Category: कहानी

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सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की कहानी ‘चटकल’

नरेश झुंझला गया। उसे लगा चटकल में बदली मजदूर का काम करना और भीख मांगना बराबर है। पिछले तीन दिनों से लेबर ऑफिस का चक्कर लगा-लगा कर वह हलकान था लेकिन बाबू थे कि काम देने का नाम ही नहीं ले रहे थे। बस एक ही ज़वाब–आज लोक नहीं लागेगा।(आज...

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क़ैस जौनपुरी की कहानी ‘ए… चश्मे वाले…!’

ट्रेन रुकी. बहुत सारे लोग छोटे से डिब्बे में चढ़े. कुछ उतरे भी. एक साथ चढ़ने-उतरने में कुछ लोग आपस में टकराए भी. कुछ अपना गुस्सा पी गए. कुछ ने कुछ नहीं कहा. वहीं एक से रहा नहीं गया. वो उतरने ही वाला था कि एक चढ़ने वाले से टकरा...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘क्या नाम था उसका?’

अब पानी सिर से ऊपर गुज़र चुका था । लिहाज़ा प्रोफ़ेसर सरोज कुमार के नेतृत्व में कॉलेज के शिक्षक अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए । धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया । प्रोफ़ेसर सरोज कुमार देश के एक ग़रीब और पिछड़े प्रांत के क़स्बे किशन नगर के सरकारी कॉलेज में पिछले पच्चीस...

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सुनें सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव की लघुकथा ‘तुम्हारी परी’

अर्जित पांडेय की लघुकथा ‘लाल लिपस्टिक’ सविता मिश्रा की दो लघुकथाएं डॉ संगीता गांधी की लघुकथा ‘गंवार’ मीनू परियानी की लघुकथा ‘मज़बूरी’ कमलेश भारतीय की दो लघुकथाएं

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘कबीरदास’

यह काल्पनिक कहानी नहीं है , सच्ची घटना है । पिछले साल गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने मामा के यहाँ रहने के लिए आया । वहीं मामाजी ने मुझे यह सत्य-कथा सुनाई । पिछले कई सालों से शहर के इलाक़े रामपुरा शरीफ़ में एक अर्द्ध-विक्षिप्त बूढ़ा भटकता हुआ दिख...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘अपना शहर’

( उन सभी को समर्पित जिन्हें  ‘ अपना शहर ‘ छोड़ना पड़ा ) ” लीजिए , आपका शहर आ गया , ” पत्नी ने कार का शीशा नीचे करते हुए कहा । कार शहर के बाहरी इलाक़ों से गुज़र रही थी । ” पापा , आप यहीं बड़े हुए थे...

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मनीष वैद्य की कहानी ‘एक्वेरियम में मछलियां’

कल दोपहर की ही बात थी। तान्या दरवाजे को ठेलती हुई हवा के झोंके के मानिंद घर में घुसी थी। बस्ता सोफे पर फेंकते हुए पैरों से ही जूते दाएं और बाएं कोनों की ओर उछाल दिए। वह दौड़ते हुए अपनी मम्मी के गले में दोनों हाथ डाले झूलने लगी।...

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क़ैस जौनपुरी की कहानी ‘सफ़ेद दाग़’

इला बड़ी देर से बस के आने का इन्तज़ार कर रही थी. काफ़ी लम्बे इन्तज़ार के बाद जब बस आई, तो इला भीड़ के साथ बस में चढ़ तो गई, लेकिन बैठने के लिए उसे सीट नहीं मिली. उसने भीड़ से खचा-खच भरी हुई बस से उतर जाना चाहा, ये...

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महावीर राजी की कहानी ‘पंच’

रेलवे स्टेशन के गर्भ से नाल की तरह निकल कर ऐश्वर्या राय की कमर की तरह छुई मुई सी “स्टेशन सरणी ” शहर के बीचों बीच से गुजरने वाले अजगरनुमा ‘शेर शाह सूरी मार्ग ‘ को जिस स्थान पर लम्बवत क्रॉस करती आगे बढ़ जाती है, वह जगह शहर के...

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भरत प्रसाद की कहानी ‘देख तमाशा पानी का’

यह पानी भी न, कमाल का मायावी है भाई। पूछो तो कहाँ नहीं घुसा हुआ है ? जीव में, जानवर में, मिट्टी और पत्थर पेड़-पालों, बंजर-धरती, आकाश यहाँ तक कि हवा का भी पीछा नहीं छोड़ता। होगी हवा उड़नछू, पानी उसका भी बाप है। वैसे पानी है बेरंगा, मगर इसके...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘दो दूना पांच’

     कैसा समय है यह / जब भेड़ियों ने हथिया ली हैं / सारी मशालें /                               और हम निहत्थे खड़े हैं … जैसे पहाड़ से एक बहुत बड़ा पत्थर तेज़ी से लुढ़कता हुआ सीधा...

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प्रमोद बेड़िया की कहानी ‘किनारे-किनारे दरिया, किश्ती बांधो जी**’

मैंने उससे कहा – ये तुम्हारा नाम आर्या नहीं भी तो हो सकता था । साथ चलते- चलते वह रुक गई । रूकी हुई वह ज़्यादा ख़ूबसूरत लग रही । मैंने सोचा उससे यह बात पूछूँ कि हर लड़की ही क्या रुकने पर ज़्यादा ख़ूबसूरत लगती है ” फिर सोचा...

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सुधांशु गुप्त की कहानी ‘सामान के बीच रखा पियानो’

दोपहर के चार…साढ़े चार या पांच बजे हैं। अक्तूबर का महीना है। 8….9 या 10 तारीख। उसने अपने घर में प्रवेश किया है। घर में व्हाइट वाश और पेंट का काम चल रहा है। बड़ा बेटा अभी काॅलेज से नहीं आया है और छोटा बेटा स्कूल से आकर ट्यूशन जा...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘हमला’

बाईसवीं सदी में एक दिन देश में ग़ज़ब हो गया । सुबह लोग सो कर उठे तो देखा कि चारो ओर तितलियाँ ही तितलियाँ हैं । गाँवों , क़स्बों , शहरों , महानगरों में जिधर देखो उधर तितलियाँ ही तितलियाँ थीं । घरों में तितलियाँ थीं । बाज़ारों में तितलियाँ...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘हे राम!’

15 अगस्त का दिन था । सरोजिनी नगर की एक सरकारी कॉलोनी में एक ऊँघते हुए बुधवार की सुबह अलसाई पड़ी थी । बाहर लॉन में कुछ ऐंठे हुए पेड़ खड़े थे जिन पर बैठे हुए कौए शायद स्वाधीनता-संग्राम की कोई कथा सुन-सुना रहे थे । कॉलोनी के गेट के...

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सेवा सदन प्रसाद की तीन लघुकथाएं

गुमशुदा इंसान एक आदमी पागल की तरह सड़क पर दौड़ रहा था। ट्राफिक पुलिस ने डपट कर कहा — “अरे! पागल है क्या ? बार – बार सड़क पे दौड़ रहा है – – क्या ढूंढ रहा है  ?।” ” इंसान ढूंढ रहा हूं ” पागल ने याचना भरे शब्दों...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘बंटवारा’

मेरा शरीर सड़क पर पड़ा था । माथे पर चोट का निशान था । क़मीज़ पर ख़ून के छींटे थे । मेरे चारो ओर भीड़ जमा थी । भीड़ उत्तेजित थी । देखते-ही-देखते भीड़ दो हिस्सों में बँट गई । एक हिस्सा मुझे हिंदू बता रहा था । केसरिया झंडे...

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यशपाल निर्मल की दो लघुकथाएं

गर्व   ” घर में कोई है क्या?” सरपंच अवतार सिंह ने आवाज़ लगाई ही थी कि फकीर चंद  दौड़ते हुए दरवाज़े पर पहुँचा । उसने भय और घबराहट से कहा,” मालिक आपने क्यों कष्ट किया? मुझे बुला लेते। ” “क्यों फकीर चंद, हम तुम्हारे घर भी नहीं आ सकते...

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मुद्राराक्षस की कहानी ‘नाश्ते से पहले’

सुबह जब सीता नाश्ता करने बैठी तो उसने देखा कि उसका बाबा हँसिया लेकर कहीं बाहर जा रहा है। ताज्जुब से सीता ने माँ को टोका, “माँ, बाबा इस वक्त हँसिया लेकर कहाँ जा रहे हैं ?” “बाड़े में जा रहे हैं।” माँ ने जवाब दिया, “सूअर ने कल राते में...

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सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘चिकन’

” आज कुछ नॉन-वेज खाते हैं , स्वीटी । चिकन-शिकन हो जाए । ” बिस्तर पर अँगड़ाई लेते हुए रजिंदर बोला । ” आँख खुली नहीं जी और आपने फ़रमाइश कर दी । ले आना । बना दूँगी । ” बगल में लेटी सुमन बोली । प्यार से रजिंदर उसे...