Category: SELF PUBLISHING

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विष्णु कुमार की कहानी ‘भैंस चोर’

रात का अंधेरा चारों तरफ, फैल चुका था, गांव के सभी लोग सो चुके थे।…चारों तरफ झींगुरों और मेंढकों की आवांजें गूंज रही थीं। मैं भी अपनी चारपाई पर गहरी नींद में सो रहा था, लेकिन मेरी आदत है कि सोने से पहले पानी न पी लूं तो रात को...

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राजेश”ललित”शर्मा की दो रचनाएं

इंतज़ार मत करना इंतज़ार मत करना अब मेरा थक गये हैं पाँव मुश्किल है चलना मोड़ अभी भी बहुत हैं ज़िंदगी के याद कर लेना कभी हो सके मेरे अक्स को। क्षणिका बहुत दूर निकल आये ए ज़िंदगी तुमसे मंज़िल आ भी गई तो मिल न पायेंगे अब ———————-

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राजेश”ललित”शर्मा की कविता ‘मन खट्टा हो गया’

“मन खट्टा” —————– मन खट्टा हो गया चल यार कैसी बात करता है मन कभी मीठा हुआ कभी सुना क्या? नहीं न यूँ ही जमी रहेगी दही रिश्तों की खटास रहेगी ही चाहे जितना डालो चीनी फिर मन खट्टा हुआ तो हुआ क्या करें????? ————————  

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पीयूष शिवम की ग़ज़ल ‘छाँव तो कर दे’

कब  से चल रहा हूँ धूप में तेरी, ज़िन्दगी इस दोपहर में छाँव तो कर दे। याद धुंधली हो गई गर्दिश में गहरा कर, इक दफ़ा मेरे शहर को गाँव तो कर दे। ख़ून देखा है नहीं अपना बहुत दिन से, ख़ंजर-ए-हालात के कुछ घाव तो कर दे। ये तसल्ली...

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तरसेम कौर की कविता ‘भावनाओं का अपलोड..!!’

  डिलीट होती जा रही भावनाएं और संवेदनाएं बैकअप शायद किसी ने भी नहीं रखा है.. जीवन के स्क्रीन से धीरे धीरे इरेज होती जा रही संवेदनाओं को रिस्टोर करना शायद अब नामुमकिन सा ही लगता है… रूप बदलता जा रहा है और बिखरी पड़ी मिलती हैं जीवन के स्क्रीन...

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नीरू मोहन की कविता ‘मील का पत्थर’

*पहुँचाकर मंजिल पर राही को अभी भी वहीं खड़ा हूँ | धूल से ढककर, सूरज से तपकर अभी भी अडिग खड़ा हूँ | रुका न कोई पलभर भी न पूछा मेरा अता-पता | देखकर मुझको दूर से यूँ ही अपनी मंजिल की ओर ही बढ़ा | न ली कोई मेरी...

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आराधना सुमन की कविता ‘नाजायज’

नाजायज शब्द बड़ा “नाजायज “लगता है मुझे क्योकि अक्सर ये वहाँ प्रयोग होते है जो जीवन का पवित्र मन्त्र है उच्चारण है आवाहन की जीवित जीवन की सुंदरता की …. नाजायज रिश्ते की परिभाषा नहीं मिलती एक दाग धब्बा को कहकर लोग निकल लेते है…..! हर रिश्ते मे मौजूद लोग...

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मुकेश कुमार सिन्हा की कविता ‘मत बनो बाज’

कभी बाँध कर देखो दो-ढाई किलो का पत्थर पेट से पांच-छः महीने तक। ऐ पुरुष! पता चल जायेगा कितना दर्द सहती हूँ कितना त्याग करती हूँ और कितने अरमान के साथ खिलाती हूँ ‘कली’! मेरे त्याग और मेरे सब्र की परीक्षा कैसे ले पाओगे? ढोकर देखो न पत्थर पेट से!...

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राजेश”ललित”शर्मा की कविता ‘दम लगा के हई शा’

दम लगा के हईशा हिम्मत न हार थक मत अब चल उठ जा चल उठ मत घुट घुट घुट कर मर जाएगा हाथ कुछ नहीं आएगा दो नहीं कई पाटों में पिस जायेगा घुड़सवार ही गिरते हैं गिर गिर कर फिर उठते हैं फिर जा घोड़े पर चढ़ते हैं छूट...

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नकुल गौतम की लघुकथा ‘तिरपाल’

मुम्बई में बारिशें इस बार जल्द शुरू हो गयी थीं। पूरी बस्ती रंग बिरंगी तिरपालों से ढंकी जा चुकी थी। बुधिया की छत पहली बारिश में ही साथ छोड़ गयी और घर में यहाँ वहाँ पानी टपकने लगा। बीवी साल भर कहती रही कि छत पर डाम्बर लगवा लो, पर...

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राजेश”ललित”शर्मा की दो कविताएं

समय समय ज़रा सरक बैठने दे मुझे अपने साथ गुज़ारने दे चंद पल कुछ करें बात चलें कुछ क़दम समझें हम तुम्हें तुम हमें समझो सच में बहुत तेज़ चलते हो रुको तो सुनो तो फिर निकल गये आगे चलो मैं ही दम भरता हूँ ज़िंदगी ही से सवाल करता...

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प्रशान्त पांडेय की लघुकथा ‘पगलिया’

एगो कुसुमिया है. हड़हड़ाते चलती है. मुंह खोली नहीं की राजधानी एक्सप्रेस फेल. हमरे यहां काम करने आती है. टेंथ का एक्जाम था तो काम छोड़ दी थी. दू-तीन महीना बाद अब जा के फिर पकड़ी है. “तब सब ठीक है?” हम अइसही पूछ लिए. गलती किये। माने कुसुमिया का...

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विशाल मिश्र का एक गीत

जब कोई हक़ीक़त चंद पलों में अफ़साना बन जाए भरने वाले ज़ख्म कोई जब फिर ताज़ा कर जाए मैं क्यूँ न रो दूं। मुद्दत से थी राह तकी के बादल एक दिन बरसेंगे धूल उड़ रही, न मालूम था के ऐसे तरसेंगे मैं क्यों न रो दूं। हम कितना चाहें...

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नीरू मोहन की लघुकथा ‘एहसास’

यह कथा एक सत्य घटना पर आधारित है गोपनीयता बनाए रखने के लिए पात्रों के नाम और जगह बदल दिए गए हैं|*मीना बनारस के एक मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखती है| परिवार में पति मनीष के अलावा सास-ससुर और मीना की दो वर्ष की एक सुंदर-सी बिटिया है| मीना...

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नकुल गौतम की ग़ज़ल

अब मेरे दिल में नहीं है घर तेरा ज़िक्र होता है मगर अक्सर तेरा हाँ! ये माना है मुनासिब डर तेरा आदतन नाम आ गया लब पर तेरा भूल तो जाऊँ तुझे पर क्या करूँ उँगलियों को याद है नम्बर तेरा कर गया ज़ाहिर तेरी मजबूरियां टाल देना बात यूँ...

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राजेश”ललित”शर्मा की कविता ‘अहं ब्रह्म न अस्मि’

शब्द ब्रह्म हैं न,बिल्कुल न; ये सिर्फ हैं अभिव्यक्ति का माध्यम जो आप दे सकते हैं बिना बोले भी गूँगे गुज़ार देते हैं उम्र सारी इशारों ही इशारों में चिड़िया भी चहकते चहकते ममता देती चुगा देती चोंच से बच्चे भी ख़ुश होते,वैसे जलस्तर स जैसे मेरी पत्नी देती कौए...

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डॉ. ललित सिंह राजपुरोहित की लघुकथा ‘बहुरिया’

रामानुज के घर में मातम का माहौल था, घर में छाती पीटने और रोने की जोर-जोर से आवाजें आ रही थी। रिश्‍तेदार और पड़ोसी ढांढस बंधा रहे थे, तो कुछ ऐसे भी थे जो मजमा देख रहे थे। रामानुज अपने बच्‍चों को सीने से लगाए दीवार के कोने में बैठा...

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डॉ० छेदी साह की कविता ‘मुस्कान’

मुर्दे में भी डाल देगी जान उषा की प्रथम किरणों सा तुम्हारी लम्बी बाहें संगमरमरी देह बालों पर छाई सावन की घटा हिरणी सी आँखें देखती हो जब तुम और होती आँखें चार तब तुम्हारी मीठी मुस्कान मुझे लगती है बड़ी ही कान्तिमान,    

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नकुल गौतम की ग़ज़ल

ग़ज़ल झड़ी जब लग रही हो आँसुओं की कमी महसूस क्या हो बदलियों की हवेली थी यहीं कुछ साल पहले जुड़ी छत कह रही है इन घरों की वो मुझ पर मेहरबां है आज क्यों महक-सी आ रही है साज़िशों की मुझे पहले मुहब्बत हो चुकी है मुझे आदत है...

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मुकेश बोहरा अमन की कविता ‘शब्द-साधना’

शब्दों को जानो, शब्दों को मानो , शब्दों की बातें होती निराली । शब्दों का व्यापार, शब्दों का व्यवहार , शब्दों से है होली, दीवाली ।। शब्दों से तुम हो , शब्दों से मैं हूँ । शब्दों से हारा , शब्दों से जय हूँ ।। शब्द है करेला व अम्बुआ...