Category: ग़ज़ल

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डॉ भावना कुमारी की पांच ग़ज़लें

1 कैसा अपना है ये सफ़र मालिक कुछ न आता है अब नज़र मालिक लूट लाते हैं, कूट खाते हैं कर रहे हैं गुजर -बसर मालिक चोट जब भी लगी है सीने पर टूटने लगती है कमर मालिक आ ही जाता है सबके चेहरे पर बीतती उम्र का असर मालिक...

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मनी यादव की एक ग़ज़ल

मेरा मुकद्दर ग़म की कालिखों में उलझ गया चराग-ए-मोहब्बत जलने से पहले बुझ गया मुस्कराने ही वाला था आंसुओं की सम्त देखकर उससे पहले ही खुशियों का कारवां गुज़र गया वाकया-ए-ज़िन्दगी में ग़ुरबत एक अभिशाप है जो उलझा था सवाल आज वो सुलझ गया ज़माने से तेरी अदावत पहले ही...

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हंसराज की चार ग़ज़लें

एक जब से सुना कि माँ बीमार पड़ गई हम भाइयों के बीच दरार पड़ गई सबसे बड़ा नुकसान  बंटवारे का ये हुआ, मां आधी इस पार, आधी उस पार पड़ गई उम्रों की जमापूंजी थी रिश्तों की ये दौलत, आज वो ही सरेआम  तार-तार पड़ गई मशरूफ हैं हम...

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‘ऐनुल’ बरौलीवी की ग़ज़ल

मेरी दुआओं में असर दे दे मौला फ़क़त अपनी नज़र दे दे ये ज़िन्दगी मेरी संवारो तुम ऐसी इनायत का शजर दे दे ईमान मेरा ये मुक़्क़मल हो मुझको मदीने का सफ़र दे दे इज़्ज़त मुझे भी बख़्श दे मौला रहमत तू अपनी मेरे सर दे दे मैं दुश्मनों का...

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पद्मश्री स्वर्गीय बेकल उत्साही को श्रद्धांजलि

एक इक दिन ऐसा भी आएगा होंठ-होंठ पैमाने होंगे मंदिर-मस्जिद कुछ नहीं होंगे घर-घर में मयख़ाने होंगे जीवन के इतिहास में ऐसी एक किताब लिखी जाएगी जिसमें हक़ीक़त औरत होगी मर्द सभी अफ़्साने होंगे राजनीति व्यवसाय बनेगी संविधान एक नाविल होगा चोर उचक्के सब कुर्सी पर बैठ के मूँछें ताने...

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सुरेखा कादियान ‘सृजना’ की तीन ग़ज़लें

एक जिन्दगी को पहेली बनाया न करो दर्द हो दिल में गर मुस्कुराया न करो परदा न हो कोई अपनों से कभी राज गैरों को मगर बताया न करो डर अंधेरों से है जो इतना तुमको सितारों से घर अपना सजाया न करो न हो कि डाल दें तुम्हें ही...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक कोई  तस्वीर  धुंधली  सी  ख़यालों में उभरती है मगर वो मजहबी झगड़ों में कुछ कहने से डरती है नए लफ़्ज़ों  के  लहंगे में सियासत जब उतरती  है सहम जाती है हर ख़्वाहिश शराफ़त घुटके मरती है किसी के  इश्क़ में  अपनी कोई  चाहत नहीं होती मुहब्बत  हुक़्म  देती  है ...

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लकी निमेष की दो ग़ज़लें

एक पसीना वो बहाकर देख बच्चों को खिलाता है जला के खून सारा दूध वो उनको पिलाता है अदाकारी गरीबों में गरीबी ला ही देती है जिसे ग़म हजारो हैं वही हँसकर दिखाता है अमीरों सीख लो हुनर तुम भी गरीबों का कि आँसू आँख में होते हुए कैसे छिपाता...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक मैं  ढूँढता हूँ आज  मेरा  घर कहाँ गया रिश्तों  के बीच प्यार का मंज़र कहाँ गया अपनी ही धुन में लोग हैं खोए हुए तमाम तनहा  हरेक  शख्स है लश्कर कहाँ गया वो भी तो अपने आप में सिमटा रहा बहुत मैं भी हदों को  तोड़ के बाहर  कहाँ ...