Category: कहानी

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राजा सिंह की कहानी ‘असफल’

राजा सिंह द्वारा राजाराम सिंह पताः- एम0 1285, सेक्टर-आई एल.डी.ए. कालोनी    कानपुर रोड, लखनऊ-226012                    मोबाइल 9415200724 वह लम्बे-लम्बे डग भरता है।उसे मालूम है कि मॉर्निंग वॉक के समय जोर-जोर से चलना चाहिए। धीमे टहलने से कोई फायदा नहीं। परन्तु तेज कदमों से चलने से वह थक जाता है,  हांफने...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘फुंसियाँ’

सुशांत सुप्रिय A-5001,गौड़ ग्रीन सिटी ,वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,ग़ाज़ियाबाद – 201014( उ. प्र . )मो: 8512070086ई-मेल: sushant1968@gmail.com  सुधीन्द्र, जब यह पत्र तुम्हें मिलेगा, मैं तुम्हारे जीवन से बहुत दूर जा चुकी हूँगी । मेरे पैरों में इतने वर्षोंसे बँधी जंजीर खुल चुकी होगी । मेरे पैर परों-से  हल्के लग रहे होंगे और किसी भी रास्ते पर चलने के लिए स्वतंत्र होंगे । चलने से पहले तुम से चंद बातें कर लेना ज़रूरी है । कल रात फिर मुझे वही सपना आया। तुममुझे अपने दफ़्तर की किसी पार्टी में ले गए हो । सपने में जाने-पहचाने लोग हैं।  परस्पर अभिवादन और बातचीत हो रही है कि अचानक सबके चेहरों पर देखते-ही-देखते फुंसियाँ उग आती हैं । फुंसियों का आकार बढ़ता चला जाता है । फुंसियों की पारदर्शी झिल्ली के भीतर भरा मवाद साफ़ दिखने लगता है । और तब एक भयानक बात होती है । उन फुंसियों के भीतर मवाद में लिपटा तुम्हारा डरावना चेहरा नज़र आने लगता है । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते हैं । जैसे तुम तुम न हो कर कोई भयावह यमदूत हो । असंख्य फुंसियों के भीतर असंख्य तुम । मानो बड़े-बड़े दाँतों वाले असंख्य यमदूत… डर के मारे मेरी आँख खुल गई । दिसंबर की सर्द रात में भी मैं पसीने से तरबतर थी । “तुमने ऐसा सपना क्यों देखा ? “जब भी मैं इस सपने का ज़िक्र तुमसे करती तो तुम मुझे ही कटघरे में खड़ा कर देते । “क्यों क्या ? क्या सपनों पर मेरा वश है ? “मैं कहती । तुम्हारा बस चलता तो तुम मेरे सपने भी नियंत्रित कर लेते ! तुम कहते हो कि यह सपना मेरे अवचेतन मन में दबी हुई कोई कुंठा है, अतीत की कोई स्मृति है । दुर्भाग्य यह है कि मेरी तमाम कुंठाओं के जनक तुम ही हो । मेरे भूत और वर्तमान में तुम्हारे ही भारी क़दमों की चहलक़दमी की आवाज़ गूँज रही है । मुड़कर देखने पर लगता है कि मामूली-सी  बात  थी।  मेरे  गाल  पर अक्सर उग आने वाली चंद फुंसियाँ ही तो इसकी जड़ में थीं । लेकिन क्या यह बात वाक़ई इतनी मामूली-सी थी ? तुमने ‘ आइसबर्ग ‘ देखा है ? उसका केवल थोड़ा-सा हिस्सा पानी की सतह के ऊपर दिखता है । यदि कोई अनाड़ी देखे तो लगेगा जैसे छोटा-सा बर्फ का टुकड़ा पानी की सतह पर तैर रहा है । पर ‘ आइसबर्ग ‘ का असली आकार तो पानी की सतह के नीचे तैर रहा होता है जिससे टकरा कर बड़े-बड़े जहाज़ डूब जाते हैं । जो बात ऊपर से मामूली दिखती है उसकी जड़ में कुछ और ही छिपा होता है। बड़ा और भयावह  । मेरे चेहरे पर अक्सर उग आने वाली फुंसियों से तुम्हें चिढ़ थी । मेरा उन्हें सहलाना भी तुम्हें पसंद नहीं था । बचपन से ही मेरी त्वचा तैलीय थी । मेरे चेहरे पर फुंसियाँ होती रहती थीं । मुझे उन्हें सहलाना अच्छा लगता था । ” फुंसियों से मत खेलो । मुझे अच्छा नहीं लगता । ” तुम ग़ुस्से से कह उठते । ” क्यों ? ” आख़िर यह छोटी-सी आदत ही तो थी । ” क्यों क्या ? मैंने कहा, इसलिए ! ” ” पर तुम्हें अच्छा क्यों नहीं लगता ? ” तुम कोई जवाब नहीं देते पर तुम्हारा ग़ुस्सा बढ़ता जाता । फिर तुम मुझ पर चिल्लाने लगते । तुम्हारा चेहरा मेरे सपने में आई फुंसियों में बैठे यमदूतों-सा  हो  जाता ।  तुम चिल्ला कर कुछ बोल रहे होते पर मुझे कुछ भी सुनाई नहीं देता । मैं केवल तुम्हें देख रही होती । तुम्हारे हाथ-पैरों में किसी जंगली जानवर के पंजों जैसे बड़े-बड़े नाख़ून उग जाते । तुम्हारे विकृत चेहरे पर भयावह दाँत उग जाते । तुम्हारे सिर पर दो सींग उग जाते । तुम मेरे चेहरे की ओर इशारा कर के कुछ बोल रहे होते और तब अचानक मुझे फिर से सब सुनाई देने लगता । ” भद्दी, बदसूरत कहीं की ।” तुम ग़ुस्से से पागल हो कर चीख़ रहे होते । शायद मैं तुम्हें शुरू से ही भद्दी लगती थी , बदसूरत लगती थी । फुंसियाँ तो एक बहाना थीं । शायद यही वजह रही होगी कि तुम्हें मेरी फुंसियाँ और उन्हें छूने की मेरी मामूली-सी आदत भी असहनीय लगती थी । जब हम किसी से चिढ़ने लगते हैं, नफ़रत करने लगते हैं तब उसकी हर आदत हमें बुरी लगती है । यदि तुम्हें मुझ से प्यार होता तो शायद तुम मेरी फुंसियों को नज़रंदाज़ कर देते । पता नहीं तुमने मुझसे शादी क्यों की ? शायद इसलिए कि मैं अपने अमीर पिता की इकलौती बेटी थी । मेरे पापा को तुमने चालाकी से पहले ही प्रभावित कर लिया था । उनकी मौत के बाद उनकी सारी जायदाद तुम्हारे पास आ गई और तुम अपना असली रूप दिखाने लगे । ” तुम भी पक्की ढीठ हो । तुम नहीं बदलोगी । ” तुम अक्सर किसी-न-किसी  बात  पर  अपने  विष-बुझे बाणों से मुझे बींधते रहते । सच्चाई तो यह है कि शादी के बाद से अब तक तुमने अपनी एक भी आदत नहीं बदली — सिगरेट पीना , शराब पीना , इंटरनेट पर पार्न-साइट्स देखना...

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ईश मिश्र की कहानी ‘गुलेरी जी की आत्मा’

ईश मिश्र दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदू कॉलेज से राजनीति शास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर पद से फरवरी 2019 में रिटायर। 1985 से पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं शोधपत्र लिख रहे हैं। सांप्रदायिकता पर लेखों का संकलन प्रकाशनार्थ समयांतर (मार्च 2017-नवंबर 2017) में समाजवाद पर प्रकाशित 9 लेखों को संकलित संपादित करने की तैयारी। 17 बी, विश्वविद्यालय मार्ग दिल्ली...

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शिव कुमार यादव की कहानी ‘किन बैरन लगाई ई आग रे…’

शिव कुमार यादव जन्म – 28जुलाई 1960 गांव – कतिकनार,बक्सर, बिहार। रचनाएं – हवा,काले फूल का प्रेम और रामऔतार की भैंस कहानी संग्रह। ईश्वर का हिन्दू और आस्था की परती पर, कविता संग्रह। अंधेर अर्थात बेजान बेजुबान समय की कहानियों का बंग्ला,मरठी, पंजाबी और तेलगु में अनुवाद। संप्रति :- सेल,आई एस...

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शंकर की कहानी ‘बत्तियां’

शंकर हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार। मशहूर साहित्यिक पत्रिका ‘परिकथा’ के संपादक थानेदार ने ऊंची आवाज में जो कुछ कहा था, दरअसल वह उसकी अपनी ही बेचैनी और घबड़ाहट का बयान था। सिपाही बिहारी राय और भरत पांडे ने जैसे कल सुना था, वैसे ही आज भी सुना: ‘‘कमबख्तो, मैं हथियार-बम...

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सुधांशु गुप्त की कहानी ‘संत, सत्यवान और सुधीर’

सुधांशु गुप्त कई कहानियां देश की प्रतिष्ठत पत्रिकाओं और पत्रों में प्रकाशित। अनेक कहानियां रेडियो से प्रसारित हो चुकी हैं। एक कहानी का मंचन श्रीराम सेंटर में हो चुका है। हिन्दी अकादमी और साहित्य कला परिषद द्वारा कहानी लेखन के लिए सम्मानित। ढाई दशक पत्रकारिता में गुजारने के बाद अब...

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रविशंकर सिंह की कहानी ‘पान-प्रसाद और पेंशन’

रविशंकर सिंह जन्म : 8 अक्टूबर 1958, ग्राम : धनौरा, भागलपुर (बिहार) शिक्षा : स्नातकोत्तर (हिन्दी), पीएचडी प्रकाशन : हंस, कथादेश, वागर्थ, वर्तमान साहित्य, जनसत्ता, अक्षरपर्व, परिंदे, संवेद, जनमत, अलाव, प्रगतिशील वसुधा, कथाबिंब, कल के लिए, किस्सा, अंगचम्पा, समकालीन भारतीय साहित्य आदि पत्रिकाओं में कहानियां, कविताएं, आलेख प्रकाशित कहानी संग्रह...

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हरियश राय की कहानी ‘ऐसा हो तो…’

हरियश राय उत्‍तर प्रदेश के फतेहगढ़ में प्रारम्भिक शिक्षा, 1971 के बाद की शिक्षा दिल्ली से। दो उपन्यासों‘नागफनी के जंगल में’और‘मुट्ठी में बादल’के अलावा  छ:  कहानी संकलन‘बर्फ होती नदी’, ‘उधर भी सहरा’,‘अंतिम पड़ाव’, ‘वजूद के लिए’,‘सुबह- सवेरे’व‘ किस मुकाम तक ‘’प्रकाशित. इसके साथ ही सामयिक विषयों से संबंधित पांच अन्‍य...

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विवेक मिश्र की कहानी ‘कारा’

विवेक मिश्र 15 अगस्त 1970 को उत्तर प्रदेश के झांसी शहर में जन्म विज्ञान में स्नातक, दन्त स्वास्थ विज्ञान में विशेष शिक्षा, पत्रकारिता एवं जनसंचार में स्नात्कोत्तर. तीन कहानी संग्रह- ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’-शिल्पायन, ‘पार उतरना धीरे से’-सामायिक प्रकाशन एवं ‘ऐ गंगा तुम बहती हो क्यूँ?’- किताबघर प्रकाशन तथा उपन्यास...

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प्रज्ञा की कहानी ‘एक झरना ज़मींदोज़’

प्रज्ञा प्रकाशित कृतियां कहानी संग्रह-तकसीम, मन्न्त टेलर्स उपन्यास—गूदड़ बस्ती, धर्मपुर लॉज नाट्यालोचना और सामाजिक सरोकारों से जुड़े मुद्दों पर भी पुस्तकें प्रकाशित संप्रति एसोसिएट प्रोफेसर किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ई-मेल-pragya3k@gmail.com एक प्रेम कहानी ऐसी भी! जैसा उन्हें उस वक्त देखा, मैं वैसा ही पेश करने की कोशिश करूंगा जनाब! न...

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राजनारायण बोहरे की कहानी ‘औकात’

राजनारायण बोहरे १-२०५/११ एकता अपार्टमेन्ट , विष्णु पुरी , भंवार्कुआ  इंदौर ४५२००१ २- एलआयजी 19, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी दतिया मध्यप्रदेश 475661 मो0 94257-26697 098266-89939 जिस दिन से दिनेश अहमदाबाद आए, मन का चैन छिन गया।      एक लम्बे अरसे से वह उससे दूर रहते आए हैं और उन्होंने मन में...

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शिवदयाल की कहानी ‘नन्हें रंगदार’

शिवदयाल मो.- 9835263930 ‘चोर-चोर ….’ अचानक शोर उठा और इतवारी तरकारी बाजार में धक्कामुक्की और ठेलमठेल शुरू हो गई। मैंने आलू वाले से वापस रेजगारी लेने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि बगल से किसी ने धक्का मारा। मैं आलू के ढेर पर गिरते-गिरते बचा, लेकिन धक्के के जोर...

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विजय शंकर विकुज की कहानी ‘संक्रमण’

विजय शंकर विकुज जन्म 12 सितंबर 1957, आसनसोल शिक्षा – स्नातक प्रकाशन – वागर्थ, वर्तमान साहित्य,  कतार,  संवेद,  निष्कर्ष,  मधुमती,  कथाबिम्ब,  प्रेरणा,  जनसत्ता, छपते छपते, उत्तर प्रदेश, भाषा, युद्धरत आम आदमी,  वैचारिकी,  स्वाधीनता,  सृजनपथ, समय के साखी इत्यादि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। कहानी के अलावा आलेख, संस्मरण, रिपोतार्ज, साक्षात्कार तथा अन्य कई विधाओं में लेखन। बहुत – सी रचनाओं...

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी ‘प्रीमियम’

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव शिक्षा : बीएससी (फिजिक्स ऑनर्स), एम ए (हिन्दी), एम ए (पत्रकारिता, गोल्ड मेडलिस्ट) सारी पढ़ाई कलकत्ता  विश्वविद्यालय से पेशा : 3 दशकों से पत्रकारिता। कोलकाता के दैनिक अखबार ‘सन्मार्ग’ से 1990 में नौकरी की शुरुआत। दस सालों तक सन्मार्ग में रहने के बाद टेलीविजन पत्रकारिता में। 2001...

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जो पढ़ रहे हैं, वही कहानियों को बचा रहे हैं : शंकर

कहानी के विभिन्न पहलुओं पर वरिष्ठ कथाकार और परिकथा के संपादक शंकर से ख़ास बातचीत। बातचीत की है वरिष्ठ कथाकार हरियश राय और सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ने सत्येंद्र : शंकर जी, आप वरिष्ठ कथाकार भी हैं और संपादक भी। तो शुरुआत इसी सवाल से करते हैं कि आखिर कहानी है...

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यारेग़ार : चरम अमानवीयता की संवेदनशील कहानी

संज्ञा उपाध्याय दिल्ली में जनमीं, पढ़ी-लिखीं संज्ञा उपाध्याय युवा संपादक, कहानीकार, फ़ोटोग्राफ़र और शिक्षक हैं. वे साहित्य और संस्कृति की प्रतिष्ठित पत्रिका ‘कथन’ की संपादक हैं. ‘कथन’ के संपादन के लिए उन्हें स्पंदन साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से नवाजा गया.‘कथन’ के साथ उन्होंने पैंतीस पुस्तकों की चर्चित अनूठी श्रृंखला ‘आज के सवाल’...

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डॉ हंसा दीप की कहानी ‘हरा पत्ता पीला पत्ता’

डॉ. हंसा दीप मेघनगर, जिला झाबुआ, मध्यप्रदेश में जन्म। हिन्दी में पीएच.डी., यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो में लेक्चरार के पद पर कार्यरत। पूर्व में यॉर्क यूनिवर्सिटी, टोरंटो में हिन्दी कोर्स डायरेक्टर एवं भारतीय विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक। कैनेडियन विश्वविद्यालयों में हिन्दी छात्रों के लिए अंग्रेज़ी-हिन्दी में पाठ्य-पुस्तकों के कई संस्करण प्रकाशित। प्रसिद्ध...

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रमेश उपाध्याय की कहानी ‘काठ में कोंपल’

रमेश उपाध्याय सम्मान गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार (केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा), साहित्यिक पत्रकारिता पुरस्कार (वनमाली सृजनपीठ, भोपाल), ‘नदी के साथ’ (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा पुरस्कृत), ‘किसी देश के किसी शहर में’, ‘डॉक्यूड्रामा तथा अन्य कहानियाँ’ (दोनों पुस्तकें हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत) संपर्क 107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम...

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एंटन चेखव की कहानी ‘एक कलाकृति’

सुशान्त सुप्रिय नाम : सुशांत सुप्रियजन्म : 28 मार्च , 1968शिक्षा : एम.ए.(अंग्रेज़ी ), एम . ए.  ( भाषा विज्ञान ) : अमृतसर ( पंजाब ) , व दिल्ली में । प्रकाशित कृतियाँ :—————–# हत्यारे ( 2010 ) , हे राम ( 2013 ) , दलदल ( 2015 ) , ग़ौरतलब कहानियाँ( 2017 ) , पिता के नाम ( 2017 , मैं कैसे हँसूँ ( 2019 ) : छह कथा–संग्रह । # इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ( 2015 ) , अयोध्या से गुजरात तक ( 2017...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘लाश’

सुशान्त सुप्रिय A-5001 ,गौड़ ग्रीन सिटी ,वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,ग़ाज़ियाबाद – 201014( उ. प्र. )मो: 8512070086ई–मेल: sushant1968@gmail.com घर के ड्राइंगरूम में उनकी लाश पड़ी हुई है  । उनकी मृत्यु से मुझे गहरा झटका लगा है ।  मैं सदमे में हूँ । बुझा हुआ हूँ ।  मेरी वाणी को जैसे लकवा मार गया है ।  हाथ–  पैरों में जैसे जान ही नहीं रही ।  आँखों में जैसे किसी ने ढेर सारा अँधेरा झोंक दिया है ।  वे नहीं गए । ऐसा लगता है जैसे मेरा सब कुछ चला गया है । जैसे मेरी धमनियों और शिराओं में से रक्त चला गया है । जैसे मेरे शरीर में से मेरी आत्मा चली गई है । जैसे मेरे आसमान से सूरज, चाँद और सितारे चले गए हैं । सुबहका समय है लेकिन इस सुबह के भीतर रात की कराहें दफ़्न हैं ।  लगता है जैसे मेरे वजूद की किताब के पन्ने फट कर समय की आँधी में खो जाएँगे … मेरे घर में मेरी पत्नी , मेरा बेटा और मेरी बेटी रहते हैं । और हमारे साथ रहते थे वे । वे मेरे यहाँ तब से थे जब से मैंने इस घर में आँखें खोली थीं । बल्कि इस से भी कहीं पहले से वे हम सब के बीच थे । मेरे पिताजी , दादाजी — सब उनकीइज़्ज़त करते थे ।  वे हमारे यहाँ ऐसे रहते थे जैसे भक्त के दिल में भगवान रहते हैं ।  जैसे बादलों में बूँदें रहती हैं ।  जैसे  सूर्य की किरणों में ऊष्मा रहती है । जैसे इंद्रधनुष में रंग रहते हैं । जैसे फूलों में पराग रहता है । जैसे पानी में मछली रहती है। जैसे पत्थरों में आग रहती है । जैसे आँखों में पहचान रहती है … उनकी उँगली पकड़ कर ही मैं जीवन में दाख़िल हुआ था । मेरी सौभाग्यशाली उँगलियों ने उन्हें छुआ था । पिताजी, दादाजी — सब ने हमारे जीवन में उनके महत्व के बारे में हमें बार–बार  समझाया  था ।  उनका  साथ मुझे अच्छा लगता था ।उनकी गोदी में बैठकर मैंने सच्चाई और ईमानदारी का पाठ पढ़ा । उनकी छाया में मैंने जीवन को ठीक से जीना सीखा । सही और ग़लत का ज्ञान उन्होंने ही मुझे करवाया था ।  और मैं इसे कभी नहीं भूला । उनके दिखाए मार्ग पर चल कर ही मैंआज जहाँ हूँ , वहाँ पहुँचा । फिर मेरी शादी हो गई । और यहाँ से मेरे जीवन में मुश्किलों ने प्रवेश किया । मेरी पत्नी पढ़ी–लिखी किंतु बेहद महत्वाकांक्षी थी ।  उसकी  मानसिकता  मुझसे अलग  थी ।  वह  जीवन में सफल होने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी । और ‘ सफलता ‘ की उसकी परिभाषा भी मेरी परिभाषा से बिलकुल मेल नहीं खातीथी । झूठ बोलकर , फ़रेब करके , दूसरों का हक़ मार कर आगे  बढ़ने को भी वह जायज़ मानती थी । उसके लिए अवसरवादिता ‘ दुनियावी ‘ होने का दूसरा नाम था ।  ज़ाहिर है , मेरी पत्नी को उनका साथ पसंद नहीं था क्योंकि वे तो छल–कपट से कोसों दूर थे । फिर मेरे जीवन में मेरे बच्चे आए । एक फूल–सा बेटा और एक इंद्रधनुष–सी  बेटी ।  मेरी    ख़ुशी  की  कोई सीमा नहीं रही । मैंने चाहा कि मेरे बच्चे भी उनसे सही जीवन जीने की शिक्षा ग्रहण करें । जीवन में सही और ग़लत को पहचानें । उनके द्वारासिखाए गए मूल्यों और आदर्शों का दामन थाम लें । किंतु ऐसा हो न सका । बच्चे अपनी माँ पर गए । उन्होंने जो सीखा , अपनी माँ से ही सीखा । इन बीजों में मैं पर्याप्त मात्रा में अच्छे संस्कारों की खाद न मिला पाया । बुराई को नष्ट कर देनेवाले कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं कर पाया । नतीजा यह हुआ कि इन पौधे–रूपी बच्चों में बुराई का कीड़ा लग गया ।  मेरे बच्चे उनकी  अच्छाइयों से कुछ न सीख सके । जब मैं घर में नहीं होता , वे घर के एक कोने में उपेक्षित–से  पड़े  रहते ।  मेरे बीवी –बच्चे उनसे...