Category: डायरी

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क्या कोई भी रचनाकार दुष्ट नहीं?

जयप्रकाश मानस 13, नवंबर, 2015 हिंदी की शुष्कता या उर्दू की रवानी ? गोपेश्वर सिंह जी हिंदी के ऐसे जाने-माने प्रोफ़ेसर-लेखक-आलोचक हैं, जिनकी बातें गंभीरता से सुनी जाती रही हैं । कई बाबा नागार्जुन से लेकर अब की पीढ़ी और उनकी दुनिया की रंगत को क़रीब से देखते-परखते रहे हैं...

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धर्म अंहकार का विसर्जन, विजय अंहकार का विस्तार

जयप्रकाश मानस डायरी के ये पन्ने भी पढ़ें 10 नवंबर, 2015 पढ़ता था तो पानी के बर्तन लेकर (बिज्जी जी की पुण्यतिथि पर ) “खोजे खोजे खोजेगा तो तीन लोक को पायेगा, पाए पाए पायेगा तो कित्ता गडेरा खाएगा। विजयदान देथा जी कहते थे –“बचपन में जब शरतचंद्र को पढ़ता...

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आदमी और राजा

जयप्रकाश मानस 6 नवंबर, 2015 बेटियों के साथ कुछ पल फ़ैशन इंस्टीट्यूट (काईट कॉलेज, रायपुर) में पढ़-सीख रही हमारी बेटियों द्वारा दीपावली पर बहुत सारी चीज़ों के डिजाइनों की प्रदर्शनी और सेल में घूमते हुए आज लगा : “बेटियों की क्रियाशीलता को पहचानना और उन्हें सही दिशा में प्रोत्साहित करना...

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‘राजनीतिक रूप से अशिक्षित व्यक्ति सबसे निकृष्ट अशिक्षित’

साहित्यिकी या राजनीति पश्चिमी दुनिया की तर्ज़ पर हिन्दी की कुछ गिनी चुनी पत्र-पत्रिकाएँ भी हर साल कथित श्रेष्ठता के अनुमापन के लिए अपने-अपने हिसाब से पुस्तक-पाठक सर्वेक्षण कराती रही हैं। ताज्जुब नहीं कि हर आयोजकों द्वारा घोषित संबंधित विधाओं की वर्ष की सर्वश्रेष्ठ कृतियों की सूची एक-सी नहीं होती...

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देह में स्त्री या पुरुष होता ही है

जयप्रकाश मानस 29 अक्टूबर, 2015 मिस्र में टैगोर अहमद स्वाकी मिस्र के जाने-माने कवि थे । नाटककार भी । उन्हें आधुनिक मिस्र साहित्य का पायोनियर माना जाता है । उनका जन्म 16 अक्टूबर, 1868 में हुआ । 14 अक्टूबर 1932 तक उन्होंने अपने जीवन काल में कई नाटकों और कविताओं...

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कहानी विचार का पानी भी है

जयप्रकाश मानस 23 अक्टूबर 2015 मेरे घर आईं 3 नन्हीं परी शीला, अम्बिका और अहल्या !किसी और से मिलूँ न मिलूँ, इन तीन निश्छल परियों से ज़रूर मिलता हूँ। जब कभी गाँव जाता हूँ, मोहल्ले की ये तीनों बच्चियाँ ज़रूर चली आती हैं मुझसे मिलने। ये नहीं आती तो खुद...

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फेंटिए, फेंकिए और फंसाइए !

जयप्रकाश मानस 16 अक्टूबर, 2015 तलाश मैं रोज़ एक अपरिचित संसार से परिचय की तलाश में रहता हूँ,  जहाँ नये सूरज, चाँद, सितारे, आकाश, लोग-बाग, घर-आँगन, अपनी नई उदासी और नई जिजीविषा के साथ मुझसे बतियाने की फ़िराक़ में हों । तलाश एकतरफ़ा तो है नहीं ? तलाश नदी से...

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दूसरी भाषा में पाठक ज्यादा, हिन्दी में कवि

जयप्रकाश मानस 3 अक्टूबर, 2015 चला अब बिहू प्रदेश की ओर आज से आने वाले 10 दिन तक चाय और बिहू प्रदेश आसाम में । जोरहाट में साथहोंगे असम के नवलेखक और देश के कुछ लेखक मित्र । मानव संसाधन विकास मंत्रालय(केंद्रीय हिंदी निदेशालय) के इस नवलेखक शिविर में नवागतों...

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रौंदी गई घास प्रगतिशील या उस पर चलने वाले?

जयप्रकाश मानस 1 अक्टूबर, 2015 ऊँचे-नीचे पेड़ कितने भी उँचे क्यों न हों, उसके फल नीचे ही गिरते हैं । चाहूँगा मैं तुझे साँझ-सवेरे 50 से ज़्यादा सालों तक हिंदी फ़िल्मों के लिए गीत लिखने और प्रगतिशील आंदोलन के उर्दू के सबसे बड़े शायरों में से एक थे महरुह सुल्तानपुरी...

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‘लोकभाषा बचेगी, तभी हिन्दी बचेगी’

  जयप्रकाश मानस 30 सितंबर, 2015 उनके पड़ोस में आज के दिन विशेष तौर पर याद आ रहे हैं – छायावाद शब्द के प्रथम प्रयोक्ता, छायावादी कविता के जनक पद्मश्री मुकुटधर पांडेय । उनकी कविता ‘कुर्री के प्रति’ पहली छायावादी रचना मानी जाती है। आज यानी 30 सितम्बर 1895 को...

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…तो सभी पत्रकार उपन्यासकार होते

  जयप्रकाश मानस 20 सितंबर, 2015 22 भाषा 43 कवि हिंदी अकादमी शायद देश की पहली सरकारी संस्था है जो भारतीय भाषाओं के कवियों को निरंतर दो दिनों तक एक मंच पर जोड़कर उनके मध्य संवाद रचती है । ‘भारतीय कविता बिम्ब’ नामक यह महत्वपूर्ण आयोजन दिल्ली में पिछले कई...

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दरबारी रचनाकार जीता कम, मरता ज्यादा है

  जयप्रकाश मानस एक कवि की डायरी किस्त : 12 11 सितंबर 2015 अँधेरा : अदृश्य मदारी कथाकार उद्भ्रांत जी की एक चर्चित कहानी है – ‘डुगडुगी’, जिसमें अँधेरा अदृश्य मदारी का रूप धारण कर लेता है और तरह-तरह के खेल रचाता है । अब यह सच होते दिखाई देने...

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बुढ़ापे में पत्नी और पैसा ही काम आते हैं

  जयप्रकाश मानस किस्त : 11 8 सितम्बर, 2015 कौन हिंदुस्तानी, कौन पाकिस्तानी 1965 के युद्ध के बाद रेडियो पाकिस्तान से फ़िराक़ गोरखपुरी की ग़ज़लें बजनी बंद हो गईं थीं, पता चला कि अब किसी भी हिंदुस्तानी शायर का कलाम नहीं बजेगा। किसी ने रेडियो पाकिस्तान, कराची की दीवार पर...

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महान होने का मतलब

  जयप्रकाश मानस किस्त -दस 3 सितम्बर, 2015 फूले कास सकल मही छाई रायपुर और नया रायपुर के बीच 30-35 किलोमीटर का फ़ासला है । दोनों तरफ़  हरे-भरे खेत, घास या फूलों की क्यारियाँ । आज मंत्रालय जाते वक्त एकाएक दिख पड़े कास के सफेद फूल । बरबस याद आ...

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विद्वानों की परिभाषा

  जयप्रकाश मानस एक कवि की डायरी :  किस्त 9 30 अगस्त, 2015 विद्वता : कुछ उत्तर आधुनिक परिभाषाएँ महान और तुच्छ में जो कोई फ़र्क न बता सके, उसे ज्ञानपीठी विद्वान कहा जाये । जो राग-द्वेष के आधार पर निर्णय लिखे, उसे पहले-पहल विद्वान समझा जाये । जो इतिहास...

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अभी तो दुनिया में अन्धेर है

  जयप्रकाश मानस एक कवि की डायरी : किस्त 7 29 अगस्त, 2015 अभी तो दुनिया में अन्धेर है दिन कब का ढल चुका है, जबकि मेरे भीतर हेमंत दा का स्वर गूँज रहा है, प्रदीप का यह अमर गीत, लक्ष्मीकांत – प्यारेलाल का लाजबाब संगीत के साथ, जो मेरे...

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भगवान हो सकता है कलेक्टर

  जयप्रकाश मानस www.srijangatha. com कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक) एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा रायपुर, एक कवि की डायरी : किस्त 6 25 अगस्त, 2015 एक कली दो पत्तियाँ फाइल में उलझे-उलझे बरबस याद आ गये महान संगीतकार भूपेन दा और उनका यह सुमधुर गीत – मन है कि भीतर-ही-भीतर...

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शहर काइयांपन सिखाता है

जयप्रकाश मानस www.srijangatha. com कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक) एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा रायपुर, एक कवि की डायरी किस्त : 5 28 नवंबर, 2011 तदर्थ उपाय मलेशिया ने टैक्सी चालकों द्वारा महिलों के साथ बलात्कार और डकैती की घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए महिलाओं के लिए महिला चालकों द्वारा...

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परिवर्तन ईमानदार समाज ही कर सकता है

जयप्रकाश मानस संपादक, www.srijangatha. com कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक) एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा रायपुर, एक कवि की डायरी : किस्त 4 10 नवंबर, 2011 जानना है बहुत कुछ आ.रंजना अरगड़े (गुजरात विश्वविद्यालय, अहमदाबाद) ने बड़ी आत्मीयता के साथ 23-24 दिसंबर को होने वाले राष्ट्रीय संगोष्ठी में ‘साहित्य तथा प्रौद्योगिकी...

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एक कवि की डायरी : भाग 3

जयप्रकाश मानस संपादक, www.srijangatha.com कार्यकारी संपादक, पांडुलिपि (त्रैमासिक) एफ-3, छगमाशिम, आवासीय परिसर, पेंशनवाड़ा रायपुर, 18 अक्टूबर, 2011 माँ और घर माँ आज शाम की ट्रेन से गाँव लौट गयी । घर ख़ाली-ख़ाली नज़र आता है । माँ का रहना घर का भरा-पूरा होना होता है । माँ का रहना घर...