दरकते सामाजिक तानेबाने की कहानी है ‘विघटन’

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

इस ‘विघटन’ से बचना मुश्किल है

हम एक ऐसे समाज में रह रहे हैं, जिसमें स्वार्थपरता हावी है। आदमी अपना स्वार्थ पूरा करने के इस हद तक नीचे गिरने को तैयार है, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। नीचता की इस पराकाष्टा के चलते ही सामाजिक तानाबाना दरक रहा है। जयनन्दन का नया उपन्यास ‘विघटन’ इसी दरकते तानेबाने की कहानी है।

‘विघटन’ युवाओं के एक ऐसे समूह की कहानी है, जो इसी स्वार्थपरता के ख़िलाफ़ खड़ा होता है। एक समूह जो अपने नायक सोनवार नरहरि के नेतृत्व में सच के लिए लड़ता है। एक ऐसे वक्त में जब सुविधावाद के आगे आदर्शवाद घुटनों के बल खड़ा है, नरहरि, फुलोदा बेसरा, पखावज महतो, हिचिक मंडल, चस्का मरांडफ, चकरेला हांसदा, मौज ठाकुर, तिरिल, मोगरा, संझा, रंगरेज दुबे, हरफन अंसारी जैसे युवा समाज के लिए लड़ते हैं, दीन-दुखियारों के आंसू पोंछते हैं। हर अन्याय के विरोध में मुठ्ठी बांधकर खड़े हो जाते हैं।

वो मजदूरों का शोषण करने वाली उस कंपनी से लड़ जाते हैं, जिसकी समानान्तर सरकार चलती है। वो चौला सिंह जैसे गुंडे से, कालू मुंडा जैसे भ्रष्ट और मतलबी नेता, मजहब के नाम पर अपना मतलब साधने वाले मुल्ला-मौलवियों से लड़ जाते हैं लेकिन आखिरकार उस वक्त खुद से ही हार जाते हैं, जब उनके अन्दर भी निजी स्वार्थ सिर उठाने लगता है। पखावज कहता है, ‘बहुमत की कद्र होनी चाहिए दोस्त। बहुमत अगर नाजायज़ को भी स्वीकार कर लेता है तो उसे मानना पड़ता है।‘ और इस तरह बहुमत के आगे अच्छाई और सच अप्रासंगिक हो जाता है। नरहरि अपने उन्हीं  दोस्तों से हार जाता है, जिनके बल पर उसने कई बार बुराई को शिकस्त दी थी। समाज के बारे में सोचने वाले नरहरि के दोस्त जब अपने बारे में सोचने लगते हैं तो उसी फांद में फंस जाते हैं, जिसे काटने की लड़ाई वो लड़ते रहे। स्वार्थपरता के आगे आदर्शवाद का स्खलन होता है और सबकुछ खत्म हो जाता है।

इस बुराई के बहुमत को हम आप हर रोज़ झेलते हैं। कई बार गलत चीज़ों को मानने के लिए हम इसलिए भी मज़बूर हो जाते हैं क्योंकि बहुमत उसके साथ होता है। सामाजिक, राजनीतिक, औद्योगिक, सांस्कृतिक हर क्षेत्र में हम इस विघटन के दौर से गुजरते हैं और जयनन्दन ने अपने उपन्यास में इसे बहुत ही प्रभावी ढंग से चित्रित किया है।

जब आप इस उपन्यास को पढ़ेंगे तो आप अपने अन्दर भी एक सोनवारे  नरहरि को महसूस करेंगे। हर इंसान के अंदर एक नरहरि होता ही होता है। सिर्फ नरहरि ही नहीं बल्कि हम सबमें नरहरि के साथ ही साथ थोड़ा फुलोदा थोड़ा पखावज थोड़ा हिचिक हैं लेकिन इस भागमभाग की ज़िन्दगी में सिर्फ अपने लिए सोचते हुए हम धीरे-धीरे इन्हें मारते जाते हैं।

विघटन की कहानी एक शहर विधातानगर की कहानी है। विधातानगर विधाता स्टील कंपनी का बसाया हुआ शहर है। कंपनी है तो शोषण है, शोषण है तो यूनियन है, यूनियन है तो मैनेजमेंट की दलाली है। मजदूर पिसता रहता है, मरता रहता है लेकिन उनकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं। जब किसी मजदूर नेता की आत्मा जगती है तो उसे मुरारीलाल की तरह मौत की नींद सुला दिया जाता है।

उपन्यास जितनी काल्पनिक है, उससे ज्यादा कहीं वास्तविक है। जब आप उपन्यास से गुजरेंगे तो आपको बड़ी आसानी से यह पता चल जाएगा कि किस शहर की कहानी है, किसी कारखाने की बात हो रही है, किस नेता की चर्चा हो रही है। इन सबके चित्र आपकी आंखों के सामने घूमने लगेंगे। जयनन्दन ‘विघटन’ के जरिए समाज की एक कड़वी सच्चाई को बड़े ही प्रभावी ढंग से कहने में कामयाब रहे हैं।

–सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

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