Category: कहानी

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रचना त्यागी की कहानी ‘काला दरिया’

 शुरुआती औपचारिकताओं के बाद पत्र का मजमून कुछ यूँ था –  माननीय मंत्री जी,  वन्दे मातरम !          बहुत सोच-विचार के बाद आपको यह पत्र लिखने बैठा हूँ। विगत कई वर्षों की पीड़ा  जब वक़्त की चट्टान तले दबकर धूमिल होने की बजाय किसी बरगद की जड़ों की मानिंद फैलती चली गई, और मैं...

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सपना सिंह की कहानी ‘उसका चेहरा’

         मैं उससे पहली दफा एक दोस्त के घर मिला था और एक लम्बे अर्से बाद मेरा मन कविता लिखने को होने लगा था।           दोस्त ने ही उसका परिचय कराया था, इनसे मिलो, अनुसूया अपने शशांक की पत्नी। उसने अन्यमनस्कता से मुझे देखकर हाथ जोड़ दिये थे तभी उधर...

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अंजू शर्मा की कहानी ‘नेमप्लेट’

ये उन दिनों की बात है जब दिन कुछ अधिक लम्बे हो चले थे और रातें मानो सिकुड़-सी गईं थीं! उनके बड़े हिस्से पर अब दिन का अख्तियार था! ये उन्हीं गुनगुने दिनों में एक बड़े महानगर की एक अलसाई-सी शाम थी जो धीमे-धीमे चलकर अपने होने का अहसास कराने...

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रमेश शर्मा की कहानी ‘एक मरती हुई आवाज़’

जाते दिसंबर का महीना था. हफ्ते भर पहले पछुआ हवाओं से हुई बारिश के चलते कड़ाके की ठंड पड़ रही थी. जगमगाते शहर को देखकर लगता था कि क्रिसमस की तैयारियां अब जोरों पर हैं. शहर के अधिकांश घर रंगीन झालरों की रोशनी में अभी से डूबे हुए थे. उसने...

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अवधेश प्रीत की कहानी ‘कजरी’

कजरी की हालत अब देखी नहीं जा रही।रात जैसे-जैसे गहराती जा रही है फजलू मियां की तबीयत डूबती जा रही है। वह इस बीच कभी घर के भीतर तो कभी बथान तक कई चक्कर लगा चुके थे। जब भी वह बथान तक जाते थम कर खड़े हो जाते। कजरी उन्हें...

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जयनंदन की कहानी ‘और रास्ता क्या है’

गुणाकर अपनी गरीबी और जहालत से लड़कर भी टूट नहीं रहा था। सभी जानते थे कि इसके पीछे अस्मां की मोहब्बत एक ताकत बनकर छतरी की तरह उस पर तनी रहती है। उसके घर के दो लड़के सोबरन और रोहित भूख और बेरोजगारी से तंग आकर अंततः घर और गांव...

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विजय शंकर विकुज की कहानी ‘ऑपरेशन प्रलय’

            हड़हड़-खड़खड़, हड़हड़-खड़खड़!             सुबह घर से निकलते हुए भी हड़हड़-खड़खड़ की आवाज़ उसके कानों में रेंगकर दिमाग को थपेड़े मार रही थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि अभी तक उसके मन-मस्तिष्क पर परसों की भारी बरसात...

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रामनगीना मौर्य की कहानी ‘बेचारा कीड़ा’

रेखा चित्र : रोहित प्रसाद पथिक ‘तू शायर है, मैं तेरी शायरी’…समर अपने मोबाइल के ‘सिंग-टोन’ पर जगा। लेकिन,फोन तुरन्त बन्द भी हो गया। शायद, किसी का मिस्सड-कॉल था। असमय नींद टूटने से समर को झल्लाहट हुई। फोन बन्द हो चुका था, सो इतनी सुबह किसका फोन हो सकता है?...

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नीरजा हेमेंद्र की कहानी ‘लड़की की जात’

—————————- नीरजा हेमेन्द्र जन्म-पडरौना, ( कुशीनगर ) उ0 प्र0। शिक्षा- एम.ए.( हिन्दी साहित्य ), बी.एड.। संप्रति- शिक्षिका ( लखनऊ उ0 प्र0 ) प्रकाशन-  5 कहानी संग्रह अमलतास के फूल, जी हां, मैं लेखिका हूं, पत्तों पर ठहरी ओस की बूंदें, और एक  दिन, माटी में उगते शब्द 2 उपन्यास अपने...

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कमलेश की कहानी ‘ज़मीन’

पूस की एकदम ठंडी रात। काली-कलूटी और डरावनी। उस पर रात के दो बजे। अपने घर के बरामदे में निकलो तो डर लगे। सर्द हवा जैसे हड्डियों तक में घुस जाने के लिए बेताब हो। रजाई या कंबल से निकलना तो मानो सजा की तरह लग रहा है। इसमें रह-रह...

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समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता से मुठभेड़ करतीं कहानियां

‘पहल 122′ में प्रकाशित गौरीनाथ की कहानी ‘हिन्दू’ और हरियश राय की कहानी ‘महफिल’ पर एक टिप्पणी सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ‘पहल जून-जुलाई 2020’ में प्रकाशित गौरीनाथ की कहानी ‘हिन्दू’  न केवल इस अंक की उपलपब्धि है बल्कि मौजूदा समय को बड़े प्रभावी ढंग से रेखांकित करती एक महत्वपूर्ण कहानी है।...

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राजा सिंह की कहानी ‘असफल’

राजा सिंह द्वारा राजाराम सिंह पताः- एम0 1285, सेक्टर-आई एल.डी.ए. कालोनी    कानपुर रोड, लखनऊ-226012                    मोबाइल 9415200724 वह लम्बे-लम्बे डग भरता है।उसे मालूम है कि मॉर्निंग वॉक के समय जोर-जोर से चलना चाहिए। धीमे टहलने से कोई फायदा नहीं। परन्तु तेज कदमों से चलने से वह थक जाता है,  हांफने...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘फुंसियाँ’

सुशांत सुप्रिय A-5001,गौड़ ग्रीन सिटी ,वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,ग़ाज़ियाबाद – 201014( उ. प्र . )मो: 8512070086ई-मेल: sushant1968@gmail.com  सुधीन्द्र, जब यह पत्र तुम्हें मिलेगा, मैं तुम्हारे जीवन से बहुत दूर जा चुकी हूँगी । मेरे पैरों में इतने वर्षोंसे बँधी जंजीर खुल चुकी होगी । मेरे पैर परों-से  हल्के लग रहे होंगे और किसी भी रास्ते पर चलने के लिए स्वतंत्र होंगे । चलने से पहले तुम से चंद बातें कर लेना ज़रूरी है । कल रात फिर मुझे वही सपना आया। तुममुझे अपने दफ़्तर की किसी पार्टी में ले गए हो । सपने में जाने-पहचाने लोग हैं।  परस्पर अभिवादन और बातचीत हो रही है कि अचानक सबके चेहरों पर देखते-ही-देखते फुंसियाँ उग आती हैं । फुंसियों का आकार बढ़ता चला जाता है । फुंसियों की पारदर्शी झिल्ली के भीतर भरा मवाद साफ़ दिखने लगता है । और तब एक भयानक बात होती है । उन फुंसियों के भीतर मवाद में लिपटा तुम्हारा डरावना चेहरा नज़र आने लगता है । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते हैं । जैसे तुम तुम न हो कर कोई भयावह यमदूत हो । असंख्य फुंसियों के भीतर असंख्य तुम । मानो बड़े-बड़े दाँतों वाले असंख्य यमदूत… डर के मारे मेरी आँख खुल गई । दिसंबर की सर्द रात में भी मैं पसीने से तरबतर थी । “तुमने ऐसा सपना क्यों देखा ? “जब भी मैं इस सपने का ज़िक्र तुमसे करती तो तुम मुझे ही कटघरे में खड़ा कर देते । “क्यों क्या ? क्या सपनों पर मेरा वश है ? “मैं कहती । तुम्हारा बस चलता तो तुम मेरे सपने भी नियंत्रित कर लेते ! तुम कहते हो कि यह सपना मेरे अवचेतन मन में दबी हुई कोई कुंठा है, अतीत की कोई स्मृति है । दुर्भाग्य यह है कि मेरी तमाम कुंठाओं के जनक तुम ही हो । मेरे भूत और वर्तमान में तुम्हारे ही भारी क़दमों की चहलक़दमी की आवाज़ गूँज रही है । मुड़कर देखने पर लगता है कि मामूली-सी  बात  थी।  मेरे  गाल  पर अक्सर उग आने वाली चंद फुंसियाँ ही तो इसकी जड़ में थीं । लेकिन क्या यह बात वाक़ई इतनी मामूली-सी थी ? तुमने ‘ आइसबर्ग ‘ देखा है ? उसका केवल थोड़ा-सा हिस्सा पानी की सतह के ऊपर दिखता है । यदि कोई अनाड़ी देखे तो लगेगा जैसे छोटा-सा बर्फ का टुकड़ा पानी की सतह पर तैर रहा है । पर ‘ आइसबर्ग ‘ का असली आकार तो पानी की सतह के नीचे तैर रहा होता है जिससे टकरा कर बड़े-बड़े जहाज़ डूब जाते हैं । जो बात ऊपर से मामूली दिखती है उसकी जड़ में कुछ और ही छिपा होता है। बड़ा और भयावह  । मेरे चेहरे पर अक्सर उग आने वाली फुंसियों से तुम्हें चिढ़ थी । मेरा उन्हें सहलाना भी तुम्हें पसंद नहीं था । बचपन से ही मेरी त्वचा तैलीय थी । मेरे चेहरे पर फुंसियाँ होती रहती थीं । मुझे उन्हें सहलाना अच्छा लगता था । ” फुंसियों से मत खेलो । मुझे अच्छा नहीं लगता । ” तुम ग़ुस्से से कह उठते । ” क्यों ? ” आख़िर यह छोटी-सी आदत ही तो थी । ” क्यों क्या ? मैंने कहा, इसलिए ! ” ” पर तुम्हें अच्छा क्यों नहीं लगता ? ” तुम कोई जवाब नहीं देते पर तुम्हारा ग़ुस्सा बढ़ता जाता । फिर तुम मुझ पर चिल्लाने लगते । तुम्हारा चेहरा मेरे सपने में आई फुंसियों में बैठे यमदूतों-सा  हो  जाता ।  तुम चिल्ला कर कुछ बोल रहे होते पर मुझे कुछ भी सुनाई नहीं देता । मैं केवल तुम्हें देख रही होती । तुम्हारे हाथ-पैरों में किसी जंगली जानवर के पंजों जैसे बड़े-बड़े नाख़ून उग जाते । तुम्हारे विकृत चेहरे पर भयावह दाँत उग जाते । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते । तुम मेरे चेहरे की ओर इशारा कर के कुछ बोल रहे होते और तब अचानक मुझे फिर से सब सुनाई देने लगता । ” भद्दी, बदसूरत कहीं की ।” तुम ग़ुस्से से पागल हो कर चीख़ रहे होते । शायद मैं तुम्हें शुरू से ही भद्दी लगती थी , बदसूरत लगती थी । फुंसियाँ तो एक बहाना थीं । शायद यही वजह रही होगी कि तुम्हें मेरी फुंसियाँ और उन्हें छूने की मेरी मामूली-सी आदत भी असहनीय लगती थी । जब हम किसी से चिढ़ने लगते हैं, नफ़रत करने लगते हैं तब उसकी हर आदत हमें बुरी लगती है । यदि तुम्हें मुझ से प्यार होता तो शायद तुम मेरी फुंसियों को नज़रंदाज़ कर देते । पता नहीं तुमने मुझसे शादी क्यों की ? शायद इसलिए कि मैं अपने अमीर पिता की इकलौती बेटी थी । मेरे पापा को तुमने चालाकी से पहले ही प्रभावित कर लिया था । उनकी मौत के बाद उनकी सारी जायदाद तुम्हारे पास आ गई और तुम अपना असली रूप दिखाने लगे । ” तुम भी पक्की ढीठ हो । तुम नहीं बदलोगी । ” तुम अक्सर किसी-न-किसी  बात  पर  अपने  विष-बुझे बाणों से मुझे बींधते रहते । सच्चाई तो यह है कि शादी के बाद से अब तक तुमने अपनी एक भी आदत नहीं बदली — सिगरेट पीना , शराब पीना , इंटरनेट पर पार्न-साइट्स देखना...

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ईश मिश्र की कहानी ‘गुलेरी जी की आत्मा’

ईश मिश्र दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से राजनीति शास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर पद से फरवरी 2019 में रिटायर। 1985 से पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं शोधपत्र लिख रहे हैं। सांप्रदायिकता पर लेखों का संकलन प्रकाशनार्थ समयांतर (मार्च 2017-नवंबर 2017) में समाजवाद पर प्रकाशित 9 लेखों को संकलित संपादित करने की तैयारी। 17 बी, विश्वविद्यालय मार्ग दिल्ली...

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शिव कुमार यादव की कहानी ‘किन बैरन लगाई ई आग रे…’

शिव कुमार यादव जन्म – 28जुलाई 1960 गांव – कतिकनार,बक्सर, बिहार। रचनाएं – हवा,काले फूल का प्रेम और रामऔतार की भैंस कहानी संग्रह। ईश्वर का हिन्दू और आस्था की परती पर, कविता संग्रह। अंधेर अर्थात बेजान बेजुबान समय की कहानियों का बंग्ला,मरठी, पंजाबी और तेलगु में अनुवाद। संप्रति :- सेल,आई एस...

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शंकर की कहानी ‘बत्तियां’

शंकर हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार। मशहूर साहित्यिक पत्रिका ‘परिकथा’ के संपादक थानेदार ने ऊंची आवाज में जो कुछ कहा था, दरअसल वह उसकी अपनी ही बेचैनी और घबड़ाहट का बयान था। सिपाही बिहारी राय और भरत पांडे ने जैसे कल सुना था, वैसे ही आज भी सुना: ‘‘कमबख्तो, मैं हथियार-बम...

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सुधांशु गुप्त की कहानी ‘संत, सत्यवान और सुधीर’

सुधांशु गुप्त कई कहानियां देश की प्रतिष्ठत पत्रिकाओं और पत्रों में प्रकाशित। अनेक कहानियां रेडियो से प्रसारित हो चुकी हैं। एक कहानी का मंचन श्रीराम सेंटर में हो चुका है। हिन्दी अकादमी और साहित्य कला परिषद द्वारा कहानी लेखन के लिए सम्मानित। ढाई दशक पत्रकारिता में गुजारने के बाद अब...

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रविशंकर सिंह की कहानी ‘पान-प्रसाद और पेंशन’

रविशंकर सिंह जन्म : 8 अक्टूबर 1958, ग्राम : धनौरा, भागलपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिन्दी), पीएचडी प्रकाशन : हंस, कथादेश, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, जनसत्ता, अक्षरपर्व, परिंदे, संवेद, जनमत, अलाव, प्रगतिशील वसुधा, कथाबिंब, कल के लिए, किस्सा, अंगचम्पा, समकालीन भारतीय साहित्य आदि पत्रिकाओं में कहानियां, कविताएं, आलेख प्रकाशित कहानी संग्रह...

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हरियश राय की कहानी ‘ऐसा हो तो…’

हरियश राय उत्‍तर प्रदेश के फतेहगढ़ में प्रारम्भिक शिक्षा, 1971 के बाद की शिक्षा दिल्ली से। दो उपन्यासों‘नागफनी के जंगल में’और‘मुट्ठी में बादल’के अलावा  छ:  कहानी संकलन‘बर्फ होती नदी’, ‘उधर भी सहरा’,‘अंतिम पड़ाव’, ‘वजूद के लिए’,‘सुबह- सवेरे’व‘ किस मुकाम तक ‘’प्रकाशित. इसके साथ ही सामयिक विषयों से संबंधित पांच अन्‍य...

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विवेक मिश्र की कहानी ‘कारा’

विवेक मिश्र 15 अगस्त 1970 को उत्तर प्रदेश के झांसी शहर में जन्म विज्ञान में स्नातक, दन्त स्वास्थ विज्ञान में विशेष शिक्षा, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्कोत्तर. तीन कहानी संग्रह- ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’-शिल्पायन, ‘पार उतरना धीरे से’-सामायिक प्रकाशन एवं ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ?’- किताबघर प्रकाशन तथा उपन्यास...