Category: कहानी

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘हे राम!’

15 अगस्त का दिन था । सरोजिनी नगर की एक सरकारी कॉलोनी में एक ऊँघते हुए बुधवार की सुबह अलसाई पड़ी थी । बाहर लॉन में कुछ ऐंठे हुए पेड़ खड़े थे जिन पर बैठे हुए कौए शायद स्वाधीनता-संग्राम की कोई कथा सुन-सुना रहे थे । कॉलोनी के गेट के...

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सेवा सदन प्रसाद की तीन लघुकथाएं

गुमशुदा इंसान एक आदमी पागल की तरह सड़क पर दौड़ रहा था। ट्राफिक पुलिस ने डपट कर कहा — “अरे! पागल है क्या ? बार – बार सड़क पे दौड़ रहा है – – क्या ढूंढ रहा है  ?।” ” इंसान ढूंढ रहा हूं ” पागल ने याचना भरे शब्दों...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘बंटवारा’

मेरा शरीर सड़क पर पड़ा था । माथे पर चोट का निशान था । क़मीज़ पर ख़ून के छींटे थे । मेरे चारो ओर भीड़ जमा थी । भीड़ उत्तेजित थी । देखते-ही-देखते भीड़ दो हिस्सों में बँट गई । एक हिस्सा मुझे हिंदू बता रहा था । केसरिया झंडे...

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यशपाल निर्मल की दो लघुकथाएं

गर्व   ” घर में कोई है क्या?” सरपंच अवतार सिंह ने आवाज़ लगाई ही थी कि फकीर चंद  दौड़ते हुए दरवाज़े पर पहुँचा । उसने भय और घबराहट से कहा,” मालिक आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुला लेते। ” “क्यों फकीर चंद, हम तुम्हारे घर भी नहीं आ सकते...

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मुद्राराक्षस की कहानी ‘नाश्ते से पहले’

सुबह जब सीता नाश्ता करने बैठी तो उसने देखा कि उसका बाबा हँसिया लेकर कहीं बाहर जा रहा है। ताज्जुब से सीता ने माँ को टोका, “माँ, बाबा इस वक्त हँसिया लेकर कहाँ जा रहे हैं ?” “बाड़े में जा रहे हैं।” माँ ने जवाब दिया, “सूअर ने कल राते में...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘चिकन’

” आज कुछ नॉन-वेज खाते हैं , स्वीटी । चिकन-शिकन हो जाए । ” बिस्तर पर अँगड़ाई लेते हुए रजिंदर बोला । ” आँख खुली नहीं जी और आपने फ़रमाइश कर दी । ले आना । बना दूँगी । ” बगल में लेटी सुमन बोली । प्यार से रजिंदर उसे...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘एक गुम-सी चोट’

सुशांत सुप्रिय कैसा समय है यह जब बौने लोग डाल रहे हैं लम्बी परछाइयाँ — ( अपनी ही डायरी से ) —————————————————————————————- बचपन में मुझे ऊँचाई से , अँधेरे से , छिपकली से , तिलचट्टे से और आवारा कुत्तों से बहुत डर लगता था । उन्हें देखते ही मैं छिप...

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राकेश कायस्थ का व्यंग्य ‘मत रोइए मी लॉर्ड…’

राकेश कायस्थ मी लार्ड का सादर अभिवादन। आप इस देश के उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायधीश हैं और मैं इस देश का एक अदना सा नागरिक। मेरे बाप-दादा कहा करते थे—- समझदार वही है जो कोर्ट-कचहरी के चक्कर से दूर रहे। कानून के रखवाले बहुत रूलाते हैं। बचपन में जो...

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घर : एक आत्मकथा

सिनीवाली मैं बोल नहीं सकता। पर मैं संवेदनहीन नहीं हूं। जिसमें तुम सब और तुम्हारी विगत पीढि़यों ने जिंदगी गुजारी है, हां मैं ही तो हूं….. तुम्हारा घर । तुम्हारे बाप दादा ने मुझे खून पसीने की कमाई से एक एक रूपया जोड़कर बनाया। जिस दिन मेरी नींव पड़ी थी,...

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मामाजी

रागिनी पुरी करीब छह बज रहे हैं। पूरा घर सुबह की पहली अंगड़ाई ले रहा है। सुमेधा के कानों में हल्की हल्की आवाज़ें छन कर आ रही हैं। कभी बाथरूम की हल्की फुल्की उथल पुथल, तो कभी रसोई में बर्तनों के खड़कने की आवाज़ें…इसका मतलब मामीजी जाग गई हैं। लॉबी...

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तीन लघु प्रेम कथाएं

सत्येंद्र  प्रसाद  श्रीवास्तव महबूबा तुम भूख की तरह आती हो, प्यास की तरह तड़पाती हो, खुशबू की तरह लुभा कर उड़ जाती हो, अभाव की तरह रोम-रोम में बस जाती हो, सपनों में खुशी बनकर आती हो, नींद खुलती है तो महंगाई की तरह इठलाती हो,पूस की ठंड की तरह...

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जंगल ज़िन्दगी

कहानी नूर मुहम्मद नूर पिछले पांच दिनों के भयावह अंतर्द्वन्द्व से आज कहीं जाकर नसीम को मुक्ति मिली। सोमवार की दोपहर अपने दो साल के मटमैले चिथड़े पहने, बेटे को अपनी गोद में सुला रही, उस पागल जैसी औरत को देखने के बाद से, निरंतर पांच दिनों की लंबी मानसिक...

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हाशिये पर

उदयराज   ”हैलो, कौन?” ”हैलो, मैं श्यामल बोलता। तुम्हारे पीछे से।” ”अरे, श्यामल दा। तुमने इस नाशुक्रे को कैसे याद किया?” ”नहीं दीपक, तुम ऐसा मत बोलो। वो हमारा मिस्टेक था।” ”नहीं, श्यामल दा, कुछ तो सच, अ बिट ट्रूथ तो रहा ही होगा न।” ”हम तुम्हारा बात आज भी...

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हमसफ़र

बेटा-बहू के होते भी घोष बाबू अकेले थे लेकिन उन्हें फिर प्यार हो गया। पर तब क्या हुआ जब घोष बाबू का बुढ़ापे का ये प्यार एक अचानक बिना बताए घर छोड़ कर चली गई। अकेलेपन से जूझते एक बुजुर्ग की मार्मिक कहानी

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पति-पत्नी और दर्द

लघुकथा 1 पति (काम से थका हुआ) काम से घर साथ आई पत्नी से- मैडम फटाफट पानी दे दो और अदरक वाली चाय बना दो पत्नी- रूको, थोड़ा आराम कर लूँ फिर बनाती हूं पति-तुम समझती ही नहीं हो। थका हुआ हूँ। तुमको अपनी पड़ी है पत्नी- तो थककर तो...

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तुम्हारी परी

एक परी उनके प्यार की गवाह थी लेकिन अचानक क्या हो गया? परी चुप क्यों हो गई? क्या हुआ उनके प्यार का अंजाम? Read more…