Category: कविता

2

नूर मुहम्मद ‘नूर’ की पांच कविताएं

अंधे और बटेर जब से अंधों के हाथ लगी है बटेर अंधे हरा – हरा हंस रहे हैं उन्हें चारों ओर बस हरा-हरा सूझ रहा है उनकी धृतराष्ट्र आंखों में नई सदी के हरे – हरे सपने हैं नक़्शे हैं लगातार बजाते हुए ताली और करते हुए जुगाली वे पतझड़...

1

मिहिर कुमार की पांच कविताएं

जिंदगी की किस्त…. वो लम्हे जो चुरा रखे हैं मैंने तुम्हारे साथ के, तुम्हारे पास के चंद कतरे तुम्हारी यादों के कुछ उजाले तुम्हारी मुस्कुराहट के जिन्हें मैंने बहुत अंदर सीने में छिपाए रखा दुनिया की नजरों से बचाये रखा हर सुबह मैं तुमको थोड़ा याद करता हूं हर रोज़...

0

श्वेता शेखर की पांच कविताएं

खिलखिलाते हैं मुखौटे समय के हिसाब से हमेशा चलता है हमारे साथ एक मुखौटा हम ठीक ठीक नहीं पहचानते समय की नब्ज को पर मुखौटा बड़ी तेजी और नजाकत के पहचान लेता है समय को अंदर जाने कितने ही हो रंग पर बाहर दिखता है सभी मुखौटा सभ्य, शालीन और...

2

राज्यवर्द्धन की चार कविताएं

छठ मइया तुम्हें सलामत रखें! एक दीप हर दीपावली में तुम्हारे नाम का आज भी जला आती हूँ – छत पर   रास्ता दिखाने तुम्हारे हृदय तरंगों को पता नहीं कब आ जाये भूले भटके   आज भी तो हिचकी आई थी खाते खाते कहा माँ ने कि कोई याद...

3

सुशांत सुप्रिय की 5 कविताएं

  1. उल्टा-पुल्टा मैं परीक्षा पास करता हूँ मुझे डिग्री मिल जाती है मैं इंटरव्यू देने जाता हूँ मुझे नौकरी मिल जाती है और तब जा कर मुझे पता चलता है कि दरअसल नौकरी ने मुझे पा लिया है 2. सूर्य के तीसरे ग्रह पर न गिला न शिकवा न...

0

हेमन्त वशिष्ठ की कविता ‘आधी बची है रात ‘

कविता : हेमन्त वशिष्ठ फोटो : पंकज जैन   एक लफ्ज़ भिजवाया है … ढलती शाम के साथ… लिख रहा हूं बाकी पयाम… अभी आधी बची है रात… हर पहर से इकरार है इंतज़ार का … आहिस्ता आहिस्ता… हर लम्हा चुन रहा है अल्फाज़… एक लफ्ज़ भिजवाया है … ढलती...

1

राजकिशोर राजन की चार कविताएं

राजकिशोर राजन हाय रे भदेस ऊपर देखो …….. ऊपर और ऊपर यह वक्त ही ऊपर-झापर देखने का है सोचो चाहे जो कुछ उचारो, सन्मार्ग की बात लिखो, भाषा में अष्टावक्र विचार भले उसका अर्थ हमारे समय के पाणिनी भी न समझ पाएं रंग दो, पूरे का पूरा रंग दो जितना...

0

सुशील कुमार की दस कविताएं

सुशील कुमार 1. कबसे जगा हूँ जब से जगा हूँ तब से सोया हूँ कब से सोया हूँ तब से कि जब से जगा हूँ ● 2. कोई न कोई तार जीवन का कोई न कोई राग वीणा का छूट ही जाता है रचता हूँ जब भी कोई जीवन-गीत, कहीं...

1

आरती तिवारी की तीन कविताएं

आरती तिवारी छाले माँ आँतों में छाले पाले जाने कैसे जीती रही बरसों हथेली में उगाती रही सरसों हम रहे अनभिज्ञ उसकी खामोश कराहों से दर्द फूलता रहा खमीर सा वो चढ़ाये रहती खोखली हँसी की परतें माँ का जिन्दा होना ही आश्वस्ति थी,हमारी खुशियों की हमारे लिए ही वो...

0

श्रीराजेश की दो कविताएं

श्रीराजेश देखो कामरेड देखो कामरेड , देखो सर्दी की ठिठुरन की मार के निशान उसके रक्ताभ चेहरे पर किस कदर दिख रही है   अब वह बड़े मालिक को बेड टी देने लायक नहीं रहा उसकी धमनियों में बहता खून लंबे-चौड़े भाषण सुनते-सुनते फ्रिज हो गया हैं   अब हाथों...

0

मज़दूर दिवस पर पांच कवियों की कविताएं

हड़ताल  के बाद गोपाल प्रसाद स्व. गोपाल प्रसाद खुद मज़दूर थे। जूट मिल में मशीन चलाते थे। मशीन चलाते हाथों ने जब कलम पकड़ा तो मज़दूरों का दर्द बखूबी उभर कर सामने आया। ये कविता उनकी किताब ‘फूलों में दुपहरिया हो गया हूं’ से ली गई है। गुल्ली-डंडा सब बंद...

0

अर्पण कुमार की दो कविताएं

अर्पण कुमार भँवर तुम्हारे गाल पर भँवर पड़ते हैं मैं उस भँवर में डूब जाना चाहता हूँ तबस्सुम से भरे तुम्हारे होंठों को भरपूर पीना चाहता हूँ तुम हो तो दुनिया आबाद है मेरी तुम्हारे पास होने मात्र से हवा मेरे नाम का संगीत रचती है जब मुस्कुराती हो तुम...

0

राज्यवर्द्धन की तीन कविताएं

राज्यवर्द्धन एकांत भीड़  में एकांत की तलाश एकांत में एक अदद चेहरे की ललक अकुलाने लगते हैं शब्द नि:शब्द में स्मृतिहीन कैसे बन जाऊँ वह भी तो संचित सम्पदा है कलकल छलछल की अहिर्निश ध्वनि बीच सुनना चाहता है कान किसी चिर -परिचित की मधुर तान खेल चॊर सिपाही मंत्री...

2

आनन्द गुप्ता की तीन कविताएं

शब्द शब्दों में ही जन्मा हूँ शब्दों में ही पला मैं शब्दों में जीता हूँ शब्द ओढ़ता बिछाता हूँ। जैसे सभ्यता के भीतर सरपट दौड़ता है इतिहास सदियों का सफर तय करते हुए ये शब्द मेरे लहू में दौड़ रहे हैं मैं शब्दों की यात्रा करते हुए खुद को आज...

5

सुषमा सिन्हा की तीन कविताएं

सुषमा सिन्हा एहसास किसी के होने का एहसास बचा रहता है वर्षों तक जबकि गुजरे उसके बीत चुका होता है बहुत सारा समय किसी का वजूद खड़ा रहता है दीवारों-सा जबकि उसका अस्तित्व ही नहीं होता है इस दुनिया में कोई आवाज करती है पीछा ताउम्र जबकि उस आवाज की...

1

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की तीन कविताएं

 सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव भूख और मुहब्बत मैंने ठंडे चूल्हे में मुहब्बत को दम तोड़ते देखा है भूख दीवानी है किसी को नहीं छोड़ती दिवास्वप्न हां यह एक दिवास्वप्न है कि आदमी कभी आदमी भी बनेगा। अंधेरे से क्या डरना? अंधेरे से क्या डरना? अंधेरा है तो उजाला आएगा ही आखिर...

0

हेमन्त वशिष्ठ की कविता ‘वो सिर्फ एक शरीर है …’

हेमन्त वशिष्ठ एक अजीब सा… गुनगुनाता हुआ सन्नाटा … सामान्य होने की कोशिश करती सांसें… औऱ चेहरे पर… जैसे उदासी की भाप लिए… 22 साल की वो … और उसका साथी …. पुरानी ब्लैक एंड व्हाईट फिल्मों सरीखा… फुल स्पीड से … लहराता सीलिंग फैन… और नीचे लेटी उस लड़की...

2

शहंशाह आलम की कविता ‘घर वापसी’

घर वापसी सहसा मेरा घर कहीं खो गया है कहीं गुम हो गया है जो चीन्हा-पहचाना था   आपने देखा आपने सुना…   मैं किस सूराख़ से झाँककर अपने चीन्हे-पहचाने घर को तलाशूँ ढूंढूँ   जबकि इस बीते-अनबीते में सबका घर है सदृश्य   बस मेरा ही घर खो-गुम गया...

1

शुक्ला चौधरी की 5 कविताएं

शुक्ला चौधरी युद्ध न मिसाइलें दाग न अस्त्र दिखा तू देखता जा युद्ध आरंभ हो चुका है एक बूंद पानी के लिए एक और युद्ध की तैयारी रात सरपट दौड़ रही है पानी के लिए बरतन खाली कर रही है औरतें/रात दो बजे सार्वजनिक नल से पतली सी धार पानी...

3

योगेंद्र कृष्णा की तीन कविताएं

योगेंद्र कृष्णा मछुआरा एक मछुआरा समुद्र को जितना जानता है उतना तुम कहां तुम तफरीह में आते-जाते रहे दूर से निहारते या छूते रहे पानी को जैसे सहलाता हो कोई खरगोश तुम उसकी लहरों से उठता संगीत सुनते रहे नहीं जाना कभी ये लहरें उठती ही क्यों हैं अजनबी सैलानियों...