Category: लघु कथा

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सविता मिश्रा की दो लघुकथाएं

एक “क्या हुआ बेटा ? तेरी आवाज क्यों काँप-सी रही हैं ? जल्दी से बता ..हुआ क्या ..?” “माँ वो गिर गया था सुबह-सुबह…।” “कैसे, कहाँ गिरा, ज्यादा लगी तो नहीं ? डॉक्टर को दिखाया! क्या बताया डॉक्टर ने ?” “न माँ ज्यादा तो नहीं लगी, पर डॉक्टर कह रहे...

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डॉ संगीता गांधी की लघुकथा ‘गंवार’

“ए, ये क्या कर रहा है ?” खेत के कोने में दीर्घशंका को  बैठे रमेश को देख  चौधरी साहब ने कहा । चौधरी साहब  मुम्बई में रहते थे ।गांव में भी घर था तो दो -चार साल में गांव का चक्कर लगा लेते थे । ……….गांव वाले उनकी नज़र में...

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संगीता गांधी की लघुकथा ‘अज्ञात अंधेरे’

सरकारी हस्पताल के एक कोने में आमिर  बुत बना बैठा था ।अनजाना अँधेरा उसके चारों ओर छाया था । ये क्या हो गया ?उसने अपने ही हाथों से अपने दिल के टुकड़े को कैसे मार दिया ! अंदर डॉ उसके 12 साल के बेटे का इलाज कर रहे थे ।सर...

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मीनू परियानी की लघुकथा ‘मज़बूरी’

आज राधा को कुछ ज्यादा ही देर हो गयी थी मै दो बार बाहर जा कर देख आई थी पर उसका दूर दूर तक पता नही था. राधा मेरी कामवाली बाई थी जो कभी कभी अपनी बेटी को भी काम पर ले आती थी। रानी उसकी बेटी जिसकी उसने छोटी उम्र में...

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कमलेश भारतीय की दो लघुकथाएं

ईश्वर का जन्म वे टूटे घरों का मलबा या कबाड़ उठाने का काम करते थे । कभी काम मिलता , कभी नहीं । रेहड़ी खडी रहती । खच्चर का चारे का खर्च अलग । ऐसे खाली समय में बैठे सोच रहे थे कि क्या किया जाए । ईश्वर तुम कहां...

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ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” की दो लघुकथाएं

अँधा “अरे बाबा ! आप किधर जा रहे है ?,” जोर से चींखते हुए बच्चे ने बाबा को खींच लिया. बाबा खुद को सम्हाल नहीं पाए. जमीन पर गिर गए. बोले ,” बेटा ! आखिर इस अंधे को गिरा दिया.” “नहीं बाबा, ऐसा मत बोलिए ,”बच्चे ने बाबा को हाथ...

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कमलेश भारतीय की चार लघुकथाएं

राजनीति के कान ‘मंत्री जी, आपने बड़ा कहर ढाया है’ ‘किस मामले में भाई ?’ ‘अपने इलाके के एक मास्टर का ट्रांसफर करके’ ‘अरे , वह मास्टर ? वह तो विरोधी दल के लिए भाग दौड़….’ ‘क्या कहते हैं , हुजूर ?’ ‘उस पर यही इल्जाम हैं ।’ ‘जरा चल...

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गौतम कुमार सागर की लघुकथा ‘एक ब्रेक’

“पिछले चार महीने से एक दिन की छुट्टी नहीं. लास्ट क्वॉर्टर का प्रेसर. जिंदगी एक कुत्ता दौड़ बन गयी है. कभी फायरिंग , कभी वॉर्निंग , कभी इन्सेंटिव का लालच , कभी प्रमोशन का इंद्र धनुषी छलावा. ओह ! दिमाग़ फट जाएगा.”- हितेश अपनी नव विवाहित पत्नी रम्या से बड़ी...

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विजयानन्द विजय की दो लघुकथाएं

पेंटिंग ट्रेन का एसी कोच — जिसमें आम तौर पर सम्पन्न लोग ही यात्रा करते हैं।आमजनों के लिए तो यह शीशे-परदे और बंद दरवाजों के अंदर की वो रहस्यमयी दुनिया है, जिसके बारे में वे जानते तक नहीं हैं। एक परिवार आमने-सामने की छ: सीटों पर अपने पूरे कुनबे के...

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कमलेश भारतीय की दो लघुकथाएं

शुरुआत ‘मैं मर क्यों नहीं जाती ?’ जमाने भर की सताई हुई औरत ने खुद से ही बुदबुदाते कहा । ‘तुम जिंदा ही कब थी ?’ औरत के अंदर की औरत ने सवाल किया । ‘तुम ठीक कहती हो । जिसके जन्म पर घर में मातम छा जाए, उसे जिंदा...

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मार्टिन जॉन की तीन लघुकथाएं

लाइक “अरे बेटा , तैयार हो जा | कॉलेज जाने का समय हो गया है |…..कितनी देर से लैपटॉप में घुसे हो !” दादाजी अपने पोते से मुख़ातिब थे | “वेट ए लिटिल दादाजी !……..लाइक्स गिन रहा हूँ |” “काहे का लाइक्स भई ?” “कल हमने मम्मी की डेथ वाली...

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कमलेश भारतीय की चार लघुकथाएं

सहानुभूति वे विकलांगों की सेवा में जुटे थे । इस कारण नगर में उनका नाम था ।मुझे उन्होंने आमंत्रण दिया कि आकर उनका काम देखूं । काम देखकर कुछ शब्द चित्र खींच सकूं । वे मुझे अपनी चमचमाती गाड़ी में ले जा रहे थे । उस दिन विकलांगों के लिए...

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सेवा सदन प्रसाद की लघुकथा ‘रिवाज’

विमलेश शोध के सिलसिले में जलपाईगुड़ी पहुंचा ।वह जनजाति पर शोध कर रहा था ।जलपाईगुड़ी के टोटापड़ा कस्बे में जनजातियों की काफी संख्या है ।विमलेश को वही जगह उचित लगा ।वहां पर आवास की व्यवस्था करने में जुटा था तभी बाबलू से मुलाकात हुई जो जनजाति का ही था ।बाबलू...

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सुषमा सिन्हा की चार लघुकथाएं

1. बेटा स्थानांतरण के फलस्वरूप कार्यालय में आये नये साहब ने अनुकम्पा पर नियुक्ति पाये एक क्लर्क से पूछा- ‘क्या बात है? तुम बार-बार छुट्टी क्यों लेते रहते हो?’ कलर्क ने उत्तर दिया- ‘क्या करें साहेब, माँ बहुते बीमार रहती है। उसका देखभाल करना पड़ता है न। उसको दस हजार...

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यशपाल शर्मा की तीन लघुकथाएं

सच्चा प्यार “यार मैं कोमल के बिना ज़िंदा नहीं रह सकता।” रमण ने बड़ी ही मासूमियत के साथ कहा। “क्यूँ? ” मैंने अनायास ही पूछ लिया। ” तुम नहीं जानते मैं कोमल से कितना प्यार करता हूँ।  सच्चा प्यार।  बहुत ज़्यादा चाहता हूँ मैं उसे। अपनी जान से भी ज़्यादा।...

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हंस राज की लघु कथा ‘दान’

आज मैं बहुत जल्दी में था।  दफ्तर के लिए घर से निकलते-निकलते देर हो गई थी।  सोचा पैदल मेट्रो स्टेशन तक जाऊंगा तो और देर हो जाएगी। अतः रिक्शा ले लिया।  रिक्शेवाला लोहे के छर्रे पर अपनी बूढी हड्डियों के सहारे रिक्शा को खींचता स्टेशन की तरफ चल पड़ा।  स्टेशन...

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डॉ संध्या तिवारी की लघु कथा ‘ठेंगा’

उसके आगे तंगी हमेशा मुंह बाए खड़ी रहती थी लेकिन देह को धंधे के लिये उपयोग में लाना उसे कभी मंजूर न था लेकिन गरीबी कैसे दूर की जाये इस का उपाय वह खोजती ही रहती थी। इसी क्रम में किसी ने उसे बताया , कि वह गुरुवार का व्रत...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की लघु कथा ‘स्मार्ट फैमिली, स्मार्ट ज़िन्दगी’

डिनर का वक्त परिवार का वक्त होता है। यही वक्त होता है जब परिवार के सारे सदस्य एक साथ मौजूद होते हैं अपने अपने मोबाइल के साथ। सब साथ होते हैं लेकिन कोई किसी की तरफ ठीक से देखता नहीं। मम्मी अपनी फोटो पर लगातार आ रही लाइक की संख्या...