Category: गद्य

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देह में स्त्री या पुरुष होता ही है

जयप्रकाश मानस 29 अक्टूबर, 2015 मिस्र में टैगोर अहमद स्वाकी मिस्र के जाने-माने कवि थे । नाटककार भी । उन्हें आधुनिक मिस्र साहित्य का पायोनियर माना जाता है । उनका जन्म 16 अक्टूबर, 1868 में हुआ । 14 अक्टूबर 1932 तक उन्होंने अपने जीवन काल में कई नाटकों और कविताओं...

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हताश लोगों के साथ खड़ा कवि विमलेश त्रिपाठी

शहंशाह आलम कवि परिचय विमलेश त्रिपाठी परिचय : विमलेश त्रिपाठी बक्सर, बिहार के एक गाँव हरनाथपुर में जन्म। प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही। प्रेसिडेंसी कॉलेज से स्नातकोत्तर, बीएड। कलकत्ता विश्वविद्यालय से केदारनाथ सिंह की कविताओं पर पी-एच.डी। देश की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, समीक्षा, लेख आदि का प्रकाशन।...

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हिंदी हैं हम वतन हैं, हिंदुस्तां हमारा

संजय स्वतंत्र आज आखिरी कोच में बैठे हुए सोच रहा हूं कि हर साल पितृपक्ष में लोग पितरों को याद करते हुए पिंडदान करते हैं। ठीक इसके बरक्स हमारे यहां हिंदी पखवाड़ा शुरू हो जाता है। यह कैसा संयोग है कि दोनों पखवाड़ों में हम अपने अतीत को याद करते...

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कहानी विचार का पानी भी है

जयप्रकाश मानस 23 अक्टूबर 2015 मेरे घर आईं 3 नन्हीं परी शीला, अम्बिका और अहल्या !किसी और से मिलूँ न मिलूँ, इन तीन निश्छल परियों से ज़रूर मिलता हूँ। जब कभी गाँव जाता हूँ, मोहल्ले की ये तीनों बच्चियाँ ज़रूर चली आती हैं मुझसे मिलने। ये नहीं आती तो खुद...

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सुशान्त सुप्रिय की कहानी ‘इंडियन काफ़्का’

सुशान्त सुप्रिय A-5001 ,             गौड़ ग्रीन सिटी ,             वैभव खंड ,             इंदिरापुरम ,             ग़ाज़ियाबाद – 201014             ( उ. प्र. )...

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फेंटिए, फेंकिए और फंसाइए !

जयप्रकाश मानस 16 अक्टूबर, 2015 तलाश मैं रोज़ एक अपरिचित संसार से परिचय की तलाश में रहता हूँ,  जहाँ नये सूरज, चाँद, सितारे, आकाश, लोग-बाग, घर-आँगन, अपनी नई उदासी और नई जिजीविषा के साथ मुझसे बतियाने की फ़िराक़ में हों । तलाश एकतरफ़ा तो है नहीं ? तलाश नदी से...

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दूसरी भाषा में पाठक ज्यादा, हिन्दी में कवि

जयप्रकाश मानस 3 अक्टूबर, 2015 चला अब बिहू प्रदेश की ओर आज से आने वाले 10 दिन तक चाय और बिहू प्रदेश आसाम में । जोरहाट में साथहोंगे असम के नवलेखक और देश के कुछ लेखक मित्र । मानव संसाधन विकास मंत्रालय(केंद्रीय हिंदी निदेशालय) के इस नवलेखक शिविर में नवागतों...

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सूर्यनाथ सिंह की कहानी ‘रजामंदी’

सूर्यनाथ सिंह जन्म : 14 जुलाई 1966 स्थान : सवाना, गाजीपुर इलाहाबाद विश्वविद्यालय और फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढाई कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित। नया उपन्यास ‘नींद क्यों रात भर नहीं आती’ हाल ही में प्रकाशित। जनसत्ता  में वरिष्ठ पत्रकार ‘साहब, मेम साहब आई हैं।’ मुन्नन मियां...

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सलामत रहे दोस्ताना हमारा

  संजय स्वतंत्र मेट्रो में यात्रा करते समय फेसबुक मेसेंजर पर आए मित्रों के संदेश प्राय: मेरा ध्यान खींच लेते हैं। आज दफ्तर जाते समय बीप की ध्वनियों को मैंने नजरअंदाज कर दिया। ऐसा अक्सर होता है, जब मैं तमाम संदेश फुर्सत में या फिर सफर के दौरान पढ़ता हूं।...

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हिजाब वाली लड़की

अली रिज़वान शिक्षा- जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्लीलेखक “कहानी डिपो” यूट्यूब चैनल एडिटर और कहानी सलाहकार हैं।मोबाइल-9899367276 इधर ईद करीब आ रही थी उधर आदिल और जुनैद के दिमाग़ में एक अलग ही खिचड़ी पक रही थी। आदिल ने एक बार जुनैद को किसी वेश्या के बारे में बताया था।...

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रौंदी गई घास प्रगतिशील या उस पर चलने वाले?

जयप्रकाश मानस 1 अक्टूबर, 2015 ऊँचे-नीचे पेड़ कितने भी उँचे क्यों न हों, उसके फल नीचे ही गिरते हैं । चाहूँगा मैं तुझे साँझ-सवेरे 50 से ज़्यादा सालों तक हिंदी फ़िल्मों के लिए गीत लिखने और प्रगतिशील आंदोलन के उर्दू के सबसे बड़े शायरों में से एक थे महरुह सुल्तानपुरी...

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‘कड़वी हवा’ के बहाने कुछ कड़वी बातें

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव बंजारे लगते हैं मौसम मौसम बेघर होने लगे हैं  जिस देश में हर साल औसतन 12,000 किसान खुदकुशी कर लेते हों, उस देश में मौसम के बेघर हो जाने पर सवाल उठना लाजिमी है। ‘कड़वी हवा’ (रिलीज डेट 24 नवंबर) फिल्म के क्लाइमेक्स पर गुलजार की धीर-गंभीर...

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चिठिया हो तो हर कोई बांचे…

संजय स्वतंत्र आज दफ्तर के लिए निकला ही था कि डाकिए ने रास्ता रोक लिया। वह अपनी साइकिल के पीछे बंधे बंडल से कोई पैकेट निकाल रहा है। शायद कोई साहित्यिक पत्रिका रही होगी, जो अमूमन मेरे पास आती रहती हैं। यों सरकारी चिट्ठी-पत्री और चेकबुक आदि लेकर यह डाकिया...

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‘लोकभाषा बचेगी, तभी हिन्दी बचेगी’

  जयप्रकाश मानस 30 सितंबर, 2015 उनके पड़ोस में आज के दिन विशेष तौर पर याद आ रहे हैं – छायावाद शब्द के प्रथम प्रयोक्ता, छायावादी कविता के जनक पद्मश्री मुकुटधर पांडेय । उनकी कविता ‘कुर्री के प्रति’ पहली छायावादी रचना मानी जाती है। आज यानी 30 सितम्बर 1895 को...

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एक था रिक्शावाला

  संजय स्वतंत्र दफ्तर के लिए निकल गया हूं। मगर मेट्रो स्टेशन जाने के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा। न फीडर बस और न ही बैटरी रिक्शा। काफी इंतजार के बाद एक रिक्शावाला आता दिख रहा है। उसे रुकने का इशारा किया है। ओह! इस बंदे की तो पूरी...

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…तो सभी पत्रकार उपन्यासकार होते

  जयप्रकाश मानस 20 सितंबर, 2015 22 भाषा 43 कवि हिंदी अकादमी शायद देश की पहली सरकारी संस्था है जो भारतीय भाषाओं के कवियों को निरंतर दो दिनों तक एक मंच पर जोड़कर उनके मध्य संवाद रचती है । ‘भारतीय कविता बिम्ब’ नामक यह महत्वपूर्ण आयोजन दिल्ली में पिछले कई...

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सोने की पाजेब

  संजय स्वतंत्र लेखक जनसत्ता, दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार हैं। कुछ दिन पहले की बात है। न्यूजरूम में काम करते हुए एक खबर पर मेरी नजर ठिठक गई। खबर थी-दुल्हन ने किया नशेड़ी से शादी से इनकार। यह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की खबर थी, जहां एक युवती ने...

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दरबारी रचनाकार जीता कम, मरता ज्यादा है

  जयप्रकाश मानस एक कवि की डायरी किस्त : 12 11 सितंबर 2015 अँधेरा : अदृश्य मदारी कथाकार उद्भ्रांत जी की एक चर्चित कहानी है – ‘डुगडुगी’, जिसमें अँधेरा अदृश्य मदारी का रूप धारण कर लेता है और तरह-तरह के खेल रचाता है । अब यह सच होते दिखाई देने...

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खुद को बदलो, देश को बदलो

  संजय स्वतंत्र किस्त : 10 आज घर की दिनचर्या पूरी करने के बाद जब दफ्तर के लिए चला तो देखा कि बाहर पिताजी गमछा-बनियान में ही खड़े हैं और ठेले वाले से सब्जियां खरीद रहे हैं। एक रिटायर आला अफसर को यों इस अंदाज में देख मैं संकोच में...

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बुढ़ापे में पत्नी और पैसा ही काम आते हैं

  जयप्रकाश मानस किस्त : 11 8 सितम्बर, 2015 कौन हिंदुस्तानी, कौन पाकिस्तानी 1965 के युद्ध के बाद रेडियो पाकिस्तान से फ़िराक़ गोरखपुरी की ग़ज़लें बजनी बंद हो गईं थीं, पता चला कि अब किसी भी हिंदुस्तानी शायर का कलाम नहीं बजेगा। किसी ने रेडियो पाकिस्तान, कराची की दीवार पर...