उम्मीद बंधाती कविताएं

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

युवा कवि मनोज चौहान की कविताओं में एक तड़प है। समाज में लगातार बढ़ती असानता उनकी इस तड़प को बढ़ाती जाती हैं और ये तड़प उनकी कविताओं में प्रभावी ढंग से उभर कर आती है।
उनके पहले कविता संग्रह ‘पत्थर तोड़ती औरत’ के टाइटल ने ही चौंकाया था। पत्थर तोड़ती औरत यानि दिमाग में सीधे निराला जी की कविता ‘वह तोड़ती पत्थर’ कौंध जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि अपने पहले कविता संग्रह का शीर्षक ‘पत्थर तोड़ती औरत’ रखकर उन्होंने एक बड़ा जोखिम उठाया है। मुझे लगता है कि इस तरह का जोखिम उठाने से नए कवि को बचना ही चाहिए, ख़ासकर तब जब वह अभी सीखने की प्रक्रिया से गुजर रहा हो।
इस संग्रह में कुल 44 कविताएं हैं। इन कविताओं में जीवन के हर रंग देखने को मिलते हैं। ‘लिंगडू की गठरियां’, ‘पहाड़ी पर घर’ जैसी कविताओं में पहाड़ की जिंदगी का दर्द झलकता है तो कुछ कविताएं दरकते रिश्तों की दास्तां भी बयां करती हैं।
‘बाज़ार’ इस संग्रह की एक अच्छी कविता है। एक ही बाज़ार का अर्थ अलग अलग लोगों के लिए कैसे अलग अलग हो सकता है, इसे मनोज ने बखूबी चित्रित किया है।

बाज़ार आखिर क्या है
इंसानी ज़रूरतों को
पूरा करने के लिए इजाद की गई
एक प्राचीन व्यवस्था
मोलभाव करते इंसानों का जमघट
या फिर किसी गरीब बच्चे की
न पूरा होने वाली इच्छाओं को
चिढ़ा देने वाला सम्मोहन?
(कविता –बाज़ार, पृष्ठ 20)

ऐसे ही ‘पोखर’ कविता गांव में शहर की घुसपैठ पर गंभीर सवाल उठाती है।

विकास और सुविधाओं की
बलिवेदी पर कुर्बान
धरती के गर्भ में समा चुके
पोखरों की चीत्कार
अब नहीं सुनना चाहते
बहरे हो चुके गांव!
(कविता -पोखर, पृष्ठ संख्या 28)

यह कविता और प्रभावी हो सकती थी, अगर मनोज ने पोखर की उपोयगिता बताने की जगह गांव के बहरेपन को ज्यादा उजागर किया होता।
यह मनोज का पहला कविता संग्रह है और संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए इस बात का एहसास भी होता है। कुछ कविताएं दिल को छूती हैं तो कुछ बिल्कुल भी प्रभावित नहीं करतीं। लेकिन मनोज उम्मीद बंधाते हैं। वक्त के साथ कविता का उनका ये सफ़र और पुख्ता और परिपक्व होगा, इसमें कोई संदेह नहीं। इसका सबूत उनकी कविता ‘कबाड़ उठातीं लड़कियां हैं’

वे कबाड़ उठातीं लडकियां
चिढ़ाती हैं
आज भी
इकीसवीं सदी के विकास को
और साथ ही
प्रति व्यक्ति आय में हुए
इजाफा दर्शाने वाले
अर्थशास्त्रियों के आंकड़ों को
और संविधान के उन
अनुच्छेदों को भी
जिनमें दर्ज हैं
उनको न मिल सके
कई मौलिक अधिकार

वे मेहनतकश बेटियाँ हैं
अपने माँ – बाप के आँगन में खिले
सुंदर फूल हैं
जिम्मेदारियां उठाकर
परिवार का भरण – पोषण करते हुए
जो बन गई हैं माताओं की तरह
इस उम्र में ही
और जूझ रही हैं
मूलभूत आवश्यकताओं की
उहापोह में
(कविता –कबाड़ उठातीं लड़कियां, पृष्ठ संख्या -110)

और एक सवाल प्रकाशक से: 116 पृष्ठों के इस कविता संग्रह की कीमत 250 (हार्डकवर, पेपरबैक के बारे में कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है) रुपए है। आम पाठक खरीद पाएगा?

कविता संग्रह : पत्थर तोड़ती औरत
कवि : मनोज चौहान
प्रकाशक : अंतिका प्रकाशक
मूल्य : 250 रुपए

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