Category: कविता

0

सुशील कुमार की दस कविताएं

सुशील कुमार 1. कबसे जगा हूँ जब से जगा हूँ तब से सोया हूँ कब से सोया हूँ तब से कि जब से जगा हूँ ● 2. कोई न कोई तार जीवन का कोई न कोई राग वीणा का छूट ही जाता है रचता हूँ जब भी कोई जीवन-गीत, कहीं...

1

आरती तिवारी की तीन कविताएं

आरती तिवारी छाले माँ आँतों में छाले पाले जाने कैसे जीती रही बरसों हथेली में उगाती रही सरसों हम रहे अनभिज्ञ उसकी खामोश कराहों से दर्द फूलता रहा खमीर सा वो चढ़ाये रहती खोखली हँसी की परतें माँ का जिन्दा होना ही आश्वस्ति थी,हमारी खुशियों की हमारे लिए ही वो...

0

श्रीराजेश की दो कविताएं

श्रीराजेश देखो कामरेड देखो कामरेड , देखो सर्दी की ठिठुरन की मार के निशान उसके रक्ताभ चेहरे पर किस कदर दिख रही है   अब वह बड़े मालिक को बेड टी देने लायक नहीं रहा उसकी धमनियों में बहता खून लंबे-चौड़े भाषण सुनते-सुनते फ्रिज हो गया हैं   अब हाथों...

0

मज़दूर दिवस पर पांच कवियों की कविताएं

हड़ताल  के बाद गोपाल प्रसाद स्व. गोपाल प्रसाद खुद मज़दूर थे। जूट मिल में मशीन चलाते थे। मशीन चलाते हाथों ने जब कलम पकड़ा तो मज़दूरों का दर्द बखूबी उभर कर सामने आया। ये कविता उनकी किताब ‘फूलों में दुपहरिया हो गया हूं’ से ली गई है। गुल्ली-डंडा सब बंद...

0

अर्पण कुमार की दो कविताएं

अर्पण कुमार भँवर तुम्हारे गाल पर भँवर पड़ते हैं मैं उस भँवर में डूब जाना चाहता हूँ तबस्सुम से भरे तुम्हारे होंठों को भरपूर पीना चाहता हूँ तुम हो तो दुनिया आबाद है मेरी तुम्हारे पास होने मात्र से हवा मेरे नाम का संगीत रचती है जब मुस्कुराती हो तुम...

0

राज्यवर्द्धन की तीन कविताएं

राज्यवर्द्धन एकांत भीड़  में एकांत की तलाश एकांत में एक अदद चेहरे की ललक अकुलाने लगते हैं शब्द नि:शब्द में स्मृतिहीन कैसे बन जाऊँ वह भी तो संचित सम्पदा है कलकल छलछल की अहिर्निश ध्वनि बीच सुनना चाहता है कान किसी चिर -परिचित की मधुर तान खेल चॊर सिपाही मंत्री...

2

आनन्द गुप्ता की तीन कविताएं

शब्द शब्दों में ही जन्मा हूँ शब्दों में ही पला मैं शब्दों में जीता हूँ शब्द ओढ़ता बिछाता हूँ। जैसे सभ्यता के भीतर सरपट दौड़ता है इतिहास सदियों का सफर तय करते हुए ये शब्द मेरे लहू में दौड़ रहे हैं मैं शब्दों की यात्रा करते हुए खुद को आज...

5

सुषमा सिन्हा की तीन कविताएं

सुषमा सिन्हा एहसास किसी के होने का एहसास बचा रहता है वर्षों तक जबकि गुजरे उसके बीत चुका होता है बहुत सारा समय किसी का वजूद खड़ा रहता है दीवारों-सा जबकि उसका अस्तित्व ही नहीं होता है इस दुनिया में कोई आवाज करती है पीछा ताउम्र जबकि उस आवाज की...

1

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की तीन कविताएं

 सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव भूख और मुहब्बत मैंने ठंडे चूल्हे में मुहब्बत को दम तोड़ते देखा है भूख दीवानी है किसी को नहीं छोड़ती दिवास्वप्न हां यह एक दिवास्वप्न है कि आदमी कभी आदमी भी बनेगा। अंधेरे से क्या डरना? अंधेरे से क्या डरना? अंधेरा है तो उजाला आएगा ही आखिर...

0

हेमन्त वशिष्ठ की कविता ‘वो सिर्फ एक शरीर है …’

हेमन्त वशिष्ठ एक अजीब सा… गुनगुनाता हुआ सन्नाटा … सामान्य होने की कोशिश करती सांसें… औऱ चेहरे पर… जैसे उदासी की भाप लिए… 22 साल की वो … और उसका साथी …. पुरानी ब्लैक एंड व्हाईट फिल्मों सरीखा… फुल स्पीड से … लहराता सीलिंग फैन… और नीचे लेटी उस लड़की...

2

शहंशाह आलम की कविता ‘घर वापसी’

घर वापसी सहसा मेरा घर कहीं खो गया है कहीं गुम हो गया है जो चीन्हा-पहचाना था   आपने देखा आपने सुना…   मैं किस सूराख़ से झाँककर अपने चीन्हे-पहचाने घर को तलाशूँ ढूंढूँ   जबकि इस बीते-अनबीते में सबका घर है सदृश्य   बस मेरा ही घर खो-गुम गया...

1

शुक्ला चौधरी की 5 कविताएं

शुक्ला चौधरी युद्ध न मिसाइलें दाग न अस्त्र दिखा तू देखता जा युद्ध आरंभ हो चुका है एक बूंद पानी के लिए एक और युद्ध की तैयारी रात सरपट दौड़ रही है पानी के लिए बरतन खाली कर रही है औरतें/रात दो बजे सार्वजनिक नल से पतली सी धार पानी...

3

योगेंद्र कृष्णा की तीन कविताएं

योगेंद्र कृष्णा मछुआरा एक मछुआरा समुद्र को जितना जानता है उतना तुम कहां तुम तफरीह में आते-जाते रहे दूर से निहारते या छूते रहे पानी को जैसे सहलाता हो कोई खरगोश तुम उसकी लहरों से उठता संगीत सुनते रहे नहीं जाना कभी ये लहरें उठती ही क्यों हैं अजनबी सैलानियों...

1

बुद्धिलाल पाल की तीन कविताएं

बुद्धिलाल पाल असंतोष जनता का असंतोष राजा के राज्य में पानी के बुलबुलों-सा उठता …… फुस्स हो जाता राजा जनता को स्वामी-भक्ति सिखाता उसकी जड़ों में मठा डालता जनता से हाय-हलो, कैसे हो कहता दारू वालों को दारू भीख वालों को भीख निकम्मे ज्ञानवादियों को दान अपने सूबेदारों को सूबे...

0

अनवर सुहैल की तीन कविताएं

एक नफरतों से पैदा नहीं होगा इंक़लाब लेना-देना नहीं कुछ नफ़रत का किसी इंक़लाब से नफ़रत की कोख से कोई इंक़लाब होगा नहीं पैदा मेरे दोस्त ताने, व्यंग्य, लानतें और गालियाँ पत्थर, खंज़र, गोला-बारूद या कत्लो-गारत यही तो हैं फसलें नफ़रत की खेती की… तुम सोचते हो कि नफ़रत के...

0

निर्मल गुप्त की तीन कविताएं

निर्मल  गुप्त लोग घर वापस जा रहे हैं लोग घर वापस जा रहे हैं कंधे पर लटकाये बेलनाकार टिफिन जिसमें अब भी पड़े हैं रोटी के कुछ सख्त कुतरे हुए कोने भूख चाहे जैसी भी हो बचा रहता है फिर भी कुछ न कुछ। लोग घर वापस जा रहे हैं...

0

मैं पतझड़ में बसंत लिख रहा हूं

नित्यानंद गायेन   आधुनिक हो गया है हत्यारा बहुत आधुनिक हो गया है हत्यारा | उसने सीख ली है नई तकनीक अब वह हथियार से नहीं करता वार नहीं मिलते उसके हाथों में खून के धब्बे अब उसके इशारों पर हो जाते हैं हजारों क़त्ल एक साथ |  मैं पतझड़ में...

1

स्मिता मृणाल की तीन कविताएं

स्मिता मृणाल रिफ्यूजी बचपन एक कोलाहल सा गुजरता है हर पल उन बदबूदार सीलन से भरे टेंटों में विस्मृत सी धुंध से उठता एक शोर तोड़ता चुप से सन्नाटे को बेतहाशा बदहवास भागती हुई सी एक भीड़ और पीछे आग की कुछ तेज़ लपटें जलते हुए कुछ घर छूटती हुई...

4

सुशांत सुप्रिय की तीन कविताएं

सुशांत सुप्रिय इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं देह में फाँस-सा यह समय है जब अपनी परछाईं भी संदिग्ध है ‘ हमें बचाओ , हम त्रस्त हैं ‘ — घबराए हुए लोग चिल्ला रहे हैं किंतु दूसरी ओर केवल एक रेकॉर्डेड आवाज़ उपलब्ध है — ‘ इस रूट की...

1

शैलेंद्र शांत की चार कविताएं

शैलेंद्र शांत   उसके सीने पर सवार थी इमारत मछलियां बार-बार ऊपर आ जाती थीं और पलट कर गोताखोर बन जाती थीं इस छोर, उस छोर कुछ लोग उन्हें फंसाने की फिराक में बैठे थे बंसी डाले और उधर उस छोर पर बैठे थे कुछ जोड़े अपनी सुध खोए और...