अंधेरे से लड़ने की ताक़त देने वाली कविताएं

समीक्षित पुस्तक – तनी हुई मुट्ठियाँ (कविता संग्रह

कवि – रमेश यादव

प्रकाशक –कनक प्रकाशन

प्रकाशन वर्ष – 2019, मूल्य – 400 रुपये     

आनन्द गुप्ता

रमेश यादव युवा कविता में नया नाम हैं। ‘तनी हुई मुट्ठियाँ’ उनका दूसरा काव्य संग्रह है।  सबसे पहले इस संग्रह का शीर्षक हमारा ध्यान खींचता है। तनी हुई मुट्ठियाँ क्रांति का परिचायक है । कवि अगर तनी हुई मुट्ठियों की बात कविता में करता है तो इसका मतलब है कि उसके अंदर का कवि अपने देश, काल, समय और आस-पास घट रही घटनाओं के प्रति सजग होकर अपने सामाजिक दायित्व के प्रति प्रतिबद्धता ज़ाहिर करते हुए किसी न किसी माध्यम से उस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करना चाह रहा है। उसके लिए कविता महज़ बुद्धिविलास की चीज़ न होकर गंभीर सामाजिक दायित्व है। उसमें इस क्रूर समय में भी धरती पर प्रतिरोध का स्वर बुलंद करने की ज़िद है। उसे उम्मीद है कि बुरे दिनों में कविता ही रोशनी बन कर दुनिया को अंधेरे के खिलाफ़ लड़ने की शक्ति प्रदान करेगी।

वर्तमान समय में खरी–खरी लिखने वाले कवि और लेखक सत्ता के निशाने पर हैं । शब्दों से सत्ता को सबसे ज्यादा खतरा महसूस हो रहा है।  वे शब्दों पर प्रतिबंध लगा कर अपने खिलाफ़ उठाने वाली हर आवाज़ को कुचल डालना चाहते हैं । सत्ता, धार्मिक कूपमंडूकता और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लिखने वाले लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं  की हत्या तक की जा रही है। उन्हें हर रोज़ धमकाया जा रहा है । जेलों में बंद किया जा रहा है।ऐसे समय में जीवन में साहित्य और कविता को बचाने की ज़िम्मेवारी लेखकों और कवियों पर आ जाती है । रमेश कहते हैं

बहुत ताकत होती है/उन तनी हुई मुट्ठियों में/जब लहराने लगती हैं/आसमां में/सैकड़ों फौज/बंदूक, तोप,बारुद/सिहरने और ठंडे पड़ने लगते हैं/उन मुट्ठियों के समक्ष/आसमान गूँजने लगता है/उन मुट्ठियों के तनने से।

 कवि देश में फैली गरीबी और भूखमरी से दुखी है। वह कहता है

भारत/पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भी/गाने में अव्वल पायदान पर है/यानी विश्व के समतुल्य आज भी/बस्तर, कालीहांडी वे गीत स्थल हैं/शोकगीत के/जहाँ मर्सिये में गाये जाने वाले/गीत से बेहतर शोकगीत/और दुनिया का बेहतरीन/शोकगीत भूख की है!

     वैश्वीकरण और बाज़ारवाद के बढ़ते प्रभाव में आज लोगों के सामने चीज़ों का ढेर लगा दिया गया है और विज्ञापन के माध्यम से उन चीज़ों को अपने जीवन का हिस्सा बनाने की  अपील की  जाती है । बाज़ार में आज सबकुछ उपलब्ध है, यहाँ तक कि आपको बिकने के लिए कर्ज भी दिया जाता है ।  पूँजी का अजीब खेल जारी है। इसने सामाजिक विषमता को चरम पर पहुंचा दिया है । सबका साथ सबका विकास का सरकार का नारा आज धूल चाटता नज़र आ रहा है । अर्थव्यवस्था निचले पायदान पर है। मीडिया के माध्यम से लोगों का ध्यान जरूरी मुद्दों से भटकाया जा रहा है। धर्मांध लोगों की एक बड़ी फौज़ आज तैयार है । धर्म और देशभक्ति के नाम पर ये किसी को भी मार सकते हैं अथवा इनकी विचारधारा के विपरीत काम करने पर ये आपको सबक सीखा सकते हैं । यहाँ तक कि अपनी विचारधारा के विपरीत संदेश देने वाले लोगों की मूर्तियाँ तक तोड़ी जा रही हैं।ऐसे समय में कवि और कविता का दायित्व बढ़ा है । ऐसे लोगों की  सच्चाई जनता के सामने लाने का दायित्व आज कविता के ऊपर भी है ।  कवि कहता है – अपनी ज़िद में/तुम केवल तोड़ सकते हो/कुरुपता के बढ़ावा में/उनके प्रतिरूप की मूर्ति को/लेकिन नामुमकिन है/उनके विचारों को तोड़ना/चाहे हत्या ही कर लो/उनकी मूर्ति की/पर हत्या नहीं कर सकते हो तुम/विचार की!”

     कवि अपने समय और परिस्थितियों से चिंतित और दुखी है । कवि की यह चिंता उसे निराशा और भय से भर देती है।पर इसका एक  सकारात्मक पक्ष यह है कि दुख और निराशा उसे तोड़ता नहीं बल्कि लड़ने की शक्ति देता है ।कवि यह आह्वान करता है कि जनता को अपने हिस्से की लड़ाई खुद लड़नी होगी तभी कोई राह निकल सकती है।कवि के शब्दों में – ” लड़नी होगी /अपने हिस्से की /अपनी लड़ाई खुद/नाके और चौराहे पर बैठा/मोची/अपनी लड़ाई खुद लड़ता है रोज़/उस धागे और सुए के सहारे/विविध माप के जूते से/ मिलों में काम करता मजूर/लड़ता है अपनी लड़ाई खुद/उस मशीन से/जो अभीअभी खा गई मनोहर को/इसलिए कोई नहीं आएगा/तुम्हारे हिस्से की लड़ाई में/अब/लड़ना होगा तुम्हें/अपने हिस्से की लड़ाई खुद।

एक कवि के जीवन में अंततः कुछ बचता है तो वह है दुख । एक सच्चा कवि सुखियों की जमात का हिस्सा नहीं हो सकता है । वह अपने समय से आँखें मूँद कर आनंद में  नहीं जी  सकता । कवि में भी यह बेचैनी देखी जा सकती है ।मनुष्य के भीतर बढ़ रहा जंगलीपन उसे व्यथित कर रहा है।इस संग्रह की एक कविता में वह कहता है – इस शताब्दी की/रोचक घटना है यह/कि जंगल शहर बन रहा है/और शहर जंगल/सभी नुकीले अस्त्र/उग आए हैं अब/हमारे शरीर पर/शायद/अस्त्रों के आदान प्रदान/हुए हैं उनसे/उन शहरों में/जो कभी जंगल थे/लेकिन अब वे शहर हैं।

      कुल मिलकर रमेश यादव के इस  संग्रह की कविताओं में भाषा और संवेदना की ताज़गी महसूस की जा सकती हैं । रमेश की भाषा में सरलता और सहजता है। यही  कारण है कि उनकी कविताएं  किसी भूल-भुलैया में भटकाने की जगह सीधे दिल तक पहुँचती हैं एवं देर तक हमारे साथ बनी रहती है। यही रमेश की कविता की शक्ति भी है।हालांकि कवि को एक लंबा सफर तय करना है।उम्मीद है कि आगे का सफर और बेहतर होगा।

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