शहंशाह आलम का आत्मकथ्य

ख़ुद को जीते हुए एक आत्मकथ्य : ख़ुशी तो बची रहती है कुएँ के सन्नाटे तक में सच पूछिए तो मैं एक निहायत कम बोलने-बतियाने वाला, कम हँसोड़, कम ख़ुश रहने वाला और अपनी ज़िंदगी में ज़्यादा परेशान, ज़्यादा ग़मग़ीन, ज़्यादा ग़मज़दा रहने वाला आदमी हूँ। अब हर कोई अपनी...