‘रेजाणी पानी’ : इस पूरे समय की अंतर्व्याधि प्रकट करती कविताएँ

पुस्तक समीक्षा

शहंशाह आलम

समकालीन हिंदी कविता की स्वरलहरियाँ ऐसी हैं, जैसे हम पेड़ों के हरे पत्तों से जगमग किसी प्रदेश से गुज़रते हुए उन पेड़ों का जो संगीत कानों को सुनाई दे और मंत्रमुग्ध हम उसी पेड़ों के अनुभवों से भरे प्रदेश का होकर रह जाने के एहसास से भर जाएँ, कुछ-कुछ ऐसा ही एहसास समकालीन कविता में बार-बार सम्मान के साथ ली जाने वाली वरिष्ठ कवयित्री पूनम सिंह की कविताएँ हैं। पूनम सिंह जिस बहुआयामी कविता- दृष्टि की संगत में रहकर सृजनरत चली आ रही हैं, वह बहुआयामी कविता-दृष्टि उनकी कविताओं को पढ़ते हुए आसानी से महसूसा जा सकता है। इनका हाल में प्रकाशित कविता-संग्रह ‘रेजाणी पानी’ की कविताओं ने समकालीन कविता को एक बिलकुल नया परिदृश्य दिया है, जो अचंभित करता है :

शाम के घिरते अँधेरे में

तंबू गाड़ते बंजारे

कितने बेपरवाह होते हैं

अपने पड़ाव और ठिकाने को लेकर

कोई ठाँव कोई गाँव

नहीं बाँध पाता उनके पाँव

सूर्य के रथ पर हमेशा

लदे होते हैं उनके असबाब(‘बंजारे’/पृ.74)।

पूनम सिंह की कविताओं की विशेषता यही है कि आप उनकी कविताओं को पढ़कर बस गुज़र जाना चाहें तो आपको लगेगा कि उनकी कविताएँ आपको बार-बार पुकार रही हैं, किसी अपने रिश्तेदार की तरह। इसलिए कि उनकी सारी कविताएँ आपके बेचैन-बेकल मन को सुकून देती हैं, शांत भी करती हैं और आवेग से भी भरती हैं। ऐसे में पूनम सिंह की कविताओं की निकटता कौन नहीं चाहेगा। उनकी कविताएँ बताती हैं कि आप क्या हैं। ये कविताएँ हमारे-आपके ही जीवन का वृत्तांत हैं। यही कारण है कि हम ललकते हुए, हुलसते हुए, प्रसन्नते हुए पूनम सिंह की कविताओं का हिस्सा होते चले जाते हैं :

माँ की सीख थी

दुःख में कभी घुटनों के बल नहीं गिरना

धरती का धीरज ले

पेड़ की तरह अडिग रहना

मौसम का हर शीत-ताप सहना

गुलमोहर की तरह हँसना(‘मैंने समो दिया कुएँ में समुन्दर’/पृ.18)।

अब कोई कवि/कवयित्री इतनी अच्छी सीख देगा, हमारे बेचैन दिलो-दिमाग़ को शांत रखेगा, तो कोई बुड़बक ही होगा, जो ऐसे कवि/कवयित्री का प्रेम, सान्निध्य और सन्निकटता नहीं चाहेगा। यह भी कि घृणा, द्वेष और ईर्ष्या लिए कोई कितने दिन सृजनपथ पर चल सकता है। हालाँकि यह समय घृणा, द्वेष और ईर्ष्या ही सीखाता दिखाई देता है। इस समय में जी रहे लोगबाग भी घृणा, द्वेष और ईर्ष्या को लेकर ही जीना चाहते हैं। लेकिन कवि-मन हरेक वस्तु को मुस्कुराहट से भर देना चाहता है :

ज़िंदगी के रेतीले मैदान में

भटकती स्त्री देख रही है

नदी के मुहाने पर बैठी

एक लड़की को जो

रंगीन लहरों के आईने में

सँवार रही है अपना रूमानी चेहरा

और गीली रेत पर

मोरपंख से लिख रही है ‘प्यार'(‘मोरपंख से लिख रही है प्यार’/पृ.27)।

पूनम सिंह की कविताएँ जिज्ञासाओं से भरी हुई हैं। इनकी कविताओं में अनुपयोगी, निरर्थक, अकारथ जैसा कुछ भी नहीं है। इनकी कोई कविता ज़्यादा रहस्यों से भरी हुई अगर नहीं है, तब भी वह कविता हमारे आसपास के मार्मिक अनुभव से भरी हुई रहती है। प्रमाण के लिए हम पूनम सिंह का ‘ऋतुवृक्ष'(1998) और ‘लेकिन असंभव नहीं'(2002) कविता-संग्रह में शामिल कविताएँ देख सकते हैं। ‘रेजाणी पानी’ संग्रह(2014) की कविताएँ किसी अँधेरी कालकोठरी का साँकल नहीं खटखटातीं बल्कि उस कालकोठरी के निकट जाकर हमें बाहर खैंच निकालती हैं। ‘रेजाणी पानी’ का अर्थ कवयित्री के शब्दों में कुछ यूँ है ‘कि यह पानी कुण्डी में सहेजा जाता है। राजस्थान में हर जगह कुण्डियाँ हैं। पहाड़ पर बने क़िलों में, मंदिरों में, पहाड़ की तलहटियों पर, घर के आँगन में, गाँव में, रेत में, खेत में हर जगह कुण्डियाँ होती हैं। इन कुण्डियों में पानी हमेशा स्वच्छ और निर्मल बना रहता है।’ इस संग्रह की सारी ही कविताओं का ध्येय यही है कि आज का आदमी ऐसा कुछ कर रहा है कि इस समय से इसका जल नष्ट होता चला जा रहा है। समय के जल को बचाया नहीं गया, तो जीने का सारा ज्ञान और विज्ञान फिर रह कहाँ जाएगा। इसलिए पूनम सिंह समय के सन्निकट रककर सदा से चले आ रहे आदमी के तनाव को कम करने का प्रयास करती हैं :

मेरी हाँफती साँसों में

पानी का शोर बढ़ने लगा है

मेरे थके पैरों में

टूटे घुंघरूओं की नीरवता व्याप्त है

कई-कई पर्वतों

कटिबंधों को पारकर

मैं ढलान की राह होती

विशाल मरुभूमि के अंतस में

सुकून की साँस बन ठहरी हूँ

क़िले की नीरवता और

समुद्र के शोर से दूर

मैं यहाँ हूँ

इधर

सदियों पुराने मरुप्रदेश की

कुण्डी के भीतर

‘रेजाणी पानी’ बन(‘रेजाणी पानी’/पृ.14-15)।

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‘रेजाणी पानी'(कविता-संग्रह)/कवयित्री : पूनम सिंह/प्रकाशक : प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002/मूल्य : ₹200

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