मौजूदा राजनीति पर व्यंग्यात्मक उपन्यास ‘प्रजातंत्र के पकौड़े’


किंडल ई बुक : प्रजातंत्र के पकौड़े

व्यंग्यात्मक उपन्यास

लेखक :  राकेश कायस्थ

मूल्य :  49 रुपए

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

आधुनिक हिन्दी व्यंग्य में राकेश कायस्थ ने अपनी एक अलग और मुकम्मल पहचान बनाई है। आज जब व्यंग्य के नाम पर इतना कूड़ा लिखा जा रहा है कि इस विधा पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं, राकेश आश्वस्त करते हैं। उनके कलम से निकले एक एक शब्द चुभते हैं, गुदगुदाते हैं, सन्न कर देते हैं। व्यंग्य को जो काम करना चाहिए राकेश कायस्थ के व्यंग्य वो काम बखूबी और प्रभावी ढंग से करते हैं।

‘प्रजातंत्र के पकौड़े’ राकेश कायस्थ का नया व्यंग्यात्मक उपन्यास है, पहला भी। इस उपन्यास के जरिए उन्होंने ना केवल व्यंग्य लेखन को एक नया आयाम दिया है बल्कि व्यंग्य लेखक के रूप में अपनी पहचान को भी और पुख्ता किया है।

‘प्रजातंत्र के पकौड़े’ समकालीन राजनीतिक परिदृश्य का जीवन्त दस्तावेज है। किसी का नाम नहीं है लेकिन आप पढ़ेंगे तो हर किरदार को पहचान जाएंगे, इतना ज्यादा पहचान जायेंगे कि आपको लगेगा कि आज मौजूदा समय को पढ़ रहे हैं। हालांकि लेखक ने उपन्यास के शुरू में ही साफ कर दिया है कि सारे पात्र काल्पनिक हैं।

मौजूदा सियासत किस तरह व्यक्ति केंद्रित हो गई है और राजनीतिक दलों के समर्थकों ने किस तरह अपने दिमाग के दरवाजे पूरी तरह बन्द कर दिये हैं, वो इस उपन्यास में बखूबी उभर कर आता है। केवल मौजूदा समय ही नहीं बल्कि राकेश ने तो ‘भविष्य के इतिहास’ (इसे आप भविष्यवाणी भी कह सकते हैं लेकिन आजकल इतिहास की बात ज्यादा होती है तो इतिहास ही लिख रहे हैं) को भी बड़े ही प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर दिया।

यह उपन्यास मौजूदा राजनीतिक दौर को किस तरह परत-दर-परत उघाड़ती है, वो इस उपन्यास के कुछ अंशों को पढ़कर ही आप समझ सकते हैं। हाल ही में पकौड़े को लेकर पूरा देश जिस तरह बहस में उलझा था, उसे राकेश के अन्दर के व्यंग्यकार ने बड़े ही महीन ढंग से पकड़ा। उसके बाद तो उनके कलम से निकले प्रजातंत्र के पकौड़े ने तो कमाल ही कर दिया। कुछ अंश प्रस्तुत है—

उन्हे फेंकना आता था, हमे फेंटना आता था। उन्होने एक आइडिया फेंका, हमने लपक लिया और फटाफट उसे बेसन के साथ फेंट दिया। बस बन गई दुनिया की सबसे अनमोल चीज़। तलते हम पहले भी थे। कड़ाही हमेशा गर्म होती थी, तेल हमेशा खौलता था। लेकिन वैसे पकौड़े नहीं बन पाते थे, जो दुनिया पर राज कर सकें। कारण क्या था? कारण सिर्फ एक ही था— हमारे पास टेलिविजन तो था लेकिन कोई विजन नहीं था।

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हम क्यों ढूंढते हमारे पास तो सबकुछ पहले से था। बात सिर्फ इतनी है कि हम भूल चुके थे। हमें कोई यह बताने और याद दिलाने वाला नहीं था कि पकौड़ा बनाना एक काम है। प्लास्टिक सर्जरी की तरह यह भी एक विज्ञान है। मधुबनी पेटिंग की तरह यह भी एक आर्ट है। कभी देखिये तेल में तैरते पकौड़ो को, जैसे सागर में तैरती मछलियां। खजुराहो के भित्ति चित्र नज़र आएंगे आपको इन पकौड़ो में और दुनिया के तमाम देशों के नक्शे भी। पिछले चार साल में भारत में रोजगार के आंकड़े देख लीजिये आप। ओवर इंप्लायमेंट है। मैन पावर कम पड़ रहा है, इसलिए अब हमें यूरोप से भी पकौड़ा बनाने वाले कारीगर बुलाने पड़ रहे हैं। उन्हे हम अपनी स्किल्ड इंडिया स्कीम में ट्रेनिंग दे रहे हैं और उसके बाद रोजगार भी। हमारा पकौड़ा विश्व को जोड़ता है। यही वजह है कि यूएन ने इसे इंटरनेशनल फूड ऑफ पॉवर्टी इरैडिकेशन एंड हार्मोनी घोषित किया है।

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इंडिया इज़ ए पॉलिसी ड्रिवेन स्टेट। हमने हर साल एजुकेशन बजट घटाया ताकि सरकारी स्कूल और कॉलेजो को कम फंड मिले। फंड कम मिले तो सीटें कम हुई और टीचर भी कम हुए। इस तरह ड्रॉप आउट बढ़े। ड्रॉप आउट पॉपुलेशन हमारी इंडस्ट्री का बैक बोन है। मेरी किस्मत अच्छी थी कि मेरे मां-बाप ने मुझे पढ़ाया नहीं वर्ना मैं आज क्लर्क होता, इतने बड़े एंपायर का मालिक नहीं। ऑल इंडिया पकौड़ा फेडरेशन की हमेशा से यह डिमांड रही है कि कक्षा आठ के बाद की पढ़ाई इतनी महंगी कर दी जाये कि अमीर लोगों के अलावा कोई अफोर्ड ना कर पाये। अमीर लोगो के पास ज़रूरत से ज्यादा पैसा होता है। एजुकेशन महंगा होगा तो सरकार को ज्यादा पैसा मिलेगा और हमें चीप मैन पावर।

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पत्रकारों के बीच में रहकर उसे खबरे सुनने, सूंघने और समझने की आदत हो गई थी। वह सुनता सबकुछ था लेकिन समझता अपने ढंग से था। जब ब्रेकिंग न्यूज़ चली कि गाय सांस में ऑक्सीजन लेकर ऑक्सीजन ही छोड़ती है, तो बहुत ज़ोर-ज़ोर से हंसा— ज़रूरत से ज्यादा सप्लाई हो गई है ससुरी ऑक्सीजन की। टीवी वालो को बताना चाहिए कि गइया गोबर में नोट दे रही कि नहीं।

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-रामभरोसे ने उसी रात अपना तीसरा सपना देखा। नोएडा के जिस पीपल के पेड़ के पास उसका ठेला है उसी पीपल के पेड़ के नीचे प्रधानमंत्री बैठे हैं- भगवान बुद्ध के वेश में। चेहरे पर परम शांति है। वे ज्ञान दे रहे हैं और रामभरोसे ज्ञानामृत का पान कर रहा है। प्रधानमंत्री जी कह रहे हैं कि प्रजातंत्र और पकौड़ा दोनो एक ही चीज़ हैं। दोनो को घोलना पड़ता है। फिर खूब फेंटना पड़ता है। जिस तरह बेसन, पानी, नमक, प्याज, धनिया और तेल से मिलकर पकौड़ा बनता है। उसी तरह प्रजातंत्र भी बहुत सारी चीज़ों से मिलकर बनता है। प्रजातंत्र बचाना है तो पहले पकौड़ा बनाओ।

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रामभरोसे बिलख-बिलखकर रोने लगा। बीवी ने चुप कराने की कोशिश की तो बोला- रोना कोई बुरी बात नहीं है। हमारे पीएम साहब भी रोते हैं।

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जो काम सत्तर साल में नहीं हुआ वो केवल सात महीने में हो गया। क्रेडिट किसको है। प्रधान सेवक जी के बाद क्रेडिट है, हमारे आम पकौड़े वालों को। प्रजातंत्र पकौड़ा अब एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी है। हम एलान करते हैं कि कंपनी से जुड़े हर पकौड़े वाले को चाहे वह बेसन फेंटता हो चाहे तलता हो या फिर साइकिल पर ले जाकर पकौड़ी बेचता हो, सबको 15-15 लाख रुपये के शेयर दिये जाएंगे एकदम मुफ्त और वो भी अगले दो महीने के भीतर।

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प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन से पता चला है कि कई प्रकार के पकौड़े होते थे, जिनसे मोटापे का नाश होता था और सौंदर्य में वृद्धि होती थी। ऐसे पकौड़े को घर-घर तक पहुंचाया जाएगा। इसके अलावा बाबाजी के कोलाइब्रेशन से प्रजातंत्र पकौड़ा लिमिटेड ने एक ऐसा पकौड़ा विकसित किया है, जिसका नियमित सेवन गर्भवती महिलाएं करें तो पुत्री रत्न की प्राप्ति अवश्य होगी। जो लोग पुत्री सुख के वंचित हैं, उनके लिए यह पकौड़ा वरदान है। पुत्र चाहने वाले पति-पत्नी कंपनी के सामान्य पकौड़े नियमित रूप से खायें।

ये तो कुछ अंश है। पूरा उपन्यास पढ़ेंगे तो आप राकेश की लेखन शैली के दीवाने हो जायेंगे। राकेश ने पकौड़े के इतने रूपों की कल्पना की है कि आप हैरान रह जाएंगे। पकौड़ा सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्रांति का दूत बन गया है। ये पकौड़े आपको चुभेंगे भी और गुदगुदायेंगे भी। ये पकौड़े ठहाके लगाने के लिए मजबूर करेंगे तो सोचने के लिए भी बाध्य कर देंगे।

उपन्यास का क्लाइमेक्स आपको चौंकाएगा। एक पकौड़े वाले के सियासी उत्थान की यह कहानी आपको खूब पसन्द आएगी। राजनीति पर केंद्रित व्यंग्यात्मक उपन्यास की बात करें तो श्रीलाल शुक्ल के ‘राग दरबारी’ और कृश्न चन्दर के ‘एक गधे की आत्मकथा’ के बाद राकेश कायस्थ के प्रजातंत्र के पकौड़े को मैं तीसरे नंबर पर रखना चाहूंगा। उन्होंने इस लेखन परंपरा को ना केवल पूरी जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाया है, बल्कि उसे समृद्ध भी किया है।

यह उपन्यास फिलहाल ई-बुक के रूप में किंडल पर उपलब्ध है और मूल्य मात्र 49 रुपये हैं।

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