Category: द लास्ट कोच

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बंद कमरे से आतीं चीखें

संजय स्वतंत्र उस शहर में किराए के दो कमरे वाला हमारा घर था। तब छठी कक्षा का विद्यार्थीं था। बस होश संभाल ही रहा था मैं। मकान मालिक की बेटी सुनीता मेरी अच्छी दोस्त बन गई थी। वह आठवीं में पढ़ती थी। बात बरसों पुरानी है। उस समय गुड्डे-गुड़ियों का...

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हिंदी हैं हम वतन हैं, हिंदुस्तां हमारा

संजय स्वतंत्र आज आखिरी कोच में बैठे हुए सोच रहा हूं कि हर साल पितृपक्ष में लोग पितरों को याद करते हुए पिंडदान करते हैं। ठीक इसके बरक्स हमारे यहां हिंदी पखवाड़ा शुरू हो जाता है। यह कैसा संयोग है कि दोनों पखवाड़ों में हम अपने अतीत को याद करते...

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अकेले हैं तो क्या ग़म है!

संजय स्वतंत्र उस दिन अस्पताल के इमरजंसी वार्ड में वे व्हीलचेयर पर दिखे। तबीयत बहुत खराब थी उनकी। शायद उन्हें नौकर लेकर वहां आया था। मैंने उससे पूछा, ‘कोई साथ नहीं आया?’ उसका जवाब था, ‘घर में बेटे-बहू हैं, लेकिन किसी को फुर्सत नहीं।’ उसकी बात सुन कर मैं सन्न...

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सलामत रहे दोस्ताना हमारा

  संजय स्वतंत्र मेट्रो में यात्रा करते समय फेसबुक मेसेंजर पर आए मित्रों के संदेश प्राय: मेरा ध्यान खींच लेते हैं। आज दफ्तर जाते समय बीप की ध्वनियों को मैंने नजरअंदाज कर दिया। ऐसा अक्सर होता है, जब मैं तमाम संदेश फुर्सत में या फिर सफर के दौरान पढ़ता हूं।...

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चिठिया हो तो हर कोई बांचे…

संजय स्वतंत्र आज दफ्तर के लिए निकला ही था कि डाकिए ने रास्ता रोक लिया। वह अपनी साइकिल के पीछे बंधे बंडल से कोई पैकेट निकाल रहा है। शायद कोई साहित्यिक पत्रिका रही होगी, जो अमूमन मेरे पास आती रहती हैं। यों सरकारी चिट्ठी-पत्री और चेकबुक आदि लेकर यह डाकिया...

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एक था रिक्शावाला

  संजय स्वतंत्र दफ्तर के लिए निकल गया हूं। मगर मेट्रो स्टेशन जाने के लिए कोई साधन नहीं मिल रहा। न फीडर बस और न ही बैटरी रिक्शा। काफी इंतजार के बाद एक रिक्शावाला आता दिख रहा है। उसे रुकने का इशारा किया है। ओह! इस बंदे की तो पूरी...

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सोने की पाजेब

  संजय स्वतंत्र लेखक जनसत्ता, दिल्ली में वरिष्ठ पत्रकार हैं। कुछ दिन पहले की बात है। न्यूजरूम में काम करते हुए एक खबर पर मेरी नजर ठिठक गई। खबर थी-दुल्हन ने किया नशेड़ी से शादी से इनकार। यह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की खबर थी, जहां एक युवती ने...

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खुद को बदलो, देश को बदलो

  संजय स्वतंत्र किस्त : 10 आज घर की दिनचर्या पूरी करने के बाद जब दफ्तर के लिए चला तो देखा कि बाहर पिताजी गमछा-बनियान में ही खड़े हैं और ठेले वाले से सब्जियां खरीद रहे हैं। एक रिटायर आला अफसर को यों इस अंदाज में देख मैं संकोच में...

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हाफ गर्लफ्रेंड

  संजय स्वतंत्र द लास्ट कोच : किस्त 9 राजीव चौक से वह मेरे साथ ही आखिरी डिब्बे में सवार हुई है। वह जिस तरह बार-बार अपने चेहरे को पोंछ रही है, उससे लगता है कि वह काफी दूर से और कई काम निपटा कर आई है। रूमाल से वह...

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राजनीति और सरोकार

  संजय स्वतंत्र द लास्च कोच : किस्त 8 आज दफ्तर जाने के लिए घर से निकला तो देखा कि चुनाव जीत चुके नेताजी होर्डिंग पर टंग गए हैं। अब वे तस्वीरों में ही नजर आाएंगे, उन सरमाएदारों के साथ जो चुनाव के दौरान उनके साथ लगे रहे। जमीन-जायदाद का...

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जरा नज़रों से कह दो जी…

  संजय स्वतंत्र द लास्ट कोच : किस्त 7 आज मेट्रो में भीड़ की वजह से सीट नहीं मिली है। तो ऐसी हालत में हमेशा की तरह गेट के किनारे खड़ा हो गया हूं। हर स्टेशन पर यात्री ऐसे घुस रहे हैं, जैसे अगली मेट्रो कभी आएगी ही नहीं। मेरी...

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क्यों न खुश रहें हम

  संजय स्वतंत्र द लास्च कोच : किस्त 6 मेरे आज लिखे के साथ जो तस्वीर देख रहे हैं ना, वो हॉलीवुड की अदाकारा क्रिस्टिन बेल की है, जो हाल में अनजाने में ही अपने एक बयान से सबको खुशियों की सौगात दे गर्इं। कैसे? इसकी चर्चा आगे करूंगा। दरअसल,...

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लौट आओ गौरैया

  संजय स्वतंत्र द लास्ट कोच : किस्त 5 दिल्ली में बरसों से नन्हीं सुकोमल गौरैया नहीं दिख रही। किसी को मालूम भी नहीं कि वह कहां गुम हो गई। एक दिन दफ्तर के सबसे युवा साथी धीरेंद्र ने बताया कि उसके करावल नगर इलाके में गौरैया दिखने लगी है।...

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मां जियेगी तो हम जियेंगे

संजय स्वतंत्र द लास्ट कोच : किस्त 4 गंगा-यमुना को लेकर जिस दिन उत्तराखंड हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आया, तब से इन दोनों नदियों को लेकर मैं बेहद भावुक हो गया हूं। यों भी हम सभी भारतीय दिल से भावुक और कल्पनाशील होते हैं। कोई एक दशक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री...

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नींद क्यों रात भर नहीं आती

संजय स्वतंत्र बिहार की उस मिट्टी से जन्म का नाता है, जो अभावों और सपनों के संघर्ष के साथ एक इंसान बनने की तमीज पैदा करती है। जब हिंदी पट्टी विचार और बाजार से जूझ रहा था, तब पिता की सरकारी नौकरी के कारण देश की राजधानी दिल्ली में सत्ता...

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कुल्हड़ की वो चाय

संजय स्वतंत्र बिहार की उस मिट्टी से जन्म का नाता है, जो अभावों और सपनों के संघर्ष के साथ एक इंसान बनने की तमीज पैदा करती है। जब हिंदी पट्टी विचार और बाजार से जूझ रहा था, तब पिता की सरकारी नौकरी के कारण देश की राजधानी दिल्ली में सत्ता...

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दिल चुरा के देखो

      संजय स्वतंत्र बिहार की उस मिट्टी से जन्म का नाता है, जो अभावों और सपनों के संघर्ष के साथ एक इंसान बनने की तमीज पैदा करती है। जब हिंदी पट्टी विचार और बाजार से जूझ रहा था, तब पिता की सरकारी नौकरी के कारण देश की राजधानी...