Category: कहानी

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रमेश उपाध्याय की कहानी ‘काठ में कोंपल’

रमेश उपाध्याय सम्मान गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार (केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा), साहित्यिक पत्रकारिता पुरस्कार (वनमाली सृजनपीठ, भोपाल), ‘नदी के साथ’ (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ द्वारा पुरस्कृत), ‘किसी देश के किसी शहर में’, ‘डॉक्यूड्रामा तथा अन्य कहानियाँ’ (दोनों पुस्तकें हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा पुरस्कृत) संपर्क 107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम...

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एंटन चेखव की कहानी ‘एक कलाकृति’

सुशान्त सुप्रिय नाम : सुशांत सुप्रियजन्म : 28 मार्च , 1968शिक्षा : एम.ए.(अंग्रेज़ी ), एम . ए.  ( भाषा विज्ञान ) : अमृतसर ( पंजाब ) , व दिल्ली में । प्रकाशित कृतियाँ :—————–# हत्यारे ( 2010 ) , हे राम ( 2013 ) , दलदल ( 2015 ) , ग़ौरतलब कहानियाँ( 2017 ) , पिता के नाम ( 2017 , मैं कैसे हँसूँ ( 2019 ) : छह कथा–संग्रह । # इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं ( 2015 ) , अयोध्या से गुजरात तक ( 2017...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘लाश’

सुशान्त सुप्रिय A-5001 ,गौड़ ग्रीन सिटी ,वैभव खंड ,इंदिरापुरम ,ग़ाज़ियाबाद – 201014( उ. प्र. )मो: 8512070086ई–मेल: sushant1968@gmail.com घर के ड्राइंगरूम में उनकी लाश पड़ी हुई है  । उनकी मृत्यु से मुझे गहरा झटका लगा है ।  मैं सदमे में हूँ । बुझा हुआ हूँ ।  मेरी वाणी को जैसे लकवा मार गया है ।  हाथ–  पैरों में जैसे जान ही नहीं रही ।  आँखों में जैसे किसी ने ढेर सारा अँधेरा झोंक दिया है ।  वे नहीं गए । ऐसा लगता है जैसे मेरा सब कुछ चला गया है । जैसे मेरी धमनियों और शिराओं में से रक्त चला गया है । जैसे मेरे शरीर में से मेरी आत्मा चली गई है । जैसे मेरे आसमान से सूरज, चाँद और सितारे चले गए हैं । सुबहका समय है लेकिन इस सुबह के भीतर रात की कराहें दफ़्न हैं ।  लगता है जैसे मेरे वजूद की किताब के पन्ने फट कर समय की आँधी में खो जाएँगे … मेरे घर में मेरी पत्नी , मेरा बेटा और मेरी बेटी रहते हैं । और हमारे साथ रहते थे वे । वे मेरे यहाँ तब से थे जब से मैंने इस घर में आँखें खोली थीं । बल्कि इस से भी कहीं पहले से वे हम सब के बीच थे । मेरे पिताजी , दादाजी — सब उनकीइज़्ज़त करते थे ।  वे हमारे यहाँ ऐसे रहते थे जैसे भक्त के दिल में भगवान रहते हैं ।  जैसे बादलों में बूँदें रहती हैं ।  जैसे  सूर्य की किरणों में ऊष्मा रहती है । जैसे इंद्रधनुष में रंग रहते हैं । जैसे फूलों में पराग रहता है । जैसे पानी में मछली रहती है। जैसे पत्थरों में आग रहती है । जैसे आँखों में पहचान रहती है … उनकी उँगली पकड़ कर ही मैं जीवन में दाख़िल हुआ था । मेरी सौभाग्यशाली उँगलियों ने उन्हें छुआ था । पिताजी, दादाजी — सब ने हमारे जीवन में उनके महत्व के बारे में हमें बार–बार  समझाया  था ।  उनका  साथ मुझे अच्छा लगता था ।उनकी गोदी में बैठकर मैंने सच्चाई और ईमानदारी का पाठ पढ़ा । उनकी छाया में मैंने जीवन को ठीक से जीना सीखा । सही और ग़लत का ज्ञान उन्होंने ही मुझे करवाया था ।  और मैं इसे कभी नहीं भूला । उनके दिखाए मार्ग पर चल कर ही मैंआज जहाँ हूँ , वहाँ पहुँचा । फिर मेरी शादी हो गई । और यहाँ से मेरे जीवन में मुश्किलों ने प्रवेश किया । मेरी पत्नी पढ़ी–लिखी किंतु बेहद महत्वाकांक्षी थी ।  उसकी  मानसिकता  मुझसे अलग  थी ।  वह  जीवन में सफल होने के लिए किसी भी हद तक जा सकती थी । और ‘ सफलता ‘ की उसकी परिभाषा भी मेरी परिभाषा से बिलकुल मेल नहीं खातीथी । झूठ बोलकर , फ़रेब करके , दूसरों का हक़ मार कर आगे  बढ़ने को भी वह जायज़ मानती थी । उसके लिए अवसरवादिता ‘ दुनियावी ‘ होने का दूसरा नाम था ।  ज़ाहिर है , मेरी पत्नी को उनका साथ पसंद नहीं था क्योंकि वे तो छल–कपट से कोसों दूर थे । फिर मेरे जीवन में मेरे बच्चे आए । एक फूल–सा बेटा और एक इंद्रधनुष–सी  बेटी ।  मेरी    ख़ुशी  की  कोई सीमा नहीं रही । मैंने चाहा कि मेरे बच्चे भी उनसे सही जीवन जीने की शिक्षा ग्रहण करें । जीवन में सही और ग़लत को पहचानें । उनके द्वारासिखाए गए मूल्यों और आदर्शों का दामन थाम लें । किंतु ऐसा हो न सका । बच्चे अपनी माँ पर गए । उन्होंने जो सीखा , अपनी माँ से ही सीखा । इन बीजों में मैं पर्याप्त मात्रा में अच्छे संस्कारों की खाद न मिला पाया । बुराई को नष्ट कर देनेवाले कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं कर पाया । नतीजा यह हुआ कि इन पौधे–रूपी बच्चों में बुराई का कीड़ा लग गया ।  मेरे बच्चे उनकी  अच्छाइयों से कुछ न सीख सके । जब मैं घर में नहीं होता , वे घर के एक कोने में उपेक्षित–से  पड़े  रहते ।  मेरे बीवी –बच्चे उनसे...

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मनोज मंजुल की कहानी ‘रूबी की मां’

मनोज मंजुल नूर मुहम्मद ‘नूर’ के ग़ज़ल संग्रह ‘सबका शायर’ खरीदने के लिए नीचे की तस्वीर पर क्लिक करें रूबी की माँ काफी परेशान है, उसका मन भारी-भारी है, चिंता से उसके चेहरे पर जो रेखाऎं उभर आईं हैं वे काफी गहरी दीख रहीं है. वह उस खतरे के बारे...

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विनोद कुमार दवे की कहानी ‘सहायता’

विनोद कुमार दवे बस में बैठे-बैठे मैंने अनुमान लगाया, जयपुर पहुंचते पहुंचते बारह बज जाएंगे। जगह-जगह बस का रुकना मुझे बेचैन कर रहा था, अभी सात घंटे बाकी थे। इतना लंबा वक़्त बस में काटना बहुत मुश्किल है। मैं पछता रहा था, ट्रेन से आता तो बहुत सुविधाजनक रहता। “खैर...

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सुशान्त सुप्रिय की कहानी ‘और फिर अंधेरा’

सुशान्त सुप्रिय अमेजन पर अभी बुक करें। कवर पेज पर क्लिक करें इस माह के आखिरी हफ्ते में प्रकाश्य प्रिय गुरमीत ,                       यहाँ हैवलॉक द्वीप , अंडमान के डॉल्फ़िन गेस्ट हाउस से मैंने पिछले हफ़्ते भी तुम्हें पत्र लिखा था  पर तुमने इस पते पर मेरे पत्र का जवाब नहीं दिया है । क्या तुम मुझे पत्र लिखने का अपना वादा भूल गए हो? पिताजी बता रहे हैं कि वहाँ दिल्ली में बहुत गड़बड़ चल रही है । पिछले हफ़्ते से विश्व की सभी प्रमुख महाशक्तियाँ विनाशकारी तृतीय विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी हैं । पिताजी का कहना है किअमेरिका और यूरोपीय देश एक ओर हैं जबकि चीन , रूस और उत्तर कोरिया दूसरी ओर हैं । चारो ओर भयऔर आतंक का माहौल छाया हुआ है । डाक-व्यवस्था भी बाधित हुई होगी । शायद इसीलिए तुम्हारी लिखी चिट्ठी मुझे नहीं मिली है । वहाँ हमारा दोस्त नफ़ीस  कैसा है ? और जेनेलिया कैसी है ?  मैं तुम्हारे और  स्कूल के सभी दोस्तों के लिए चिंतित हूँ । सच कहूँ तो मुझे पिताजी की तृतीय विश्वयुद्ध वाली बात पर पूरा यक़ीन नहीं है । हो सकता है , वहाँ दिल्ली में सब ठीक हो और तुमने आलस के मारे मुझे पत्र लिखा ही नहीं हो । हमें यहाँ अंडमान के हैवलॉक द्वीप आए हुए एक हफ़्ते से ज़्यादा समय हो गया है । तुम्हें पता है , मम्मी तो यहाँ आना ही नहीं चाहती थी । वह तो कश्मीर जाना चाहती थी , पर पिताजी हम सब को मना कर यहाँ ले आए । वैसे मेरी  इच्छा शुरू से ही अंडमान के जंगलों में घूमने की थी । अब तो मम्मी को भी यहाँ के समुद्र-तट और यहाँ की हरियाली अच्छी लगने लगी है । इस बीच वहाँ दिल्ली में रितिक रोशन की नई फ़िल्म  लगने वाली थी । जब मैं वापस आऊँगा और सब ठीक होगा तो हम दोनों अपने पापा-मम्मी के साथ इकट्ठे वह फ़िल्म देखने जाएँगे । यहाँ डॉल्फ़िन गेस्ट हाउस के पास के ‘ बीच ‘ से समुद्र में सूर्योदय और सूर्यास्त बहुत सुंदर लगते हैं । पास ही मछलियों से भरी एक छोटी सी नदी भी बह रही है । हमें बहुत मज़ा आ रहा है । हमने बहुत सारी तस्वीरें खींची हैं । जब मैं वापस दिल्ली आऊँगा तब तुम्हें ये सारी सुंदर फ़ोटो दिखाऊँगा । हमारे पड़ोस में  केरल का एक परिवार ठहरा हुआ है । अंकल-आंटी के साथ एक प्यारी-सी छोटी बच्ची भी है । मैं उसके साथ खेलता हूँ । तुम्हारी बहुत याद आ रही है । तुम कैसे हो ? मैं मोबाइल फ़ोन पर तुमसे बात करना चाहता था पर इन  दिनों यहाँ कोई भी फ़ोन काम नहीं कर रहा । पोस्ट-ऑफ़िस यहाँ से दूर है । यहाँ के रसोइया माइकेल अंकल हफ़्ते में दो बार दूर के बाज़ार जा कर खाने-पीने का सामान ख़रीद लाते हैं । लौटते हुए वे डाक-घर से यहाँ की चिट्ठियाँ भी ले आते हैं । तुम्हारी चिट्ठी की प्रतीक्षा है , दोस्त । — तुम्हारा मित्र , पलाश ।...

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रंजना जायसवाल की कहानी ‘कैसे लिखूं उजली कहानी’

रंजना जायसवाल जन्म  : ०३ अगस्त को पूर्वी उत्तर-प्रदेश के पड़रौना जिले में | शिक्षा –गोरखपुर विश्वविद्यालय से “’प्रेमचन्द का साहित्य और नारी-जागरण”’ विषय पर पी-एच.डी | प्रकाशन –आलोचना ,हंस ,वाक् ,नया ज्ञानोदय,समकालीन भारतीय साहित्य,वसुधा,वागर्थ,संवेद सहित राष्ट्रीय-स्तर की सभी पत्रिकाओं तथा जनसत्ता ,राष्ट्रीय सहारा,दैनिक जागरण,हिंदुस्तान इत्यादि पत्रों के राष्ट्रीय,साहित्यिक परिशिष्ठों...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘गलती’

सुशांत सुप्रिय A-5001 , गौड़ ग्रीन सिटी , वैभव खंड , इंदिरापुरम् , ग़ाज़ियाबाद – 201014 ( उ. प्र. ) मो : 8512070086 ई-मेल : sushant1968@gmail शुक्लाजी ने चश्मा लगाया , थैला उठाया , छड़ी ली और बाज़ार से दूध , सब्ज़ी और अन्य सामान लाने के लिए धीमी चाल...

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सुशान्त सुप्रिय की कहानी ‘मिसफिट’

सुशान्त सुप्रिय मार्फ़त श्री एच. बी. सिन्हा , 5174, श्यामलाल बिल्डिंग , बसंत रोड, ( निकट पहाड़गंज ) , नई दिल्ली – 110055 मो:  8512070086 ई-मेल: sushant1968@ gmail.com उसका सिर तेज़ दर्द से फटा जा रहा था । उसने पटरी से कान लगा कर रेलगाड़ी की आवाज़ सुननी चाही । कहीं कुछ नहीं था । उसने जब-जब जो जो चाहा, उसे नहीं  मिला । फिर आज  उसकी  इच्छा   कैसे  पूरी हो सकती थी । पटरी  पर लेटे-लेटे उसने कलाई-घड़ी देखी ।  आधा घंटा ऊपर हो चुका था पर इंटरसिटी एक्सप्रेसका कोई अता-पता  नहीं  था । इंटरसिटी एक्सप्रेस न सही , कोई पैसेंजर गाड़ी ही सही । कोई मालगाड़ी ही सही । मरने वाले को इससे क्या लेना-देना  कि  वह  किस गाड़ी  के  नीचे  कट  कर  मरेगा ।  उसके सिर के भीतर कोई हथौड़े चला रहा था । ट्रेन उसे क्या मारेगी, यह सिर-दर्द ही उसकी जान ले लेगा — उसने सोचा । शोर भरी गली में एक लंबे सिर-दर्द  का नाम ज़िंदगी है । इस ख़्याल से ही उसके मुँह में एक कसैला स्वाद भर गया । मरने के समय मैं भी स्साला फ़िलास्फ़र हो गया हूँ — सोचकर वह पटरी पर लेटे-लेटे ही मुस्कराया । उसका हाथ उसके पतलून की बाईं जेब में गया । एक अंतिम सिगरेट सुलगा लूँ । हाथ विल्स का पैकेट लिए बाहर  आया  पर  पैकेट  ख़ाली  था ।  दफ़्तर से चलने से पहले ही उसने पैकेट की अंतिम सिगरेट पी ली थी — उसे याद आया । उसके होठों पर गाली आते-आते रह गई । आज सुबह से ही दिन जैसे उसका बैरी हो गया था ।सुबह पहले पत्नी से खट-पट हुई । फिर किसी बात पर उसने बेटे को पीट दिया । दफ़्तर के लिए निकला  तो  बस...

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उदयराज की कहानी ‘विश्वास-यात्रा’

उदयराज रितेश और मोहिनी बड़ी सतर्कता से प्लेटफॉर्म पर पहुंच एक कोने में दुबकने के अंदाज़ में बैठ गए। दिल्ली के लिए टिकट आते ही ले लिया था। उनकी नज़रें निरंतर प्लेटफॉर्म पर आने के सभी प्रवेश द्वारों पर घूम रही थीं और कान अनाउंसमेंट पर लगा हुआ था। यूं...

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राजगोपाल सिंह वर्मा की कहानी ‘…सोलह प्रेम पत्र’

राजगोपाल सिंह वर्मा पत्रकारिता तथा इतिहास में स्नातकोत्तर शिक्षा. केंद्र एवम उत्तर प्रदेश सरकार में विभिन्न मंत्रालयों में प्रकाशन, प्रचार और जनसंपर्क के क्षेत्र में जिम्मेदार वरिष्ठ पदों पर कार्य करने का अनुभव. पांच वर्ष तक प्रदेश सरकार की साहित्यिक पत्रिका “उत्तर प्रदेश “ का स्वतंत्र सम्पादन. इससे पूर्व उद्योग मंत्रालय तथा स्वास्थ्य मंत्रालय, भारत...

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आयरिश कहानी ‘पहली उड़ान’

सुशान्त सुप्रिय नाम : सुशांत सुप्रिय जन्म : 28 मार्च , 1968 शिक्षा : अमृतसर ( पंजाब ) , व दिल्ली में ।प्रकाशित कृतियाँ :—————–# हत्यारे ( 2010 ) , हे राम ( 2013 ) , दलदल ( 2015 ) , ग़ौरतलब कहानियाँ ( 2017 ) , पिता के नाम ( 2017 ) : पाँच कथा – संग्रह ।# इस रूट की सभी...

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सुशान्त सुप्रिय की कहानी ‘इंडियन काफ़्का’

सुशान्त सुप्रिय A-5001 ,             गौड़ ग्रीन सिटी ,             वैभव खंड ,             इंदिरापुरम ,             ग़ाज़ियाबाद – 201014             ( उ. प्र. )...

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सूर्यनाथ सिंह की कहानी ‘रजामंदी’

सूर्यनाथ सिंह जन्म : 14 जुलाई 1966 स्थान : सवाना, गाजीपुर इलाहाबाद विश्वविद्यालय और फिर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढाई कई कहानी संग्रह और उपन्यास प्रकाशित। नया उपन्यास ‘नींद क्यों रात भर नहीं आती’ हाल ही में प्रकाशित। जनसत्ता  में वरिष्ठ पत्रकार ‘साहब, मेम साहब आई हैं।’ मुन्नन मियां...

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हिजाब वाली लड़की

अली रिज़वान शिक्षा- जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्लीलेखक “कहानी डिपो” यूट्यूब चैनल एडिटर और कहानी सलाहकार हैं।मोबाइल-9899367276 इधर ईद करीब आ रही थी उधर आदिल और जुनैद के दिमाग़ में एक अलग ही खिचड़ी पक रही थी। आदिल ने एक बार जुनैद को किसी वेश्या के बारे में बताया था।...

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रवि कुमार गुप्ता की कहानी ‘बेपटरी’

  रवि कुमार गुप्ता नवभारत (भुवनेश्वर) में संवाददाता सेंट्रल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई संपर्क : 9471222508, 9437767065 रात का सन्नाटा. सङकें वीरान. स्टेशन की ओर तेजी से बढ़ रहा था. ट्रेन छूट ना जाए कहीं! इस डर ने मेरी रफ्तार बढ़ा दी थी. थैंक गॉड! सही टाइम पर स्टेशन पहुंच गया....

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सुषमा सिन्हा की कहानी ‘रिश्ता’

सुषमा सिन्हा शिक्षा : बीए ऑनर्स (अर्थशास्त्र), फाइल आर्ट में डिप्लोमा छात्र जीवन से ही चित्रकला और लेखन में रुचि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर कई बार रचनाओं का पाठ। चित्रकला के लिए कई बार पुरस्कृत। कृतियां :  मिट्टी का घर (कविता संग्रह), बहुत दिनों के...

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रिजवान अली की कहानी ‘वो ठंडी रात’

अली रिज़वान शिक्षा- जामिया मिलिया इस्लामिया नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता। लेखन- तहलका हिंदी में आपबीती कलम के लिए लिख चुके हैं। इंडिया न्यूज़ में काम कर चुके हैं। आजकल यूट्यूब चैनल कहानी डिपो में कार्य कर रहे हैं। मोबाइल- 9717583570 केशव को दिल्ली आये अभी 6 महीने ही हुए थे और इसी...

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संजीव ठाकुर की बाल कथा ‘जालिम सिंह’

स्कूल का चपरासी बच्चों को बहुत बदमाश लगता था। बच्चे उसे जालिम सिंह नाम से पुकारते थे। जालिम सिंह स्कूल के बच्चों पर हमेशा लगा ही रहता था। किसी को मैदान में दौड़ते देखता तो गुस्साता, झूले पर अधिक देर झूलते देखता तो गुस्साता। कोई बच्चा फूल तोड़ लेता तब...

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शहादत ख़ान की कहानी वेलेंटाइन डे

शहादत शिक्षा-           दिल्ली विश्वविद्यालय के भीमराव अंबेडर कॉलेज से बी.ए. (विशेष) हिंदी पत्रकारिता। संप्रीति-         रेख़्ता (ए उर्दू पोएट्री साइट) में कार्यरत। मोबाईल-        7065710789 दिल्ली में निवास। कथादेश, नया ज्ञानोदय, समालोचना, कथाक्रम, स्वर्ग विभा, परिवर्तन, ई-माटी और जनकृति सहित आदि पत्रिकाओं में कहानियां प्रकाशित। वेलेंटाइन-डे...