Category: कविता

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अनुपमा शर्मा की कविता ‘अस्तित्व की जड़’

अदृश्य है ,है दृश्य भी, सजीव में है,निर्जीव में भी, ज्ञान में है, अश्रु में है, मुस्कान में है, आवाज़ में है, साज़ में भी, नृत्य की मुद्राओ में भी, अभिनय में भी, शिक्षा में भी, आत्मविश्वास में भी, विश्व की हर काबिलियत में भी, उसकी प्राथमिकता है केवल सम्मान,...

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मनोज चौहान की तीन कविताएं

ऐ कविता   दस्तक देना तुम कभी ऐ कविता दिनभर कमर तोड़ चुके ईंट-भठ्ठे के मजदूरों की उन बास छोड़ती झुग्गियों में बीड़ी के धुंएं और सस्ते देशी ठर्रे के घूंट पीकर जो चाहते हैं मिटा देना थकान और चिंताओं को व भीतर उपजती वेदना को भी और बुनते हैं सपनों...

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आरती आलोक वर्मा की दो कविताएं

मैं आज की नारी हूं ढूंढते रहे हर वक्त खामियां दर खामियां दोष मुझमें था या तुम्हारे नजरिए में नापसन्द थी तुम्हेें हर वो चीज, व्यक्ति या परिस्थितियाँ जो मुझे बेहद पसंद थी । मेरे किसी फैसले तक आने से पूर्व, सुना देते अपना निर्णय या फिर धमकियाँ तलाक की...

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प्रतिभा चौहान की पांच कविताएं

||हमारे फूल -तुम्हारे नक्शे|| तुम्हें उलझे हुए आदमी हो तुम सुलझा नहीं  सके समय की लट को तुमने नहीं सीखा खुशियों से खेलना तुम्हें नहीं आता सीधे सरल सवालों का जवाब देना तुमने तो यह भी नहीं समझा कि डूबते हुए आदमी को तिनके का सहारा होता है तुमने नहीं...

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पंकज शर्मा की दो कविताएं

तस्वीरें… गहरे असमंजस से भरा चेहरा अचानक मुस्कुरा उठता है। स्माइल प्लीज.. सुनकर कुछ साफ दिल लोगों को छोड़ हर चेहरा हरा भरा हो उठता है। और.. निकल आती है तरह तरह की तस्वीरें.. कुछ हँसते चेहरों के बीच, बुझी आँखों की कुछ जवां नौकरियों के बीच,रिटायर्ड साखों की अटल...

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सुशांत सुप्रिय की छह कविताएं

1. लौट आऊँगा मैं क़लम में रोशनाई-सा पृथ्वी पर अन्न के दाने-सा कोख में जीवन के बीज-सा लौट आऊँगा मैं आकाश में इंद्रधनुष-सा धरती पर मीठे पानी के कुएँ-सा ध्वंस के बाद नव-निर्माण-सा लौट आऊँगा मैं लौट आऊँगा मैं आँखों में नींद-सा जीभ में स्वाद-सा थनों में दूध-सा ठूँठ हो...

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मार्टिन जॉन की दो कविताएं

मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ   उसने शपथ ली , “मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ ……….” और वह राजा बन गया   इसके पहले मज़हबी क़िताबों की कसमें खा चुका है कई कांडों को सरअंजाम देने के मामले में .   ईश्वर सर्वशक्तिमान है ईश्वर उसे शक्ति देगा...

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चन्द्रप्रकाश श्रीवास्तव की छह कविताएं

गतिमान हने दो समय को भागता है समय तो भागने दो समय को कुलाचें भरने दो समय चीखता-चिल्लाता है तो चीखने चिल्लाने दो समय अकुलाता है तो अकुलाने दो समय विलाप करता है तो सुनो समय का विलाप अच्छा है समय का गतिमान रहना कुलाचें भरना चीखना-चिल्लाना हांफना और विलाप...

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कृष्णधर शर्मा की चार कविताएं

नदी और औरत किसी झरने का नदी बन जाना ठीक वैसे ही तो जैसे किसी लड़की का औरत बन जाना जैसे एकवचन से बहुवचन हो जाना जैसे अपने लिए जीना छोड़कर दुनिया के लिए जीना जैसे दूसरों को अमृत पिला खुद जहर पीना अद्भुत सी समानताएं हैं नदी और औरत...

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ललित शर्मा की दो कविताएं

 बिजूका जानते नहीं , क्या होता, बिजूका? एक टाँग , पर खड़ा हुआ, बाँहें पसारे, मटकी का सिर लटकाये, सदा मुस्कराये, पराली का शरीर, चीथड़े लगा कोट, खेत जैसे इसका हो। कौआ भगाने को, लगाया इसको, चिड़िया तक नहीं , भागती, चूहे भी, कुतर जाते टाँग , इसी की, कभी...

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डॉ भावना की तीन कविताएं

उस रात उस रात जब बेला ने खिलने से मना कर दिया था तो ख़ुशबू उदास हो गयी थी उस रात जब चाँदनी ने फेर ली अपनी नज़रें चाँद को देखकर तो रो पड़ा था आसमान उस रात जब नदी ने बिल्कुल शांत हो रोक ली थी अपनी धाराएँ तो...

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देवेंद्र कुमार की पांच कविताएं

आंखों में पानी  डॉक्टर ने कहा आंखों में ड्रायनेस है आंसू नहीं बनते अब कुछ दिनों में दिखना भी बंद हो जाएगा दिखना बंद होने से पहले ही बंद हो गए आंसू देखकर भी नहीं बहता आंखों से आंसू चाहे कुछ भी देख लो डॉक्टर ने कहा प्रदूषण बढ़ गया...

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सुधीर कुमार सोनी की छह कविताएं

बेमिसाल मुहब्बत पानी के गहरे तल में पत्थर है पत्थर के गहरे तल में पानी है पानी है पत्थर है अटूट प्रेम है यह शायद कोई नहीं जानता कि इनके प्रेम की मिसाल दी जाए धीरे-धीरे कटकर प्रेम में सब कुछ मिटा देना पत्थर के सिवाय कोई नहीं जानता युगों-युगों से...

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प्रसून परिमल की दो कविताएं

प्रेम-कहानी का एक ‘ पाठक ‘ हूँ… पता है, मुझे प्रेम कहानियाँ पढ़नी अच्छी लगती है..बहुत अच्छी लगती है मैं पढ़ना चाहता हूँ एक-एक प्रेम-कहानी..एक-एक-की प्रेम-कहानी..हर्फ़- हर्फ़..शब्द-शब्द मैं दुनिया की सारी प्रेम कहानियाँ पढ़ना चाहता हूँ सच..तुम्हारी भी ..तुम्हारी भी..और तुम्हारी भी… मैं हर प्रेमी-ह्रदय की संजो-संजो रखी बेशक़ीमती अक्षय...

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मुक्ता वेद की पांच कविताएं

बोगनवेलिया मौसम तो है ये गुलाब गेंदा गुलदाउदी का तो क्या? उसकी यादों में लहराता झूमता है बोगनवेलिया चटख गुलाबी बोगनवेलिया उसके घर की छज्जी पर लहराता झूमता निकलता था वो गीले बालों को झटकता खिले बोगनवेलिया की आड़ से पल भर ढूंढती उसकी आँखें सामने की लॉन में किसी...

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डाॅ. अजय पाठक के दस गीत

मजदूर-कटारों की कौन यहाॅ सुनता है हम मजदूर-कहारों की। खून पेर कर, करें पसीना क्या गर्मी-सर्दी हक मांगो तो लाठी मारे हमको ही वर्दी जुल्म जबर झेला करते है हम सरकारों की मेहनत अपनी, हुकुम तुम्हारा मालिक तुम हुक्काम बारह घंटे भठ्ठी झोंके फिर भी नमक हराम! नीयत हम भी...

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शहंशाह आलम की कविता ‘यक्षिणी’

एक यह आकाश जो कोरा है तुम्हारी छुअन की प्रतीक्षा में शताब्दियों-शताब्दियों से   अंतरिक्ष की सीढ़ियाँ पकड़कर अपने यक्षपति से छुप-छुपाकर तुम उतरते हो सखियों के संग-साथ और बादलों को सियाही बनाकर लिखते हो कोरे आकाश पर प्रेम की अमर कथाएँ मेरे लिए   अपार दिनों से पसरा मेरे...

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मीनू परियानी की कविता ‘मां’

    कष्ट हजारों सहकर,अपनी जान ज़ोखिम में डाल कर     जन्म हमें जो देती है, कोई और होती नहीं     वो औरत  सिर्फ माँ होती है     शक्ल सूरत पर जाती नहीं मेरी, कलेज़े से लगा कर रखती है     अपंग अपाहिज बच्चे को भी,...

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महिला दिवस पर डॉ सुलक्षणा अहलावत की कविता

सीता के रूप में मेरी अग्नि परीक्षा लेते हो, द्रौपदी रूप में जुए के दांव पर लगा देते हो, फिर भी तुम महिला दिवस मनाते हो। कभी सती के नाम पर चिता में जला देते हो, कभी जौहर के नाम पर अग्नि में कूदा देते हो, फिर भी तुम महिला...

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कृष्ण कुमार यादव की पाँच कविताएंं

प्रेयसी छोड़ देता हूँ निढाल अपने को उसकी बाँहों में बालों में अंगुलियाँ फिराते-फिराते हर लिया है हर कष्ट को उसने। एक शिशु की तरह सिमटा जा रहा हूँ उसकी जकड़न में कुछ देर बाद खत्म हो जाता है द्वैत का भाव। गहरी साँसों के बीच उठती-गिरती धड़कनें खामोश हो...