मज़दूरों के संघर्ष का देखा-भोगा सच

पुस्तक समीक्षा

सुशील कुमार

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आजादी के इतने सालों बाद भी जब दुनिया के प्रगतिशील देशों में रोटियों के हादसे हो रहे हों तो परिवेश का दबाव कवि को जनाकीर्ण विभीषिका पर कविता लिखने को मजबूर करता है। गोया कि , युवा कवि सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव का पहला काव्य संकलन “रोटियों के हादसे ” इसी वर्ष छपकर आया है। वे मीडिया से जुड़े हुए हैं और गाजियाबाद में रहते हैं ।

यह स्वाधीन देश की कितनी बड़ी विडंबना है कि कवि को अब भी भूख और रोटी पर कविताएं लिखनी पड़ती है ! उन्होंने कोलकाता के चटकल इलाके में रहते हुए बहुत निकट से मजदूरों के जिन संघर्ष को देखा-भोगा है , वह बड़े करीने से इनके संग्रह “रोटियों के हादसे में’ प्रतिकृत हुआ है। संग्रह में कुल 51 कविताएँ हैं , सब के सब कवि के कटु जीवनानुभव से पगी, रोटी के बीजगणित को खंगालती, अस्तित्व के लिए अपने हिस्से की लड़ाई लड़ते-खपते मनुष्य के संघर्ष की धूरी पर रची गई जनवादी पहल की आक्रोशित कविताएँ। ये कविताएँ भूख को गहन मानवीय संवेदना से जोड़ती हुई पाठक के मन में तीक्ष्ण सामाजिक-राजनीतिक करुणा जनित आवेग को उत्पन्न करती हैं।

संदर्भवश यहाँ इनकी एक महत्वपूर्ण कविता *आग* को देखिए- “फैक्ट्री की बाँझ बन गई है/ चिमनी /अब धुआं नहीं उगलती / मौन, उदास चिमनी को/ हर रोज / सैकड़ों आंखें घूरती हैं/ पर /चिमनी नहीं तोड़ती/ अपनी चुप्पी / नहीं देती / किसी भी /सवाल का जवाब /क्योंकि /उसके पेट में /अब नहीं दहकती आग ।/ सिर्फ /एक भट्टी के बुझ जाने से /जल रही है / कई जगह आग । / वह बच्चा /छटपटा रहा है/ पेट में जलती आग से / मां की सलाह पर / वह गटागट पीता है पानी / लेकिन आग/ बुझती नहीं/ धधक उठती है । /मां के हृदय में है / मां होने की आग /जो /हर पल उसे /थोड़ा-थोड़ा राख करती है / और बाप ? /वह तो/ खुद बन गया है आग /जो फूंक डालना चाहता है /ऐसी व्यवस्था को /जहां/ भूख की आग में /हो जाता है सब कुछ राख ।”

आप देखेंगे कि सामाजिक-राजनीतिक चेतना से लैस इस कविता में एक कारखाने की भट्ठी की आग बुझ जाने से सैकड़ों जीवन में जो आग लग जाती है, उससे जिंदगियाँ जो जलकर राख हो जाती हैं , उसकी यहाँ मार्मिक-कलात्मक अभिव्यक्ति हुई है। आग और राख के बीच जलने-बुझने का दृश्य पाठक को गहराई तक उद्वेलित करता है।

संग्रह से गुजरने से प्रतीत होता है कि सत्येंद्र बड़बोले कवि नहीं हैं। बिना लाग-लपेट के कवि की कहन उसके रचनातल को मजबूती प्रदान करती है। यहाँ भूख केवल रोटी की ही नहीं, वह तन की भी है, सत्ता की भी है, सियासत की भी है। इसलिए यह जन में कभी तो भगवान को साकार करती है तो कभी सामंती ताकतों में शैतान को।”

“रोटी!

तुमने खा ली

हमारी भूख

चबा ली

विरोधी आवाज।”

….

“रोटी!

सचमुच

तुम बहुत

मोटी हो गई हो।” / कविता : ‘सब कुछ पचा जाती है रोटी’ से / पृ-21 ।

महसूस किया जा सकता है कि इन पंक्तियों की व्यंजनाएँ जन की उन विवशताओं का प्रतिदर्श रचती है जो हमें क्रूर व्यवस्था के आगे नतमस्तक ही नहीं करती, रिश्तों की गर्माहटों को भी गाहे-बगाहे ठंढी कर देती है – “मैंने ठंढे चूल्हे में/मुहब्बत को दम/ तोड़ते देखा है।”

कवि के भावजगत में रोटियों के हादसे इतने वीभत्स और बहुकोणीय फलक में व्यक्त हुए हैं कि वह आदमी और कुत्ते के बीच रोटी की छीना-झपटी तक जा पहुंचता है , जहाँ रोटियाँ खून से सन भी जाती हैं, जहाँ एक जानवर भी अपनी संवेदना से आदमी की नैतिक नीचता को चुनौती दे डालता है! यह कवि के आक्रोश की चरम अभिव्यक्ति है, देखिए :

“कुत्ता गुर्राया -/ हम संप्रदायमुक्त जीव हैं/ विभक्त नहीं हम/तुम्हारी तरह/हम कुत्ते हैं/तो सिर्फ़ कुत्ते हैं/…हम कुत्ते नहीं खाते/खून से सनी रोटियाँ/दंगे की आग में सेंकी गई रोटियाँ/ यह तुम्हारा चलन है/..” – कविता: रोटियों के हादसे’ से। यही नेमत है सत्येंद्र के कवि की , और उनकी जमा पूँजी भी ।

संग्रह की कई अन्य कविताएँ , जो महत्वपूर्ण हैं , उनका यहाँ नाम लेना चाहूंगा : ‘अगर भूख नहीं होती’, ‘रोज रोज भूख’, ‘अभाव’ , ‘ एक गांव की कहानी’, ‘श्रमजीवी’ , ‘संस्कार’ , ‘सपनों का चक्र ‘ , ‘हादसा’, ‘शहर की चिट्ठी गांव के नाम’, इत्यादि।

कहने का मूलार्थ यह है कि संग्रह की सभी कविताएँ भूख और रोटी के सवालों से जूझती हुई, उसे विभिन्न लक्षणाओं-व्यंजनाओं में अर्थ देती हुई जीवन की अस्मिता और अस्तित्व की अनवरत पड़ताल करती नज़र आती है जिनमें कवि कहीं दुःखी है , कहीं क्रुद्ध तो कहीं बिखर कर सपाट भी। पर पहला ही संकलन कवि के जिन जनोन्मुख वृतियों और तेवरों का भास कराता है , उसे देखकर तो मुझे यही लगता है कि अपने काव्य-सौष्ठव में आगे चलकर और भी वे निपुण हो पाएंगे और भविष्य में श्रीवास्तव जी की और भी सुगढ़ कृति पढ़ने को मिलेगी , इसमें तनिक संदेह नहीं।

© सुशील कुमार /मो. 0 90067 40311

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कविता संग्रह : रोटियों के हादसे

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

लिटरेचर पॉइंट /जी-2, प्लॉट न.-156,

मीडिया एन्क्लेव, सेक्टर -6, वैशाली

गाजियाबाद(ऊ. प्र

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1 Response

  1. Om sapra says:

    Bhai satyender ji, namastey,
    aapki kavitayon ke baare mein dekha. Yeh kafi dukhad isthiti hai .
    Mein bhi picchle 42 varshon se delhi ke mazdooron se juda raha hoon.
    Kafi dayniya v hridya vidarak living conditions hain, par koi hal nahi…
    Apni maansik peeda ko aapne sashakt lekhni se abhivyakt kiya hai. Saadhuvaad.
    Sabhaar
    . .. Om Sapra, delhi
    M … 9818 18 0932

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