Category: कविता

1

प्रेरणा शर्मा ‘प्रेेरणा’ की सात प्रेम कविताएं

प्रेरणा शर्मा ‘प्रेरणा’ पेशे से अध्यापिका विभिन्न पत्र – पत्रिकाओं , समाचार पत्रों  में लेख, कविताएं प्रकाशित बोधि प्रकाशन द्वारा  प्रकाशित पुस्तक ‘ स्त्री होकर सवाल करती है ‘  में कविताएं प्रकाशित  हो चुकी हैं । एक प्रभात  के आगमन  से .. निशा  के अवसान  तक .. घूमती  रहती  हूँ...

1

सुरेंद्र भसीन की चार कविताएं

सुरेन्द्र भसीन पेशे से एकाउंटेंट, कई निजी  कंपनियों में काम किया। पता के 1/19A, न्यू पालम  विहार, गुड़गांंव, हरियाणा मो-9899034323 मेरी बेटी /सबकी बेटी मैं जब भी अपनी बीवी की आँखों में देखता हूँ उसमें मेरी बेटी का चेहरा नजर आता है। जो बड़ी होकर अपने पति को जैसे बड़ी उम्मीद से याचक होकर निहार रही है तो मैं बिगड़ नहीं पाता हूँ वहीं ढीला पड़ जाता हूँ। क्रोध नहीं कर पाता उबलता दूध जैसे छाछ हो जाता है. हाथ-पांव शरीर और दिल अवश होकर जकड़ में आ जाता है और आये दिन अख़बारों में पढ़े अच्छे-बुरे समाचारों की सुर्खियाँ याद आ-आकर मुझे दहलाने लगती हैँ। और मेरी पाशविक जिदें, नीच चाहतें बहुत घिनौनी और बौनी होकर मेरा मुँह  चिढ़ाने लगती है। कोई भला ऐसे में कैसे अपने परिवार को भूल अपनी बेटी के भावी सुखों को नजरअंदाज कर अपना सुख चाहता है ? वह ऐसा बबूल कैसे बो सकता है जिसे काटने की सोचते ही उसका कलेजा मुँह  को आता है? तभी जब मैं कुछ कहने को होता हूँ...

4

माया मृग की पांच कविताएं

मुझे तुम्‍हारे हाथ देखने हैं तुमने लौ को छुआ वह माणिक बन गई बेशुमार मनके तुम्‍हारी मुट्ठी में सिमटते चले गए मुझे बहुत देर बाद पता चला कि दरअसल लौ से तुम्‍हारे हाथ जल गए थे तुमने जले पोर मुझसे छिपाने को मुट्ठियां बन्‍द कर ली थीं …. ! उस...

6

जगजीत गिल की तीन कविताएं

जगजीत गिल उप संपादक पंजाबी त्रैमासिक साहित्यक पत्रिका ’अक्खर’, काव्य संग्रह ’मील पत्थरां बिन शहर’ और ’रेत के घर’ प्रकाशित। कहानी संग्रह ’हदबस्त नंबर 211’ प्रकाशन हेतु। 095920-91048 याद याद अकेले, कभी आती नहीं, गाल सुर्ख़, तो आंखें नम भी हैं। बसती रुह अगर, चेहरे में किसी के, रुकी सीने...

0

कमलेश भारतीय की दो कविताएं

एक जादूगर नहीं थे पिता पर किसी जादूगर से कम भी नहीं थे सुबह घर से निकलते समय हम जो जो फरमाइशें करते शाम को आते ही अपने थैले से सबको मनपसंद चीजें हंस हंस कर सौंपते जैसे किसी जादूगर का थैला हो अब पिता बन जाने पर समझ में...

0

आरती कुमारी की दो कविताएं

आरती कुमारी जन्म तिथि:  25 मार्च, 1977 पता:  द्वारा – श्री ए. एन. पी. सिन्हा,  शशि भवन, आजाद काॅलोनी, रोड- 3,  माड़ीपुर, मुजफ्रपफरपुर- 842001,’ शिक्षा: एम.ए. अंग्रेजीद, एम.एड, पीएच-डी. व्यवसाय: सहायक शिक्षिका के रूप में राजकीय उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय, ब्रह्मपुरा, मुजफ्रपफरपुर में  पदस्थापित। प्रकाशन : कैसे कह दूँ सब ठीक...

0

भास्कर चौधुरी की दस कविताएं

भास्कर चौधुरी जन्म: 27 अगस्त 1969 रमानुजगंज, सरगुजा (छ.ग.) शिक्षा: एम. ए. (हिंदी एवं अंग्रेजी) बी एड प्रकाशन: एक काव्य संकलन ‘कुछ हिस्सा तो उनका भी है’ एवं गद्य संकलन (यात्रा वृतांत) ‘बस्तर में तीन दिन’ प्रकाशित। लघु पत्रिका ‘संकेत’ का छ्टा अंक कविताओं पर केंद्रित. कविता, संस्मरण, समीक्षा आदि...

2

अर्जित पांडेय की कविता ‘पुरुष तू देवता क्यों नहीं?’

अर्जित पाण्डेय अर्जित आईआईटी दिल्ली में इंजीनियरिंग  के छात्र हैं। अच्छा लिखते हैं। पुरुष और महिला को लेकर जिस सोच के साथ हम केवल दिखावे के लिए जीते हैं, उसमें उनकी ये कविता कई लोगों को अजीब लग सकती है लेकिन अर्जित जिस सवाल का जवाब ढूंढ रहे हैं, उसकी...

0

परितोष कुमार ‘पीयूष’ की कविता ‘इस कठिन समय में’

परितोष कुमार ‘पीयूष’ (s/o स्व० डॉ० उमेश चन्द्र चौरसिया(अधिवक्ता) मुहल्ला- मुंगरौड़ा     पोस्ट- जमालपुर(बिहार)पिन- 811214 इस कठिन समय में इस कठिन समय मेंजब यहाँ समाज के शब्दकोश सेविश्वास, रिश्ते, संवेदनाएँऔर प्रेम नाम के तमाम शब्दों कोमिटा दिये जाने की मुहिम जोरों पर है तुम्हारे प्रतिमैं बड़े संदेह की स्थिति में हूँकि...

0

नीरजा मेहता की कविता ‘ज़िन्दगी एक पहेली’

ज़िन्दगी आदि से अंत तक शाश्वत किन्तु क्षणिक विस्तृत किन्तु संक्षिप्त विचित्र किन्तु सत्य अलबेली किन्तु नित्य चिर परिचित किन्तु अकाल्पनिक रहस्यमयी किन्तु दिलचस्प विस्मयकारी किन्तु प्रभावकारी अभिशापित किन्तु अलौकिक वरदान सी उलझी डोर सी किन्तु सपनों को साकार करती सी प्रवाहमयी अद्भुत अभिव्यक्ति सी भावानुकूल सुसंस्कृत आदर्शमयी कविता की...

0

भावना की तीन कविताएं

संवेदनाओं का पौधा अधिकांश औरतें जब व्यस्त होती हैं खरीदने में साड़ी और सलवार सूट तो लेखिकाएं खरीदती हैं अपने लिए कुछ किताबें ,पत्रिकाएॅ और कलम अधिकांश औरतें जब ढूंढती हैं इन्टरनेट पर फैशन का ट्रेंड तो लेखिकाएं तलाशती हैं ऑनलाइन किताबों की लिस्ट अधिकांश औरतें जब नाखून में नेलपाॅलिश...

0

प्रभांशु कुमार की दो कविताएं

लेबर चौराहा और कविता सूर्य की पहली किरण के स्पर्श से पुलकित हो उठती है कविता चल देती है लेबर चौराहे की ओर जहां  मजदूरों की बोली लगती है। होता है श्रम का कारोबार गाँव-देहात से कुछ पैदल कुछ साइकिलों से काम की तलाश में आये मजदूरों की भीड़ में...

0

राकेश रोहित की सात कविताएं

जब सब लौट जायेंगे सब जब घर लौट जायेंगे मैं कहाँ जाऊंगा इतनी बड़ी दुनिया में नहीं है मेरा कोई वृक्ष! मेरे जीवन में कुछ कलरव की स्मृतियाँ हैं और एक पुराने स्कूल की जिसकी दीवार ढह गयी थी मास्टर जी की पीठ पर छुट्टी का घंटा बजने पर जहाँ...

1

अंजना वाजपेई की कविता ‘ये शेष रह जाएंगे’

कुछ गोलियों की आवाजें बम के धमाके , फैल जाती है खामोशी …नहीं, यह खामोशी नहीं सुहागिनों का ,बच्चों का, मां बाप का करूण विलाप है, मूक रूदन है प्रकृति का , धरती का ,आकाश का …..जलेंगी चिताएं और विलीन हो जायेंगे शरीर जो सिर्फ शरीर ही नहीं प्यार है...

0

‘मां’ पर अमरजीत कौंके की सात कविताएं

जो कभी नहीं भूलती  ( दिवंगत माँ के लिए सात कविताएं )  1. बहुत भयानक रात थी ग्लूकोज़ की बोतल से बूँद-बूँद टपक रही थी मौत कमरे में माँ को किसी मगरमच्छ की तरह साँस-साँस निगल रही थी बचपन के बाद मैं माँ को पहली बार इतना समय इतना नज़दीक...

0

गौतम कुमार ‘सागर’ की चार कविताएं

एक उम्र  की सुराही से रिस रहा है लम्हा लम्हा बूँद बूँद और हमें मालूम तक नहीं पड़ता कितनी स्मृतियाँ पुरानी किताब के जर्द पन्ने की तरह धूमिल पड़ गई हमें मालूम तक नहीं पड़ता बिना मिले , बिना देखे कितने अनमोल रिश्ते औपचारिकता में तब्दील हो जाते है हमें...

1

विभा परमार की दो कविताएं

सवाल आने बंद हो जाएं… मेरे भीतर चलती रहती है सवालों की सीरीज अनवरत गति से जैसे हवा चलती है, पानी बहता है और साँसें चलती हैं सोचती हूँ अक्सर हवा गर रुक जाये तो दम घुटता है पानी रुक जाये तो सड़ने लगता है सवाल आने बंद हो जाएं...

0

ओम नागर की चार कविताएं

तुम और मैं तुम मंच पर मैं फर्श पर बैठा हूँ एक सच्चे सामाजिक की तरह तुम्हें चिंता है अपने कलफ़ लगे कुर्ते पर सिलवट उतर आने की मुझे तो मुश्क़िल हो रहीं यह सोचते कि अभी और कितनी खुरदरी करनी हैं तुम्हें तथाकथित तरक्की की राह तुम किस अजाने...

0

नीलिमा श्रीवास्तव की दो कविताएं

मै स्त्री मैं स्त्री कभी अपनों ने कभी परायों ने कभी अजनबी सायों ने तंग किया चलती राहों में कभी दर्द में कभी फर्ज में कभी मर्ज में वेदना मिली इस धरती के नरक में कभी शोर में कभी भोर में कभी जोर में संताप सहे अपनी ओर से कभी...

0

मान बहादुर सिंह की कविता ‘बैल-व्यथा’

  तुम मुझे हरी चुमकार से घेरकर अपनी व्यवस्था की नाद में जिस भाषा के भूसे की सानी डाल गए हो एक खूंटे से बंधा हुआ अपनी नाथ को चाटता हुआ लम्बी पूंछ से पीठ पर तुम्हारे पैने की चोट झाड़ता हुआ खा रहा हूं।   देखो हलधर, मुझे इस...