैसी हो जो गई है। इस वास्ते भी कि शबाना की ज़िंदगी जो भी, जैसी भी है, इस ज़िंदगी में नग्नता नहीं है। बहुत सारी औरतों की तरह शबाना भी चाहती तो बदन नंगा करके, जाँघ उघाड़ करके, अपनी बग़ल में बैठे हुए को सहला करके अपनी ज़िंदगी सजा, सँवार, संभाल सकती थी। जिस तरह की बहुत सारी औरतें करती आई हैं। मगर शबाना ऐसा नहीं करती। शबाना अपने आकाश को निर्मल बनाए रखना चाहती है ताकि चिड़ियों का गोल अगर इस आकाश से गुज़रे तो चिड़ियों को किसी तरह की सड़ाँध से न गुज़रना पड़े। शबाना के शौहर असलम मियाँ की अचानक हुई मौत के बाद भी नहीं :

मैं अपने ग़मों और जज़्बात की नुमाइश करके लोगों की हमदर्दी हासिल नहीं करना चाहती थी। मैं किसी को भी नहीं बताना चाहती थी कि मुझ पर क्या गुज़र रही थी। अगर बताती तब भी मेरा ग़म कम नहीं हो सकता था। मेरा दर्द सिर्फ़ वही औरत समझ सकती थी, जो मेरे जैसे हालात से गुज़री हो। उस वक़्त पता नहीं क्यों मैं न रोई थी, न मातम किया था। मैंने बस अपने-आपको उसी कमरे में समेट लिया था, जिसे हम छोड़कर जाने वाले थे ( पृ. 117 )।

शबाना की एक और ख़ासियत है कि वह जिरह नहीं करती। ख़ासकर अपने दुखों के बारे में। शबाना को ज़िंदगी जीने के लिए जितना स्पेस मिला है। वह चाहती है, वह स्पेस उसकी ज़िंदगी में यादगार बनकर रहे। शबाना ज़िंदगी में हिंसा नहीं चाहती थी। मगर उसके शौहर की मौत ने उसको हिला ज़रूर दिया था। असलम की मौत के पीछे का राज़ वह जानना चाहती थी। मगर सबको लग रहा था कि अपने शौहर की मौत की असल ज़िम्मेदार यही है। अपने शौहर की मौत पर उसने सब्र से जितना  काम लिया था, मौत की वजह को लेकर वह सब्र से नहीं रहना चाहती है। वह समझ चुकी है कि उसके शौहर असलम की मौत स्वाभाविक रूप में नहीं हुई थी। असलम की मौत पर का धुँध, कोहरा और अँधेरा, सब शबाना हटाना चाहती है। यहाँ आकर यूसुफ़ सईद साहब ने अपने उपन्यास को ज़रा-सा थ्रिलर रंग देने का प्रयास किया है। या फिर असलम की संदिग्ध मौत के बहाने लेखक ने शबाना की ज़िंदगी के उथल-पुथल और अंत:संघर्ष को पाठको के समक्ष और अधिक स्पष्ट करने के लिए यह सब ताना-बाना बुना है। जो भी हो, यहाँ आकर शबाना संकट की गिरफ़्त में ज़रूर आ जाती है :

मुझे लग रहा था कि असलम मियाँ की मौत फ़ितरी नहीं थी, मुझे यक़ीन था कि उनका ज़ुल्फ़िकार ने क़त्ल किया था। लेकिन मेरे पास न गवाह थे, न सबूत। मेरी बात पर कौन यक़ीन करता। हो सकता था कि मरजीना भाभी को भी ज़्यादा कुछ मालूम न हो और घर के लोगों ने उन्हें भी उनकी मौत की कोई झूठी कहानी सुनाई हो।

तभी मरजीना भाभी ने जाते-जाते कहा था, ‘तुम्हारी इद्दत पूरी होने में अभी बारह दिन बाक़ी है, लेकिन वो कमीना अभी से तुमसे निकाह के मंसूबे बाँध रहा है। ज़रा हुशियात रहना।’ उनकी बात सुनते ही मुझ पर बिजली गिर पड़ी थी ( पृ. 121-122 )।

इस उपन्यास को पढ़कर आप सहज समझ सकते हैं कि लेखक यूसुफ़ रईस साहब की क़लम से अभी कई-कई उपन्यास आने बाक़ी हैं। इनके भीतर एक बड़े उपन्यासकार का सपना अपना भविष्य पा रहा है। थोड़ी-बहुत कमियाँ-ख़ामियाँ हर लेखक-कवि के पास होती हैं, सो यूसुफ़ रईस साहब में भी थोड़ी-बहुत कमियाँ-ख़ामियाँ हैं। लेकिन लेखक की उम्र अभी जितनी है, जैसी है, यह सब ख़ुद-ब-ख़ुद ठीक होती चली जाएँगी। लेखक के पास अपने किरदारों के घाव धोने का जो हुनर है, कमाल का है और किसी सफल लेखक के जैसा है। लेखक नदी किनारे खड़े होकर पानी देखने वालों में से नहीं है बल्कि पानी के अंदर गहरे उतरकर ज़िंदगी को देखने वालों में से है। इस उपन्यास की क़िस्सागोई इतनी अच्छी और ख़ूबसूरत है कि आप ‘मैं शबाना’ को पढ़ना शुरू करते हैं तो पढ़ते चले जाते हैं। ज़बान भी ऐसी है कि आपको भा जाती है। यह उपन्यास एक जीवन का चक्र पूरा होने जैसा है। यानी जीवन-तत्व इस उपन्यास का ऐसा है कि एक पूरा स्त्री-जीवन आर-पार दिखाई दे जाता है। यही वजह है कि इस उपन्यास की शबाना हमारे घर की अपनी शबाना जैसी लगती है। बेन ओकरी कहते हैं कि ‘मृत्यु भी एक काव्यात्मक स्थिति है – आत्मा का देह में बदल जाना।’ यह उपन्यास भी हमारे जीवन और मृत्यु के चमत्कार के जैसा ही आभास देता है :

अतिया पंखे के लिए लगाई गई म्यान के फंदे पर लटकी हुई थी और उसकी मुट्ठी में एक पर्ची दबी हुई थी। मैंने बड़ी मुश्किल से उसकी उँगलियों में एक पर्ची दबी हुई थी। मैंने बड़ी मुश्किल से उसकी उँगलियों को सीधी कर पर्ची निकाली थी। अतिया ने उस पर्ची पर लिखा था, ‘सादात! मेरी अम्मा बदचलन नहीं है। मेरी अम्मा दुनिया की सबसे नेक औरत है ( पृ. 182 )।’

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