Category: ग़ज़ल

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लकी निमेष की दो ग़ज़लें

एक पसीना वो बहाकर देख बच्चों को खिलाता है जला के खून सारा दूध वो उनको पिलाता है अदाकारी गरीबों में गरीबी ला ही देती है जिसे ग़म हजारो हैं वही हँसकर दिखाता है अमीरों सीख लो हुनर तुम भी गरीबों का कि आँसू आँख में होते हुए कैसे छिपाता...

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अनिरुद्ध सिन्हा की पांच ग़ज़लें

एक मैं  ढूँढता हूँ आज  मेरा  घर कहाँ गया रिश्तों  के बीच प्यार का मंज़र कहाँ गया अपनी ही धुन में लोग हैं खोए हुए तमाम तनहा  हरेक  शख्स है लश्कर कहाँ गया वो भी तो अपने आप में सिमटा रहा बहुत मैं भी हदों को  तोड़ के बाहर  कहाँ ...