Category: बाल-साहित्य

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संजीव ठाकुर की बाल कथा ‘जालिम सिंह’

स्कूल का चपरासी बच्चों को बहुत बदमाश लगता था। बच्चे उसे जालिम सिंह नाम से पुकारते थे। जालिम सिंह स्कूल के बच्चों पर हमेशा लगा ही रहता था। किसी को मैदान में दौड़ते देखता तो गुस्साता, झूले पर अधिक देर झूलते देखता तो गुस्साता। कोई बच्चा फूल तोड़ लेता तब...

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कैलाश मंडलोई की कहानी ‘निमाई का गजरू दादा’

बहुत समय पहले की बात है। गंगा नदी के किनारे चरनोई नाम का एक छोटा सा गाँव था। इसी गाँव में निमाई रहता था। तीन वर्ष का निमाई बहुत ही सुन्दर और चंचल स्वभाव का बालक था। उसके बचपन की लीलाओं को देखकर लोगों को कृष्ण की बाल-लीलाएं याद आ...

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संजीव ठाकुर की पांच बाल-कविताएं

रोज रात           रोज रात घर के बाहर भौंका करते हैं कुत्ते कहते हैं पहनेंगे हम भी तेरे जैसे जूते ठंड सताती है हमको पहरेदारी करने में तुम्हें मजा तो आता होगा घर के भीतर रहने में ? रोज रात घर के भीतर चूँ –चूँ करते...

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वीणा भाटिया की दो बाल कविताएं

रसगुल्ले के पैसे लाओ   चिड़ियों ने बाजार लगाया कौआ चौकीदार बिठाया। मेले में जब भालू आया उठा एक रसगुल्ला खाया। गौरैया यह कह मुस्काई कहां चल दिए भालू भाई। जल्दी क्या है रुक भी जाओ रसगुल्ले के पैसे लाओ। भालू बोला क्या फरमाया मुझको क्या जान न पाया। मंत्री...