बेखौफ़ होकर सच बोलतीं कविताएं

पुस्तक समीक्षा

सत्येन्द्र प्रसाद श्रीवास्तव
रोहित कौशिक के कविता संग्रह ‘इस खंडित समय में’ की समीक्षा

जिस समाज में नफ़रत फैलाने वालों को सम्मानित किया जा रहा हो, वह समाज जाहिर तौर अपने पतन के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा होगा। ऐसे समाज में सच बोलने वाले या तो सरेंडर कर चुके होते हैं या फिर चुप्पी साध लेते हैं। सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक स्खलन के इस बुरे दौर में सच बोलना ही सबसे बड़ा जोखिम होता है। सच को झूठ बताने वाला तंत्र इतना प्रभावी और मजबूत होता है कि सच हाशिए पर चला जाता है। कड़वी सच्चाई यह है कि हम अभी ऐसे ही एक दौर में जी रहे हैं। ऐसे दौर में जहां सिर्फ़ जिंदाबाद के नारे हैं, विरोध दिखता ही नहीं। ‘इस खंडित समय में’ भी अगर कविता सच्चाई के साथ पूरे तल्ख तेवर में खड़ी हो तो आश्वस्त हुआ जा सकता है कि तंत्र चाहें जितना भी मजबूत हो जाय, वह कविता का मुंह बंद नहीं कर सकता। कविता सच के साथ खड़ी थी और सच के साथ ही खड़ी रहेगी।

युवा कवि रोहित कौशिक के कविता संग्रह ‘इस खंडित समय में’ की कविताएं ना केवल सच बयां करती है बल्कि तंत्र को बुरी तरह बेनक़ाब भी करती हैं।

आओ हम यों ही

मरते-कटते रहें

और फूलने दें संतों की तोंद

बढ़ने दे  चोटी और तिलक की लंबाई

फलने दें मौलवियों की दाढ़ी।

कि जब तक सम्पूर्ण मानवता का रक्त

संतों की तोंद में न समा जाए

और इस रक्त से पोषित संतों की चोटी

और मौलवियों की दाढ़ी ज़मीन को न छू जाए

आओ हम यों ही काटते रहें

एक-दूसरे का गला।‘  (कविता: आओ, पेज  संख्या: 9)

क्या आज हम सांप्रदायिकता की ऐसी ही गलाकाट अंधी दौड़ में नहीं भाग रहे?  मजहब के नाम पर हमें एक ऐसे अंधेरे की ओर धकेलने की कोशिश की जा रही है, जहां हर आदमी बंटा हुआ है। वो चाहते ही यही है कि हिन्दू हिन्दू बना रहे और मुसलमान, मुसलमान।

हिन्दू, हिन्दू बने रहें

मुसलमान बने रहें मुसलमान

क्योंकि इंसान बनने में

धर्म नष्ट होता है श्रीमान।

(कविता: इंसान बनने में, पेज  संख्या: 19)

धर्म के नाम पर आदमी को बांटने की साज़िश बहुत पुरानी है। सदियों पुरानी और आज भी यह दांव उतना ही कारगर है, जितना हजारों साल पहले था। सूरज तक को पढ़ने में कामयाबी हासिल कर चुका इंसान धर्म का नाम आते ही कूपमंडूक  बन जाता है। जानवर से भी बदतर क्योंकि जानवर धर्म के नाम पर कभी नहीं लड़ते। और इस पूरे खेल के पीछे का मकसद एक ही है सत्ता।

राजनीति के लिए

जरूरी हैं धब्बे

जरूरी है खून

जरूरी है खून की कीमत

(कविता: जरूरी है खून, पेज  संख्या: 23)

रोहित ना केवल इस साज़िश को भलीभांति समझते हैं बल्कि पाठक को इस सच्चाई से आगाह भी करते हैं।

वे चाहते हैं

कि हम उलझे रहें

अंधविश्वासों के मकड़जाल में

ताकि बिल्कुल भी न जले

हमारे दिमाग  की बत्ती

दिमाग की बत्ती

आग बनकर जला  सकती है

मठाधीशों के दरबार

इसलिए वे चाहते हैं

कि हमारे चेतना-तन्तुओं में

प्रवाहित न हो बिजली

(कविता: इस खंडित समय में, पेज  संख्या: 109 )

आदमी के कत्ल पर आज तथाकथित सभ्य समाज व्यथित नहीं होता बल्कि इसके पक्ष में दलीलें गढ़ता है। हैरानी नहीं होती। आदमी तो अब मर रहा है, इंसानियत तो कब की मर चुकी है।

इंसानियत बची रही

तो नष्ट हो जाएगा धर्म

इसलिए घोंप दें छुरा

इंसानियत की पीठ पर

ताकि दोबारा सिर ना उठा सके इंसानियत

शैतानियत की ज़मीन पर

(कविता: इंसान बनने में, पेज  संख्या: 19)

 

इंसानियत विहीन मुर्दा समाज में हर ओर अंधेरा ही होता है लेकिन रोहित को विश्वास है कि  ये अंधेरा ही उजाले का पता बताएगा। यह भरोसा रोहित की कविताओं को एक अलग ऊंचाई देता है।

अंधकार सिर्फ अंधकार नहीं है

संभावना है रोशनी की

कोनों में  पालथी मारकर बैठा अंधकार

एक संभावना लिए

पसर जाता है हर तरफ़

(कविता: संभावना है अंधकार, पेज  संख्या: 76)

रोहित की कविताएं आम आदमी की कविताएं हैं। इसलिए उनकी नज़र से ऐसा कोई पहलू नहीं छूटा है, जिससे आम आदमी की जिंदगी प्रभावित है। चाहें वो घर में घुसता बाज़ार हो या दीमक की तरह रिश्तों का चाटता उपभोक्तावाद या फिर लड़की को सिर्फ देह समझने वाला पुरुष समाज। कुछ कविताओं पर नज़र डालिए

नफे-नुकसान की बुनियाद पर

रिश्ते-नातों के बीच

बन रहा है बाज़ार

इस दौर में

हम बाज़ार को नहीं

बाज़ार हमें नियंत्रित कर रहा है

हमारी रगों में दौड़ रहा है बाज़ारूपन

(कविता: बाज़ार, पेज  संख्या: 38)

***

जहां भी दरकेगी

बाज़ार की ज़मीन

फूटेगा वहीं

इंसानियत का अंकुर

(कविता: बाज़ार, पेज  संख्या: 38)

***

प्रगतिशील समाज में भी

प्रगतिशील गिद्ध बदल नहीं सके

अपनी पुरातन सोच

उनकी सोच मडराती रहती है

हमेशा गदराई देह के आसपास ही

और इसलिए वे गिद्ध हैं आज भी।

(कविता: लड़की, पेज  संख्या: 45)

गांव की ओर बढ़ते शहर के खूनी पंजे भी कवि को चिंतित करते है। शहरीकरण और औद्योगिकीकरण में किस तरह गरीब शोषित है, वह भी उनकी कविताओं में प्रभावी ढंग से प्रतिबिंबित हुआ है।

 

अजीब जंगल है कंक्रीट का

जहां तपन है

फिर भी संबंधों में गर्मी नहीं

आंखें गड़ी हैं छोटे परदे के लटकों-झटकों पर

सुनाई देती हैं रागिनियां सिर्फ़ रेडियो पर ही

एक भी बोल याद नहीं है गंवई गीत का

बच्चे पूछते हैं क्या है आल्हा?

विकास को लेकर दकियानूस

नहीं हूं मैं

चिन्ता है इस एकाकीपन में

कैसे बचा रहेगा गांव?

(कविता: कैसे बचा रहेगा गांव, पेज  संख्या: 15)

***

कोल्हू का बैल

गायब है कोल्हू से

गन्ने से गायब है रस

गुड़ से वो मिठास गायब है

जैसे गायब है बोलचाल से मीठापन

होने और गायब होने के बीच से

जो गायब नहीं होना चाहिए था

वह सब कुछ गायब है

इसीलिए तो

गांव से गांव गायब है

(कविता: गांव से गांव गायब है , पेज  संख्या: 59)

***

अमीरों का मूड अधिकतर ठीक नहीं रहता

क्योंकि गरीबों का मूड अधिकतर ठीक रहता है

(कविता: साहब का मूड, पेज  संख्या: 43)

 

रोहित पत्रकार भी हैं, इसलिए जनता से जुड़े मसलों से सीधे जुड़ते हैं। उन्हें समझते हैं। उनकी समस्याओं पर वो अलग अलग अखबारों में लगातार लिखते रहते हैं। इसलिए उनकी कविताओं में सच्चाई झलकती है। वह बनावटी नहीं लगती। वो खुद भी लिखते हैं

ज़िन्दगी के कागज पर

अहसास की कलम से

लिखी जाती है कविता

(कविता: इस कागज पर, पेज  संख्या: 91)

उम्मीद है उनका ये एहसास लगातार समृद्ध होगा और साथ ही उन अहसासों से लबरेज कविता  भी।

कविता संग्रह : इस खंडित समय में

कवि : रोहित कौशिक

प्रकाशक : शिल्पायन

मूल्य : 250 रुपए

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