Category: HINDI

0

मान बहादुर सिंह की कविता ‘बैल-व्यथा’

  तुम मुझे हरी चुमकार से घेरकर अपनी व्यवस्था की नाद में जिस भाषा के भूसे की सानी डाल गए हो एक खूंटे से बंधा हुआ अपनी नाथ को चाटता हुआ लम्बी पूंछ से पीठ पर तुम्हारे पैने की चोट झाड़ता हुआ खा रहा हूं।   देखो हलधर, मुझे इस...

0

नूर मुहम्मद ‘नूर’ की दो भोजपुरी ग़ज़लें

एक आदमिन के ढ़हान, चारू ओर उठि रहल बा मकान चारू ओर एगो बस जी रहल बा नेतवे भर मू  रहल  बा  किसान चारू ओर अब के पोछी हो लोर, ए, दादा रो रहल, समबिधान चारु ओर ई अन्हरिया, बड़ा पुरनिया  हो कब ले  होई  बिहान चारू ओर जे बा...

0

अजमेर अंसारी ‘कशिश’ की एक ग़ज़ल

पस्ती में जिसने माना के तदबीर इश्क़ है पहुँचा बुलन्दियों पे तो तक़दीर इश्क़ है ! क्यों देखूँ इस जहान कीं रंगीनियाँ तमाम मेरी नज़र में यार की तस्वीर इश्क़ है हर लम्हा आता–जाता बताता है दोस्तो दुनिया है एक ख़्वाब तो ताबीर इश्क़ है मुझ सा कोई गनी नहीं...

0

पवन तिवारी की कविता किताबें

अब लोगों के हाथों में किताबें नहीं दिखतीं पर सच यह भी है कि मेरे हाथों में भी किताबें नहीं दिखतीं कुछ दोस्तों के हाथों में कभी-कभी दिखती थीं किताबें पर मेरे हाथों में तो रोज रहती थी किताबें जो रिश्ता था रुहानी सा किताबों से,किताबी हो गया कल जब...

0

चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव की सात कविताएं

जब कविताएं नहीं होंगी सोचो जरा ऐसे कल के बारे में जब कविताएं नहीं होंगी सोचो जब गीतों में सुर नहीं होंगे सोचो जब आल्हा चैती के स्वर नहीं होंगे सोचो जब ताल, धुन और लय नहीं होंगे सोचो जब किस्से और किस्सागो नहीं होंगे सोचो जब बच्चे सपने देखना...

0

संजीव ठाकुर की कविता ‘वे भूल गए’

वे भूल गए वे दिन जब बाढ़ में डूबे गाँव से निकलते थे सतुआ खाकर चिलचिलाती धूप में जाते थे शहर के कॉलेज नंगे पाँव ! अब वे महानगर में माल रोड पर रहते हैं चार कमरों के मकान में ए॰सी॰ में सोए बगैर नहीं निकलता पेट का पाखाना कमोड...