Category: पद्य

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मुकुल आनन्द की कविता ‘तुम्हारी याद’

मुकुल आनन्द ग्राम+पो- पटसाजिला-     समस्तीपुर राज्य-     बिहारपिन-     848206″बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययनरत” वर्तमान निवास स्थान-  दुर्गाकुंड, वाराणसी तुम्हारी याद  तुम याद आती हो जैसे आती है रात आता है दिन लगती है भूख लगती है प्यास.. जैसे बच्चों के चोटिल होने पर माँ को आता है...

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नूर मुहम्मद ‘नूर’ की 2 ग़ज़लें

नूर मुहम्मद ‘नूर’ जन्म : 17 :08 :1952 गांव :महासन, डाक : महुअवां कारख़ाना, जनपद : कुशीनगर। पिछले 5 दशक से निरंतर लेखन। हिंदी की तमाम पत्र- पत्रिकाओं  में अनगिनत रचनाओं का प्रकाशन। अबतक चार किताबें प्रकाशित। एक लंबी कविताओं, एक कहानियो और दो ग़ज़लों की। भारतीय रेलवे में 36...

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प्रशान्त तिवारी की 7 कविताएं

प्रशान्त तिवारी जौनपुर निवासी (उत्तर प्रदेश)वर्तमान में नोएडा में निवास एक न्यूज़ ऐप में कार्यरत माएं भी जादूगर जैसी होती हैं 10 रुपए की कमाई में 12 रुपए का खर्च चला लेती हैं और उसी 10 रुपए में से 3 रुपए बचा भी लेती हैं उस वक्त के लिए जब हम...

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राजेश ‘ललित’ शर्मा की 4 कविताएं

राजेश’ललित’शर्मा बी-९/ए:डी डी ए फ्लैटस होली चाईल्ड के पीछे टैगोर गार्डन विस्तार नई दिल्ली -११००२७ ज़ख्म ज़ख़्मों पर मरहम नहीं नमक लगा बना रहे घाव उठती रहे टीस दर्द की आह निकले। याद रहे हमेशा किसने दिया था ? ये जख्म !! तन्हा कुछ देर इंतज़ार करो,ए दोस्त ज़िंदगी ज़रा...

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राजेंद्र राजन की 3 कविताएं

राजेंद्र राजन बुखार पर्व जो फेंक दिए गए थे इतिहास के कूड़ेदान में आज वे घूम रहे हैं दल के दल बजा रहे हैं धर्म का बाजा हर सड़क हर गली में इतने जोर से कि बहरे हो जाएं कान सुनाई न दे पड़ोस का चीखना अपनी ही आवाज़। उनकी...

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विजेंद्र की 6 कविताएं

विजेंद्र एक तुम्हें बाहर आना ही होगा कहां मिलेगा उस आदमी का उजला ब्यौरा जिसे काले पत्थरों में चुन दिया गया है उन्हें करीब से देखो समुद्र की तूफानी लहरों का गरजन तुम्हें सुनाई देगा श्रमिकों और किसानों का एकजुट संघर्ष लोकतंत्र की पहली जरूरत है दबे कुचले लोगों की...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की 5 कविताएं

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव राजा एक उसे वो पसंद हैं जो मुंह नहीं खोलते उसे वो पसंद हैं जो आंखें बंद रखते हैं उसे वो पसंद हैं जो सवाल नहीं करते उसे वो पसंद हैं जिनका खून नहीं खौलता उसे वो पसंद हैं जो अन्याय का प्रतिकार नहीं करते उसे मुर्दे...

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आरती आलोक वर्मा की 3 ग़ज़लें

आरती आलोक वर्मा एक लगाई  उन्होंने  ही  आग  घर में बसाये हुये थे जिन्हें हम नजर में   घरौंदे बिखरते नजर आ रहे हैं  नये दौर के इस अनूठे शहर मेंचमन में पसरने लगी आग हरसू शरारे दिये छोड़ किसने शज़र में ।जहाँ मुफलिसी बसर कर रही होवहाँ कौन जीता नहीं डर फिक्र में किसी...

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शुक्ला चौधुरी की 3 कविताएं

शुक्ला चौधुरी मां एक जब घर से अचानक गायब हो जाती थी मां पहले हम चावल के कनस्तर में झांकते फिर दाल मसाले के डिब्बे से पूछते तब भी अगर मां आवाज़ नहीं देती तब हम चूल्हे के पास खड़े हो जाते और जोर-जोर से रोते मां मां मां चूल्हे...

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डा.अमरजीत कौंके की 12 क्षणिकाएं

अमरजीत कौंके  1सुरमई संध्या कोहरी घास पर उस की आँखों में देखते  सोचा मैंने- अगर सारी जिंदगी यूँ ही गुज़रती तो बस क्षण भर की होती…. 2सुरमई संध्या को हरी घास पर उसके पास बैठे मैंने कहा उस से – कोई बात करो वह बोली -जब ख़ामोशी ख़ामोशी से संवाद कर रही होतो शब्दों को निरर्थक गँवाने का क्या...

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पल्लवी मुखर्जी की 6 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी पिंजरा गहन सन्नाटा है यहाँ मत झाँको इस पिजंड़े के अंदर यहाँ कुलांचे भरती कोई हिरनी नहीं उछलेगी न ही दिखेगी…. दूर-दूर तक कोई हरीतिमा जिस पर छोटे-छोटे खरगोशों के नन्हें-नन्हें पाँव होते हैं और जाने कहाँ -कहाँ से आ जाती हैं अनगिनत चिड़ियाँ… जिनकी चहचहाहट से तुम...

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रोहित ठाकुर की 5 कविताएं

रोहित ठाकुर  आखिरी दिन    आखिरी दिन आखिरी दिन नहीं होता जैसे किसी टहनी के आखिरी छोर पर उगता है हरापन दिन की आखिरी छोर पर उगता है दूसरा दिन आज व्यस्त है शहर शहर की रोशनी जहाँ खत्म हो जाती है वहाँ जंगल शुरू होता है आज व्यस्त है...

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नवीन गोपाल कानगो की 5 ग़ज़लें

प्रोफेसर नवीन गोपाल कानगो प्राध्यापक एवं अध्यक्ष सूक्ष्म जीव विज्ञान विभाग समन्वयक, परिष्कृत उपकरण केंद्र डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (म.प्र.) ४ ७०००३  Mobile 9425635736, nkango@gmail.com एक कहकशाँ हूँ मैं  सारे सितारे मुझमें बहता दरिया हूँ सारे किनारे मुझमें ये मेरा दिल है कि आईनाख़ाना मैं सभी में नज़र आता...

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सुशान्त सुप्रिय की 5 कविताएं

सुशान्त सुप्रिय A-5001, गौड़ ग्रीन सिटी, वैभव खंड, इंदिरापुरम, ग़ाज़ियाबाद – 201014 ( उ.प्र. ) मो : 8512070086 ई-मेल : sushant1968@gmail.com बचपन  दशकों पहले एक बचपन था बचपन उल्लसित, किलकता हुआ सूरज, चाँद और सितारों के नीचे एक मासूम उपस्थिति बचपन चिड़िया का पंख था बचपन आकाश में शान से उड़ती रंगीन पतंगें थीं बचपन माँ का दुलार था बचपन पिता की गोद का प्यार था समय के साथ चिड़ियों के पंख कहीं खो गए सभी पतंगें कट-फट गईं माँ सितारों में जा छिपी पिता सूर्य में समा गए बचपन अब एक लुप्तप्राय जीव है जो केवल स्मृति के अजायबघर में पाया जाता है वह एक खो गई उम्र है जब क्षितिज संभावनाओं से भरा था एकदिन  एक दिन मैंने कैलेंडर से कहा — आज मैं मौजूद नहीं हूँ और अपने मन की करने लगा एक दिन मैंने कलाई-घड़ी से कहा — आज मैं मौजूद नहीं हूँ और खुद में खो गया एक दिन मैंने बटुए से कहा — आज मैं मौजूद नहीं हूँ और बाज़ार को अपने सपनों से निष्कासित कर दिया एक दिन मैंने आईने से कहा — आज मैं मौजूद नहीं हूँ और पूरे दिन उसकी शक्ल नहीं देखी एक दिन मैंने अपनी बनाईं...

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पल्लवी मुखर्जी की 5 कविताएं

पल्लवी मुखर्जी एक आओ सुनते है एक दूसरे की धड़कनों को धड़कनेंधड़कती हैं जैसेघड़ी की सुईटिक-टिक करती और ले जाती हैं हमेंं उम्र के उस दौर मेंजहाँ न मैं….मैं रहती हूँन तुम….तुम रहते हो हम एक हो जाते हैंउम्मीदों का हरापन लेकर  दो तुम एक पुल होजिस पर सेतमाम रिश्ते गुज़र रहे हैंधड़ाधड़ जैसे गुज़रती...

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पुष्कर बन्धु की 5 कविताएं

पुष्कर बन्धु काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक व परास्नातक ( हिन्दी साहित्य ) 2017 । सोशल मीडिया पर कविताओं का प्रकाशन । साहित्य , समाज और राजनीति में  गहरी रुचि । पता – हौसला सिंह लॉज, नसीरपुर, सुसुवाहि , हैदराबाद गेट , BHU चयन और प्रस्तुति : विहाग वैभव  ...

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नदी पर रोहित ठाकुर की 4 कविताएं

रोहित ठाकुर जन्म तिथि – 06/12/ 1978 शैक्षणिक योग्यता  –   परा-स्नातक राजनीति विज्ञान,विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित, विभिन्न कवि सम्मेलनों में काव्य पाठ   वृत्ति  –   सिविल सेवा परीक्षा हेतु शिक्षण   रूचि : – हिन्दी-अंग्रेजी साहित्य अध्ययन  पत्राचार :- जयंती- प्रकाश बिल्डिंग, काली मंदिर रोड,संजय गांधी नगर, कंकड़बाग , पटना-800020, बिहार  मोबाइल...

दिलीप कुमार की 6 ग़ज़लें 0

दिलीप कुमार की 6 ग़ज़लें

दिलीप कुमार जन्म तिथि : 28 अक्टूबर 1974।मूल निवास : बलिया,  रूपौली, पूर्णिया, बिहार संप्रति- शाखा प्रबंधक, भारतीय स्टेट बैंक               वास्को दा गामा मुख्य शाखा, गोवा।संपर्क : 8806660113 एक   मुझे खुद की नहीं है  फिकर अब तो ।कोई करता नहीं मेरा जिकर अब तो।।सिर्फ रस्ता ही है...

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भास्कर चौधुरी की 10 कविताएं

1 माँ का आना माँ के आते ही मैं असहज हो जाता हूँ हो जाती है पत्नी असहज हम दोनों के कान खड़े छोटी-छोटी बातों को पकड़ लेने की क्षमता एक-ब-एक दुगुनी-तिगुनी हो जाती है   माँ के आते ही खुश हो जाती है हमारी चार साल की बिटिया वह...

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मनोज शर्मा की 2 कविताएं

मनोज शर्मा एक मेरा स्थिर समर्पण साध लो तुम अब नयी सुबह नया आगमन कारवां लिए बढ़ चले अब तुम बूंद नहीं वरन सतत् सत्य हो अनल से दहकते कर्मपथ पर बढ़ चलो तुम हर कदम राह से जोड़ता है तुम अस्थिर हो असहज हो रुको न! दूर कहीं क्षितिज...