शिवदयाल के उपन्यास ‘एक और दुनिया होती’ का एक अंश

                      

रात को ओढ़ने के लिए मेरे पास तो कुछ था नहीं। रात एक झोपड़ी के ओसारे में गुजारनी थी। पुआल का बिस्तर लगा और मुझे सहारा मिला बम्बइया से। उनके पास कंबल था। बीड़ी सुलगाने के पहले उन्होंने कंबल खोला और मुझ पर डाल दिया। कुछ इधर-उधर की बात होती रही। फिर उन्होंने आलाप लिया। एक फिल्मी गाना था। गला उनका अच्छा था लेकिन आरोह-अवरोह पर जैसे कुछ कव्वाली गायकी की छाप थी।

‘आपने सीखा है गाना?’ मैंने पूछा उनसे।

‘नहीं, बचपन से शौकिया गाता चला आ रहा हूँ। अपना भी मन बहल जाता है और लोगों का भी।’

‘आप …. लगता है किसी ग्रुप से जुड़े रहे हैं’

‘‘माने?’’

‘‘यानी कि किसी गीत-संगीत वाली जमात से–जैसे नौटंकी, कव्वाली?

‘‘आपने कैसे जाना?’’

‘‘बस, जान गया। मुझे ऐसा लगा …’’ मैं धीरे से हँसा।

‘‘आप पहले आदमी ही हैं जिसने यह अनुमान लगाया! लेकिन यह बताइए कि क्या आपको भी इस लाइन में दिलचस्पी है, क्यों?’’

‘‘हाँ-हाँ, दिलचस्पी तो है ही। मैं गाना सुनने का बहुत शौकीन हूँ। आप और सुनाइए न। लेकिन आपने यह तो बताया नहीं कि आप किस जमात से जुड़े रहे?’’

‘‘बचपन से ही शौक था। कई पार्टियों से जुड़ा। बारह-तेरह बरस का था। शुरू में रामलीला में सीता का रोल करता रहा। ज्यादा पढ़-लिख नहीं पाया तो अपने को इसी काम में लगाया मैंने। बहुत जगह घूमा भी। बाद में एक नौटंकी पार्टी में आ गया। उन्हें गवैये की जरूरत थी। यह सब करते-करते मैं जवान हो गया और लोगों ने मुझे बम्बइया कहना शुरू कर दिया, बस!’’ वे हँसे।

‘‘अब क्या सब छूट गया?’’

‘‘नहीं, पूरी तरह तो नहीं छूटा, या कहुँ कि मेरा किरदार बदल गया है। यहाँ इतना बड़ा आन्दोलन खड़ा हुआ। साथी लोगों से मुलाकात हुई। मैंने तय किया मैं अब लोगों को रिझाने में नहीं, उन्हें जगाने में खुद को लगाउफँगा। मैंने खुद कई गीत लिखे संघर्ष के, क्रान्ति के और उन्हें गाया-बजाया। बच्चों को भी सिखाता रहता हूँ।’’ उनकी आवाज कुछ पतली थी किन्तु थी खनकदार और उनकी भाषा उस इलाके के लिहाज से कापफी समृद्ध थी।

‘‘आपने शादी की या नहीं?’’

‘‘कभी कोई रिश्ता ही नहीं आया।’’ उन्होंने तपाक से कहा कि मुझे ताज्जुब हुआ।

‘‘अभी तक राह देख रहा हूँ … ’’ वे हँसे। मेरे दोनों पाँव कंबल में होने के बावूद ठंडे हो रहे थे। कुछ गर्म होते तो नींद आती। लेकिन बम्बइया की दिलचस्प बातों में भला नींद जल्द कैसे आ सकती थी।

‘‘लेकिन आप इस आन्दोलन से जुड़े कैसे’’ मुझे जिज्ञासा हुई।

‘‘पहले तो जो मठ के खिलापफ जुलूस निकलते थे तो मुझे लगता था, ये सब स्वार्थी लोग हैं और लोगों को भड़का कर अपना उल्लू सीध कर रहे हैं। लेकिन अपना उल्लू सीध करने के लिए कोई लाठी-गोली खाने को कैसे तैयार हो सकता है। मेरे सामने साथियों की जबरदस्त पिटाई हुई। गोलियाँ चलीं, लेकिन आन्दोलन और जोर ही पकड़ता गया। अमृत, प्रह्लाद, कल्पना और अर्चना जैसी साथियों को देखा तो मुझे लगा कि यह सब कुछ यों ही नहीं है, कुछ बदलने वाला है – सिरे से बदलने वाला है। और जब मैंने यह महसूस कर लिया, खुद को बदलना शुरू कर दिया। एवज में एक बार तीन महीने अंदर रहा तो उल्टे वहाँ और अच्छी ट्रेनिंग हो गई। अब तो इसी में जीना-मरना है।’’

हम दोनों देर तक बातें करते रहे थे। इस तरह के व्यक्ति से पहली मुलाकात थी – अलग-सा स्वाद, अलग तरह का अनुभव। बाद के दिनों में हम दोनों बहुत आत्मीय हो गए थे और फुर्सत के वक्त प्रायः मुझे तो उनकी चाहत हो आती।

उधर संकेत मिलने शुरू हो गए थे कि राजधनी में हमारे संघर्ष को लेकर सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। सरकार पर कई स्तरों पर दबाव बढ़ गया था। एक सरकारी प्रतिनिधिमंडल के क्षेत्र के दौरे का कार्यक्रम शक्ल ले रहा था। यह इसलिए कि हरचंद कोशिशों के बावजूद आंदोलन दबाया नहीं जा सका था। वहाँ दिन ऐसे बीत जाता था कि कुछ पता नहीं चलता था। यों भी सर्दियों के दिन तो छोटे होते हैं। हम कार्यक्रम का संचालन इस प्रकार करते कि कार्रवाइयों वाले या उस जैसे काम दिन में निपट जाएँ और शिक्षण-प्रशिक्षण, गोष्ठियाँ और बैठकें दिन ढलने के बाद हों। अब ऐसा हो गया था कि लगभग हर रोज हमारे रात का ठौर बदलता था। याद है, गणेश का घर एक बार छोड़ने के बाद उधर फिर कभी जाना ही नहीं हुआ। अलग-अलग टीमें बनी थीं। मेरे साथ अर्चना, फुलेसरी, शिशिर, सुमंत और बिन्देश्वर आदि साथी थे। क्या संयोजन था। अर्चना जैसी अग्निशिखा और शिशिर जैसा हिमशैल, फुलेसरी जैसा अधीर तो सुमंत जैसा हर कदम फूँक-फूँक कर रखने वाला शख्स। सुमंत से वहीं भेंट हुई। उसके लतीफे अब भी याद हैं। इतना हँसमुख और खुशमिजाज व्यक्ति मैंने दूसरा नहीं देखा। हाँ, बम्बइया से अक्सर बैठकों में ही भेंट हो पाती।

शिशिर को देखकर मुझे कल्पना की याद हो आती। कई बार मैंने चाहा कि उनसे उस मामले में बात करूँ, लेकिन ऐन वक्त पीछे हट गया। कल्पना उन दिनों प्रांत के बाहर थीं। अर्चना वैसे स्वस्थ नहीं चल रही थी। अक्सर उसे किसी न किसी दवा का सेवन करता देखता। एक दिन उसके पास ही बैठा था, उसने झोले में से एक टिकिया निकाली और निगल गई।

‘‘यह तुम क्या दवाइयाँ लेती रहती हो अर्चना? क्या हुआ तुम्हें?’’

‘‘कुछ नहीं, बस बदन में दर्द है।’’

‘‘इसके लिए दवा की क्या जरूरत है। दर्दनाशक दवाइयाँ ज्यादा नहीं खानी चाहिएँ।’’

‘‘वो तो ठीक है लेकिन क्या करूँ, दर्द ज्यादा है आज कुछ’’

‘‘कहाँ दर्द है अर्चना?’’

‘‘सीने में दर्द है, हफ्रते भर से …’’

‘‘यह तो ठीक नहीं है।’’ मैंने उसे ध्यान से देखा। वह पीली-सी दिखी। निचुड़ा हुआ मुखमण्डल। आँखों के नीचे मध्यम छाँह-सी बनती। मिट्टी की दीवार से लगी थी वह, सामने पाँव फैलाए आँखें बन्द किए। मुझे अनिष्ट की ही आशंका हुई। और वह यों ही नहीं थी। बाद में अर्चना को बहुत झेलना पड़ा। लापरवाही के नतीजे में वह छह महीने तक बिस्तर पर रही। मैं कभी-कभी उसके घर जाता गो कि मुश्किल से उससे मिलने दिया जाता, तो बिस्तर पर पड़ी-पड़ी वह कैसी निरीह लगती। उसकी आँखों के कोरों से बहते आँसू देखकर मन भारी हो जाता। उस दौरान मैंने उसे कई किताबें दी थीं पढ़ने को। वह शायद शारीरिक तकलीफ के साथ किन्हीं स्तरों पर मानसिक त्रास भी झेल रही थी। कहा उसने कभी कुछ नहीं। निम्न मध्यवर्गीय परिवार में लंबा इलाज पूरे कुनबे को तोड़ कर रख देता है। फिर भाइयों पर आश्रित अर्चना! मैं कभी नहीं भूल सकता उसका बिलख-बिलख कर रोना जब मैंने सबकी नजरें बचाकर उसकी हथेली पर सौ रुपया का नोट छोड़ दिया था। लौटकर जीवन में पहली बार मैं उतना रोया था। पैसा क्या अजीब चीज है! कैसे-कैसे भेद खोलता है!

लेकिन यह तो बाद की बात है। उन दिनों तो अर्चना हमारी नेता थी – समर्थ, उर्जस्विनी और निडर। उस दिन बातों ही बातों में उसने बताया कि शिप्रा का विवाह हो गया था। मुझे सुनकर कुछ धक्का-सा लगा। तत्क्षण अमृत का ख्याल आया। क्या पता उसे मालूम भी है या नहीं। सुनकर उसे कैसा लगेगा, यह सोचता रहा। मैंने अर्चना पर कुछ प्रगट नहीं होने दिया। कुछ देर को वातावरण बोझिल-सा हो आया, मैंने उसे हल्का करने की गरज से पूछा,

‘‘अर्चना, तुम्हें नहीं लगता, तुमने जो यह ‘विध्वंसकारी’ भूमिका और मुद्रा अख्तियार की है, यह तुम्हारे लिए शायद सपनों का राजकुमार सुलभ नहीं करा पाएगी?’’

‘‘सपनों का राजकुमार! हुँह! तुम विश्वास करोगे, मैंने कभी इस ओर सोचा ही नहीं! सच!’’

‘‘क्यों अर्चना?’’

‘‘क्यों क्या, बस नहीं सोचा। लेकिन तुम क्या यही सब सोचते रहते हो?’’

‘‘मेरी बात छोड़ो। सवाल पहले मैंने किया है।’’

‘‘तो जवाब तो मैंने दे दिया। कभी नहीं सोचा, लेकिन … सुनो, एक बात ईमानदारी से बताओगे?’’ शातिर मुस्कान थी उसके चेहरे पर। मैं चौंका।

‘‘क्या?’’

‘‘ईमानदारी से बताओगे न?’’

‘‘बोलो तो, क्या?’’

‘‘अपूर्वा क्या तुम्हें बहुत पसंद है? है न?’’

‘‘उफ, अर्चना!’’

‘‘क्यों? है न?’’ वह हँसने लगी और मैं इस प्रसंग से विचित्र मनःस्थिति में घिरा। लेकिन अर्चना ने यह कैसे जाना? तो क्या और भी साथियों पर यह बात जाहिर हो चुकी है? मैंने क्या जाने-अनजाने अपने भाव प्रगट हो जाने दिए हैं? और अपूर्वा? क्या वह भी? ओह!

‘‘क्यों उस बेचारी को मेरे साथ घसीटती हो!’’ मुझसे और कुछ कहते न बना।

‘‘ओ … हो… बेचारी! पकड़े गए न!’’ वह शरारत पर उतर आई थी। हम दोनों की नजरें मिलीं और सहसा हम खिलखिला कर हँस पड़े। और हँसते ही चले गए। यहाँ तक कि उसे खाँसी होने लगी। हँसी का जोर थमने पर उसने कहा

‘‘अपनी तो कहते नहीं, मेरे चक्कर में पड़ते हो। … मुझे कौन पूछता है! और मुझे ही कौन-सी परवाह है! किसे फुर्सत है भला!’’

‘‘अर्चना, अगर कोई मान लो पूछे तो क्या करोगी?’’

‘‘कौन बुद्धू आएगा?’’

‘‘मान लो कोई हो?’’

‘‘मानना ही है तो कुछ भी माना जा सकता है।’’

‘‘नहीं, यह तो तुम जिद कर रही हो!’’

‘‘तुम्हारा सवाल ही बेतुका है। कोई बेवकूफ ऐसा मिला भी तो उसके बारे में अभी से कुछ कैसे कहा जा सकत है? तुम क्या चाहते हो, कोई आ जाए और मैं उसे स्वीकार कर लूँ, बस? मैं ऐसी भी तो नहीं प्रेम कि मैं अस्वीकार के अपने अधिकार से वंचित हो रहूँ?’’

‘ओफ्फ, अर्चना, तुम तो इस प्रसंग को वैचारिक बहस में उतार रही हो! मैं तो तुम्हारा मन जानना चाहता था। …’’

“जान लिया?’’

‘‘हाँ, जान लिया।’’ मैंने मुस्कराकर उससे कहा लेकिन अब तक गंभीर हो आई थी।

अर्चना कंबल ओढ़ कर लेट गई। मैं बाहर निकल आया। शाम ढलने में अभी देर थी। कुछ देर मैं यूँ ही टहलता हुआ बच्चों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता रहा। कुछ स्त्रियाँ बांस के खपच्चों से टोकरी और सूप बना रही थीं। कुछेक आपस में बतियाती जुएँ निकाल रही थीं। धूप में कितने ही चीथड़े या कि गुदड़ियाँ सूखने को डाल दी गई थीं। दूर टोले की सीमा पर जामुन के दो पेड़ साथ लगे खड़े थे। आगे रास्ते से कुछ हट कर जब मैंने गेंदे के फूलों का एक छोटा-सा झुरमुट देखा तो रोमांचित हो गया। पीले और कत्थई फूल! लगता था जैसे कोई बिछुड़ा सहसा आ मिला हो। पौधे बेतरतीबी से उगे थे, कोई साज-सँवार नहीं किया गया था उनका। इससे उनका सौन्दर्य कई गुना बढ़ गया लगता था। थोड़ी देर को मैं वहीं बैठ गया धरती पर – फूलों और पत्तियों को देखता-निरखता। कुछ ही देर में वहाँ मेरे इर्द-गिर्द कुछ बच्चे भी आ खड़े हुए। शायद कौतूहलवश। मैंने उन्हें मुस्कराकर देखा और बैठने को कहा तो दो बच्चे बैठ गए, शेष खड़े ही रहे। बच्चे पाँच से दस बरस के बीच रहे होंगे।

“ये कौन-सा फूल है?’’

‘‘गेंदा!’’ एक ने जवाब दिया।

‘‘तुम इन्हें तोड़ते नहीं?’’

‘‘कभी-कभी तोड़ते हैं!’’

‘‘कभी-कभी इसकी पत्ती तोड़ते हैं।’’

‘‘क्यों, पत्ती क्यों?’’

‘‘घाव पर उसका रस लगाते हैं।’’

‘‘अच्छा?’’

‘‘हाँ!’’

‘‘और धनेसी चाचा जब मरे थे गोली से तो हम लोग माला बनाकर उनको पहनाए थे।’’

जानकारी जैसे मेरा नशा उतारने के लिए काफी थी। फूलों को लेकर जो सौन्दर्य-बोध जगा था, उसकी अकाल-मृत्यु हो गई। कुछ देर को मैं चुप रहा। बच्चे लेकिन वहीं डटे रहे। मैं उनसे बातें करता रहा। कुछ सामान्य जानकारियों की परीक्षा भी लेता रहा। बच्चे अपनी आस-पास की दुनिया से अनभिज्ञ नहीं थे। सभी आन्दोलनकारी मजदूर-किसानों के बच्चे थे। उनके पास सुनाने के लिए भी आन्दोलन से सम्बन्ध्ति किस्से ही थे। कुछ ने भूत-प्रेतों के बारे में भी अपनी जिज्ञासा जरूर प्रगट की। उनमें से दो बच्चों को हिन्दी वर्णमाला और सौ तक गिनती याद थी। स्कूल कोई नहीं जाता था। स्कूल था भी वहाँ से दस कोस दूर। यह बच्चों को बताया गया था। उन्होंने अब तक अपनी आँखों से स्कूल देखा तक नहीं था।

कुछ देर उनके साथ बहला रहा और उन्हें भी बहलाता रहा। मन में सोचता रहा, कल को जब ये बच्चे पढ़ने-लिखने लगेंगे, जब दुनिया एक अलग ही ढंग से इनके सामने खुलना शुरू होगी, तब हमसे ये जाने कौन-कौन से सवालों के जवाब मांगेंगे। सही मायनों में तब इतिहास करवट लेगा।

सामने सूरज डूब रहा था – सुदूर ताड़ के पेड़ों की पंक्ति के पीछे। सिन्दूरी सूरज, जो शनैः शनैः निस्तेज पड़ता जा रहा था। इतनी खामोश शाम! शाम की तो कैसी-कैसी अभिरंजित कल्पनाएँ हैं। यहाँ तो बस दूर तक फैली, फसल से खाली हुई धरती, सूने क्षितिज में जैसे कुछ भरने की कोशिश करते ताड़-वृक्ष, और मेरे बिल्कुल पास यह गेंदे के फूलों का झुरमुट! बस! तभी मेरे सर के ऊपर से बगुलों की कतार गुजरी। मैं फिर से हैरत में पड़ा। ये बगुले किधर से आते हैं, किधर को जाते हैं, कहाँ हैं इनको जीविका देने वाले ताल-तलैया, वे सीधे पश्चिम की ओर उड़ रहे थे – जिधर सूरज डूबने को था – शाम में कुछ रंग भरते हुए।

बच्चे मेरे पास से जा चुके थे। मैं अकेला बैठा था – हल्के-हल्के सिहरता। एक और दिन गया – मैंने अपने आप से कहा और उठ खड़ा हुआ। कुएँ पर हाथ-मुँह धोकर कोठरी में आया। अर्चना मोमबत्ती में कुछ काम कर रही थी। मुझे भी कार्रवाइयों पर रपट तैयार करने को प्रह्लाद ने कहा था सो मैं भी उनके सामने आकर जम गया। कुछ ही देर बाद शिशिर, बिन्देश्वरी और कुछ और साथी आ गए। अगले दिन अमृत के आने की संभावना थी। आगे की योजना पर कुछ विचार-विमर्श हुआ। फिर हमलोग भोजन की जुगत में भिड़े। आज कहीं से मक्के के आटे का जुगाड़ हुआ था। मकई की रोटी और चौलाई की साग। भोजन बाहर ही पका।

छोटी-सी कोठरी में हम पाँच साथी सोए हुए थे। मेरे बगल में शिशिर लेटे थे, अभी जागते मालूम पड़ रहे थे। मैं तो अक्सर सबके सो जाने के बाद ही सो पाता था। रात को पढ़ते-पढ़ते सोने की आदत थी। और यहाँ तो बिजली-बत्ती की कोई बात ही नहीं थी। बिजली के खम्भे तक इस इलाके में नहीं दीखते थे। यहाँ तीन चीजें बिल्कुल अनुपस्थित थीं – सड़क, बिजली और नहर।

सहसा मुझे बगुलों का ध्यान हो आया तो मैंने शिशिर से पूछा – “शिशिर जी, यहाँ माना कि सड़कें नहीं हैं, बिजली तो खैर है ही नहीं लेकिन क्या ताल-तलैया, गड़हे-पोखर कुछ नहीं हैं?”

‘‘यहाँ से कोई अट्ठारह-बीस मील दूर एक जलाशय है – प्राकृतिक जलाशय! उसके आगे पठारी क्षेत्रा शुरू हो जाता है।’’

‘‘तभी कहुँ कि ये बगुले किधर से होकर आते हैं?’’

‘‘कौन?’’

‘‘बगुले, बगुले दिखते हैं आसमान में। मैं सोचता कि पानी तो इधर कहीं दिखता नहीं, बगुले कहाँ इधर भटक आए!’’

‘‘आप भी कमाल के आदमी है!’’ मैंने उनकी इस उक्ति में उपेक्षा को साफ लक्ष्य किया था।

‘‘नहीं, इसमें कमाल की कोई बात नहीं। आस-पास निगाह दौड़ाने की बात है।’’ मैंने सोचा कि वे कुछ कहेंगे लेकिन वे वही शिशिर हो आए – हिम शैल की तरह ठंडे और कठोर। मैंने देखा, आज मौका था। संकोच तो हुआ लेकिन पूछ ही डाला।

‘‘अगर आप सो नहीं रहे हों तो कुछ बात करें?’’

‘‘करिए!’’

‘‘कुछ पूछना चाहता हूँ लेकिन वह आपकी निजता से जुड़ा है।’’

‘‘निजता की बात क्यों करते हैं? कैसी निजता? अगर आप सचमुच मेरी निजता का सम्मान करते हों तो उसके अतिक्रमण का प्रयास करने की क्यों सोचते?’’

‘‘आपको ऐसा लगता है तो मैं अपनी बात वापस लेता हूँ।’’

‘‘देखिए मैं जानता हूँ आप भी वही सब पूछेंगे। मैं जवाब देते थक गया हूँ। क्या सारी जवाबदेही मेरी ही है?’’

‘‘ज्यादा तो है, पूरी न सही।’’

‘‘हमलोग बातें क्रांति की और मुक्ति की करेंगे और निजी रिश्तों से जुड़े मसलों को बेवजह उछालेंगे। बताइए इससे क्या बनता है? मैं मानता हूँ कि हमारा सहजीवन कुछ ही महीनों का साथ बनकर रह गया। ऐसा होना नहीं चाहिए था लेकिन हुआ, वह भी परस्पर सहमति से हुआ …’’

‘‘शिशिर, इसे कुछ ही महीनों का विलास नहीं माना जाए?’’

‘‘विलास! विलास क्या वास्तव में इतना लघुजीवी होता है?’’ उन्होंने व्यंग्य में पूछा मुझसे।

‘‘चलिए, विलास न सही, साथीपन को ही क्या इतना भंगुर होना चाहिए? स्त्री-पुरुष के साथीपन को? आप बाकायदा ऐलान करके एक दूसरे को साथी चुनते हैं, तो क्या उसकी मर्यादा सिर्फ दैहिक रिश्तों की स्वीकार्यता बनाने के लिए हो? मैं आपके सामने एक जिज्ञासा रख रहा हूँ शिशिर, संभव है आपको यह बकवास ही लगे फिर भी रख रहा हूँ। क्या वरेण्यता का अधिकार संबंधों से मुक्ति दिलाने में ही प्रयुक्त होना चाहिए? हम अपने माँ-बाप को इसलिए नहीं बदल सकते कि उन्हें हमने वरा नहीं और पत्नी या पति से इसलिए अलग हो सकते हैं कि उन्हें हमने वरा है, चुना है। और चूंकि वरा है इसलिए छोड़ भी रहे हैं? क्या स्त्री-पुरुष संबंधें की मर्यादा इसी कसौटी पर बनेगी?’’

‘‘मुझे अफसोस है कि संगठन की सारी ट्रेनिंग को आपने अपनी जिज्ञासा से बेकार कर दिया। आप अब भी वहीं हैं जहाँ से शुरू हुए थे। बताइए, आपकी बात और एक कर्मकाण्डी की बात में रत्ती भर का फर्क है? प्रेम, हमने देखा, हम साथ नहीं चल सकते थे सो अलग हो गए। आप जिस बात की वकालत कर रहे हैं वह स्त्रीत्व के दमन का अब तक सबसे बड़ा औजार रहा है। बँधु, जाओ जन्म-जन्मांतर के बंधन में और फिर कभी मुक्त मत होवो – चाहे कितने भी नालायक वर ने तुम्हें वरा हो। मिटा दो उसके श्रीचरणों में अपने सम्पूर्ण अस्तित्व को। आपके हिसाब से स्त्री-पुरुष संबंध में इसी मर्यादा का पालन करते हुए हमें क्रान्तिकारी आन्दोलन की अगुआई करनी चाहिए।’’

मैंने अपनी जिज्ञासा को इस कोण से तो परखा ही नहीं था लेकिन इतना तय था कि जिज्ञासा मेरी ज्यों की त्यों बनी हुई थी। जो उन्होंने कहा था वह अतियों में ले जाने वाली बात थी। मेरा आग्रह तो और ही बातों पर था – क्या वे इतने भोले थे, या फिर इतने उत्कट इंकलाबी जो मेरा आशय न जान रहे हों?

‘‘आप तो मेरी जिज्ञासा को अतियों में ले गए। भला मेरा इन बातों के लिए आग्रह हो सकता है? आपको ऐसा लगता है? मेरी अपनी सोच यह है कि संबंधों से मुक्ति की ऐसी उकताहट से समाज में कुछ नया और सुस्थिर रचने के अवसर हम गँवाते रहेंगे। मैं नहीं जानता कि आप दोनों के बीच आखिर आपने ऐसा क्या पा लिया जो आप अलग हो गए, हठात् अलग हो गए। मैं विश्वास करता हूँ कि जरूर ऐसी ही कोई बात रही होगी जो आप को निर्वाह करना असंभव मालूम हुआ होगा।’’

‘‘सुनो, बड़े दार्शनिक बन रहे हो। सुनो, वह मुझमें किसी और की छाया देखती थी। और यह मुझे सह्य नहीं था। और कुछ जानना चाहते हो? अब आगे फिर कभी कुछ मत पूछना।’’

कैसा आवेग आया होगा कि उन्होंने ऐसा कहा। वे चिल्लाए जरा नहीं थे। उनकी आवाज बस काँप रही थी। और अब वे लम्बी साँसें ले रहे थे। मैं अपने पर झल्लाया कि क्यों मैं राह चलते कुओं में झाँककर देखने की कोशिश कर लेता हूँ।

हिम पिघला तो मानो पहुँच का नहीं रहा। सामने से यूँ ही बह गया। मैंने एक कोशिश की, कंबल में उनकी हथेली टटोलने की क्षमा ज्ञापित करने के लिए। मालूम नहीं कितना सफल रहा।

बड़ी सभा थी। कोई पाँचेक सौ लोग रहे होंगे। बारी-बारी से लोग सम्बोधित कर रहे थे। सूरज एकदम माथे पर था। मैं अमृत की बगल में बैठा था। वह बीच-बीच में कुछ पूछ लेता था मुझसे। उस सभा में छोटन जी को सर्वसम्मति से नेता चुना गया और अपेक्षा की गई कि निर्णायक दौर में उनका नेतृत्व आंदोलन के लिए नई मंजिलें तय करेगा। जमकर भाषण हुए, नारेबाजी हुई। मुझे भी बोलने को कहा गया। मैं क्षेत्र के अपने अनुभव को ही बता सका।

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