हमारे समय के अँधेरे को रौशन करनेवाले शायर इब्राहीम ‘अश्क’ का ‘सरमाया’

पुस्तक-समीक्षा

शहंशाह आलम

ibrahim ask

इब्राहीम ‘अश्क’ की पहचान उन शायरों में है, जिनका गहरा ताल्लुक़ फ़िल्मी दुनिया से है। ‘कहो न प्यार है’, ‘कोई मिल गया’, ‘कृश’, ‘दस कहानियाँ’, ‘वेलकम’, ‘ब्लैक एण्ड व्हाइट’, ‘जाँनशीन’, ‘कोई मेरे दिल से पूछे’, ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’ आदि कितनी ही फ़िल्में हैं, जो इब्राहीम ‘अश्क’ के गानों से सजी हैं। प्राइवेट एलबम की बात करें, तो हम गिनते-गिनते थक जाएँ शायद। इनकी ख़ासियत इस बात में नहीं कि ये कितने फ़िल्मी हैं। इनकी ख़ासियत इस बात में है कि जब ये ग़ज़लें लिखते हैं, तो इब्राहीम ‘अश्क’ फ़िल्मी शायर क़तई नहीं लगते बल्कि एक ऐसे शायर दिखाई देते हैं, जो समकालीन ग़ज़ल की ख़ासमख़ास अवधारणाओं से पूरी तरह परिचित हैं। मेरे ख़्याल से इब्राहीम ‘अश्क’ का नाम उतने ही सम्मान से लिया जाना चाहिए, जिस सम्मान से गुलज़ार या जावेद अख़्तर साहब का नाम हम लेते हैं। मुझे याद है, पटना में हिंदी-उर्दू के ख्यात साहित्यकार और उस वक़्त बिहार विधान परिषद् के सभापति प्रो. जाबिर हुसेन ने गुलज़ार साहब को पटना बुलाया था और उन्हें होटल से लाने के लिए मुझे भेजा था तो विधान परिषद् आते हुए अपनी बातचीत में गुलज़ार साहब ने यह कहा था कि फ़िल्मी दुनिया में जीते हुए भी हम ज़मीनी रह सकते हैं। यह सच है कि गुलज़ार साहब एक ज़मीनी साहित्यकार हैं। इब्राहीम ‘अश्क’ की ग़ज़लों का संग्रह ‘सरमाया’ पढ़ते हुए मैंने यही महसूस किया कि इब्राहीम ‘अश्क’ भी गुलज़ार के जैसे एक ज़मीनी शायर हैं :

कभी ये दिल जो घबराया  बहुत है

तो हमने इसको समझाया  बहुत है

न जाने कौन-सा  जादू है  तुझ  में

तेरा  अंदाज़  मनभाया   बहुत  है

बहुत  कमज़ोर  है ये  दिल  हमारा

मगर दुनिया से  टकराया  बहुत  है

अदावत  हमसे करने के   लिए तो

हमारे  दर पे   हमसाया  बहुत  है

बचा लेगा  तुझे  हर इक  बला  से

कि सर पे माँ का इस साया बहुत है

न होगा  ख़त्म सदियों  तक जहाँ में

मेरी ग़ज़लों  का  सरमाया  बहुत है

न  आया  कोई  सीधे  रास्ते  पर

पयम्बर ने  तो  फ़रमाया  बहुत है

बहुत रोका मगर ये  दिल  न माना

तेरी  बातों  ने  ललचाया  बहुत है

हज़ारों  ख़्वाब  जागे  हैं  नज़र में

कोई  आँखों  पे  लहराया बहुत है ( ग़ज़ल : दो / पृ. 15 )।

 

ग़ौर किया जाए तो ‘माँ’ को विषय बनाकर हर भाषा में रचे जा रहे साहित्य में कुछ-न-कुछ सार्थक लिखा जाता रहा है। शायरी की बात करें तो मुनव्वर राणा की शायरी में ‘माँ’ अपनी पूरी संवेदनशीलता के साथ उपस्थित होती रही हैं। मुझे लगता है कि मुनव्वर राणा के बाद इब्राहीम ‘अश्क’ एक ऐसे शायर हैं, जो ‘माँ’ को पूरी शिद्दत से अपनी शायरी का हिस्सा बनाते दिखाई देते हैं। यह सच है कि माएँ हमारे समय को महाकरुणा से लबरेज़ करती आई हैं। माँ की महाकरुणा का उद्घाटन करने का मुनव्वर राणा का अपना तरीक़ा है और इब्राहीम ‘अश्क’ का अपना। इब्राहीम ‘अश्क’ की यह अदा मुझे बेहद पसंद है कि ये जितनी शिद्दत से माँ को याद करते हैं, उतनी ही शिद्दत से अपने वतन और वतन पर मर मिटनेवाले शहीदों को भी याद करते हैं : ‘ख़ुदा के बाद जो माँ को सलाम करता है / वो शख़्स सारे ज़माने में नाम करता है’, ‘जो हँसते-हँसते शहादत का जाम पीते हैं / उन्हीं का सारा वतन एहतराम करता है।’ इनकी ग़ज़लों को पढ़कर यही लगता है कि इब्राहीम ‘अश्क’ पूरी दुनिया में मुहब्बत का पैग़ाम फैलानेवाले शायर हैं। इनकी सामाजिक प्रतिबद्धता हमारे दिलों को छूकर हमारे दिलों को और बड़ा, और बड़ा और बड़ा बनाना चाहती है। यह भी सच है कि इब्राहीम ‘अश्क’ अपनी बातें कहकर छूमंतर हो जानेवाले शायर नहीं हैं बल्कि अपने विचारों पर डटे रहनेवाले शायर हैं। इनकी प्रतिबद्धता को सलाम करने का जी आपका भी चाहेगा। इसलिए कि इनकी प्रतिबद्धता आदमियत को बचाए रखना चाहती है : ‘वही है संत, वही क़लंदर, वही पयंबर है / जहाँ में जो भी मुहब्बत को आम करता है।’ इब्राहीम ‘अश्क’ शोक अथवा दुःख की शायरी नहीं करते। इनकी ग़ज़लें हमें हमारे शोक के और दुःख के क्षणों से बाहर निकलने का रास्ता दिखाती हैं। इनकी निष्ठा, इनकी सजगता, इनकी सहजता इन बातों में है कि भारतीय जनमानस कैसे ख़ुशहाल रहे। इनके सृजन का तानाबाना एक ऐसी चादर के बुनने में है कि भारतीय जनमानस का आपसी संबंध भाईचारे का रहे, जो हमारे सदियों पुरानी परंपरा रही है, जिस परंपरा में समाज के सभी पक्ष का एक ही पक्ष रहा है कि हम चाहे जिस किसी मज़हब को माननेवाले हैं, हम सबके ख़ून का रंग एक ही है :

 

ज़िंदगी  को  उजाड़  देता  है

वक़्त  शक्लें  बिगाड़  देता है

रोज़ लिखता है वो नई  तहरीर

और काग़ज़ को फाड़  देता है

कोई दस्तक, किसी के आने की

बंद  अपना  किवाड़  देता  है

वलवला कुछ तो अपने अंदर है

हौसला  कुछ  पहाड़  देता  है

एक लम्हा किसी की चाहत का

धूल  सारी  ही  झाड़  देता है

कोई दारा हो या  सिकंदर  हो

इश्क़  सबको  पछाड़ देता  है

ताज़गी  जो  कोई  नहीं  देता

नीम  का  एक  झाड़  देता है

उसको दुनिया  सलाम  करती  है

अपना  झंडा  जो  गाड़ देता  है

किसके  साये में जा खड़े हो तुम

छाँव  क्या  कोई  ताड़  देता है ( ग़ज़ल : पाँच / पृ. 18 )।

 

इब्राहीम ‘अश्क’ की ग़ज़लों को पढ़ते हुए एक नई बात जो मैंने महसूस की, वह यह कि इब्राहीम ‘अश्क’ की शायरी अपनी भाषा, अपने शिल्प, अपने संप्रेषण का कमाल ही नहीं दिखाती बल्कि इन चीज़ों के अलावा ये एक और कमाल भी करते हैं, अपनी शायरी में कई नई चीज़ों को भी आने देते हैं, जैसे ‘झाड़’, ‘ताड़’ आदि संभवत: सिर्फ़ और सिर्फ़ इन्हीं की शायरी में प्रयोग हुआ दिखाई देता है। इब्राहीम ‘अश्क’ की यह उर्वरता क़ाबिले-तारीफ़ है और क़ाबिले-ज़िक्र भी। इस उर्वरता को पाने के लिए हम कभी-कभी तरस जाते रहे हैं। इनकी शायरी में हमारे समय का यथार्थ ज़रा अलग तरह से प्रकट हुआ है। इसलिए कि इनकी शायरी की ज़मीन विनम्र है, विरल है, व्यापक है। इनकी ग़ज़ल का भूखण्ड अपने सुनने-पढ़नेवालों को विस्तारता है, समृद्ध करता है और सजग करता है। और यह अद्भुत है, अनूठा है, दिलचस्प है : ‘समुंदरों में रहे कोई या ज़मीनों पर / ख़ुदा तो सबके लिए इंतज़ाम करता है ( पृ. 14 )।’ ‘बचा लेगा तुझे हर इक बला से / कि सर पे माँ का इक साया बहुत है ( पृ. 15 )।’ ‘नई बस्ती बसाना चाहते थे / सबब ये था, उजड़ जाना पड़ा है ( पृ. 19 )।’ ‘आईना झूठ का चटखने लगा / सच जो अपने बयान पर आया ( पृ. 44 )।’ ‘बेसाख़्ता हमें जो कभी जो आ गई हँसी / महफ़िल में कितने लोगों के चेहरे उतर गए ( पृ. 45 )।’ ‘कोई सूरज, कोई जुगनूँ, कोई महताब मिले / आँख तैयार अगर हो तो नया ख़्वाब मिले ( पृ. 64 )।’ ‘फूल बनकर यही अंजाम हुआ है अपना / लोग बेदर्द हैं पाँवों से मसल जाते हैं ( पृ. 65 )।’ ‘सारे जहाँ के दर्द को ख़ुशबू बना लिया / हमने ग़ज़ल के शे’र को जादू बना लिया ( पृ.82 )।’ ‘माँगता है लहू के घूँट अभी / ज़ख़्म दिल का बहुत रचाव में है ( पृ.83 )।’ ‘नींद आती है, ख़्वाब आता है / रात भर इंक़िलाब आता है (पृ. 115 )।’ ‘आ गए शहर में, हम लोग बियाबानों के / दिल हैं उजड़े हुए, अंदाज़ हैं दीवानों के ( पृ.134 )।’ ‘उसे तो बादशाह बनने में थी न दिलचस्पी / मगर वो शाह से बढ़कर फ़क़ीर कहलाया ( पृ. 154 )।’ ‘जिसने भी सुना उसकी आँखों में सितारे थे / क्या ख़ूब मेरे ग़म की तासीर नज़र आई ( पृ. 155 )।’

 

इब्राहीम ‘अश्क’ के कवि-कर्म से गुज़रकर मेरे ख़्याल से आपको भी यह ज़रूर लगेगा कि इब्राहीम ‘अश्क’ ग़ज़ल-विधा का एक ऐसा सरमाया हैं, जिनसे सबको फ़ायदा पहुँचनेवाला है। इस सरमाया का सही-सही मूल्याँकन किया जाना अभी शेष है, चाहे कितने भी शोध इनके लिखे पर किए जा चुके हों या किए जा रहे हों। इनका कवि-स्वभाव ऐसा है कि कोई शोधार्थी इनकी शायरी का मूल्याँकन करने बैठेगा कि तब तक इब्राहीम ‘अश्क’ का इतना कुछ नया-नवेला आ चुकेगा कि इस नए-नवेले के उजाले को छोड़ना मुश्किल हो जाएगा। इसलिए कि इब्राहीम ‘अश्क’ की ग़ज़लें ऐसी हैं कि इन ग़ज़लों में हमारे समय का अँधेरा भी रौशन हो-होकर अपने महान समय की माँग सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे हुए आदमी से करता दिखाई देता है। सच कहिए तो इब्राहीम ‘अश्क’ जितने इश्क के कवि हैं, उतने ही मुख़ालफ़त के कवि भी हैं और इब्राहीम ‘अश्क’ का यह कमाल समकालीन ग़ज़ल को बाकमाल करता चला आ रहा है।

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सरमाया ( ग़ज़ल-संग्रह ) / शायर : इब्राहीम ‘अश्क’ / प्रकाशक : मंगलम् पब्लिकेशन, 138/13, छोटा बघाड़ा, प्रयाग, इलाहाबाद-211002 / मोबाइल संपर्क : 09820384921 / मूल्य : ₹150

 

समीक्षक संपर्क : शहंशाह आलम, प्रकाशन विभाग, कमरा सँख्या : 17, उपभवन, बिहार विधान परिषद्, पटना-800 015 / मोबाइल : 09835417537

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