Category: कविता

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देवेंद्र कुमार की पांच कविताएं

आंखों में पानी  डॉक्टर ने कहा आंखों में ड्रायनेस है आंसू नहीं बनते अब कुछ दिनों में दिखना भी बंद हो जाएगा दिखना बंद होने से पहले ही बंद हो गए आंसू देखकर भी नहीं बहता आंखों से आंसू चाहे कुछ भी देख लो डॉक्टर ने कहा प्रदूषण बढ़ गया...

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सुधीर कुमार सोनी की छह कविताएं

बेमिसाल मुहब्बत पानी के गहरे तल में पत्थर है पत्थर के गहरे तल में पानी है पानी है पत्थर है अटूट प्रेम है यह शायद कोई नहीं जानता कि इनके प्रेम की मिसाल दी जाए धीरे-धीरे कटकर प्रेम में सब कुछ मिटा देना पत्थर के सिवाय कोई नहीं जानता युगों-युगों से...

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प्रसून परिमल की दो कविताएं

प्रेम-कहानी का एक ‘ पाठक ‘ हूँ… पता है, मुझे प्रेम कहानियाँ पढ़नी अच्छी लगती है..बहुत अच्छी लगती है मैं पढ़ना चाहता हूँ एक-एक प्रेम-कहानी..एक-एक-की प्रेम-कहानी..हर्फ़- हर्फ़..शब्द-शब्द मैं दुनिया की सारी प्रेम कहानियाँ पढ़ना चाहता हूँ सच..तुम्हारी भी ..तुम्हारी भी..और तुम्हारी भी… मैं हर प्रेमी-ह्रदय की संजो-संजो रखी बेशक़ीमती अक्षय...

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मुक्ता वेद की पांच कविताएं

बोगनवेलिया मौसम तो है ये गुलाब गेंदा गुलदाउदी का तो क्या? उसकी यादों में लहराता झूमता है बोगनवेलिया चटख गुलाबी बोगनवेलिया उसके घर की छज्जी पर लहराता झूमता निकलता था वो गीले बालों को झटकता खिले बोगनवेलिया की आड़ से पल भर ढूंढती उसकी आँखें सामने की लॉन में किसी...

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डाॅ. अजय पाठक के दस गीत

मजदूर-कटारों की कौन यहाॅ सुनता है हम मजदूर-कहारों की। खून पेर कर, करें पसीना क्या गर्मी-सर्दी हक मांगो तो लाठी मारे हमको ही वर्दी जुल्म जबर झेला करते है हम सरकारों की मेहनत अपनी, हुकुम तुम्हारा मालिक तुम हुक्काम बारह घंटे भठ्ठी झोंके फिर भी नमक हराम! नीयत हम भी...

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शहंशाह आलम की कविता ‘यक्षिणी’

एक यह आकाश जो कोरा है तुम्हारी छुअन की प्रतीक्षा में शताब्दियों-शताब्दियों से   अंतरिक्ष की सीढ़ियाँ पकड़कर अपने यक्षपति से छुप-छुपाकर तुम उतरते हो सखियों के संग-साथ और बादलों को सियाही बनाकर लिखते हो कोरे आकाश पर प्रेम की अमर कथाएँ मेरे लिए   अपार दिनों से पसरा मेरे...

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मीनू परियानी की कविता ‘मां’

    कष्ट हजारों सहकर,अपनी जान ज़ोखिम में डाल कर     जन्म हमें जो देती है, कोई और होती नहीं     वो औरत  सिर्फ माँ होती है     शक्ल सूरत पर जाती नहीं मेरी, कलेज़े से लगा कर रखती है     अपंग अपाहिज बच्चे को भी,...

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महिला दिवस पर डॉ सुलक्षणा अहलावत की कविता

सीता के रूप में मेरी अग्नि परीक्षा लेते हो, द्रौपदी रूप में जुए के दांव पर लगा देते हो, फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो। कभी सती के नाम पर चिता में जला देते हो, कभी जौहर के नाम पर अग्नि में कूदा देते हो, फिर भी तुम महिला...

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कृष्ण कुमार यादव की पाँच कविताएंं

प्रेयसी छोड़ देता हूँ निढाल अपने को उसकी बाँहों में बालों में अंगुलियाँ फिराते-फिराते हर लिया है हर कष्ट को उसने। एक शिशु की तरह सिमटा जा रहा हूँ उसकी जकड़न में कुछ देर बाद खत्म हो जाता है द्वैत का भाव। गहरी साँसों के बीच उठती-गिरती धड़कनें खामोश हो...

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जयप्रकाश मानस की 10 कविताएं

मित्र होता है हरदम लोटे में पानी – चूल्हे में आग होता है हरदम जलन में झमाझम – उदासी में राग   दुर्दिन की थाली में बाड़ी से बटोरी हुई उपेक्षित भाजी-साग रतौंदी के शिविर में मिले सरकारी चश्मे से दिख-दिख जाता हरियर बाग   नहीं होता मित्र राजधानी में...

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कृष्ण सुकुमार की सात कविताएं

(1) बचा हुआ हूँ शेष जितना नम आँखों में विदा गीत ! बची हुई है जिजीविषा जितनी किसी की प्रतीक्षा में पदचापों की झूठी आहट ! बची हुई है मुस्कान जितना मुर्झाने से पूर्व फूल ! बचा हुआ है सपना जितना किसी मरणासन्न के मुँह में डाला गंगाजल ! बचा...

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नवनीत शर्मा की पांच ग़ज़लें

एक कुछ मेरा उस पार जिंदा है अभी जब कि ये दीवार जिंदा है अभी मेरी हां मजबूरियों का ढोल है दिल में तो इनकार जि़ंदा है अभी हर तरफ है धुंध नफरत की मगर इस जहां में प्‍यार जिंदा है अभी खुदकुशी कर ली कबीले ने मगर एक अदद...

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नीलम नवीन ”नील“ की कविता ‘उत्तरायण की धूप’

उत्तरायण की धूप उत्तरायण से बंसत तक खिली चांदी सी धूप से मीठी धीमी ताप में एक उमंग पकने लगती है।। सर्द गर्म से अहसास, कहीं जिन्दा रखते हैं सपने बुनते आदम को विलुप्त होते प्राणी को ।। और मुझमें भी अन्दर धूप सी हरी उम्मीद मेरा ”औरा“ बनती है...

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सुरेश शर्मा की तीन कविताएं

भयावह दिनों में भरोसे की कविता ( एक ) हम परास्त करेंगे उस काले-दैत्य को ! जो लाल, हरे व भगवा रंगों में आता है और सपनों में मीरा व मरियम को डराता है ताकि हो सके तय कि भरोसा, भय पर भारी है जंग हर लम्हा जारी है….!! (दो)...

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मल्लिका मुखर्जी की तीन कविताएं

सामंजस्य कितना सामंजस्य है सपनों और वृक्षों में ! दोनों पंक्तियों में सजना पसंद करते हैं । कितना भी काटो-छाँटों उनकी टहनियाँ, तोड़ लो सारे फल चाहे नोंच लो सारी पत्तियाँ, मसल दो फूल और कलियाँ; फिर भी पनपते रहते हैं असीम जिजीविषा के साथ जब तक उन्हें जड़ से...

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रागिनी शर्मा “स्वर्णकार” की तीन कविताएं

सरलता ही है जीवन सरल सरल सांसों से बनता सुन्दर , मृदुमय जीवन ! सहज सहज बातों से बनता सहज भाषा साधन ! सहज ही होते हैं सुख के आनन्दित क्षण जब पाते हृदय का सरल स्पंदन !! वृहद आकार पाते जब जुड़ते सरलता से सरल सरल लघु कण !...

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केशव शरण की 15 कविताएं

क्या कहूंगा क्या मैं कह सकूंगा मालिक ने अच्छा नहीं किया अगर किसी ने मेरे सामने माइक कर दिया क्या मैं भी वही कहूंगा जो सभी कह रहे हैं बावजूद सब दुर्दशा के जो वे सह रहे हैं और मैं भी क्या मैं भी यही कहूंगा कि आगे बेहतरीन परिवर्तन...

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वेद प्रकाश की तीन प्रेम कविताएं

एक लंबी प्रेम कविता तुम धूप में अपने काले लंबे बाल जब-जब सुखाती हो सूरज का सीना फूल जाता है और पूरे आकाश पर छा जाता है मैंने देखा है गुलमुहर के नीचे बस का इंतजार करते हुए बस आए या न आए तुम्हारी छाया गुलमुहर को चटख कर देती...

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डॉ हरविंदर सिंह बक्शी की तीन कविताएं

विनाश निकट खड़ा है यह धरा पर क्या घटित हो रहा है जाग रहा बाज़ार, इंसान सो रहा है। दागदार करता प्रकृति का आंचल बीज विनाश के मानव बो रहा है। सुरसा जैसी बढ़ रही  सड़कों पर गाड़ियां लील रही लोलुपता वृक्ष, वन और झाड़ियां। तप रहे पर्वत, पिघलती हिम-शिलाएं...

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आकांक्षा यादव की तीन कविताएँ 

21वीं सदी की बेटी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी बेटी को माँ ने सिखाये उसके कर्तव्य ठीक वेैसे ही जैसे सिखाया था उनकी माँ ने पर उन्हें क्या पता ये इक्कीसवीं सदी की बेटी है जो कर्तव्यों की गठरी ढोते-ढोते अपने आँसुओं को चुपचाप पीना नहीं जानती है...