चंद्र प्रकाश श्रीवास्तव की सात कविताएं

जब कविताएं नहीं होंगी

सोचो जरा ऐसे कल के बारे में

जब कविताएं नहीं होंगी

सोचो जब गीतों में सुर नहीं होंगे

सोचो जब आल्हा चैती के स्वर नहीं होंगे

सोचो जब ताल, धुन और लय नहीं होंगे

सोचो जब किस्से और किस्सागो नहीं होंगे

सोचो जब बच्चे सपने देखना भूल जाएंगे

न बारिश की छप-छप होगी

और न कागज की नाव

सोचो जब डालों पर झूले नहीं पड़ेंगे

सोचो जब गांवों में मेले नहीं लगेंगे

सोचो जब सारी दुनिया बाजार में तब्दील हो जाएगी

सोचो जब तिजारती हुक्म चलाएंगे

और मसिजीवी थके-हारे खामोश नजर आएंगे

सोचो जब बच्चों की आंखों में सपने नहीं होंगे

सोचो जब मोर-तितली-कबूतर नहीं होंगे

सोचो उस कल के बारे में

कुछ देर ठहर कर

 

जीवित रहेगा राम

जब तक रावण जिंदा है

राम भी जीवित रहेगा

रक्तबीज रावण मरा नहीं अब तक

नगर-नगर, गांव-डगर

सर्वव्यापी है दशानन

उसकी भुजाएं लम्बी हैं

उसके शीश अट्हास कर रहे हैं

किन्तु उसके मुकाबिल

तन कर खड़ा है राम

तनिक भी डरा नहीं है राम

राम अकेला नहीं

उसके साथ असंख्य जन की आवाजें हैं

राम हार नहीं मानेगा

यदि थक गया राम

उसकी जगह खड़े हो जाएंगे कई राम

रावण के मरने से ज्यादा जरूरी है

राम का जीवित रहना

शुक्र करो कि

अभी राम जिन्दा है

और जीवित रहेगा राम

 

कहो दुष्यंत अब क्या करें

पीर अब पिघलती ही नहीं

हिमशिला से कोई नदी निकलती ही नहीं

कहो दुष्यंत

अब कौन सा जतन करें

शिथिल हाथों से

कोई पत्थर

अब आसमां तक उछलता ही नहीं

अपने ही सिर अब लगता अपना पत्थर

बताओ दुष्यंत अब क्या करें

जिस कबूतर से पाती भेजी

फिर वह नीचे आ गिरा है

गौरैया अब नजर आती नहीं

तितली डरी-डरी सी है

बताओ दुष्यंत अब क्या करें

 

चौकीदार के लिए

वो चौकीदार मुझे बहुत भले लगते हैं

जो रात के अंधेरे में

जागते रहो-जागते रहो की आवाज

लगाते हैं

तमाम जोखिम के बावजूद

जो जगाते रहते हैं हमें

चौकन्ना रखते हैं तमाम खतरों के प्रति

अपनी परवाह किये बगैर

जो हमें सावधान करते हैं

उन चोरों उचक्कों से

जो हमारी थाली की रोटी

आंखों की नींद

होठों की हंसी

और नींद के सपने

चुराने पर आमादा हैं

चौकीदार उन उचक्कों के निशाने पर हैं

हमें जागना पड़ेगा अब

चौकीदार की हिफाजत के लिए

 

कुछ पल

जैसे हम चुनते हैं

शापिंग माल में गैरजरूरी चीजों के अम्बार से

रोजमर्रा की कुछ उपयोगी वस्तुएं

आओ चुनें उसी तरह

गहराते समय के बीच से

कुछ चुनिन्दा खुशनुमा पल

आओ सहेज ले कुछ ऐसे पल

जब चांदनी के फूल खिलते हैं

कुछ पल जब तबीयत से पत्थर उछलते हैं

और आसमां में सुराख नजर आते हैं

कुछ पल जब मदद को हाथ उठते हैं

और पहाड़ सी पीड़ा पिघलने लगती है

वो पल जब लोग

गर्मजोशी से हाथ मिलाते हैं

गले मिलते हैं

मुस्कुराते, हंसते, गाते और गुनगुनाते हैं

जब लोग खुशी से थिरक उठते हैं

कुछ पल जब लोग उगते सूरज की ओर देखते हैं

कुछ ऐसे पल जब घने अंधेरे के बीच

रोशनी की लकीर नजर आती है

और राह दिखाई देती है

कुछ ऐसे पल जब

कविताएं रची जाती हैं।

 

कलुवा का सच

बन्द वातानुकूलित कक्ष में

बन रही थीं तमाम विकास योजनाएं

हर हाथ को काम

सबके सिर पर छत

सड़क, नाली, शौचालय, इण्टरनेट

और पीने का पानी

बच्चों के लिए स्कूल और किताबें

मुफ्त भोजन और अनाज

फलानां, ढेमाका

बिसलेरी सजी मेजों के सामने

नियोजकों के चेहरे आत्ममुग्धता से भरे हुए थे

उनके चेहरों पर गजब की चमक थी

ठीक उसी समय जब

महोबा के रामदीन और कलुआ

घास की रोटी खाकर

गड्ढे का सड़ा पानी पी रहे थे।

योजनाएं चल निकलीं

समीक्षाओं बैठकों का दौर चला

निरीक्षण हुए

सत्यापन हुए

कहीं फटकार कहीं सराहना

अन्ततः

योजनाएं शत प्रतिशत कामयाब रहीं

लेकिन महोबा के कलुवा और रामदीन

फटे चीथड़े वस्त्रों में

तब भी खा रहे थे घास की रोटी

और पी रहे थे

सूखे पोखर का बदबूदार पानी।

 

डायरी

उपहार में मिली नयी डायरी

दस बरस पहले

मैनें रख दी थी

कुछ नयी कविताएं लिखने के लिए

किताबों की आलमारी साफ करते हुए

आज फिर हाथ लगी है

वह पुरानी डायरी

जिसमें लिखा है

दूध का हिसाब

कुछ दोस्तों के फोन नम्बर

दूर की मौसी का पता

रिश्तेदारों के बच्चों के जन्म की तारीखें

जुकाम से राहत पाने के नुस्खे

बेल का मुरब्बा बनाने की विधि

डायरी के पन्नों में दबी पड़ी मिली है

पिता के हाथ की लिखी आखिरी चिट्ठी

डायरी में मैंने

कभी कोई कविता नहीं लिखी

लेकिन डायरी भरी पड़ी है

जिन्दगी की असल कविताओं से

चिलबिल का पेड़

किसी ने बोया नहीं कोई बीज

किसी ने रोपा भी नहीं

अपने आप उग आया

मेरे घर के सामने चिलबिल का नन्हा पौधा

न किसी ने खाद दी

और न ही किसी ने सींचा उसे

अपने आप बढ़ता गया चिलबिल का पौधा

जमीन से पानी/हवा से आक्सीजन लेकर

वह निरन्तर बढ़ता रहा

देखते ही देखते

एक विशाल चिलबिल का पेड़ बन गया

राह चलते जानवरों ने बार-बार नोचा

बालू लदी ट्रकों से रगड़ खाता रहा

कई बार उसकी डालियां भी टूटीं

पर वह बार-बार फुनगता रहा

और तनकर खड़ा रहा

किसी परिन्दे ने अनजाने में

लाकरगिराया होगा चिलबिल का एक बीज

आज सैकड़ों परिंदे रोज

आकर बैठते हैं उस चिलबिल के पेड़ पर

गूंजता रहता है जीवन का संगीत

और जब उड़ते हैं, चोंच में

लेकर जाते हैं चिलबिल का बीज

जीवन का संगीत

जगह जगह बिखेरने के लिए

एक बीज काफी है जीवन के लिए

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